Monday, 24 April 2017

समकालीन कविता में बारहमासा


कविता को समर्पित ‘आलोचना’ के सहस्राब्दी अंक 57 को पढ़ते समय मेरा ध्यान बरबस कवयित्री अनामिका की कविता ‘बारामासा’ पर टिक गया, इस ‘बारामासा’ शीर्षक ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी. क्योंकि कहाँ तो नवकवितावादी अपने पूर्व की कविताओं का कलेवर हर स्तर पर बदल डालने का संकल्प लेकर आगे बढ़े थे, और बदले भी, और कहाँ अनामिका ने विषयवस्तु ही पुराना ले लिया.  संवेदना में कितना पुरानापन और नयापन है यह इन कविताओं में डूबने पर ही पता चलेगा. यह परखना रोचक होगा. यह भी देखना रोचक होगा कि नई कविता का जो रूप हमारे सामने है उसमें कविता का जो बहुत कुछ खो गया है, इस बारामासा में उन संवेदना के तंतुओं को घना करने में कवयित्री को कितनी रुचि है और उसे कितना घना पर पाई हैं.
आलोचना का यह सहस्राब्द्र्यांक 57 कुछ विशिष्ट है. इस अंक की प्रस्तुति ‘कविता की उत्तरजीविता’ शीर्षक से सम्पादकीय लिख कर की गई है. सम्पादकीय लिखा है सम्पादक अपूर्वानंद ने. अभी पिछली शताब्दी में कविता का कुछ लोगों ने अंत कर दिया था, तो अपूर्वानंद जी का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. वह चिंता से भर गए हैं. इस चिंता में उन्हें जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडार्नो याद आने लगे हैं. अडार्नो ने एक विचार दिया है निगेटिव डायलेटिक्स का- “आश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बरता है”. आश्वित्ज कंसेन्ट्रेशन कैंप में जर्मनी विरोधियों को नजियों ने बंदी बनाकर और बहुत प्रताड़ना देकर मार डाला. अडार्नो इससे इतने विचलित हो गए कि उनके ह्रदय का करुणा-जल सूख गया. उन्होंने कविजनों को संदेश दे दिया कि ऐसी स्थिति में कविता लिखना बर्बरता होगी. हालाँकि मैंने महसूस किया है कि अत्याचारियों के खिलाफ कविता एक बहुत बड़ा हथियार होती है. हमारे मार्क्सवादी कवि भी पूँजीवादी सोच के विरुद्ध लड़ने के लिए कविता को एक हथियार के रूप में ही इस्तेमाल करने की बात करते हैं. यदि आश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बरता है तो उसका हथियार के रूप मे प्रयोग करना तो और बर्बरता ढाना ही होगा.
जब अडार्नों ने यह विचार रखा तो पता नहीं उनके ध्यान में महाभारत का युद्ध था या नहीं. पर पत्रिका के सम्पाकीय लिखनेवाले के ध्यान में अवश्य होना चाहिए था. वह तो उनकी नाड़ियों में प्रवाहित है. इस युद्ध में भी बर्बरता बरती गई थी. इसमें मानवी उर्जा का इतना ह्रास हुआ कि उस क्षति से उबरने में भारत को सहस्राब्दियाँ लग गईं. जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी पर जो बम गिराए गए वह भी बर्बरता ही थी. उसकी पीड़ा जापान की आज की पीढ़ी तक भुगत रही है. किंतु न तो भारत के न जापान के ही बौद्धिक इतना निराश हो बैठे कि वे ह्रदय के स्फोट को एक बर्बर कार्य मान लिए हों. इन संस्कृतियों के प्राणों में विधेयकता है. महाभारत तो समय में हमसे बहुत दूर है पर जर्मनी के कन्संट्रेशन कैंप में ढाए जा रहे जुल्म के लगभग समांतर ही जापान पर बम गिराए गए थे. इस जापान ने अपने प्राणों की उर्जा का उपयोग कर इस बर्बरता को झेल लिया. पता नहीं अडार्नों के चिंतन में जर्मनी के प्राणों की उर्जा का योग था या नहीं.
खैर, अडार्नों का आयातित चिंतन न तो कविता का अंत कर सका, न उसकी उत्तरजीविता को ही कभी बाधित कर सका और न ही कविता लिखने को कभी बर्बरता में तब्दील कर पाया. कविता लिखी जाती रही और उसे हमेशा हृदय का स्फुरण ही समझा गया. हाँ ऐसा शोर मचाने वालों ने उसमें पोर पोर विचारों को पिरोया जरूर (भावों से दूरी बनाई), पर ये विचार कविता में कितना सौंदर्य भर पाए यह शोध का विषय है. कविता पर तमाम तरह के मुखौटे थोपे गए, कुछ नया लाने के प्रयास में. किंतु सभी प्रयास अल्पजीवी रहे. उसे सीमा में बाँधने की कोशिश की. किंतु हिंदी कविता वादों के घेरे में नहीं आ सकी. कविजनों में अभिव्यक्ति की बेचैनी भरी छटपटाहट थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. पर उनमें अनुभव और अनुभूति की भरी पूरी समृद्धि भी थी, इसपर विवाद खड़ा हो सकता है.  इनकी प्रामाणिकता की बातें खूब की गईं. पर अब ये कविताएँ कुछ थोड़े से बौद्धिकों तक सिमट कर रह गई हैं. एक समय में सहृदय होते थे जो कविता-पुस्तकों को खोज-खोज कर पढ़ते थे. आज उनका स्थान जन ने ले लिया है और मेरे अनुभव में ये बौद्धिक ही वे जन हैं. इनका आश्रयस्थल जीवन का व्यापक क्षेत्र नहीं वरन् कॉफी-हाउस और पुस्तक विमोचन-मंच हैं. ये अपनी रचनाओं को पढ़े जाने के लिए जन की खोज कर रहे हैं. अभी दैनिक हिंदुस्तान में सुधीश पचौरी का इसपर एक खूबसूरत व्यंग्य आया है.
जो हो, मेरी उत्सुकता इस कवितांक की ‘बारामासा’ कविता में है. यह कवयित्री द्वारा वर्ष के बारह महीनों के नाम से अलग-अलग लिखी गई कविताओं का एक गुच्छ है. कवयित्री ने हर महीने की बदलती ऋतु के अनुसार अपने को उससे जोड़कर जो मन में अनुभूत किया है उसे ही पिरोया है. हिंदी कविता में छायावाद के बाद आज की तिथि तक यह एक अभिनव और साहसिक प्रयोग है. अभिनव इसलिए कि बारहमासा गीतों में जो संवेदनाएँ परंपरा से रूढ़ हो गईं हैं उनका इन कविताओं में दर्शन नहीं होता. ये विशुद्ध बुद्धिवादी कविताएँ हैं. और साहसिक इसलिए कि परंपरागत संवेदनाभूति के स्थान पर इसमें नया चिंतनानुभव और परिप्रेक्ष्य देने की चेष्टा की गई है.
‘बारहमासा’ नाम से एकांत श्रीवास्तव की भी एक कविता देखने को मिली है पर वह बहुत संक्षिप्त है, और चलताऊ है.   
कवयित्री ने अपने कविता-गुच्छ के लिए ‘बारहमासा’ की जगह ‘बारामासा’ शीर्षक चुना है. यह शब्द हिंदी की हरियाणवी बोली का है. इसका अर्थ होता है विरह गान. हिंदी की अन्य बोलियों में भी इस तरह के गीत बहुप्रचलित हैं. वहाँ इन्हें ‘बारहमासा’ कहा जाता हैं. ऐसी कविताओं के लिए ‘बारहमासा’ पद ही अधिक प्रचलित है.
कवयित्री ने अपने गीत-गुच्छ के लिए यद्यपि ‘बारामासा’ शीर्षक चुना है पर इनके गीत विरहानुभूति के गीत नहीं हैं. ये विरह के गान नहीं हैं. वर्ष के हर माह के मौसम-परिवर्तन को वर्ष भर में कवयित्री ने जैसा अनुभूत किया है, उसे इन कविताओं में बुनने का नहीं वरन् चित्रित करने का प्रयास किया है. इसमें प्रकृति उनकी जीवनानुभूतियों के साथ एकरूप नहीं हैं. इस कवितागुच्छ पर कुछ लिखने के पूर्व परंपरागत ‘बारहमासा’ की प्रकृति और स्वरूप को परखना युक्तिसंगत होगा.
‘बारहमासा’ मूल रूप में लोक बोलियों में गाया जानेवाला गीत है. हिंदी की लगभग हर बोली में ‘बारहमासा’ के गीत गाए जाते हैं. गामीण अपनी सीमाओं में जीते हैं. उनके जीने के अपने ढंग होते हैं. जब वे दिन भर के अपने कामों को निपटा कर थके-हारे होते हैं तो शाम को खा-पीकर चौपाल में या अन्यत्र ढोल झाल के साथ इकट्ठे होते हैं और गा-बजाकर अपना मनोरंजन करते हैं--कभी भजन, कभी कबीर का निर्गुन, तो कभी रामचरित मानस के दोहे गाकर. कभी वे निपुण गवैयों को बुलाकर  ‘आल्हा’ और ‘कुँअर विजयमल’ जैसे वीर गीत सुनते हैं तो कभी ‘सोरठी बृजभार’ और ‘विहुला बाला-लखंदर’ जैसे विरह के गान भी सुनते हैं. इन विरह-गीतों ‘में बारहमासा’ के गीत भी होते हैं.
