Friday, 20 February 2026

श्रीमद्भगवद्गीता -10

 

श्रीमद्भगवद्गीता 


21-02-2026

ब्लॉग-10

                             दसवॉं अध्याय

ओशो कृष्ण को विश्व-मनोविज्ञान का पिता कहते हैं. कृष्ण अर्जुन से जब जो कह रहे होते हैं तब उनकी मनस्थिति को भी पढ़ रहे होते हैं. उन्हें लगा जैसे अर्जुन को उनकी बातों को समझने में कुछ कठिनाई हो रही है. वह कहते हैं- ‘अर्जुन! फिर भी तू मेरे इस श्रेष्ठ वचन को सुन. मेरे मन में तेरा हित करने की बलवती इच्छा है. तू जान कि इस संसार की प्रत्येक बस्तु मेरी ही विभूति है.

# हिन्दी पद्यकार०-श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा-वह उनमें मनवाला हो उनका भक्त बन उन्हें पूजते हुए भी उनके परम वचन को सुने-

श्री भगवान ने कहा :

       फिर भी तू सुन महाबाहु! इस मेरे परम बचन को

       कहूँगा तेरी हित-इच्छा से तुझ  अतिशय  प्रेमी  से ।1

       नहीं  जानते  सुर  महर्षि  लीला  से  मेरा प्रकटन1      

       क्योंकि आदि कारण मैं ही सब देवों मर्हिर्षयों का ।2

       जो जानता अनादि अजन्मा लोक-महेश्वर मुझको

       मर्त्यों में  वह  ज्ञानवान  होता प्रमुक्त सब अघ से ।3

       निश्चयबुद्धि2 ज्ञान अमूढ़ता सत्य क्षमा मन-निग्रह 

       सुखदुख उद्भव नाश भयाभय  सर्वेंद्रिय-संयम भी ।4

       यश  अपयश  संतोष अहिंसा दान तपस्या  समता

       होते   ये  उत्पन्न   भाव  नाना  प्रकार  के  मुझसे ।5

       सात महर्षि चार पहले के  सनकादिक मनु चौदह

       मुझमें निष्ठ मेरे मन-जन्मे3 जिनकी लोक-प्रजा यह ।6

       मेरी  इस विभूति4  योग5  को जो यथार्थ से जाने

       होता अचल युक्त  योग6  से संशय नहीं तनिक भी ।7

       मुझसे ही उत्पन्न जगत यह  जग चलता मुझसे  ही

       ऐसा   मान   बुद्धिमान   जन  भजें  मुझे  श्रद्धा से ।8

       मुझमें  लगा  प्राण  चित्त वे  मुझे  जनाते7 परस्पर

       कहते  मेरे  गुण  प्रभाव  को  तुष्ट  मुझी  में   रमते ।9      

       नित्य  ध्यान में  लगे मेरे  जो  मुझे  प्रेम  से भजते

       बुद्धियोग8  देता  मैं  उनको  मुझे प्राप्त हों  जिससे ।10

       उन पर कृपा  हेतु  उनके  ही आत्मभाव में स्थित

       तत्वज्ञान-दीप  से  करता  नष्ट  अज्ञान-तम उनका ।11                 

# हि.प०- अर्जुन पूछते हैं- हे भगवन! तेरे अमृत वचन को सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती- मैं यह नहीं समझ रहा कि किन भावों में तू मेरे लिए चिंतन योग्य है?

अर्जुन ने कहा: 

       परम ब्रह्म  तू  परम धाम हो  तू पवित्र  परम  हो

       दिव्य सनातन पुरुष अजन्मा आदि देव सब-व्यापी ।12

       यही सर्व ऋषि नारद देवल असित व्यास कहते हैं

       और स्वयं  तू भी  कहते  हो  मेरे  प्रति  अपने  को ।13        

       केशव! जो  कहते तू  मुझसे  सत्य  मानता  सबको

       भगवन!  नहीं  जानते  तेरा प्रकटन  देव न  दानव ।14

       स्वयं  जानते  पुरुषोत्तम!  तू  अपने  को  अपने  से

       देवदेव!  भूतेश!  जगत्पति!   भूतों  के  भावक9  तू ।15

      पूर्ण कथन में सक्षम तू निज दिव्य विभूतियों के उन   

       जिनसे  व्याप्त किए स्थित तू इस सम्पूर्ण जगत को ।16

       किस प्रकार जानूँ  योगेश्वर! तुझे नित्य चिंतन कर

       भगवन! तू  किनकिन भावों में  चिंतनयोग्य मेरे से ।17

       फिर कह सविस्तार योग  व विभूतियॉ  तू अपनी

       तेरे अमृत बचन  को  सुन  होती न तृप्ति  जनार्दन! ।18

# हि.प०-भगवान ने अर्जुन को अपनी विभूतियॉ बताईं-

श्री भगवान ने कहा:

