Friday, 1 September 2017

देवेंद्र आर्य की दृष्टि में देवेंद्र कुमार बंगाली : कवि-कर्म और दलित-संबंध

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

देवेंद्र कुमार बंगाली गोरखपुर के कविता-क्षेत्र में एक अच्छा खासा नाम हैं. वह गामीण परिवेश के कवि हैं और शहरी परिवेश के भी.
इनके दो संकलन मेरे सामने हैं-“देवेंद्र कुमार की प्रतिनिधि कविताएँ” और “आधुनिक हिंदी कविता के पहले दलित कवि देवेंद्र कुमार बंगाली”. इन दोनों संकलनों को कवि देवेंद्र आर्य ने संपादित किया है.
आर्य ने इस दूसरे संकलन की एक विस्तृत भूमिका लिखी है. इस भूमिका में कवि के कवि-कर्म पर और उनका व्यक्तिगत परिचय देकर उनके दलित-संबंध पर चर्चा की गई है. इसमें उनके काव्यत्व पर एक हल्की समीक्षात्मक टिप्पणी भी है जिसमें उनके समूचे काव्य की चर्चा की गई है. कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व की सुंदर और संतुलित विवेचना भी की गई है. इस विवेचना को निर्मम कहा जा सकता है. क्योंकि इसमें कवि की स्तुति में समय न खर्च कर उनकी कविताओं की, उनके सृजित बिंबों की आलोचना की गई है. आज की आलोचना से अलग इसमें सूक्ष्मग्राही दृष्टि से काम लिया गया है.
इस भूमिका का आधार लेकर, इस लेख में, आर्य की दृष्टि से देखे गए कवि के कवि-कर्म और व्यक्तित्व पर मैंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणी दी है.
गोरखपुर एक ऐसा जन-क्षेत्र है जहाँ के जन, कविता कवि सम्मेलनों में अधिक सुनते हैं, पढ़ते कम हैं. कविताएँ पढ़ता है प्रबुद्ध वर्ग. देहाती परिवेश के प्रति संवेदनशील होते हुए भी देवेंद्र कुमार प्रबुद्ध वर्ग के ही कवि जान पड़ते हैं.
कविता के क्षेत्र में देवेंद्र कुमार बंगाली का सत्तर के दशक में ही आविर्भाव हो गया था. उस समय (सन् 1966-68 में) मैं नीना थापा इंटर कॉलेज में था, मेरे अध्यापक मित्र सैयद असगर मेंहदी आपसी कविता-चर्चा के दौरान कभी कभी देवेंद्र कुमार बंगाली का नाम लेते थे, उनकी एकाध कविताएँ भी सुनाते थे. ये कविताएँ वे अपने रेल कर्मी पिता से पाते होंगे. देवेंद्र कुमार बंगाली भी रेल-कर्मी थे और मेंहदी के पिता भी. इनमें साहित्यिक रुचि भी थी. बंगाली की कविताएँ नयी शैली की होतीं थीं. तब कविता में वादों की आँधियाँ चल रहीं थीं. लेकिन देवेन्द्र कुमार किसी वाद से ग्रस्त होते सुनाई नहीं दिए. गोरखपुर से बाहर उनकी कविताओं की चर्चा कम ही हुई.
अस्सी के दशक में प्रबुद्ध वर्ग में उनकी कविताओं की चर्चा होने लगी थी. सन् 1972 में उनकी पहली कृति प्रकाशित हुई- ‘कैफियत’, और सन् 1980 में ‘बहस जरूरी है’. किंतु सन् 2016 के पुस्तक मेला में ही मुझे आर्य द्वारा संपादित उनकी एक प्रतिनिधि कविताओं का संकलन मिला. और दूसरा संकलन उसके कुछ ही समय बाद.
इस दूसरे संकलन की भूमिका पाँच खंडों में है. पहले खंड में कवि के संबंध में सामान्य बातें की गई हैं. कवि के व्यक्ति के संबंध में संपादक का आकलन है कि वह एक सहृदय, सरल-हृदय, संवेदनशील पर चुप्पा कवि थे. उन्होंने अपनी कविताओं में अपने परिवेश (सोच, समझ और जीने) के अनुभव को समेटा है.
भूमिका के तीसरे खंड में आर्य, कवि के संबंध में एक आलोचना योग्य बात कहते हैं-
देवेंद्र कुमार बिना कहीं घोषित किए कि वे दलित रचनाकार हैं, साहित्य के ब्राह्मणवाद पर गहरी चोट
कर जाते हैं (पृष्ठ 23).
इस उद्धृतांश के अध्ययन से अनुमान होता है कि देवेंद्र कुमार के मन में कहीं न कहीं दलित-कुंठा दबी पड़ी थी. वह भोले भाले थे पर सरल-हृदय नहीं थे. उनमें एक चतुर व्यक्ति का वास था. क्योंकि उनकी काव्योक्ति को ब्रह्मणवादी सीधे न समझ कर समझते समझते कहीं समझ सकते थे कि उनकी कोई खास कविता ब्राह्मणवाद पर कटाक्ष है और फौरी प्रतिक्रिया से बच सकते थे (यह कोई टिप्पणी नहीं, उस वाक्य का लक्ष्यार्थ प्रतीत होता है). उनके सहकर्मी जगदीश नारायण श्रीवास्तव बताते हैं कि वह अपने प्रति जातिसंज्ञक संबोधन से चिढ़ते थे.
आर्य पृष्ठ 24 पर कहते हैं- चाहे जिस भी कारण से, उनकी लगातार उपेक्षा हुई और वे हिंदी के सवर्ण साहित्य परिसर में मुख्य धारा से काट दिए गए.
भूमिका से लिए इस उद्धृतांश में शुरू का वाक्य बहुत विरोधाभासी है. संपादक आर्य के ही अनुसार देवेंद्र कुमार बंगाली गोरखपुर के अपने समय के वह नवोदित कवि थे जिनकी कविता धर्मयुग ने छापी, और वह प्रचार पाए. साप्ताहिक हिंदुस्तान ने भी छापी तथा अन्य और पत्रिकाओं ने भी छापी. फिर भी आर्य की यह उलाहना? जहाँ तक उनपर किसी आलोचनात्मक पुस्तक की बात है, शहर के कुछ नामचीनों को छोड़कर अभी भी कई कवि हैं जो इस दृष्टि से उपेक्षित हैं, और ये सभी दलित नहीं हैं. गणेश पाणडेय खुद अपनी जमीन बना रहे हैं. बंगाली किन्हीं कारणों से अपनी जमीन नहीं बना पाए यही कहना युक्तिसंगत है. देवेंद्र कुमार बंगाली जैसे स्वाभिमानी कवि के लिए परमुखापेक्षिता की बातें करना उचित नहीं लगता. अन्यों ने उनकी उपेक्षा कर दी इसलिए वे कम चर्चित हुए यह कहना भी ठीक नहीं. जायसी तो कई सौ बर्षो तक साहित्य जगत में उपेक्षित रहे. किंतु सूफी समुदाय में परम पूजित रहे. क्या ‘बंगाली’ दलित समाज में उतने ही सम्मान्नित थे? आर्य को इसपर भी विचार करना चाहिए था. मुझे तो नहीं लगता कि उनकी कविताएँ दलितों में बहुत लोकप्रिय थीं.
उक्त उद्धृतांश के परवर्ती वाक्य में किसी “सवर्ण साहित्य परिसर” का उल्लेख है. क्या हिंदी साहित्य जगत में वाकई सवर्ण साहित्य परिसर नाम की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई संस्था है? धर्मयुग जैसी उक्त पत्रिकाओं के संपादक सवर्ण थे तो ये पत्रिकाएँ सवर्ण साहित्य परिसर का अंग हुईँ मान लिया जाए तो सवर्ण साहित्य परिसर में मुख्य धारा से उन्हें कहाँ काटा गया. वे मुख्य धारा की पत्रिकाएँ थी और उनने देवेंद्र कुमार की कविताएँ छापी थीं. आज दलितों में से भी हिंदी साहित्य जगत में प्रखर लेखक-विभूतियाँ हैं पर उनमें से किसी ने उनके काव्य पर अपनी लेखनी नहीं चलाई. आर्य यहाँ किसी तरह की कुंठा से पीड़ित दिखाई दे रहे हैं,
भूमिका में संकलन संपादक आर्य ने (पृष्ठ 17-18 पर) बंगाली के एक बिंब सृजन की अस्वाभाविकता को दिखाया है. बंगाली द्वरा वह सृजित बिंब है-
कविता को अच्छी होने के लिए
उतना ही संघर्ष करना पड़ता है
जितना एक लड़की को औरत होने के लिए
(यह वसंत : बहस जरूरी है)
आर्य यहाँ मान बैठे हैं कि कविता सायास लिखी जाती है (कवि भी यही संकेत करते है) और आयास के संघर्ष में विकसित होती कविता को किसी लड़की के औरत होने के प्रकृत विकास के साथ जोड़कर बिंब खड़ा करना त्रुटिपूर्ण है. बात तो पते की है, पर आर्य को इस तथ्य पर भी गौर कर लेना चाहिए था कि मिथुनरत क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर क्रौंच के मारे जाने पर मादा क्रौंच के चीत्कार से बाल्मीकि के हृदय में जो करुणा उमड़ी और वाणी से निःसृत हुई, उसने अनूठी कविता का रूप धारण कर लिया. यह कविता सायास नहीं थी स्वतःस्फुरित थी, किसी लड़की के औरत होने में नैसर्गिक विकास जैसी. बाल्मीकि की करुणा नैसर्गिक थी और वाणी भी.
अपनी उक्त आलोचना को और स्पष्ट करने के लिए आर्य ने उन्हीं की एक अन्य काव्य-पंक्ति उद्धृत की है-
धूप और अँधेरे की मिली जुली इच्छा है
कि मछलियाँ तालाब से बाहर आएँ...
अपने खाए जाने के खिलाफ
दबी जुबान से ही, मगर कुछ बोलें (परिसंवादः बहस जरुरी है)
और उनकी काव्य-दृष्टि पर टिप्पणी करते उक्त भूलभुलैया में फँस गए हैं-
यह एक इतिहासविरोधी काव्य-दृष्टि है. एक तो धूप और अँधेरे की मिली जुली इच्छा नहीं हो सकती. एक यदि पक्ष है तो दूसरा उसका प्रतिकार. दूसरेव्यवस्था चाहती ही यह है कि मछलियाँ पानी से बाहर आकर विद्रोह करें ताकि उनका विद्रोह आत्महत्या में बदल जाए.