यह लोक गीत की एक आकर्षक विधा है. इसमें लोक कवि द्वारा किसी विरहिणी स्त्री की पीड़ा गूँथी हुई होती है जो वह अपने प्रियतम के विछुड़ने से भोग रही होती है. विरहिणी हर पल पति की बाट जोहती है. पति अथवा प्रियतम दूर है. महीने पर महीने बीत रहे हैं पर वह नहीं आता. हर महीने प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों के साथ पत्नी अथवा प्रिया की मानसिक दशा में भी परिवर्तन होते हैं. कभी उनका मन आकाश में आषाढ़ के भटकते बादलों में प्रियतम को खोजने के लिए भटक जाता है, तो कभी सावन के झकोरों में झूमते उसके अलक उसके बदन से टकराकर उसे पति-स्पर्श की स्मृति से भर पीड़ा देते हैं. भादो की धारासार बारिश में वह मदन-अंगड़ाइयों से बेहाल हो जाती है. वैसे ही शरद, हेमंत, शीत. बसंत और ग्रीष्म ऋतुओं में पति वियोग से होने वाली मंद-तीव्र पीड़ाओं की अनुभूति उसे सताती हैं. वर्ष भर की ऋतुओं के उतार चढ़ाव के साथ उनकी विरहानुभूति में होने वाले परिवर्तन ही बारहमासा में गुंफित रहते हैं. लोक-कवि अपने बीच विरह में घुलती विरहिणियों की विरहानुभूति को अत्यंत जीवंत रूप से पिरोए रहते हैं और बारहमासा गायक उसमें इतना डूब कर गाते हैं कि सुनने वाले की आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहता. लोग उसे रस ले-लेकर सुनते हैं.
बारहमासा कविता वस्तुतः लोक कविता का वह विशिष्ट रूप है जिसमें प्रकृति एवं लोक जीवन की तरलतम अनुभूति का करुणापूर्ण और मोहक दर्शन होता है.
साहित्य मे यह ग्यारहवीं शती से मिलता है. इसका प्राचीनतम साक्ष्य अब्दुल रहमान कृत संदेशरासक का विरह-प्रसंग है (हिंदी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ- पृ 315, योगेंद्र प्रताप सिंहा) अपभ्रंश साहित्य की नेमिनाथ चउपई में भी बारहमासा का प्रसंग है. रासो काव्यों में, बीसलदेव रासो और ढोला मारूरा दूहा में भी बारहमासा का उपयोग हुआ है. ‘बीसलदेव’ में रानी राजमति पति बीसलदेव को एक ब्राह्मण द्वारा संदेश भेजती है जिसमें उनसे एक वर्ष के विछुड़न के, प्रत्येक माह में झेले गए, कष्टों का वर्णन है. दूसरे में मारवणी, प्रियतम ढोला को एक ढाढ़ी द्वारा संदेश भेजती है जिसमें वर्ष भर में भोगे गए उसके कष्टों का वर्णन है. विद्यापति ने भी बारहमासा पर हाथ आजमाया है. किंतु यह विधा साहित्य में गति न पा सकी. बारहमासा विधा को गति मिली अवधी भाषा के प्रेमाख्यानक काव्यों में भक्तिकाल में. पद्मावत के ‘नागमति वियोग’ वर्णन में मलिक मुहम्मद जायसी ने बारहमासा विधा का बड़ा ही सटीक और साहित्यिक प्रयोग किया है. रीतिकाल में बारहमासा कविता ने कवि-शिक्षा का रूप ले लिया. इसके पश्चात उन्नीसवीं सदी के अंत तक बारहमासा के गीत लोक काव्यों में ही मिलते हैं.
‘विरह-गीतों के लिए बारहमासा’ एक रूढ़ हो गई विधा है. ‘बीसलदेव रासो’ में यह गीत सावन माह से शुरू होकर आषाढ़ माह तक और ‘ढोला मारूरा दूहा’ में कार्तिक माह से शुरू होकर आश्विन माह तक जाता है. लेकिन पद्मावत में यह आषाढ़ से शुरू होकर जेठ माह तक जाता है.
अधुनातन हिंदी काव्य में कवयित्री ने ‘बारहमासा’ को एक नए रूप में प्रस्तुत किया है. उन्होंने इस शीर्षक से अपने कविता-गुच्छ के लिए आधुनिक मनस्थिति और तदनुरूप आधुनिक शब्दावली का चयन किया है. ऋतुओं को आधुनिक छवि देने की कोशिश की है. किंतु यह आधुनिकता उनके द्वारा निर्मित कतिपय बिम्बों और मुक्त छंद के पंक्ति-विन्यासों में ही अधिक देखने को मिलती है. हाँ भावभूमि में उन्होंने अनुभूति के स्थान पर अनुभव को प्रतिष्ठित किया है. पहली कविता की कुछ पंक्तियाँ बारामासा की भूमिका-सी लगती हैं. किंतु इसे लिखते समय बारहमासे की परंपरागत पीठिका की स्मृति उनमें बनी हुई-सी लगती है. बारामासा चुँकि विरह गान के रूप में प्रचलित है, कदाचित ईसीलिए उन्होंने अपनी कविता का आरंभ दुख से किया है, ऋतु भी आषाढ़ की चुनी है.
                मेरा दुख
                जल्दी में
                ढीली बाँधी गई गठरी का दुख है. 
                                          (आषाढ़ में धरती-1)
‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग-वर्णन’ में नागमति की बारहमासी अनुभूति उसके वियोग से प्रारंभ होती है जो उसे हीरामन तोते के बहकावे में आकर पति रतन सिंह के सिंहल चले जाने से होता है. वह दुखी हो जाती है. उसके दुख का पारावार नहीं है. पर वह करे क्या. प्रतीक्षा ही कर सकती है. वह प्रतीक्षारत हो जाती है. इतने में आषाढ़ का महीना आ जाता है. आकाश में घुमड़ते विकीर्ण मेघ उसकी नाड़ियों में जाने कैसी वेदना भर देते हैं. वह दुखानुभूति से भर ताती है. यह दुख विरह का है, और जीवंत है. ‘बारामासा’ की कवयित्री किसी के वियोग में नहीं हैं. उन्हें किसी के वियोग का दुख नहीं है.  वह किसी दुखानुभूति में नहीं हैं. लगता है जब वह कविता लिखने बैठीं तो उन्होंने दुख का आह्वान कर लिया. वह दुख ढीली बाँधी गई गठरी का ही दुख सही (गठरी तो उन्होंने ही बाँधी होगी). यह गठरी ही उन्हें दुख दे रही है, संभवतः अपने बेडौलपन के कारण. अब इसमें जीवंतता कहाँ से होगी. इसे दुख नहीं कष्ट कहना चाहिए. इसमें मानवीय संवेदना (गहराई में अनुभूत हुई जो अनुभूति बन गई हो) का कहीं अता पता नहीं है. क्योंकि यदि गठरी कसकर बाँधी गई होती तो? संभव है तब कष्ट कम होता या होता ही नहीं (गठरी बाँधने का कौशल कष्ट कम कर देता है). इस गठरी में है भी क्या, उनके द्वारा बटोरी गई कुछ निधियाँ- भाषाओं की लुप्तप्राय ध्वनियाँ, बारह ऋतुओं का विलास (हमें तो छै ही ऋतुओं का पता है, पश्चिम में चार ही होती हैं), अंतःसत्वा चुप्पियाँ (मानों युप्पियाँ कहीं मँडरा रहीं थीं), बाली से छूट गिरे अन्नकणों की खुशबुएँ और आषाढ़ माह की पहली बूँदों का आस्वाद. कवयित्री ने गठरी में बाँधी गई निधियों को कुछ शब्द सोंदर्य से मढ़ कर पेश किया है-जैसे,
                आस्वाद
                मिट्टी की टटा रही जिह्वा पर
                आषाढ़ की पहली
                सिहरती हुई बूँद का.      (आषाढ़ मे धरती-1)
किंतु ये निधियाँ उनकी अनुभूति में स्फुरित निधियाँ नहीं हैं, सामान्य अनुभव की चीजें हैं. व्याकरण में अनुभव और अनुभूति में अंतर किया गया है. अनुभव का अर्थ है बाहर का अनुभव अर्थात बुद्धि का अनुभव और अनुभूति का अर्थ है भीतर का अनुभव अर्थात हृदय द्वारा अनुभूत. किसी की पीठ पर लद कर अनुभव ही लिया जा सकता है जैसे वायुयान पर सवार होकर मंत्री लोग लेते हैं.
अनुभव में भी कुछ गहराई होती है. अनुभव की सीमा लाँघ लेने पर ही अनुभूति में प्रवेश मिलता है. कवयित्री महसूस करती हैं कि वह काल की पीठ पर लदी हैं. याने वह समय से बाहर हैं. पर हमारा अनुभव है कि हम समय में हैं. समय के बाहर होने पर तो हम आईंस्टीन की सापेक्षता के शिकार हो जाएँगे, काल की पीठ पर लदने का सवाल ही कहाँ रहेगा. समय तो हमारे जीवन का एक आयाम है. जीवन काल के आयाम में बहता है, उसकी पीठ पर लद कर नहीं चलता. “समय की पीठ पर’’ वाक्यांश में काव्य की ध्वनि–सी निकलती प्रतीत होती तो है पर इसमें काव्य है नहीं. इसे पढ़कर हमारे हृदय की कोई पंखुड़ी नहीं खुलती. इस मायने में संस्कृत भाषा के कवियों के अनुभव और अनुभूतियाँ ध्यान देने योग्य हैं.
कवयित्री के बारामासे में विरहानुभूति न होकर ऋतुओं का विलास है. उनकी बड़े जतन से सँजोई गई गठरी की निधियाँ एक-एक कर गिरती जा रही हैं, उन्हीं में ऋतुओं का विलास भी गिरता है और वह उनके समूचे मानस-क्षेत्र पर छा जाता है. उनके बारामासा में ऋतुओं का यह विलास ही चित्रित है. इस तरह बारहमासा का परंपरागत कथ्य उनके बारामासे में ऋतु विलास से स्थानापन्न हो गया है. मेरी दृष्टि से इस कविता-गुच्छ का समेकित शीर्षक ऋतु विलास होना चाहिए, बारामासा नहीं.  
                                                     ( अधूरा )