       अब,जो मेरी दिव्य विभूतियॉ तुझे प्रधानतः10कहता 

       अन्त नहीं कुरुश्रेष्ठ! विभूतियों के  विस्तार का मेरी ।19

       गुडाकेश!  मैं  सभी प्राणि  के  उर-स्थित आत्मा हूँ      

       और आदि भी मध्य अंत भी  सब प्राणी  का  मैं ही ।20

       मैं हूँ विष्णु अदिति-पुत्रों में रश्मि-सूर्य11ज्योतियों में  

       मरुतों12 का  मैं  तेज, चंद्रमा  अधिपति नक्षत्रों का ।21

       वेदों   में   मैं   सामवेद    मैं   इंद्र   देवतागण   में 

       मन  हूँ  सभी  इन्द्रियों  में  चेतना  सभी  प्राणी में ।22

       यक्ष  राक्षसों   में   कुबेर   मैं   रुद्रों  में  शंकर   हूँ

       वसुओं में मैं अग्नि सुमेरु हूँ मैं ही शिखर-पर्वतों13में ।23

       पुरोहितों में मुख्य वृहस्पति जान पार्थ!  तू मुझको      

       सेनापतियों  में   स्कंद   मैं   जलाशयों  में   सागर ।24

       महर्षियों  में  भृगु  मैं  ही  मैं  शब्दों   में  अक्षर हूँ

       तुंग हिमालय  स्थावरों  में  मैं  जपयज्ञ  सुयज्ञों  में ।25

      पीपल हूँ  सब  वृक्षों  में मैं    देवर्षियों में नारद

       सुष्ठु14 चित्ररथ गंघर्वों में सिद्धों में  मैं कपिल मुनी ।26

       अश्वों में मैं उच्चैःश्रवा जो प्रकट सुधा संग निधि15से

       श्रेष्ठ गजों  में  ऐरावत मैं  मैं ही  नृपति मनुष्यों में ।27

       मैं  ही  वज्र  आयुधों में  मैं कामधेनु  हूँ  गौओं  में

       प्रजनन में  कंदर्प16 और  हूँ सर्पों में  वासुकि मैं ही ।28

       नागों  में  मैं शेषनाग मैं नायक वरुण जलचरों का  

       मैं  अर्यमा17 पितर  लोगों में मैं यमराज शासकों में ।29

       दैत्यों   में  प्रह्लाद  और  मैं  काल  गणन-कर्ता  में     

       पशुओं  में  मैं  ही  मृगेंन्द्र   हूँ  गरुड़  पक्षियों  में  हूँ ।30

       पवन पवित करने वालों में शस्त्रधारियों में  मैं राम

       मगर18जंतुओं में जल का मैं पूत जाह्नवी नदियों में ।31        

       इस  सम्पूर्ण  सृष्टि  के अर्जुन! आदि मध्य अंत  मैं ही   

       विद्याओं  में  ब्रह्मविद्या  मैं वाद वादकर्तागण19 का ।32     

       मैं   अ-कार  अक्षरों  में  हूँ  द्वंद्व  समास समासों  में

       मैं  हूँ  अक्षय  काल  सर्वतोमुख20 धाता  भी  मैं  ही ।33

       मैं  हूँ  मृत्यु   सर्वनाशी  मैं  ही  भविष्य  का उद्भव

       कीर्ति  धैर्य  स्मृति  मेधा श्री  वाणी  क्षमा स्त्रियों में ।34

       वृहत्साम21  गेय  गीतों  में   छंद  गायत्री  छंदों  में 

       मासों  में  मैं मार्गशीर्ष  हूँ ऋतु वसंत  मैं ऋतुओं में ।35

       छलियों में मैं   जुआ तेज मैं  प्रबल तेजस्वी  जन में

      जेता-जीत22 व्रती-निश्चय23 मैं सत्व सात्विकों का हूँ ।36

       वृष्णिवंश में  वासुदेव  मैं  मैं  ही  पार्थ  पांडवों  में      

       मुनियों  में हॅू व्यास और हूँ  शुक्राचार्य सुकवियों में ।37

       दमनशील  की दण्डनीति मैं नीति जीतकामी24 की  

       मैं  हूँ  मौन गुह्य  भावों में  मैं ही  ज्ञान ज्ञानियों में ।38

       अर्जुन!  सभी  प्राणियों  का जो बीज, बीज मैं ही हूँ

       ऐसा नहीं प्राणि  कोई चर अचर  रहित  जो मुझसे ।39

       मेरी   दिव्य   विभूतियों   का   अंत   नहीं  परंतप! 

       यह  विभूति विस्तार कहा जो जान  बहुत थोड़ा है ।40

       जुडे़  सत्व25 जो जो  विभूति  से शोभा  से व बल से

       समझो  सब  उत्पन्न   हुए  वे   तेज- अंश   से  मेरे ।41

       अथवा  बहुत  जानने से  है अर्थ  तुझे क्या अर्जुन!

       मैं  अपने एक ही   अंश से जगत  व्याप्त कर स्थित ।42

           विभूतियोग नाम का दसवॉ अध्याय समाप्त

1 प्रकाश में आना 2. निश्चय करने वाली बुद्धि 3. मन से उत्पन्न 4. परम ऐश्वर्य 5. योग शक्ति 6. भक्ति योग 7. मेरे प्रभाव को एक दूसरे को जनाते अर्थात बताते हैं 8. तत्वज्ञान रूपी योग  9. उत्पन्न करने वाले 10. प्रधानता से 11 किरणों वाला सूर्य 12. वायु के देवताओं. 13. शिखर वाले पर्वतों 14. सुन्दर 15. समुद्र 16. कामदेव 17. एक पितर का नाम 18. मगरमच्छ 19. परस्पर विवादी 20. सभी और मुख वाला 21. बड़ा सामवेद 22.विजयी की जीत 23. निश्चय करने वालों का निश्चय  24. जीत की इच्छा वाले  25. प्राणी तथा पदार्थ

 शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव 

७१५ डी, पार्वतीपुरम, चक्शाहुस्सैन,

बशारतपुर, गोरखपुर, २७३००४, उ.प्र

Email- sheshnath250@gmail.com

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