उक्त काव्य-पंक्तियों की यह आलोचनात्मक व्याख्या बहुत अटपटी लगती है. इस क्षण विद्वद्जनों का कहना मुझे याद आ रहा है कि अभिव्यक्ति की भाषा दो प्रकार की होती है, एक तथ्यानुवर्तनी और दूसरी भावानुवर्तनी. काव्य में भावानुवर्तनी भाषा का प्रयोग होता है. भावानुवर्तन के वशीभूत होने से ही कवि काव्य में प्रतीकों और बिंबो तथा मानवीकरण का संयोजन करता है. काव्य में प्रतीक भी बोलते हैं, बिंब भी बोलते हैं और मानवीकरणकृत तथ्य भी बोलते और इच्छाएँ रखते हैं. राजेश जोशी के जिद काव्य-संकलन की कविता अँधेरे के बारे में कुछ वाक्य का अँधेरा और उजाला दोनों बोलते हैं और इच्छाएँ भी रखते हैं. और आर्य यहाँ धूप और अँधेरे का इच्छायुक्त होना इतिहासविरोधी बता रहे हैं (इतिहासविरोधी अथवा तथ्यविरोधी?). ‘मिलीजुली’ शब्द से संकेत मिलता है कि उनकी अकेली अकेली इच्छाएँ हो सकती है. अकेली अकेली हो सकती हैं तो मिलीजुली क्यों नहीं. भावानुवर्तन की भाषा में किसी की भी इच्छाएँ हो सकती हैं.
अपनी इस आलोचना में आर्य ने एक और उलझन पैदा कर दी है- वह धूप को पक्ष और अंधेरे को उसका प्रतिकार बता रहे हैं. उन्होंने इस बात का ख्याल नहीं किया कि अँधेरा का अपना कोई अस्तित्व है ही नहीं. अँधेरे का होना धूप के न होने से ही है. जबतक दीया जलता है अँधेरा पास फटकता नहीं, दीया बुझा अँधेरा हाजिर. फिर इनको पक्ष और उसके प्रतिकार (प्रतिपक्ष) का प्रतीक कैसे माना जा सकता है. पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों अस्तित्ववान होते हैं. उन्होंने इसमें व्यवस्था को भी ला खड़ा किया है. लगता है उनपर मार्क्सवादी विचारधारा हाबी है. मछलियाँ पकृति की व्यवस्था में जल में रहती हैं. मछुआरा किसी मानवी व्यवस्था में अपने जीवन यापन के लिए उन्हें जल से निकालता है, जल से निकलते ही मछलियाँ मर जाती है. आर्य व्याख्या करते हैं कि मानवी व्यवस्था मछुआरों द्वारा मछलियों को जल से इसलिए निकलवाती है कि वे आत्महत्या कर सकें (या मनुष्यों के जीवन-यापन में सहयोग दे सकें?). आर्य की यह व्याख्या जबरदस्ती की है. अगर देवेंद्र कुमार बंगाली ने व्यवस्था को आततायी दिखाने के लिए यह बिंब सृजित किया
है तो यह त्रुटिपूर्ण है.
मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि क्या बिंब ऐसे नहीं होने चाहिए जिसमें कवि जो अर्थ संप्रेषित करना चाहता है, उसके कुछ अर्थ-संकेत उसमें हों. मुक्तिबोध ने अपनी अँधेरे में कविता में एक रक्तस्नात पुरुष का बिंब सृजित किया है. यह बिंब अभी भी आलोचकों के लिए एक पहेली है. सबने इस बिंब पर अपने अपने अर्थ आरोपित किए हैं.
देवेंद्र आर्य भूमिका में एक विवादास्पद बात भी करते हैं-
देवेंद्र कुमार अपने को दलित मानते थे या नहीं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे दलित थे या नहीं ?” (पृष्ठ 24).
देवेंद्र कुमार बंगाली दलित थे या नहीं, यह तय करना बहुत महत्वपूर्ण क्यों है. सरकारी फाईलों में तो ऐसा करना कई कारणों से जरूरी होता है किंतु साहित्य में भी ऐसा करना....यह जान लेने से क्या उनके काव्य-व्यक्तित्व में कोई निखार आ जाएगा, जिससे दलित न कहने से वह वंचित रह जाते? आर्य के इस तर्क के आधार पर तो अम्बेडकर को दलित महात्मा या रैदास को दलित संत कहना चाहिए. कुमार के स्वयं को दलित न मानने के पीछे कोई कारण रहा होगा. आर्य को उसे जानने की कोशिश करनी चाहिए थी. उनकी इच्छा के विपरीत उनके प्रति दलित विशेषण प्रयुक्त करना आर्य के किसी विशेष प्रयोजन की ओर ईशारा करता है. दलित शब्द एक राजनीतिक शब्द है. संभव है कुमार को दलित कहने के पीछे उनका कोई राजनीतिक उद्देश्य हो.
देवेंद्र कुमार बंगाली को दलित विशेषण से विभूषित करते हुए आर्य उन्हें आधुनिक हिंदी कविता का पहला दलित कवि कहते हैं. कवि को दलित कहने से आर्य का क्या उद्देश्य हो सकता है. इसका हल्का सा अनुमान उनकी इस पंक्ति में झलकता है- आखिर ऐसा क्यों हुआ कि आज जो दलित नहीं है, वह भी चाहता है कि उसे दलित साहित्यकारों में शुमार कर लिया जाए (पृष्ठ 21). शायद आर्य को यह भय हो गया लगता है कि कहीं इन दलित साहित्यकारों (में से कोई) दो पीढ़ी पुराने प्रमाण-पत्र पर स्वयं को (पहला दलित कवि) रेखांकित न करा ले (वही पृष्ठ). कैसा बेतुका भय है यह. आर्य शोध छात्रों के लिए भी कुछ नहीं छोड़ना चाहते. इसी पृष्ठ पर वह यह भी कहते हैं- स्वयं देवेंद्र कुमार ने कभी यह जाहिर नहीं होने दिया, न व्यक्तिगत बातचीत में न कविता में, कि वे जन्मना दलित हैं. आर्य ने उनकी मन:स्थिति को जानने की चेष्टा नहीं की कि कवि ने ऐसा क्यों किया. वह केवल जिज्ञासा भर करके रह गए- देवेंद्र कुमार की इस मन:स्थिति के पीछे कुंठा थी या उनकी प्रगतिशील-वाम चेतना? (पृष्ठ वही).
कवि को दलित विशेषण से अभिहित करने के पूर्व उन्हें उनके मन की स्थिति को जानने का प्रयास करना चाहिए था. हालाँकि वह इतना अवश्य कहते हैं- वे सबके प्रिय और आदरणीय बनना चाहते थे (पृष्ठ23). बस केवल इतना ही कारण था उनके अपने को दलित कहकर प्रकट न करने का? और ऐसा सोचना कोई गलत तो नहीं था.
इसी पृष्ठ 23 पर आर्य यह भी कहते हैं- देवेंद्र कुमार के लिए उनका मात्र कवि-रूप ही महत्वपूर्ण था, दलित कवि-रूप नहीं. उन्हें अलग से दलित-बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ी. किंतु उनकी मृत्यु के उपरांत आपने उन्हें दलित-बैसाखी को पकड़ा ही दिया और अफसोस जताते हैं- काश! उन्होंने इसपर (दलित-बैसाखी ग्रहण करने पर?) सचेतन रूप से ध्यान दिया होता तो शायद कुछ मार्मिक कविताएँ हिंदी जगत को दे पाए होते. दलित-बैसाखी न लेने के कारण उन्हें वह प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़ी थी जिसके चलते दलित साहित्य का अलग अस्तित्व सामने आया. तो आपने उन्हें दलित विशेषण देकर उनकी यह कमी पूरी कर दी?
मुझे यही समझ आ रहा है कि भले ही देवेंद्र कुमार ने आज के दलित-साहित्य जैसी मार्मिक कविताएँ न दी हों पर वह दलित कवि अर्थात दलितों में से एक कवि हैं और पहले कवि हैं यही बताना भूमिका लेखक की मंशा है.
‘दलित कवि’ से एक और अर्थ का द्योतन हो सकता है- दलितों के कवि या कहें दलितों के संबंध में सोच समझ रखने और उनके लिए कविता लिखने वाले कवि. एक तीसरा अर्थ भी लिया जा सकता है ‘दलित कवि’ का- दलित चेतना के कवि.
भूमिका में दलितों के प्रति उनकी सोच समझ या दलितों के लिए उनकी लिखी कविता का तो कोई जिक्र नहीं है पर दलित परिवेश को लेकर लिखी एकाध कविता का जिक्र अवश्य है. पर ऐसी कविताएँ तो दलित परिवेश से बाहर के कवि भी लिखते हैं और लिखे हैं. सन् 1929 में लिखी निराला की एक कविता है-
दलित जन पर करो करुणा
दीनता पर उतर आए प्रभु
तुम्हारी शक्ति वरुणा. (अणिमा)
इस कविता में दलित शब्द को व्यापक अर्थ में लिया गया है. जिसमें दीनता हो वे सभी दलित हैं चाहे वे किसी वर्ग से हों. आगे चल कर राजनीति में अम्बेडकर के डिप्रेस्ड क्लास को दलित कहा गया जो एक सीमित अर्थ देता है. इस सीमित में भी सीमित वर्ग (चमार या अछूत) के लिए आर्य ने दलित शब्द का प्रयोग किया है. आर्य की इस सोच ने थोड़ी देर के लिए मुझे सोच में डाल दिया कि बंगाली को उनकी जाति बताकर उन्हें दलित कवि कहने की उन्हें क्या आवश्यकता आन पड़ी, जबकि आर्य के अनुसार ही मृत्युपर्यंत वह अपने को दलित कहलाने को तैयार नहीं थे.
खैर, दलित कवि से आर्य का क्या यह भी मकसद हो सकता है- दलितों के कवि अथवा दलित चेतना के कवि- यह जानने के लिए एक अलग लेख तैयार करने की आवश्यकता जान पड़ती है. वह फिर कभी.
                                                                                                                    रचनाकार में प्रकाशित 01-09-2017