Monday, 12 December 2016

नोटबंदी


विगत ८ नवम्बर को १००० और ५०० के नोटों के प्रचलन को बंद करने की मोदी जी की घोषणा ने देश में भूचाल-सा ला दिया. जनता में एक थर्राहट-सी आ गई - जाने क्या होगा. लेकिन इन पुराने नोटों के बदलने के कई तौर तरीकों ने जनता को कुछ आश्वस्त किया. इस कदम को भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाया गया जानकर लोग बैंकों में लाईन में लग गए, नोट वापस करने या खाते में जमा करने के लिए और नए नोट पाने के लिए. राजनीतिज्ञों को तो मोदी जी की खिलाफत के लिए एक नया अस्त्र मिल गया. उनको तर्क मिला लाईन में लगे लोगों को हो रही तकलीफों का. बैंकों में प्रतिदिन लग रही विराट कतारों में लोगों को तकलीफें हो भी रही थीं. कई लोग तो लम्बी क़तार में देर तक लगे रहने की थकान सह नहीं सके. वे गस खाकर गिरने लगे. कईयों की मृत्यु तक हो गई. किन्तु जनता के धीरज ने जवाब नहीं दिया.  किसानों की खेती पर भी असर पड़ा. छोटे व्यापारी भी चरमराने लगे. फिर भी सीमा पर लगे जवानों के कष्टकर मुश्तैदी का उदाहरण लेकर नोटबंदी से हो रहे कष्टों को झेलते रहे और मोदी जी के नोटबंदी के निर्णय को वाजिब कदम ठहराते रहे. यहाँ तक कि इस कदम का विरोध कर रहे विपक्ष के क्षेत्र की जनता में भी अधिकांश, पत्रकारों के सामने मोदी जी के कदम की सराहना करते रहे. हालांकि लोगों ने यह अवश्य टिपण्णी की और अब भी कर रहे हैं कि इस कदम के कार्यान्वयन के लिए सरकार की तैयारी आधी अधूरी है.

लेकिन विपक्ष की भूमिका अद्भुत है. जनता को हो रही कष्टों का बहाना लेकर वह सरकार पर हमलावर है. उन्हें लग रहा है निकट भविष्य में होनेवाले चुनावों में इसका लाभ उन्हें मिल सकता है. ठीक वैसे ही जैसे बिहार के विधानसभा चुनाव के पहले साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को वापस करने की मुहिम से हुआ था जो कुछ मार्क्सवादी लेखकों की हत्या और असहिष्णुता का बहाना लेकर हुआ था. बाद में इस हुए मोदी वेरोध की पोल खुल गई थी. विपक्ष इस बात की चर्चा तक करने से बच रहा है कि इस नोटबंदी ने कश्मीर में हो रही पत्थरबाजियों की पोल खोलकर रख दी है. पकिस्तान में आतंक को फीड करनेवाले आत्महत्या तक कर रहे हैं. देश में भी भ्रष्टाचार ने किस तरह अपने पाँव फैलाए हैं वह प्रतिदिन अवैध रूप से बटोरे जा रहे नए पुराने नोटों के पकडे जा रहे जखीरे से पता चल रहा है. इस भ्रष्टाचार में बैंक मेनेजर, बैंक कर्मचारी, अन्य साधारण कर्मचारी, कारोबारी और यहाँ तक कि राजनेता तक शामिल है. इन राजनेताओं में सांसद-विधायक तक अछूते नहीं हैं. इस विरोध में सबसे अधिक मुखर हैं - मायावती, ममता, राहुल और केजरीवाल.  मायावती जो अपने को दलितों की देवी कहती हैं, दलितों में विवेक जगाने के बजाय नोटों की माला पहनना अधिक पसंद करती हैं क्योंकि दलितों में विवेक जग जाएगा तो वे गैर-दलितों की तरह ऐसे प्रश्नों की बौछार कर देंगे जिससे उनकी जमीन खिसकने लग सकती है. विवेकहीन ही अपनी नेतृ को महारानी कहना पसंद कर सकते हैं. नोटबंदी से उन्हें कष्ट है क्योंकि चुनाव बिना नोट के जीते नहीं जा सकते. और इतने अल्प समय में बहुत सारे नए नोट जुटाए नहीं जा सकते. पुराने तो काम आयेंगे नहीं. अतः अपने समर्थकों को भ्रम में डालो ताकि उनका विवेक जागने न पाए. ममता ने जिस तरीके से मार्क्सवादी सरकार को अपदस्थ किया वह तरीका वह अब भी अपना रही हैं. और उस तरीके में बेशुमार नए नोटों की जरूरत पड़ेगी. दूसरे अगर नोटबंदी कहीं अपेक्षित प्रभाव डाल सकी तो ममता की सरकर प्रभावित होने लगेगी. और राहुल या कांग्रेस को तो यह नोटबंदी महाघोटाला लगती है, किसप्रकार यह कदम महाघोटाला है वह इसे संसद में ही बताएँगे जिससे मोदी जी की बोलती बंद हो जाए. जनता को इसका इन्तजार करना पड़ेगा. वैसे सभी जानते हैं कांग्रेस संभवतः अपने अस्तित्व की अन्तिम लड़ाई लड़ रही है. कहीं ऐसा न हो कि नोटबंदी के खिलाफ संसद में होनेवाला उनका भाषण कुछ अति पर चला जाए और उनकी पार्टी  को उसके डैमेज कंट्रोल में लग जाना पड़े. और केजरीवाल? राजनेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर ही ये पब्लिसिटी पाए, आरोपों से मुग्ध हुए नवयुवकों की सहानुभूति पाकर वह सत्ता में आए. मोदी जी उनकी नजर में एक अपशकुन की तरह हैं. इसीलिए वे उनका पुरजोर विरोध कर अपना अपशकुन टालते हैं. वह अपने को सच्चरित्र तो घोषित किये ही हैं, अपने समर्थकों को भी सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे रखे हैं. पर देखने में आ रहा है कि इनका एक सांसद अभी अभी लोकसभाध्यक्ष द्वारा सांसद-चरित्र की अवहेलना करने पर दण्डित कर संसद की कुछ कार्यवाहियों से बचित कर दिया गया है. एक विधायक घरेलू हिंसा में आरोपित है. पर स्वयभू चरित्रवान राजनेता बेफिक्र हैं. जब केजरीवाल अपनी छींक आने का कारण भी मोदी को मानते हैं तो नोटबंदी के प्रत्यक्ष कारण तो मोदी ही हैं. यह नोटबंदी उनके लिए घोर अपशकुन है. राहुल तो इसे महाघोटाला ही कहकर रह गए, पर यह पंजाब की एक सभा में इस महाघोटाले को व्योरेवार बतानेवाले हैं.