Tuesday, 15 August 2017

“अँधेरे के खिलाफ ऊजाले की जिद” पर एक समीक्षकीय टिप्पणी

समीक्षा की समीक्षा                                                                                                                         रचनाकार में प्रकाशित

शेषनाथ प्रसाद

                   
    यह समीक्षा-लेख वाणी प्रकाशन से सुधीश पचौरी के संपादकत्व में प्रकाशित पत्रिका ‘वाक्’ के मार्च 16, अंक 22 में छपा है. इस समीक्षा के  लेखक हैं एक शोध-छात्र जगन्नाथ दूबे. दूबे ने इस लेख में राजेश जोशी के काव्य-संकलन ‘जिद’ की समीक्षा की है. लेकिन इसमें जोशी की काव्य-प्रकृति खुल नहीं पाई है. समीक्षक एक शोध-छात्र हैं पर वह इसमें अपनी शोध-दृष्टि का उपयोग करते नहीं दिखाई देते.
    समीक्षक इस समीक्षा में अनुभव करते हैं कि हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो मानवीयता के लिए भयानक संकट का समय है. वह यह भी अनुभव करते हैं कि यह संकट....कवि या कविता की तरफ से पैदा किया गया संकट नहीं है. यह संकट सत्ता की ओर से....पैदा किया जा रहा संकट है. लेकिन उनका ध्यान इस ओर नहीं गया कि भारत के एक वाद-बद्ध साहित्यकार-समूह, जो ऐसी ही बातें करता है, को प्रभावित करने वाले सार्त्र कहते हैं- Hell is the other people. माओ का सिद्धांत है  First we should choose who is Our friend avd who is our enemy (माओ का यह वक्तव्य तब का है जब वह चीनी-सत्ता को च्युत करने की तैयारी कर रहे थे). समीक्षक ने सत्ता का जो सरलीकरण किया है उसमें ये भी आते हैं. ये अपने आप में एक सत्ता की हैसियत रखते थे. ये कितने खतरनाक वक्तव्य हैं, समीक्षक स्वयं समझ सकते हैं.
    कविता हमें मुक्त-हृदय करती है. मुक्त-हृदय? क्या हृदय से मुक्त जैसे मुक्त-काम- कामना से मुक्त? तब तो मनुष्य जी ही नहीं पाएगा. शायद समीक्षक का आशय हो हृदय पर पड़े भारों से मुक्त. जोशी के ‘जिद’ संकलन की कविताओं ने समीक्षक को कितना मुक्त-हृदय किया, यह तो वही जानें पर स्वतंत्रता आंदोलन के समय मैथिली शरण गुप्त की ‘भारत भारती’ ने इस देश के जन को खूब मुक्त-मन किया. मन्मथ नाथ गुप्त ने इसी के गीतों को गा-गा कर स्वाधीनता नामक मूल्यवान त्तत्व से यहाँ के जन को जोड़ा. मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता के मूल आशय को पाने के लिए प्रखर बुद्धिवादी लोग आज भी सिर खपा रहे हैं. इस जनपक्षधर कवि का ‘जन’ कौन है मैं आज भी ढूँढ़ रहा हूँ. क्यों कि खेत खलिहान में रहने वाला या मजदूर वर्ग तो इसे समझने से रहा, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवि ने भी इसे एक बार पढ़ कर अलग रख दिया, दुबारा पढ़ने के लिए नहीं  उठाया.                                                                               
अँधेरे की बात-
    अब ध्यान फिराते हैं इस लेख के शीर्षक पर. इस शीर्षक में एक तरह से ‘जिद’ संकलन का मूल कथ्य समेटा गया लगता है. समीक्षक अनुभव करता है कि राजेश जोशी अँधेरे समय में उजाला दिखाने वाले कवि तो हैं ही, अँधेरे का पर्दाफाश भी करने वाले कवि हैं. उजाला फैलाने और अँधेरे का पर्दाफाश करने के लिए वह ‘जिद’ ठाने हुए हैं. वह अपनी बात अंधेरा और उजाला का मानवीकरण कर रखते हैं.
    समीक्षक ने इस समीक्षा-लेख का नाम रखा है, अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद. तो समीक्षक को अपने लेख में इन दो बिंदुओं पर मुख्य रूप से फोकस रखना चाहिए था, यह अँधेरा क्या है और उजाला क्या है, जो नहीं रखा है.
    समीक्षक गोलमटोल शब्दों में कवि के अँधेरे की प्रतीति को सामाजिक अँधेरा कहते हैं. और इस सामाजिक अँधेरे को सत्ता द्वारा पैदा
किया मान लिए हैं. शायद अँधेरे के पर्दाफाश से उन्हें यह तथ्य मिला है.  
तो समाज में केवल सत्ता द्वारा पैदा किया ही अँधेरा है? और किस प्रकार के संकट और किस प्रकार के अनुभव उन्हें मिले, समीक्षक नहीं बताते.
    समीक्षक यह भी नहीं बताते कि यह सामाजिक अँधेरा है क्या. आज समाज भी अनेक है- दलित समाज, समाजवादी समाज, मार्क्सवादी समाज वगैरह. सबके अपने अँधेरे और सबके अपने उजाले हैं. इसे वह पाठक की समझ पर छोड़ देते हैं. (ऐसा कर समीक्षक का अपने दायित्व से बच लिकलना आसान है, आज के समीक्षकों में यह आम प्रवृत्ति दिखाई देती है.)
    कवि के अँधेरे को जानने के लिए मैंने इस संकलन की कविता अंधेरे के बारे में कुछ वाक्य पर ध्यान जमाया. इसमें मुझे ये पंक्तियाँ मिलीं –
                        अँधेरे में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह क़िताब पढऩा
                        नामुमकिन बना देता था।
    वैसे अँधेरे का काम ही क्या है. यह तो स्वाभाविक है.
    अँधेरा का यहाँ मानवीकरण किया गया है. अँधेरे ने जो भूतकाल में किया उसीका इसमें जिक्र किया गया है. वह “किताब पढ़ना नामुमकीन कर देता था” मतलब अब नहीं करता. समीक्षक यह नहीं बताता कि ‘था’ के प्रयोग से कवि का क्या प्रयोजन है. क्या ‘है’ के प्रयोग से वह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता था. समीक्षक की पूरी समीक्षा ‘है’ में ही है,
    एक बात मेरी. मेरे जाने उजाले का न होना ही अँधेरा का होना है. किताबों पर पड़ती रौशनी जब हटती जाती है तब अँधेरा पसरता जाता है. यह तो कवि भी अनुभव करता है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इसमें अस्तित्वहीन अँधेरे का क्या दोष. उसने क्या बुरा किया?
    इस किताब को बुद्धि के उजाले का प्रतीक कैसे माना जाए. किताब तो खुद अन्य उजाले से प्रकाशित होने पर ही दिखती है.
    कवि का अगला कथन है-
                       पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या क़िताब (उजाला) से डरता था
    जिसका अस्तित्व ही उजाले के न होने से है वह शरारत क्या करेगा.
    इस कविता के पढ़ने पर अँधेरे का कोई स्पष्ट रूप नहीं उभरता. कवि इस अँधेरे के कई चेहरे का जिक्र करता है - 
                      लेकिन अँधेरे के अनेक चेहरे थे
                      पॉवर-हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर
                      कई दिनों तक अन्धकार में डूबा रहा
                     देश का एक बड़ा हिस्सा ।
    यह सामाजिक अंधकार तो नही है, तकनीक के फेल्योर से पैदा अंधकार है. ये पंक्तियाँ काव्यात्मक भी नहीं हैं. अँधेरे का मानवीकरण कर देने से ये काव्य-पंक्तियाँ नहीं बन जातीं. इससे क्या प्रतीकार्थ या लक्ष्यार्थ निकाला जाए. इस अँधेरे को दूर करने के लिए पावर हाउस के ग्रिड को ठीक करना ही काफी है जो एक इलेक्ट्रीशियन कर सकता है. वहाँ राजेश जोशी का उजाला या उसकी जिद क्या करेगी.
अँधेरे का एक चेहरा यह-
                    लेकिन इससे भी बड़ा अँधेरा था
                    जो सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होता था
                    या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले
                    ग़ुलाम दिमाग़ों से !
    लगता है यहाँ समीक्षक की शोध-दृष्टि नहीं पड़ी है. कवि इस कविता में अँधेरे को पैदा करने वाली सत्ता की राजनीतिक जिद की बात करता है, अँधेरे के खिलाप उजाले की जिद की नहीं. इस कविता में अँधेरे को तोड़ने के लिए उजाले को जिद करते नहीं दिखाया गया है. मेरे देखे राजनीतिक सताएँ अँधेरा नहीं फैलातीं वरन् उजाले के केन्द्रों को ध्वस्त करती हैं और अँधेरा पाँव पसार देता है. गुलाम हों या आजाद उनमें अँधेरा नहीं फैलाया जाता, उनके पास उजाला पाने की जो युक्ति है उसे छीन लिया जाता है. क्योंकि वस्तुतः उजाले का ही अस्तित्व है अँधेरे का नहीं.