एक बात तो विल्कुल स्पष्ट है कि विपक्ष अपने अपने कारणों से नोटबंदी के विरोध में है. किन्तु मोदी के मन में नोटबंदी को लागू करने के पीछे क्या उनके मन में महज भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई छेडने की ही बात थी. जब औरों के लिए चुनाव सामने है तो चुनाव तो भाजपा को भी लड़ने हैं. अगर विपक्ष इस नोटबंदी के पीछे भाजपा की चुनावी गंध को सूँघता है तो एकबारगी उसे झुठलाया तो नहीं जा सकता.

जो भी हो नोटबंदी के इस मुहिम में मोदी जी का धैर्य और साहस वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुनने लायक है. मिलिटरी वाले तो यह कहने से अपने को रोक नहीं पा रहे हैं कि वर्षों बाद ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जिसे पाकर देश का बल कई गुना बढ़ गया है. इस मुहिम के पीछे कौन कौन सी मनसा मोदी जी के मन में है हमें नहीं मालूम पर इस मुहिम को सफल बनाने के उनके प्रयास इमानदारी से भरे हैं.

अब प्रश्न उठता है कि नोटबंदी वास्तव में क्या एक सही कदम है अर्थव्यवस्था के पक्ष में. क्या इस कदम से देश भ्रष्टाचारमुक्त हो जाएगा? इस एक कदम से भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी यह कहना खयाली पुलाव पकाने जैसा ही होगा, किन्तु इस लक्ष्य की ओर यह एक कारगर कदम अवश्य है. एक और बात साफ़ हो रही है कि भ्रष्टाचार की पाँव पसरता है इसके तौर तरीके भी ध्यान में आते जा रहे है जो investigation काम आयेंगे. मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ किन्तु अर्थशास्त्रियों के विचार पढ़ता रहता हूँ. और यह बात सामने आ रही है कि कई अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था पर इसके पड़नेवाले अच्छे प्रभाव के प्रति आश्वस्त नहीं हैं लेकिन निराश भी नहीं हैं. हाँ डा मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था पर इसके पड़नेवाले विपरीत प्रभाव से आगाह अवश्य किया है. किन्तु इससे इस उठाए गए कदम का महत्त्व कम नहीं हो जाता. फिलवक्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव परीशान करनेवाला है.  ऐसे समय में अर्थशास्त्रियों के विचारों को प्रमुखता मिलनी चाहिए राजनीतिज्ञों के शोर शराबे के बरक्स.

संभव है विपक्ष के नोटबंदी के विरोध में कुछ दम हो किन्तु जिस तरह से वह विरोध कर रहा है, यह वैसा ही है जैसा वह GST का विरोध कर रहा था. बहुत बाद में उसकी समझ में आया कि उस बिल को संसद से पास करवाना ही चाहिए.  

Wednesday, 8 June 2016

अनुशेष: उड़ता पंजाब

अनुशेष: उड़ता पंजाब: 'गैंग ऑफ बासेपुर'' के फ़िल्मकार अनुराग कश्यप की नयी फिल्म 'उड़ता पंजाब' पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चला दी है. समाचार के ...

उड़ता पंजाब


'गैंग ऑफ बासेपुर'' के फ़िल्मकार अनुराग कश्यप की नयी फिल्म 'उड़ता पंजाब' पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चला दी है. समाचार के अनुसार उसने फिल्म में से करीब अस्सी से अधिक स्थानों पर प्रयुक्त 'पंजाब' शब्द हटाने को कहा है. ट्रिब्यूनल ने तो फिल्म के नाम से भी 'पजाब' शब्द को हटाने को कहा है. अनुराग कश्यप को यह मंजूर नहीं है. अखबारों में आए उनके वक्तव्यों से यही लगता है कि वह पजाब के युवकों को नशाखोरी के खिलाफ सन्देश देना चाहते हैं कि नशा एक बहुत बुरी चीज है. 

लेकिन सेंसर बोर्ड फिल्म से 'पंजाब' शब्द क्यों हटवाना चाहता है इसपर उनके अपने तर्कों के साथ अभी तक उनका कोई वक्तव्य देखने को नहीं मिला. वह अपने किन तर्कों के सहारे फिल्म में 'पंजाब' को रखने पर बल दे रहे हैं, यह न बताकर, सीधे सेंसर बोर्ड पर तानाशाही का आरोप लगा रहे हैं. वह यहीं नहीं रुकते वल्कि सेंसर बोर्ड की तुलना कोरिया के तानाशाही शासन से कर डालते हैं. और विडम्बना देखिये 'आप' के केजरीवाल और कांग्रेस के राहुल गांधी अनुराग के समर्थन में इसे एक अवसर के रूप में लपक लेते हैं. वह अवसर क्या है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमले का अवसर, ठीक जे एन यु काण्ड और फिल्म संस्थान के अध्यक्ष पद की नियुक्ति के मसले को जैसे लपक लिया था. बहाना क्या है, अभ्व्यक्ति की आजादी. अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ही साहित्य अकादमी के पुरस्कार को कुछ लेखकों-कवियों के द्वारा लौटाया गया था. उसका असली उद्देश्य क्या था अब किसी से छिपा नहीं. अनुराग कश्यप ऐसे अबोध नहीं कि वह यह सब नहीं जानते हों. इनके एक समर्थक एक फिल्म-नेता कहते हैं, फिल्म के खिलाफ पंजाब सरकार को कोर्ट जाना चाहिए. इस वक्तब्य के पीछे उनकी मनसा क्या है? इसमें क्या राजनीति की बू नहीं आती? अनुराग कश्यप ही क्यों नहीं कोर्ट चले जाते. ऊल जूल वक्तव्य देने के बजाय सेंसर बोर्ड यदि लिखित आदेश नहीं देता तो यही लेकर वह कोर्ट जा सकते हैं की उन्हें बोर्ड से फिल्म में कटिंग के लिए लिखित आदेश दिलाया जाए. पंजाब सरकार के पास कोर्ट जाने के क्या आधार है जबतक कि फिल्म रिलीज नहीं हो जाती.

नशाखोरी एक बहुत बुरी आदत है. पजाब में यह समस्या खतरनाक मोड़ पर पहुँच गई है. लेकिन क्या यह समस्या केवल पंजाब की ही है. क्या महाराष्ट्र में यह समस्या खतरे के विन्दु तक नहीं पहुँच चुकी है. समाचारों में तो महाराष्ट्र को भी नशाखोरी से ग्रस्त पदेश बताया जाता है. फिर उड़ता पंजाब ही क्यों, उड़ता महाराष्ट्र क्यों नहीं. बेहतर होता इस फिल्म का कोई एक सामान्य नाम होता जिसमें किसी प्रदेश को लक्ष्य न किया गया होता. इस फिल्म में संशोधनों की सलाह पर अनुराग की इस किस्म की प्रतिक्रियाओं से तो यही लगता है कि वह किसी निहित उद्देश्य के तहत पंजाब को लक्ष्य किया है. फिल्म सेंसर बोर्ड कोई प्रभुता संपन्न संस्था नहीं वरन भारतीय सरकार के शासनान्तार्गत एक संस्था है, जबकि कोरिया एक प्रभुतासंपन्न सरकार है. अनुराग कश्यप की इस तुलना में क्या कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं दिखाई देता?

"उड़ता पंजाब" यदि ज्यों का त्यों पंजाब में प्रदर्शित हो जाए और वहां कोई राजनीतिक तूफ़ान उठ खड़ा हो तो क्या कश्यप उसे रोक सकते हैं? इसका राजनीतिक उपयोग नहीं होगा क्या इसकी कोई गारंटी दी जा सकती है. अभी फिल्म रिलीज नहीं हुई और अभी से 'आप' और कांग्रेस ये दोनों दल इसका लाभ लेने के लिए आतुर हो उठे हैं. फिल्म रिलीज होने पर ये कैसा तूफ़ान खडा करेंगे इसका अनुमान अभी से लगाया जा सकता है. यह प्रत्याशित है कि पंजाब में जभी यह दिखाई जाएगी पंजाबी लोग इसका विओध करेंगें. इस फिल्म को पंजाब के लिए वे एक लांछन के रूप में ले सकते हैं. क्या यह उसी तरह का चित्रण नहीं है जैसा मकबूल फ़िदा हुसैन ने हिन्दू देवी देवताओं के प्रति किया था. अनुराग जी फिल्म भी साहित्य का एक हिस्सा है. उसे आग्रही नहीं होना चाहिए. अभिव्यक्ति की आजादी के जितने बड़े शत्रु कमुनिस्ट सरकारें है भारतीय सरकारे तो ऐसी नहीं दिखती. हाँ अभिवक्ति की आजादी के नाम पर धंधा चलाने वाले बहुत दिखाई देते हैं..

Thursday, 11 February 2016

श्लील-अश्लील




एक बार स्वर्ग की नर्तकी उर्वसी को अपने रूप यौवन पर बड़ा अभिमान हो गया था. उसने ऋषियों को चुनौती दे डाली थी- वे मेरा नृत्य देख कर अपने आपको रोक नहीं सकेंगे.
तो इंद्र ने उसके कहने पर एक नृत्य सभा का आयोजन किया और ऋषियों को भी बुला भेजा.
उर्वशी ने इंद्रसभा में वस्त्रउतार नृत्य प्रारंभ किया. नृत्य बहुत सुंदर था, सभी सभासद और ऋषि उर्वशी का नृत्य देख मंत्रमुग्ध हो गए.
तभी नृत्य करते करते उर्वसी ने अपना एक अंगवस्त्र उतार फेंका और नृत्य जारी रखा. एक ऋषि से उर्वशी का यह नृत्य देखा नहीं गया. उसने सभा छोड़ दी.
नृत्य रत उर्वशी ने इधर एक-एक अंगवस्त्र उतार कर फेकने शुरू किेए उधर एक-एक ऋषि सभा छोडकर जाने लगे, लेकिन एक ऋषि हठी निकला. उसने सभा नहीं छोड़ी. उर्वशी को लगा अब उसका गर्व टूटने ही वाला है. और तब उसने अपने शरीर का अंतिम वस्त्र भी उतार फेंका. नृत्य वास्तव में सुंदर और अद्भुत था. सभा में उपस्थित वह अंतिम ऋषि उठा और तालियों से उर्वशी के नृत्य की प्रशंसा की किंतु सभा से उठकर गया नहीं. बोला, उर्वशी, तुम्हारा नृत्य अद्भुत है परंतु एक कमी अभी भी रह गई है. एक वस्त्र अभी भी शेष रह गया है तुम्हारा, तुम उसे भी उतार फेंको. ऋषि का ईशारा था, यह देह भी तो एक वस्त्र ही है जिससे उसके होने (beeing) को सजाया गया है.
यह वाक्य कान में पड़ते ही उर्वशी नृत्य करते करते रुक गई. ऋषि का अर्थ उर्वशी की समझ में आया और वह पछाड़ खाकर ऋषि के पैरों पर लुढ़क गई. उसका सारा अभिमान चूर चूर हो गया था.