    राजनीति ने आज के समाज में बहुत अँधेरा पैदा किया है. इसमें कोई दो राय नहीं. यह उसने मनुष्य की स्वतंत्रता (उजाला) छीन कर किया है. दो उदाहरण सामने ही है, रूस के नोवेल पुरस्कार निजेता साल्झेनित्सिन और चीन के विचारक ल्यु श्याबाओ का. इन दोनों को सत्ता के सामाजिक विचार से भिन्न मत रखने के कारण जेल के भीतर डाल कर लेखन जगत और विचार जगत में अँधेरा पैदा किया गया. समीक्षक सत्ता द्वारा अँधेरा पैदा करने का उदाहरण कबीर और मुक्तिबोध के साथ किए गए सत्ता के व्यवहार को बताते है. वह भूल गए हैं कि सिकंदर लोदी धर्मांध था. उसने हाथी के पैर तले कबीर को कुचलवा कर अपने धर्म को ऊपर करना चाहा था. इससे कोई अँधेरा पैदा होता तो वह धार्मिक अँधेरा होता सामाजिक नहीं. किंतु वह यह अँधेरा पैदा कर नहीं सका. और मुक्तिबोध कोई इतिहासविद नहीं थे. कुछ इतिहासकारों के आधार पर उन्होंने विद्यार्थियों के लिए आर्य संस्कृति का जो चित्र खींचा था वह सर्वस्वीकार्य नहीं था. इसपर प्रतिबंध से कौन सा अँधेरा फैला? प्रतिबंध तो प्रेमचंद के सोजे वतन पर भी लगा था. अब रोमिला थापर आर्यों का इतिहास इक्ष्वाकु से मानती हैं, इसे कौन मानेगा.
    कवि के अनुसार इस राजनीतिक जिद से एक बौद्धिक अँधेरा भी पैदा होता था -  
                     एक बौद्धिक अन्धकार मौक़ा लगते ही सारे देश को
                     हिंसक उन्माद में झोंक देता था ।
     सहृदय जन को यहाँ कुछ सोचने का अवसर मिलता है. यह बौद्धिक अँधेरा है क्या, समीक्षक तो इसे स्पष्ट नहीं करते. मेरी समझ से सोच विवेक को अपहृत कर लेना ही बौद्धिक अँधेरा है. तो इसके उलट सोच विचार को पैदा करना ही उजाला प्रदान करना होगा. यह तो कृत्रिम ढंग से किया जा सकता है, शैक्षणिक जैसी विधियों से. कवि इस कविता में यह उजाला परदा को हटा कर या बंद कर करता है (आगे वे पंक्तियाँ उद्धृत की गई हैं). यह उजाला पहले से ही स्वतंत्र उपस्थित है.
    किंतु सत्ता हमेशा बौद्धिक अँधेरा ही पैदा करती हो ऐसा नहीं है. सत्ता ने कला, विचार-विवेक के क्षेत्र में भी योगदान दिया (उजाला पैदा किया) है, कलाकारों को सहयोग देकर. मनुष्य के सर्वांग को प्रकाशित करने वाले गौतम बुद्धों के उजाले पर तत्कालीन सम्राटों ने प्रतिबंध लगा कर अँधेरा पैदा करने की कोशिश नहीं की. वे उस उजाले को उनसे छीन भी कैसे सकते थे. मिनांडर ने तो नागार्जुन से बाकायदा शास्त्रार्थ किया था. राजपूत कला, मुगल कला जैसी कलाएँ भी सत्ता द्वारा विकसित हुईं हैं.
    कृत्रिम उजाला अँधेरे को दूर नहीं कर सकता. क्यों कि उसका होना न होना अधूरे व्यक्तियों के हाथ में होता है. जैसे कलबुर्गी मूर्तिपूजा को अंधविशास मान कर उसे जन से दूर करना चाह रहे थे. जबकि उन्हें जानना चाहिए था कि मीरा ने परमात्म तत्व के अनुभव के लिए मूर्ति को ही माध्यम बनाया था. और इस अंधविश्वास को मिटाने के लिए वह मूर्तियों की उपेक्षा करने की सीख देते थे. कहते थे कि मूर्तियों पर तो मूता जा सकता है. (यह समाचार उस समय के हिंदू दैनिक में छपा था.) मजा यह कि वह सामाजिक उजाले के पैरोकार थे.
अब उजाले की बात.
    समीक्षक के अनुसार कवि उजाला दिखाने वाला और अँधेरे का पर्दाफाश करने वाला कवि है. .
    कविता अंधेरे के संबंध में कुछ वाक्य में राजेश जोशी ने रौशनी का भी जिक्र किया है-
                     रोशनी के पास कई विकल्प थे
                     ज़रूरत पडऩे पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था
                     ज़रूरत के हिसाब से कभी भी उसको
                     कम या ज़्यादा किया जा सकता था
                     ज़रूरत के मुताबिक परदों को खीच कर
                     या एक छोटा सा बटन दबा कर
                     उसे अन्धेरे में भी बदला जा सकता था
    कवि की रौशनी (उजाला) विकल्पों वाली है. इसका इस्तेमाल (शब्द पर ध्यान दें) किया जा सकता है, वह भी जरूरत के मुताबिक. यह रौशनी हमारे हृद-मन को प्रकाशित करने वाली नहीं, टार्च की रौशनी-सी है. क्या यही रौशनी अँधेरे (कवि ने इसे किसी गूढ़ अर्थ में लिया है) को हटाने की जिद किए हुए है?
    मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कविता में रौशनी (उजाले) के उजाले ने जिद कर रखी है तो उस जिद का जिक्र कहाँ है. यहाँ तो अवरोध हटाओ, अँधेरा गायब. अवरोध खड़ा कर दो अँधेरा हाजिर. यह अवरोध खड़ा करने वाला कौन है. केवल सत्ता? कबीर के उजाले को कोई सत्ता नहीं रोक सकी थी. आज के दिन सत्ता की एक बड़ी ताकत अमरीका (निक्सन का) ने ओशो को जहर दिया, उन निहत्थे को बाईस देशों तक खदेड़ा, वहाँ ठहरने के लिए उतरने नहीं दिया, उन्हें उनके अपने देश में रहने के लिए उसने तब अनुमति दी जब राजीव सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि किसी से उन्हें मिलने नहीं दिया जाए. प्रकांतर से समाज से काट दिया जाए. क्या ओशो के प्रकाश को रोका जा सका? उनके प्रकाश ने तो कोई जिद भी नहीं की. निक्शन की ज्यादती इसलिए नहीं थी कि दुनिया में अँधेरा पैदा करना है. वह इसलिए थी कि कहीं उनकी सिखावन ईसाइयत के ऊपर न हो जाए. वह स्वयं एक क्रूसेड (धर्मयुद्ध) की अगुआई करना चाह रहे थे. दुनिया में हैरी पॉटर के बाद सबसे अधिक बिकने वाली उन्हीं की प्रकाशप्रकीर्णक पुस्तकें है. उनकी पुस्तकों को छापने के लिए आज वह बाजार लालायित है, जिस बाजार को अन्यों के साथ समीक्षक भी कोसता है. बाजार अपने हानि-लाभ को जरूर देखता है. किंतु पुस्तक में कुछ जीवनदाई है तो उसे भी अंगीकार करता है. फणीशवर नाथ रेणु के मैला आँचल को प्रकाशक ओमप्रकाश ने खोज कर छापा था.
    राजेश जोशी की रौशनी का एक और विकल्प है –
                    एक रोशनी कभी कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास
                    एक रोशनी कहीं भीतर सेकहीं बहुत भीतर से
                    आती थी और दिमाग को एकाएक रोशन कर जाती थी ।
    कवि यहाँ कुछ दार्शनिक-सा हो गया लगता है. समीक्षक ने इन, कहीं दूर से और कहीं भीतर से आती रौशनियों पर विचार ही नहीं किया है. ये कैसी रौशनियाँ (उजाले) हैं. सत्ता द्वारा पैदा किए गए अँधेरे का फाश करने, उसे दूर करने के लिए, उससे उलझने के लिए कवि के हाथ में जो उजाला है वह कैसा है, पर्दा हटाने से आने वाला या बटन दबाकर पैदा किया उजाला या इन दूर से और भीतर से आती रौशनियों का उजाला. इन अंतिम ऱौशनियों के उजाले का प्रभाव ऐसा है कि यह कवि के दिमाग को एकाएक रौशन कर देती थी (अब शायद नहीं करती). दिमाग तो किसी व्यक्ति का ही रौशन हो सकता है समाज का नहीं. तो फिर इससे सामाजिक अँधेरा केसे दूर हो सकेगा. समाज तो अनेक लोगों से बनता है. समाज के हर व्यक्ति पास ये ऱौशनियाँ आएँ तो ही तभी समाज रौशन हो सकता है, इस रौशनी को आने देने में या उसे आने से रोकने में सत्ता क्या कर सकती है. मुहम्मद साहब को ये रौशनियाँ उतरी थीं उनके विरोधी इसे रोक नहीं सके थे. इस उजाले को कवि फैलाता तो अँधेर को हटाने की ओर उसका एक कदम हो सकता था. किंतु कवि को केवल इन रौशनियों का अहसास भर है. केवल अहसास वाली रौशनी से न तो कोई विरोध सफल हो सकता है न कोई आंदोलन. वह भी कवि का एक शायर दोस्त उसके मन में एक शंका डाल देता है-
                      एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था
    वह शक ही नहीं करता था. वह-
                      कहता थाउसे रेशा-रेशा उधेड़ कर देखो
                      रोशनी किस जगह से काली है
रौशनी देने वाले स्रोत के जिस हिस्से से रौशनी नहीं आ रही हो वह हिस्सा काला दिख सकता है पर रौशनी किस जगह से काली है यह देखने की बात समझ के बाहर है. कवि के दोस्त कुछ अनूठी दृष्टि वाले है.  
    तो यह है कवि राजेश जोशी का उजाला जिसकी प्रकृति ही अस्थाई है. जो खुद ही एक बटन के सहारे अंधेरे में बदला जा सकता है वह किस दम के साथ अंधेरे के खिलाफ कोई जिद ठान सकता है.
    कहा जा सकता है कि उक्त कविता में अंधेरे और उजाले के बिंब खड़े किए गए हैं. तो मैं इतना ही कहूँगा कि कबीर के पास भी एक उजाला था, स्थिर प्रकृति का. उस उजाले को जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने एक काव्य-बिंब खड़ा किया, लुकाठी और घर का. यह लुकाठी उजाले का पुंज प्रज्ज्वलित करती हुई लकड़ियों की ढेरी में से निकाल ली गई एक जलती हुई लकड़ी है, जो किसी घर (अंधेरा) को जला कर उजाला पैदा कर सकती है. (उजाला आता है तो अँधेरा स्वतः हटता जाता है, इसे अँधेरे का जलना कहा जा सकता है). उजाले और अंधेरे के ये कबीर के बिंब बहुत स्वाभाविक हैं. हमारे बोध में सहज रूप से उतर जाते हैं.
अब उजाले की जिद की बातः
    समीक्षक ने अपनी समीक्षा में यह साफ नहीं किया है कि कवि के पास उजाला कौन सा है और उजाले की जिद की बात करने लगता है.  कवि की ‘जिद’ शीर्षक से लिखी दो कविताओं में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता. द्वीतीय ‘जिद‘ कविता में निराशा कवि के पीछे पड़ी हुई है. कवि मीटिंग का बहाना बनाकर उससे पीछा छुड़ाना चाहता है. यह कह कर कि तुम वही बातें कहोगी जो अन्य कहते हैं. वे (अँधेरे के) विरुद्ध एजेंडा बनाते हैं, किसी उद्यान में मीटिंग करते हैं, समाचार बनाकर छपवा देते हैं. लेकिन उनपर भी कभी कभार उदासी छा जाती है. प्रथम ‘जिद’ कविता से पता चलता है कि वे विरोध के लिए अपनी जेबें निचोड़ते हैं, पोस्टर बनाते हैं, प्रदर्शन करते हैं. पर यह सब तो शासन से कुछ माँगने के लिए किया जाता है. ऐसे विरोध को समीक्षक कवि के उजाले की जिद मान लेता है. हालाँकि कवि ने कविता में इस विरोध को अन्यों द्वारा किया जाता बताया है. यह जिद कवि की है, कैसे कहा जा सकता है. क्या यह जिद है भी?
    समीक्षक कवि को बेचैनी से भरा एक संबेदनशील कवि कहते हैं. गजब की बेचैनी और संवेदनशीलता है इन कवि में. वह इतना बेचैन हैं कि अपनी ‘गुरुत्वाकर्षण’ कविता में न्यूटन से गुरुत्वाकर्षण के अपने नियम को वापस ले लेने का उनसे गुहार करते हैं. क्योंकि पृथ्वी फिसल रही है (अगर यह अनुभूति है तो कवि अनोखी अनुभूति वाले कवि हैं). क्या नियम वापस ले लेने से पृथ्वी का फिसलना बंद हो जाएगा? न्यूटन एक वैज्ञानिक थे. वैज्ञानिकों के आविष्कार को मनुष्य जाति का आविष्कार माना जाता है. पर यह कवि सीधे उससे अपना पिंड छुड़ा लेते हैं- न्यूटन तुम अपना..नियम वापस ले लो...राषट्राधयक्षों की जबान कब फिसल जाए कोई नहीं कह सकता. जहाँ तक संवेदनशीलता का प्रश्न है, इन पंक्तियों से कौन सी संवेदनशीलता संप्रेषित होती है. मेरे जाने कविता में संवेदनशीलता पिरोना होता है.
    समीक्षक बहुपठित लगते हैं, शोध-छात्र हैं. कवि की बेचैनी और संवेदनशीलता के संभवतः उदाहरणस्वरूप ही ये पेक्तियाँ उद्धृत की हैं.
                      अँधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे
                      और उसे अपनी नियति मान लेते थे
                      कुछ ज़िद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में
                      जो कहते थे कि अँधेरे समय में अँधेरे के बारे में गाना ही
                      रोशनी के बारे में गाना है ।
                      वो अँधेरे के समय में अँधेरे के गीत गाते थे
अपनी वेचैनी में कवि पीछे मुड़ कर (‘थे’ की अभिव्यंजना) देखता है. वहाँ उसे बहुत से लोग डरे हुए दिखते हैं जो अँधेरे को अपनी नियति मान लिए हैं. कुछ जिद्दी लोग भी दिखे जो जिंदगी को हार बैठे थे और अँधेरे का गीत गाने में ही अपनी सुरक्षा समझते थे, अँधेरे के बारे में गाना ही वे रौशनी के बारे में गाना मानते थै. यह किन लोगों की तरफ ईशारा है, भारतीय लोगों की या पश्चिमी लोगों की तरफ? मैथिली शरण गुप्त ने तो अतीत के अँधेरे में हुए उजाले की और उसे प्रयोग करने वालों के गीत अपने समय के अँधेरे में गाए थे, और निराला ने भी. इन लोगों ने अँधेरे के बारे में गीत गाकर उजाले का गीत समझने को नहीं कहा था.
    अँधेरे के बारे में गाना रौशनी के बारे में गाना कैसे है, समीक्षक ने इसको स्पष्ट करने में रुचि नहीं ली है. अँधेरे के बारें गाना, मेरी समझ से अँधेरे की सत्ता को मानकर उसकी जुगाली करना ही है. यह भारतीय मनीषा की जातीय प्रकृति नहीं है. फिर राजेश जोशी को इसका इलहाम कहाँ से हुआ. जरा इन पंक्तियों पर गौर करें-
                       क्या अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएँगे
                       हाँ, गाए जाएँगे
                       अँधेरे वक्त में भी अँधेरे के गीत गाए जाएँगे। ---  बर्तोल्त ब्रेखत       
                                                                                                                 (वसुधा, मार्च-17)
    बर्तोल्त ब्रेख्त जर्मनी के कवि और नाटककार थे. बीसवीं सदी के जर्मनी के संदर्भ में उन्होंने यह कविता लिखी थी. आश्वित्ज कैंप के उत्पीड़न से वहाँ का एक चिंतक इतना निराश हो गया था कि उसने कविता लिखने की ही मनाही कर दी थी जबकि हिरोशिमा-नागासाकी की तबाही से जापान ने हिम्मत नहीं हारी. संभव है ब्रेख्त ने सोचा हो अँधेरे के गीत में अँधेरे को दिखाते हुए उसमें चतुराई से जागरण की ध्वनि लपेट कर गाया जाए. हो सकता है उन्हें अपने जर्मनी देश के लिए ऐसा करना ही उपयुक्त लगा हो. जर्मनी के अवाम की नब्ज उनमें धड़कती थी. लेकिन इस अँधेरे के गीत को उजाले का गीत तो नहीं कहा जा सकता. कवि के लिए भारतीय संदर्भ में भारतीय अवाम की नब्ज को अपने हृदय में धड़कने देना चाहिए. अब इक्कसवीं सदी के भारत के संदर्भ में उक्त पंक्तियों का अनुभव कितना उपयुक्त बैठता है. देखने की बात है. 
    जापानियों के उत्साहावेग को हम क्यों नहीं कोट करते?
    समीक्षक यह नहीं समझा पाए हैं कि उजाला और उजाले की जिद से इन पंकतियों का क्या ताल मेल है. यह शोध करने योग्य है कि राजेश जोशी का अँधेरे और उजाले का चिंतन उनके अपने चिंतन की उपज हैं या ब्रेख्त से लिया गया है.
पुनश्चः
मेरा ध्येय राजेश जोशी के ‘जिद’ कोव्य-संकलन की समीक्षा करना नहीं, जगन्नाथ दूवे की समीक्षा पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखनी थी. आज की समीक्षा में समीक्ष्य की विवेचना की क्या पद्धति है यही जानने की मेरी अभिप्सा थी. क्योंकि अक्सर पढ़ने को मिलता है कि आज की आलोचना अपने पूर्व स्तर से च्युत हो गई है. मैंने इस समीक्षा में अनुभव किया कि संकलन में जो कहा गया है उसपर ध्यान न टिकाकर उसके माध्यम से समीक्षक अपनी बातें कहने में अधिक रुचि रखते है.
     आलोचना ऐसी होनी चाहिए जिससे उस पुस्तक को पढ़ने में पाठक की रुचि जगे