Monday, 8 February 2016

अंगुलिमाल : उत्तर प्रसंग/कहानी

रचनाकार में प्रकाशित       8-2-2016




image
उत्तर प्रसंग
तथागत अंगुलिमाल को साथ लेकर उस स्थान पर आ गए जहाँ वह ठहरे हुए थे. वहाँ उनके शिष्य बड़ी व्याकुलता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. अभी तक उनके शिष्यों के हृदय की बढ़ी हुई धड़कनें थमी नहीं थीं. वे प्रशनाकुल हुए बड़ी तेज गति से तथागत के समीप सिमट आए और उनका कुशल-क्षेम पूछने लगे.
तथागत ने वन में घटी घटना से अपने शिष्यों को अवगत कराया और फिर अपने नए शिष्य से उनका परिचय कराया-
           “ये हैं हमारे संघ के नए संन्यासी, अंगुलिमाल. ये तुम लोगों के साथ ही रहेंगे. तुमलोग इनसे किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न करना. इनके संबंध में किसी से कोई चर्चा भी न करना”.
तथागत की देशना में किसी तरह के प्रचार का स्थान नहीं था. उनका प्रयोग-क्षेत्र मनुष्य था.
अंगुलिमाल ने बौद्ध-संन्यासी का चीवर धारण कर लिया. वह तथागत की नित्य की दैनिक देशना में सम्मिलित होने लगा और अन्य संन्यासी शिष्यों के साथ भिक्षा के लिए भी जाने लगा. पुरवासियों को उसके संबंध में कुछ भी पता नहीं होने दिया गया. उन्हें केवल इतना ही पता था कि भगवान वन में अंगुलिमाल के विचरण-भेत्र की ओर गए थे. किसलिए गए, कहाँ तक गए, कब आए, अंगुलिमाल से उनकी भेंट हुई या नहीं, इसका उन्हें कुछ भी पता नहीं हुआ. क्योकि यह प्रयाण बुद्ध की दैनिक चारणा का अंग था. पुरवासियों को क्या पड़ी थी कि वे भगवान के शिष्यों से, उनके साथ क्या घटा, क्या नहीं घटा इसकी पड़ताल करें. कुछ घटा होता तो आश्रम में कुछ हलचल अवश्य होती.
उधर उसकी माँ भी वन से वापस आ गई. आकर अपनी दैनिक चर्या में लग गई. अंगुलिमाल के बुद्ध का शिष्य बन जाने से वह बहुत प्रसन्नचित थी. उसका पुत्र सम्राट के हाथ में पड़ने से बच गया था. यदि पड़ जाता तो उसे मृत्यु की सजा निश्चत थी.
भले ही उसका पुत्र डाकू-हत्यारा हो गया था, उस माँ के मन में पुत्र के प्रति आक्रोश का भाव होते हुए भी उसके प्रति अभी भी स्नेह शिथिल नहीं हुआ था. उसका स्नेह ही उसे पुत्र से मिलने जाने के लिए बाध्य कर देता था. वन में जिस समय उसने पुत्र को तथागत के चरणों में झुके देखा उसके नेत्र छलछला आए थे. एक क्षण के लिए उसकी ममता में ऊफान सा आ गया था. उस क्षण उसके मन में हुआ कि वह पुत्र को अपनी आँचल में समेट ले, पर उसने अपने को रोक लिया था. भावावेश के क्षण में भी उसे लगा कि वह क्षण उस कृत्य के लिए उपयुक्त नहीं था.     
अंगुलिमाल तथागत के साथ उनके प्रवासाश्रम में आ गया, बौद्ध आश्रम में निभाई जाने वाली सभी चर्याओं को उसने अपना भी लिया. आश्रम में ध्यान  करना अनिवार्य था. वह ध्यान के लिए भी बैठने लगा पर ध्यान साध नहीं पाता था. ध्यान-मुद्रा में बैठकर ज्योंही वह नेत्र मूँद कर अपने भीतर प्रवेश करने का प्रयत्न करता उसके मन में उसके वे हत्या-कृत्य उभर आते जो उसने 999 उँगलियों को प्रप्त करने के लिए किए थे. वह आत्मग्लानि से भर जाता और घबराकर ध्यान से उठ जाता.
वह दिन-रात पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा. किंतु अपने संन्यासी साथियों पर वह इसे प्रकट नहीं होने देता था.
उसकी समूची सूचनाएँ नित्य तथागत तक पहुँचती रहती थीं. पर ये सारी सूचनाएँ उसकी बाह्य गतिविधि की ही होती थीं.
अगुलिमाल इससे अनभिज्ञ था. उसकी अनभिज्ञता में तथागत उसके प्रति अपने कर्तव्य निभा रहे थे. उसके मन में घट रही अंतर्घटनाओं को वह उसके मन पर अपना ध्यान फेंक कर जान लेने में समर्थ थे. उनके संबंध में ये तथ्य मिलते हैं कि जहाँ वह अपने शिष्यों के साथ ठहरते थे, यदि वहाँ कोई जनश्रद्धा-स्थल होता, तो अपने शिष्यों से, उस स्थल पर ध्यान फेंक कर, यह जानने को कहते कि देखो इस स्थल की सही स्थिति क्या है. उनके शिष्य उस पर अपना घनीभूत ध्यान फेंक कर उन्हें बताते कि वहाँ किसी साधु की या किसी तपस्वी की समाधि है.
इसी बीच तथागत को सूचना प्राप्त हुई कि सम्राट प्रसेनजित उनका दर्शन करना चाहते हैं.
वास्तव में सम्राट वहाँ के पुरवासियों की प्रार्थना पर एक बड़ी सेना लेकर अंगुलिमाल को पकड़ने के लिए उसी समय चल पड़े थे जब तथागत जंगल की ओर प्रयाण किए थे, अंगुलिमाल से मिलने. मार्ग में उन्हें सूचना प्राप्त हुई कि तथागत अपने शिष्यों के साथ उसी जंगल के पास के गाँव में ठहरे हुए हैं जो अगुलिमाल का विचरण-क्षेत्र है. सम्राट ने पहले तथागत के दर्शन करने का निर्णय लिया.
सम्राट की सूचना पाते ही तथागत ने उन्हें बुला लिया. तथागत के पास आकर सम्राट ने उनका अभिवादन किया और उनसे अपने आने का उद्देश्य बतायाः
           “यहाँ के पुरवासियों की प्रार्थना पर हम यहाँ आए हैं. किसी अंगुलिमाल नाम के डाकू ने उनके प्राण संकट में डाल रखा है. वे उससे बहुत आतंकित हैं. जो भी जंगल के मार्ग से जाता है वह उनकी हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता है. हम अपने सैनिकों के साथ उसे पकड़ने आए हैं.”
तथागत ने सम्राट की बातें सुनीं. पूछा-
           “सम्राट, यदि मैं अंगुलिमाल को आपके सामने ला दूँ, तो आप उसके साथ क्या करेंगे.”
सम्राट ने कहा- 
          “मैं उसपर आक्रमण नहीं करूँगा. उसे आपके आश्रम में रहने की अनुमति दे दूँगा”.
तथागत ने अपनी दायीं ओर कुछ दूरी पर बैठे एक सन्यासी की ओर इंगित कर सम्राट से कहा-
          “वह रहा आपका अंगलिमाल, दाढ़ी मूंछें कटी हुई, संन्यासी वेश में”
उसे देखते ही सम्राट कुछ डग कूद गए और तलवार खींच लिए. तथागत ने कहा- “सम्राट अब तलवार की कोई आवश्यकता नहीं”.
सम्राट कुछ क्षण उसे देखते रह गए.  पुरवासियों ने सम्राट के सामने डाकू अंगुलिमाल का जो चित्र खींचा था, यह अंगुलिमाल उससे एकदम भिन्न था. पुरवासियों ने सम्राट के समक्ष उसे बड़ी बड़ी दाढ़ी-मूँछों, शीश पर अग्नि की लपटों-सा फड़-फड़ाते बालों और कठोरता लिए खिंचे खूंखार चेहरे वाला चित्रित किया था. और यह जो सामने है एकदम श्मश्रुविहीन, सौम्य, शांतचित्त और शीतल स्वभाव का है. सम्राट के मन में तुरंत यह बात कौंध गई, जिसे हम वश में नहीं कर पाए उसे तथागत ने....
बुद्ध का वचन सुन सम्राट ने तलवार वापस अपने म्यान में रख ली. उनकी अनुमति लेकर उसे अपने पास बुलाया, उसे चीवर भेंट किया और प्रवासाश्रम में रहने की अनुमति दे दी. और तथागत के प्रति अपनी धन्यता व्यक्त कर तथा उनकी अनुमति लेकर राजधानी सेना सहित श्रावस्ती के लिए प्रस्थान कर गए.
अंगुलिमाल को यह सब अद्भुत लगा. उसके वन्य जीवन में उसकी माँ के अतिरिक्त कोई उससे मिलने नहीं आता था. सहानुभूति के कुछ शब्द तो उससे कोई कैस कहता. उसके कर्म ही वैसे थे. किंतु उसके मन में कहीं कुछ पड़ गई गाँठें खुलती सी उसे अवश्य अनुभूत हुईं.
उसके मन की गतियों पर बुद्ध की अंतर्दृष्टि निरंतर बनी हुई थी. उसके मन को उसके पूर्वकृत्य बहुत व्याकुल किए हुए थे. इसके कारण ध्यान छोड़कर वह बीच ही में उठ जाता और अनमना हो टहलने लगता. जब उसे किसी पर उसकी की गई क्रूरता का दृश्य उसके सामने उभरता तो उसके रोम-रोम सिहर उठते. हत्या करते समय कभी उसके हाथ काँपे नहीं थे.
उसकी इस मानसिक गतिविधि को ताड़कर बुद्ध ने उसके मानसिक भाव के अनुरूप ही ध्यान की एक विधि दी. उसे विपस्सना ध्यान करने को कहा. इस ध्यान में तीन चरण होते हैं- पहले चरण में साधक को अपने मन में उठते हुए भावों- कृत्यों, विचारों- को साक्षी भाव से देखना होता है. दूसरे में भीतर जाती साँसों और तीसरे में बाहर निकलती साँसों को देखना होता है. बौद्ध साहित्य कहता है स्वयं बुद्ध ने इसी ध्यानविधि से ज्ञान प्राप्त किया था.
अंगुलिमाल के लिए यह बहुत ही उपयुक्त ध्यान था. उसके मन में  उसके पूर्वकृत्य बार बार उभर आते थे. और वह ग्लानि से भर जाता था. वह यह ध्यान मनोयोग से करने लगा और उसे यह सधने भी लगा. ध्यान में जब भी उसका कोई पूर्वकृत्य उभरने से उसका मन उद्विग्न होने लगता, वह उन कृत्यों को अंतर्मन से सायास देखने लगता. वैसा करने से उसके उभरते कृत्य विरल होने लगते और वह धीरे धीरे स्वस्थ-चित्त हो जाता और उसका ध्यान घना होने लगता.