Wednesday, 26 July 2017

आखिर नितीश को ही इस्तीफा देना पड़ा


बिहार में महा गठबंधन का नेतृत्व कर रहे नितीश को ही आखिर इस्तीफा देना पड़ा. उप मुख्य मंत्री तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उनके फर्मों पर सी. बी आई के छापे पड़े, एफ आई आर हुए, जाँच परख के बाद आरोप पत्र भी दाखिल हुए किंतु उनके और उनके पिता लालू प्रसाद यादव के लिए यह सब  सब झूठ है. तेजस्वी को  स्वयं इसका संज्ञान लेकर इस्तीफा दे देना चाहिए था. क्योंकि  भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर नितीश ने अपने चार मंत्रियों के इस्तीफे ले चुके थे. लालू ने तब यह तर्क नहीं दिया कि आरोप लगना मात्र इस्तीफे का कारण नहीं बनता. इस बार नह पुत्र मोह में पड़ गए. उनको यह डर सताने लगा कि भ्रष्टाचार के आरोप में अगर तेजस्वी को अगर इस्तीफा देना पड़ा तो उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. वह यह नहीं सोच सके कि इस्तीफा देने से उसका कद और बढ़ सकता था. वह ऐसा इसलिए नहीं सोच सके क्योंकि वह फेयर राजनीति करने के आदी नहीं हैं. उनको शायद यह भरोसा नहीं है कि उनका लड़का तेजस्वी अपने बल पर राजनीति में जगह बना सकेगा. पत्नी राबड़ी देवी से तो उन्होंने येन केन प्रकारेण मुख्यमंत्रित्व करा लिया किंतु इसका मूल्य बिहार को चुकाना पड़ा.

नितीश ने तेजस्वी से इस्तीफा नहीं माँगा. हालाँकि भीतर से वह चाहते थे कि तेजस्वी इस्तीफा दे दें. पर इस्तीफा नहीं माँगा. उन्होंने तेजस्वी से सफाई माँगी पर तेजस्वी ने उसे पूरा नहीं किया. तब नितीश को लगा कि इस हालत में इस्तीफा मांगना उचित नहीं है. वह इस्तीफा माँगते हैं और गठबंधन टूटता है तो चतुर खिलाड़ी लालू इसका उपयोग कर गठबंधन तोड़ने का सारा दोष वह उन्हीं पर मढ़ देंगे. क्योंकि इस्तीफा लेने पर भी गठबंधन को टूटना ही था. क्योंकि काँग्रेस को भ्रष्टाचार के होने न होने से कोई मतलब नहीं है. ऐसी स्थिति में गेंद लालू के पाले में होती और वह जैसा चाहते इसका उपयोग करते. उन्हें बेहतर यही लगा कि वह इस्तीफा ही दे दें. विपक्ष से और गठबंधन के लोगों से वार्ता कर वह अपनी स्थितर मजबूत तर चुके थे

Saturday, 22 July 2017

फेसबुक की जिज्ञासा ब्लॉग-स्पॉट पर


फेसबुक के लेखक मित्रों से एक जिज्ञासा-
फेसबुक मित्र पंखुरी जी ने अपने वाल पर अपनी एक कविता दी है जिसकी कुछ पंक्तियाँ निम्नवत हैं-
"--उसकी हर पंक्ति में 
नंगा शब्द है
कितने विशेषण बनाए जा सकते हैं उससे
कितने 'तरहों' (?) से प्रयोग कर
वाक्यों में उसका (?)
जैसे जपी जा रही हो
नंगेपन की माला"
मैंने उन्हें इंगित किया कि तरह का विशेषण तरहों नहीं होता, तरह ही विषेषण की तरह प्रयुक्त होता है. तो उन्होंने मुझे सीख दी ...
Pankhuri Sinha- Tarah ko tarahon bana lena, poetic licence ka istemaal karna hai.
साहित्य में poetic licence जैसी कोई चीज भी होती है मुझे नहीं मालूम है. आपलोगों से जानना चाहूँगा. यह licence कौन जारी करता है और वह किसके द्वारा अधिकृत किया गया है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि sense की जगह licence लिख मारा है उन्होंने. तब सवाल उठता है नए लेखन को इतनी स्वतंत्रता है कि वह भाषा की स्वभाविकता के भी कान ऐंठ दे. poetic sense में शब्द का रूप बदलने का अधिकार है कवियों को पर अराजकता की हद तक नहीं.
पंखुरी सिन्हा पत्रकार भी हैं

Wednesday, 31 May 2017

समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा-3 अंतिम कड़ी


 रचनाकार में प्रकाशित  29-05-2017

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
                                                                      3
अगहन माह से जाड़े का आरंभ और पूस माह तक इसका प्रसार माना जाता है – “अगहन पूस हेमंत ही जान.” अगहन में हल्की ठंढक पड़ने लगती है. छाँह में बैठने पर देह में कँपकँपी-सी लगने लगती है. लोग घरों से निकलकर धूप लोर्हने लगते हैं. औरतें गलियों में खाट खींच धूप-छाहीं में बैठ जाती हैं और स्वेटर आदि बुनने लगती हैं. कवयित्री ने अगहन के ऐसे ही एक क्षण का बहुत सुंदर चित्रण किया है-
भुइले बहुत मगन हैं। ....
गलियों में खाट खींचकर
औरतें धूप मुनने लगी हैं
पूरी यह धरती
उनकी ही काढ़ी हुई चादर—
ये देखो कैसे महीन बेल-बूटे.                (अगहन)
घरों के पास के पेड़ों की झाँझर पत्तियों से छन कर धरती पर आते घूप के टुकड़े किसी चादर पर काढ़े गए बेल-बूटों की तरह दमक रहे है. इन औरतों के लिए एक साझा चूल्हा है. अगहन. ये एक साथ बैठी हैं, चूल्हे पर चढ़ी हुई है केतली, कुल्हड़ में चाय चल रही है. प्रत्येक का जीवन मानो सोंधा-सा कुल्हड़ हो गया है.
‘पूस‘ शीर्षक में लोगों को इस माह की ठिठुराती ठिठुरन कवयित्री की अपनी अनुभूत नहीं है, यह ठिठुरन प्रेमचंद “पूस की रात” कहानी के किसान की अनुभूत है और कोहरा तो चेखव की घोड़ागाड़ी में जुता हुआ है.
लोकप्रचलित कहावत है- “माघ फागुन शिशिर बखान”. माघ माह में जाड़ा उतरने लगता है. पेड़ों से पत्ते झड़ने शुरू हो जाते हैं. लोग कपड़ों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. पूस की अपेक्षा उनके शरीर पर कपड़े कम होने लगते हैं. फलतः ठिठुरन सताने लगती है. लोक में ठिठुरन से बचने के लिए बच्चे-बड़े हल्के कपडे पहनते हैं और जो अभाव में होते हैं वे घेंकुरी मारकर (घुटनों में माथा डाल) अपनी ठिठुरन भगाते हैं. कवयित्री का यह चित्रण देखें-
‘जाड़ा रइया
तोरा डरे घेंकुरी लगइया’
यह डर माघ के कड़क जाड़े का है. कवयित्री की दृष्टि में यह डर एक पवित्र घाव है. जिसमें सारा जहान घेंकुरी लगाया है. घाव में घेंकुरी ? माघ की ठिठुरन के डर में किसानों को जो अनुभूति होती है वह ‘घाव’ से व्यंजित नहीं होती.
फागुन महीने के लिए एक लोक व्यंजना है- “भर फागुन बुढ़ऊ देवर लागे, भर फागुन”. गाँवों में जो फगुआ गाया जाता है, यह उसका एक स्वर भी है. कवयित्री अपने ‘फागुन’ गीत को फगुआ-गान के इस टुकड़े से आरंभ करती हैं. वह अनुभव करती हैं कि मानो फागुन ही कटहली चंपा (एक सुगंधित फूल) के रूप में लोक-रगों में फूल रहा है. इस चंपा पुष्प की सुगंध सर्पों को इतनी पसंद है कि जहाँ यह फूल होता है वहाँ इसकी डालों से ये लिपटे रहते हैं. इसी लिए इस फूल का एक नाम नाग चंपा भी है. फागुन का महीना जब भी आता है लोग इन साँपों की तरह ही फागुनी भावों से लिपट जाते हैं. इस फागुनी रोमल संचार को यह प्रकृति भी खुला खेलती हैं-
बौरा गई है गिलहरी-
खीरी के पेड़ों पर बैठी गौरैया
एक पंख उठाए हुए
लेती है अँगड़ाई मीठी!
यह फागुन महीना ही ऐसा है कि बिना बात के ही उद्गारों के सोते फूट पड़ते हैं, आकाश की तरह साफ
मन से. फिर फागुन के रस से भरे कवयित्री के मन में एक विचार उड़ आता है चील-चाल से.-
एक विचार उड़ रहा है
चील-चाल से।
चील आकाश में उड़ती तो है मंद चाल से लेकिन उसका ध्यान अपने शिकार पर टिका रहता है. अवसर देखते ही वह शिकार पर झपट्टा मार उसे अपनी चोंच में दबोच लेती है. शिकार को बचने का भी अवसर नहीं मिलता. फागुन के महीने में भी कुछ लोक-चीलें मँडराती रहती हैं. कब झपट्टा मार दें कहा नहीं जा सकता.
फागुन के कुछ अनुभव कवयित्री ने ‘फागुनी बयार’ में दिया है. फागुन के महीने में कवयित्री किसी झील के एक किनारे बैठी हैं. अचानक कँपकँपी बढ़ाती फागुनी हवा उनसे टकराती है. उन्हें लगता है वह हहरकर (.यहाँ हहरकर विशेषण सटीक नहीं लगता) उनसे कहती है - देखो उस किनारे झील के पानी में पाँव डाले कोई बाँसुरी बजा रहा है. स्वर में कोई कोलाहल नहीं है. उसमें मंद समीरण की ध्वनि है जिसके प्रभाव में झील के पानी की सतह पर छोटी छोटी शांत बीचियाँ उभर-मिट रहीं हैं. मानो झील के कानों में गोरख (नाथपंथ के सद्गुरु) की बानी गूँज रही हो- हबकि न बोलिब, थपकि न चलिब, धीरे रखिब पाँव. लेकिन वह इसे आचरण में उतार नहीं पाती. वह अपने समंदरपन (सबकुछ हो रहने) से थक चुकी है. एक अगस्त्य प्यास (जो उसकी सारी बेचैनियों को पी जाए) की बाट जोहती उसकी लहरें उसी में डूब रही हैं. क्या गजब है, कहीं शांति की भी बाट जोही जाती है. यह तो अपने प्रयासो के प्रति जागरुक होने से बंचित रहने की चतुराई भी हो सकती है. नयी कविता के प्रयास कुछ ऐसे ही प्रतीत होते हैं.
प्रकृति की गति का क्रम भी बहुत अद्भुत और रोचक है. जेठ की गर्मी से राहत के लिए वह आषाढ़ माह में आकाश में बादलों के टुकड़े फैला देती है, कभी सूरज पर आवरण डाल देते हैं तो कभी चाँद को घेर कर बैठक करने लगते हैं. ये बादल सावन में आकाश में और उँचा उठ ढंढा होकर बारिश की झड़ी लगा देते हैं, भादो में उसे घटाटोप आच्छादित कर धारासार बरस जाते हैं. अगहन पूस में बारिशोपरांत जाड़ा तो आएगा ही क्योंकि पर्यावरण की हवा में जल-बूंदों की नमी धीरे धीरे ही जाएगी, इतना धीरे कि माघ फागुन में वातावरण को सम होने का अवसर मिल सके, प्रकृति अपने पुरानेपन को झाड़े और नए को उगने का अवसर दे.
चैत माह में इस नवांकुरण की गति ऐसी होती है कि प्रकृति का कोई भी अंग इससे अछूता नहीं रहता. खेत, बाग, जेल, जन सभी एक रंग (नया होने के) में रंग जाते हैं, मानो पूरे कुँए में ही भंग पड़ गई हो, कोई किसी की नहीं सुनता. इस धुन मे कुछ युवा जेल में कैदी हो गए हैं. कवयित्री के अनुसार बसंत ने गवाही दी होती अर्थात यह आकलन किया गया होता कि इनपर बसंतागम का प्रभाव है तो ऐसा नहीं होता. प्रकृति जानती है ये बेकसूर हैं. इसीलिए पीपल के टूसे के रूप में वह जेल की दीवार फोड़कर अंदर घुस गई है. पत्ते सिर हिलाकर उनके निरपराध होने की खबर दे रहे हैं. कोयल जन्मों से उनकी फरियाद में कुहुक रही है. हालाँकि कोयल इतनी चूजी नहीं होती. चूजी होना तो मनुष्य का स्वभाव है.
“चैत : एक अनंत-सा प्रसव” गीत में कवयित्री ने प्रकृति के प्रसव-रहस्य की ओर संकेत किया है. बसंत ऋतु में प्रकृति में जो भी हरियाली और नयापन दीख पड़ता है वह उसके नव-प्रसव का ही परिणाम है. प्रसव के पूर्व कारकों पर बसंत छा जाता है. कवयित्री पर भी यह बसंत छाया है. उनकी रातें नहीं कटतीं, उसी तरह जैसे हँसुए से पकठोसा कटहल नहीं कटता. अब यह उपमा बड़ी विचित्र है. पकठोसा कटहल के काटने में काटकर अलग करने का भाव है और रात के कटने में रात के बीतने का भाव है. इस कटने और बीतने में क्या साधर्म्य है. खैर, बसंती हवा बह रही है, फिजाँ में होली के जले सम्हत की गंध है. कल होली है शायद, वह लोगों को होली की शुभकामनाएँ देती हैं-