तथागत उसे ध्यान में थोड़ी सफलता प्राप्त करते देख आश्वस्त हुए. वह उसकी चित्त-दशा में हो रहे परिवर्तन पर अधिक ध्यान दे रहे थे. वह प्रतीक्षा में थे कि उन्हें एक अवसर मिले और वह अंगुलिमाल के चित्त पर एक परिवर्तनकारी प्रयोग करें.
शीघ्र ही उन्हें एक सुयोग भी मिल गया.
एक दिन अंगुलिमाल संन्यासियों के साथ जब आश्रम की ओर लौट रहा था तो मार्ग में एक पुरवासी के घर से उसे एक स्त्री के रोने का स्वर सुनाई पड़ा. गृहस्वामी से पूछने पर उसे ज्ञात हुआ कि उसकी पुत्रवधू प्रसव की पीड़ा से तड़प रही है. उसके प्रसव में कठिनाई हो रही है. प्रसव पीड़ा झेल रही उस स्त्री के प्रति उसके मन में करुणा उमड़ आई. उसके मन में हुआ कि उसकी पीड़ा को न्यून करने के लिए उसकी कुछ सहायता की जानी चाहिए. किंतु तत्काल उसेकोई उपाय नहीं सूझा.
वह आश्रम आकर तथागत को बताया और पूछा- “भगवन उस गर्भवती स्त्री की पीड़ा को न्यून करने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ”.
तथागत ने उससे कहा- “अंगुलिमाल, पीड़ा झेलती उस गर्भवती स्त्री के पास जाओ और कहो-
         ‘बहन, जबसे मैंने जन्म लिया है, मुझे स्मरण नहीं होता कि मैंने अपने संज्ञान में किसी जीवित प्राणी की हत्या की हो. इस सत्य के द्वारा आपकी पीड़ा कम हो और सुख प्राप्त हो, आपके गर्भ में पल रहा शिशु भी सुख प्राप्त करे’.
अंगुलिमाल ने तथागत के उस कथन को सुना, किंतु उसे यह कथन सत्य के परे लगा. उसने इस कथन के प्रति अपनी हिचकिचाहट प्रकट की.
वास्तव में तथागत पहले अंगुलिमाल के मन की स्थिति को जानना चाहते थे. अपने पहले कथन को मानने में उसकी हिचकिचाहट देख उन्होंने यह जान लिया कि वह जन्म से हिंसक प्रवृत्ति का नहीं है. उसकी हिचकिचाहट का अर्थ था कि उसे उनका वह कथन उसके प्रति सत्य को व्यक्त करता प्रतीत नहीं हुआ.
किसी की मनस्थिति को जानने का उनका यह अपना ढंग था. एक सत्य घटना आपके सामने रखूँ. जब बट-वृक्ष के नीचे नरकंकाल जैसा शरीर लिए बैठे तथागत को सुजाता की खीर खाकर ज्ञान प्राप्त हुआ था, सुजाता उन्हें बट वाले बाबा कहने लगी थी. वहाँ के ग्रामवासी भी उन्हें बट वाला बाबा मानकर उनके पास अपने भले के लिए आशीर्वाद माँगने जाने लगे थे. एक दिन एक ग्रामणी रोती हुई अपने अभी अभी मृत पुत्र को लेकर उस बट वाले बाबा के पास आई और उसे जीवित कर देने का आग्रह करने लगी. तथागत ने उसकी प्रार्थना ध्यान से सुनी. उन्होंने उस ग्रामणी से कहा-
         “तुम एक मुट्ठी सरसो लाओ. यह सरसो उस घर का होना चाहिए जिस घर में कोई मृत्यु न हुई हो. मैं तुम्हारे पुत्र को जीवित कर दूँगा”.
ग्रामणी वापस गई और अपने ग्राम के हरएक घर घूम आई किंतु उसे एक भी घर ऐसा नहीं मिला जिसके घर किसी की मृत्यु न हुई हो. आकर उसने  स्थिति बताई. तथागत ने उससे कहा-
         “मृत्यु जीवन का ध्रुव सत्य है.  इसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता”.
अंगुलिमाल की हिचकिचाहट को देख तथागत ने उसे एक दूसरा कथन सुझाया. उन्होंने पूर्व कथन को थोड़ा सुधारा और कहा, उससे कहना-
          “बहन, मैं जन्म से ही उदार हृदय का हूँ. मुझे स्मरण नहीं होता कि मैंने अपने संज्ञान में किसी जीवित प्राणी की हत्या की हो. इस सत्य के द्वारा आपको सुख प्राप्त हो, आपके गर्भ में पल रहा शिशु भी सुख प्राप्त करे”.
तथागत का यह कथन उसे अपने अस्तित्व के निकट का और उपयुक्त लगा. वह उस गर्भवती स्त्री के पास गया और तथागत के उस कथन को आशीर्वादस्वरूप उससे कहा. करुणा से भरे हृदय वाले अंगुलिमाल के उस आशीर्वाद के संवेदनशील शब्द-तरंगों ने उस गर्भवती स्त्री पर अनुकूल प्रभाव डाला. उसने एक शिशु का आसान प्रसव किया.
जब सम्राट के सामने अंगुलिमाल का रहस्य प्रकट हुआ, इसे ग्रामवासियों ने भी जाना. सम्राट को उसे चीवर भेंट करते देख उनके मन मे उसके प्रति थोड़ी सहानुभूति जगती दिखी. उसके आशीर्वाद से गर्भवती स्त्री को प्रसव पीड़ा से मुक्त हो जाने की घटना ने उनमें उसके प्रति सहानुभूति को और गहरा कर दिया. किंतु कुछ ग्रामवासी अभी भी उससे रुष्ट थे. वे अपने स्वजनों की हत्या करने वाले को भूल नहीं पा रहे थे.
अंगुलिमाल भिक्षाटन के लिए अभी तक अपने संन्यासी साथियों के साथ जाता था. तथागत ने अब उसे अकेले जाने को कहा. स्यात उनका ध्यान उन ग्रामवासियों की ओर था जो उससे अभी भी रुष्ट थे. वह जानना चाहते थे कि उसके अकेले होने पर वे उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं. उसके साथ उनके द्वारा किए जाने वाले व्यवहार का उनुमान अवश्य रहा होगा पर उसकी चर्चा तथागत ने उससे नहीं की. वह चाहते थे कि अंगुलिमाल स्वयं उस व्यवहार का अनुभव करे. यह अनुभव उसका अपना अनुभव होगा और उससे निपटने की सूझ भी उसकी अपनी होगी. इसीसे उसके अस्तित्व में खिलावट आएगी.
तथागत की अनुमति लेकर भिक्षाटन के लिए अब वह गाँव में अकेले ही  निकलना आरंभ किया. पहले ही दिन गाँव में प्रवेश कर जब वह एक गृहस्वामी  के द्वार पर भिक्षा के लिए खड़ा हुआ, अभी पात्र आगे बढ़ाया भी न था कि उसे भिक्षा देने से मना हो गया. और ज्योंही अगले गृहस्वामी की ओर आगे बढ़ा, एक पत्थर उसके शीश पर लगा. उसने हाथ से अपना शीश पकड़ लिया. पर रुका नहीं, आगे ही बढ़ा. अभी दूसरे गृहस्वामी तक वह पहुँचा भी न था कि उसके शरीर पर एक डंडा आकर लगा. किंतु उसके डग रुके नहीं, अगले गृहस्वामियों की ओर बढ़ते गए. उसपर प्रहार होने भी नहीं रुके. और इतने प्रहार हुए कि चोटों से आहत हो वह धरती पर गिर गया. जब संध्या तक वह आश्रम नहीं पहुँचा तो उसके साथी उसे ढूँढ़ने निकले. उन्हें वह ग्राममार्ग के एक स्थान पर घायल पड़ा मिला. वे उसे उठाकर आश्रम ले आए, सेवा सुश्रुषा किए. तभी तथागत आ गए. उन्होंने उससे पूछा-
          “अंगुलिमाल, जब ग्रामवासी तुम पर प्रहार कर रहे थे तो तुम्हारे मन में क्या हो रहा था?”
          “भगवन, मेरे मन में उनके प्रति थोड़ा भी क्रोध नहीं आया. जब भी उनके प्रहार मुझपर होते थे, एक क्षण के लिए मेरे द्वारा उनके स्वजनों की की गई हत्याएँ मुझे स्मरण हो आती थीं.”
          “किंतु वे तुम्हें चोट पहुँचा रहे थे. चोट से तुम्हें पीड़ा होती होगी.”
          “यह तो मात्र चोट लगने की पीड़ा है. इन लोगों ने तो अपने स्वजनों के खोने की पीड़ा सही है. भगवन, मेरे प्रति उनके मन में आया क्रोध स्वाभाविक था.”
         “अंगुलिमाल, तुम भिक्षाटन के लिए अकेले जाते रहना. यह तुम्हारे ध्यान की साधना का एक अंग है. तुम्हारे साथ ग्रामवासी जो भी व्यवहार करें बिना उसके प्रति प्रतिक्रिया किए उन व्यवहारों के प्रति अपने मन में उठते भावों का साक्षी बने रहना.”
वह अब और उल्लास से भिक्षाटन पर जाने लगा. किंतु उसके प्रति ग्रामवासियों के क्रोध में कोई न्यूनता नहीं आई. अब वे प्रहार पत्थर, डंडे से नहीं वरन क्रोध-वाण से उसपर आक्रमण करते रहे. वे किसी भी तरह उसके प्रति नम्रता वरतने की मुद्रा में नहीं प्रतीत होते थे.
अंततः तथागत को बीच में पड़ना पड़ा. वह अंगुलिमाल के प्रति अब पूर्णतः आश्वस्त थे. उन्होंने ग्रामवासियों को समझाया. यह अंगुलिमाल अब तुम लोगों को कोई हानि नहीं पहुँचाएगा. इसका दायित्व मेरा है. भूत में इसने जो हानि तुम्हें पहुँचाई है उसे होनी मान लेनी चाहिए. इसी में तुम्हारी भलाई है. पूर्व कृत्य को सदा स्मरण किए रहने से जीवन की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकेगी. कालवश तुम्हारे परिवार में कोई मृत्यु होती है तो उसे तुम्हें भुलानी ही पड़ती है. तुमलोग इस अंगुलिमाल को स्वीकार कर लो. यह तुम्हारे लिए हितकारी ही सिद्ध होगा.
ग्रामवासियों ने तथागत की इस देशना को शीश झुकाकर स्वीकार किया.
                                                  7-2-2016