ह्वट्सएप पर छिड़क देती हूँ शुभकामनाएँ
जैसे कबूतरों को दाने।                                ( चैत : एक अनंत-सा प्रसव)
समय ही ऐसा है. अब शुभकामाएँ भी दी नहीं जातीं, छिड़क दी जाती हैं जैसे कबूतरों को दाने दिए जाते हों, वे कहीं पड़ें जिसे चुगना हो चुग ले, न चुगना हो न चुगे. फिर वह कुछ चित्रण में लग जाती हैं. इस समय आकाश चिनके हुए आईने की तरह है, उनके बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उनका आँचल अब उनके लिए पूरा नहीं पड़ता. बोतल तिरछी कर पानी पीते, पसीना पोंछते कहीं भी सो जाते हैं. यह गजब का सिलसिला है-
सो जाते हैं फिर से गुड़ी मुड़ी होके।
है यह अजब सिलसिला।
घुटनों के बीच गाड़कर अपना पूरा वजूद
अपने ही गर्भ में गुड़प होना
और जन्म देना खुद को दोबारा हर रोज।      (चैत : एक अनंत-सा प्रसव)
घुटनों में अपना वजूद गाड़, जैसे वे गर्भस्थ हो रहे हों और फिर वहीं से एक नए वजूद का जन्म लेना, यह एक सिलसिला चल निकलता है वजूद के अनंत प्रसव का.
बैसाख, बसंत का उत्तर पक्ष. सूरज की तपन बढ़ने लगती है. सूरज की बढ़ती तपन के साथ जायसी की नागमती की विरह पीड़ा में भी तपन बढ़ती जाती थी. किंतु कवयित्री ने अपने इस ‘बैसाख’ कविता में एक ऐसा पात्र चुना है जिसे सूरज की तपन पसंद है. इस तपन से उन्हें प्रसन्नता होती है. वह है बैसाखनंदन अर्थात गधा या गधा जैसे स्वभाव वाले लोग जिनका काम ही है जीवन भर गठरी ढोना.
बैसाखनंदन ये
लादे गठरियाँ
लो फिर चले घाट पर-                   (बैसाख)
घाट पर याने जीवन के घाट पर. गठरी ढोते हुए भी उनके कान चौकस रहते हैं. वे हवा में तैरती कनबतियों को चौकस (कान उठाकर) होकर सुनते हैं. जमाने को देह की भूख (रसावेग) की आँखों से देखते दम साधे आगे बढ़ते जाते हैं-
भूख देह की आँख है।.....
रसावेग में इनकी
नस-नस फड़कती-सी है!
पर ये रसावेग साधे हुए
बढ़ रहे हैं घाट तक
मौन योगी-से। (बैसाख)
अपने एक ब्लॉगपोस्ट “शब्दों का सफर” में वाडनेरकर ने लिखा है कि बैसाख माह ही गधी का प्रसव काल है.
जेठ माह, गर्मी का पूर्व पक्ष है और आषाढ़ उत्तर पक्ष- “ग्रीषम जेठ आषाढ़ बखान.” जेठ माह में कड़ाके की धूप होती है. दिन में लू चलने लगती है. छाँह पाने के लिए लोग परीशान हो उठते हैं. जेठ की तपन को कवयित्री ने चार शीर्षकों में अनुभव किया है- ‘जेठ-1’, ‘जेठ की दुपहरिया’, जेठी ‘पूर्णिमा’ और ‘दुपहरिया जेठ की’. जेठी पूर्णिमा को छोड़ शेष तीन शीर्षकों में जेठ की दुपहरिया का ही चित्रण है.
लेकिन ‘जेठ-1’ की दुपहरी में वह झुलसाती तपन नहीं है जिसके लिए जेठ का महीना जाना जाता है. इसमें तो किसी बरगद की छाँव में खड़ी/बैठी कवयित्री को उस छाँव में बिछे धूप के टुकड़े ऐसे लगते हैं जैसे इस दुपहरिया ने धूल की चटाई पर फैंसी बिंदिया-चूड़ियाँ सजा दी हो एक मनिहारिन की तरह-
जेठ की यह दुपहरी
बरगद की छाँह-तले.....
बिंदिया-चूड़ियाँ फैंसी
सजा रही हों देखो-
धूल की चटाई पर
मनिहारिन-सी                              (जेठ-1)
उन्हें लगता है यह दुपहरी बरगद की चानी (शिखर) पर धूप की थाप दे रही है और हवा अपनी उँगलियों से उसकी जटाएँ सुलझा रही है. वह थोड़ी चिड़चिड़ी हो गई है कदाचित धूप की तपन से. इस हवा में आराम तो नहीं है पर जीव जीव का साथ कैसे छोड़े. थोड़ा ही आराम दे सके तो दे ले.
‘जेठ की दुपहरिया में’ गर्मी की सताती प्यास को बुझाने के लिए रखा प्याऊ का घड़ा / कंठ तक लबालब भरा घड़ा / थोड़ा-सा मता गया है , क्योंकि इसमें जेठ की धधकती हुई लू में / उड़ती हुई जब गदराए आमों की गंध प्रेम-पत्र की तरह आकर घुल गई है. जेठ की दुपहरी को झेलने के लिए कुछ उपाय तो प्रकृति स्वयं करती है और कुछ सहयोग जीव का भी होता है. दुपहरी की यह धूप कई तरह से सताती है. बाहर निकलो देह को जलाती है और घर के अंदर रहो तो पढ़ते पढ़ते विद्यार्थी पुस्तकों पर ही नींद में झूलते हुए लुढ़क जाते है.
जेठ के महीने में कभी कभी बड़े बड़े भयंकर बवंडर उठते हैं, जो एकाएक उत्पन्न होते हैं और जो भी उसकी चपेट में आ गया उसे चोटिल कर आगे बढ़ जाते हैं. ‘जेठी पूर्णिमा’ में कवयित्री ने एक ऐसे ही बवंडर का चित्र प्रस्तुत किया है. यह बवंडर उन्हें उस सनकी बाप की तरह लगा जो बच्चे को एकबारगी पीट देता है जिससे बच्चा बुरी तरह डर जता है, इस बवंडर की चोट से गड्ढों में फँसा पानी उस डरे बच्चे के हृदय-सा हकर हकर (पानी के छलकने की ध्वनि) करने लगता है. इस बच्चे के लिए जेठ-पूर्णिमा का चाँद ताबीज का काम देता है. ताबीज टोन टोटका के अलावे डर कम करने के लिए भी बाँधे जाते हैं. कवयित्री सोचती हैं कि यही बच्चा बडा होकर बडे बडे सपने देखेगा. देखेगा कि आकाश में एक बग्घी उड़ रही है जिसमें रेस के हारे हुए घोड़े जुते हुए हैं. पूर्णिमा का इकलौता चाँद उसे उस बग्घी का एक छिटका हुआ पहिया सा लगेगा. इन पंक्तियों में कवयित्री चुग के यथार्थ को अभिव्यक्त कर रही हैं. वह चिंतित हैं कि जो छिटके हुओं (जीवन से) के संताप को झेला होगा वही छिटके पहिए को बग्घी में लगा सकेगा. लेकिन समाज से छिटके हुओं को समाज से जोड़ने की कला क्या इन्हें आती है-
क्या तुमको आता है पहिया लगाना?
क्या तुमने झेले हैं संताप
छिटके हुओं के?                      (जेठी पूर्णमा)
किसी भी समाज की एक अपनी जमीन होती है. क्या किसी खास समाज-रचना का आग्रह लेकर उस जमीन से छिटकी इकाई उससे जोड़ी जा सकती है.
‘दुपहरिया जेठ की’ में जेठ की दुपहरी कवयित्री को उनके अपने बचपन में पढ़े जासूसी उपन्यास ‘ट्रेजर आइलैंड‘ की तरह लगती है-
आज तलक
लू के भभूखों से पटी पड़ी
दुपहरिया यह जेठ की
फड़फड़ाया करती है मेरे भीतर
जासूसी उपन्यास-सी।
अंत में थोड़े से शब्द अपने इस लेख के संबंध में—
अनामिका के इस गीत-गुच्छ की ओर मेरा ध्यान उनके एक सर्वथा नए प्रयास के लिए गया. इसके अध्ययन में मेरा ध्येय ‘बारामासा’ शीर्षक से दिए इस गीत-गुच्छ की पूर्ववर्ती बारहमासे से तुलना करना नहीं था. प्रसंगवश पूर्ववर्ती बारहमासे और इस बारामासे की केंद्रीयता दिखाने का प्रयास करना पड़ा. पूर्ववर्ती बारहमासा की अवधारणा से इस बारामासा ( मूलत: बारहमासा ही) की अवधारणा एकदम भिन्न है. यह मुझे षड्ऋतु वर्णन कोटि की रचना लगी. मेरे हिसाब से इसका शीर्षक ऋतु-विलास होना चाहिए था.
यह लेख समीक्षा नहीं है, अपितु एक सार-अध्ययन है. सार-अध्ययन इसलिए क्योंकि इसमें आज के परिप्रेक्ष्य के प्रतिबिम्ब आपको नहीं मिलेंगे. किंतु इसमें कविता-गुच्छ की कविताओं के मर्मों के उद्घाटन का पूरा प्रयास किया गया है. आम समीक्षाएँ जो देखने में आती हैं उनमें न तो विषय ही स्पष्ट हो पाता है न इसमें कविताओं के समझने का प्रयास दीख पड़ता है. इनमें समीक्षक कवि और कविता के मर्मोद्घाटन की अपेक्षा अपना ही उद्घाटन करते अधिक दीखते हैं.
इस लेख में किसी भी वादी समीक्षा के प्रति मेरा झुकाव नहीं है. इन वादी समीक्षाओं और आलोचनाओं ने हिंदी आनोचनाओं का बंटाढार ही किया है. हिंदी आलोचना का नया अस्तित्व गढ़ना अब आवश्यक हो गया है.
शेषनाथ प्र श्री
गोरखपुर