Sunday, 31 January 2016

अंगुलिमाल / कहानी


रचनाकार में प्रकाशित   31.01.2015


पूर्व प्रसंग 
समय लगभग ईस्वी पूर्व 500. ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध लोगों तक अपनी देशना पहुँचाने के लिए गाँव गाँव भ्रमण करते थे. भ्रमण करते हुए एक बार वह कोशल महाजनपद की राजधानी सावत्थी (श्रावस्ती) के एक गाँव में थे. वहाँ वह अपने शिष्यों के बीच अपनी देशना देते थे. आस-पास के गाँव के लोग भी उनकी देशना सुनने आते थे. धर्म-देशना के समय तथागत को अनुभव हुआ कि गाँव के लोग कुछ सहमे-से लग रहे हैं. कोई भी पुरवासी खुले मन से इस देशना में नहीं आ रहा. जो आ रहे हैं उनका भी ध्यान देशना को सुनते समय उनकी ओर न होकर अन्य ओर विचलित होता रहता है जैसे कि उनके मन में उनकी ओर किसी हानि पहुँचाने वाले तत्व के आ जाने का भय लगा हो. उन्होंने इस भासित होने वाले तथ्य से अपने शिष्यों को आगाह किया. क्योंकि वे भिक्षाटन के लिए गाँवों में जाते रहते है.
उन्होंने स्वयं भी पुरवासियों की मनस्थिति को जानने की चेष्टा की. उन्हें ज्ञात हुआ कि इस अंचल के पुरवासियों के मन पर किसी अंगुलिमाल नाम के डाकू का आतंक छाया हुआ है. वह दुर्दांत है. वह जंगल से होकर जानेवाले पथिकों और व्यापारियों की हत्या कर उनके दाएँ हाथ की एक-एक उँगली काट लेता है. उँगली के लिए वह तीर्थयात्रियों की भी हत्या कर देता है. वहाँ के वासियों के मन में उसका भय इस कदर समाया हुआ है कि उन लोगों ने जंगल के बाट से जाना आना बंद कर दिया है. वह जंगल से निकल कर पुरवासियों के घर में भी घुस जाता है और उस घर के सदस्यों की हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता है. उन काटी गई उँगलियों की माला बनाकर उसने अपने गले में पहन रखी है. वह यहाँ के लोगों में अंगुलिमाल के नाम से जाना जाता है. उसका शरीर विशाल है. उसके चेहरे पर बड़ी बड़ी मूँछें हैं. घने लटियाए हुए बिखरे बाल हैं. बड़े बड़े, लाल लाल, आग बरसाते नेत्र, उँगलियों में बड़े बड़े कटार-से नाखून और उसकी बलिष्ठ भुजाओं की कसी हुई मांसपेशियें ने उसे इतना खूंखार बना रखा हैं कि प्रतीत होता है वह हाथियों को भी चनौती दे डालता होगा.
तथागत को एक दिन यह भी ज्ञात हुआ कि अंगुलिमाल ने अबतक 999 उँगलियाँ अपनी माला में गूँथ ली है. माला में 1000 उँगलियों के गूँथने की उसकी प्रतिज्ञा है. उन्हें किसी स्रोत से यह भी ज्ञात हुआ कि इन्हीं दिनों उसकी माँ उससे मिलने जाने वाली है. वह उससे अक्सर मिलने जाती है. लेकिन इस बार वह थोड़ी डरी हुई है. सम्राट उसे जीवित या मृत पकड़ने की आज्ञा अपने सैनिकों को दे चुके हैं. उसीसे उसे अवगत कराने वह उसके पास जानेवाली है. उसके मन में उधेड़बुन है कि जाने इस बार क्या होगा. क्योंकि अगुलिमाल की माला के पूरी होने अब केवल एक उँगली की ही आवश्यकता है..
तथागत को जब ये तथ्य ज्ञात हुए तो वह कुछ चिंतित हो उठे. उन्होंने सोचा, हत्या करने का अंगुलिमाल का यह कृत्य अब चरम पर पहुँच चुका है.
तथागत को मनुष्य के मनस की गहनतम जानकारी थी. उन्होंने अंगुलिमाल के डाकू बनने की पृष्ठभूमि की सूक्ष्म छानबीन की. उन्हें ज्ञात हुआ कि अंगुलिमाल मगध जनपद के किसी गाँव के ब्राह्मण का पुत्र है. वह कोशल महाजनपद के सम्राट प्रसेनजित का राजपुरोहित है. ध्यान में डुबकी लगाकर उन्होंने उसके मनस की गति को भी जाना. उन्होंने अनुभव किया कि उसके अंतस्तल में, गहरे में कहीं करुणा की बूंदें दबी हुई हैं. वे उद्रेक की स्थिति में नहीं हैं. इसका कारण उसके मन पर हिंसा का अनिवार भार है.
उन्होंने मन में कुछ निश्चय किया और बिना किसीसे कुछ चर्चा किए जंगल की ओर चल पड़े.
डाकू अंगुलिमाल का यह अंगुलिमाल नाम उसके बचपन का नाम नहीं था. बौद्ध-धर्म की पुस्तकों में उल्लिखित है कि कोशल नरेश सम्राट प्रसेनजित के दरबार के राजपुरोहित के घर एक बालक ने जन्म लिया, सुंदर गोलमटोल. उसके चेहरे पर एक कांति खेलती थी. घर में आनंद ही आनंद था. परंपरा के अनुसार राजपुरोहित बच्चे की जन्मकुंडली बनवाने राजज्योतिषी के पास गए. राजज्योतिषी ने बच्चे के जन्म की घंटा-घटी पूछी. राजपुरोहित ने बताई. बच्चे के जन्म की घटी सुनते ही राजज्योतिषी के माथे पर बल पड़ गए. माथे पर बल पड़ते देख पुरोहित जी कुछ घबड़ाए. पूछा-
         “क्या हुआ ज्योतिषी जी? सब ठीक तो है न?”
         “इस घटी में आकाश में अशुभ नक्षत्रों का उदित होना दिखाई दे रहा है. शिशु के जन्म के समय क्या आपको कोई अनहोनी दिखी थी?”
          “हाँ ज्योतिषी जी, रात के जिस प्रहर में इस शिशु का जन्म हुआ, वह घड़ी बहुत डरावनी प्रतीत हो रही थी. आकाश में तारों की जो स्थिति हो रही थी उसे देखकर प्रतीत हो रहा था कि किसी यात्री को लूटने के लिए डाकू आकाश में तलवारें उछाल रहे हैं.”
“ राजपुरोहित जी, इस अशुभ योग में जन्मे बच्चे डाकू और हत्यारा होते हैं. कुंडली से यह भी संकेत मिल रहा है कि यह पिछले जन्म में कोई यक्ष था, मनुष्यों का हत्यारा.”
यह सुनकर राजपुरोहित को तो मानो काठ मार गया. बहुत मन्नतों के बाद घर में एक बालक भी आया तो ऐसा भवितव्य लेकर. घर में सभी के मन में उदासी छा गई. उनके मन में आया, क्यों न इस शिशु का नाम ‘हिंसक’ ही रख दिया जाए.
किन्तु पुरोहित दम्पति विचारवान थे. उन्होंने बहुत सोचा. युगप्रचलित तर्क-वितर्कों का सहारा लिया. अंततः उनका मन इस निषकर्ष पर आकर स्थिर हो गया कि भवितव्य पर किसी का वश नहीं चलता. बहुत विचार विमर्श के बाद उन्होंने निश्चित किया कि यह बालक परमात्मा की देन है. परमात्मा के आगे किसी की नहीं चलती. राजज्योतिषी से परामर्श कर उन लोगों ने उस बालक का नाम लोक-प्रथा के अनुसार ‘अहिंसक’ रखा. इस प्रथा में यह माना जाता है कि ऐसा नाम रखने से वैसा ही प्रभाव उसपर पडेगा. स्यात कहीं ऐसा हो भी जाए कि बार-बार उसे ‘अहिंसक’ कहकर पुकारने से उसके मन पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़े कि उसके मन में कभी हिंसा का भाव आए ही न. राजपुरोहित के इस प्रयास में उनके दो-एक शिक्षक साथियों ने भी उनका साथ दिया. गुरुकुल के एक आचार्य ने अहिंसक की प्रारंभिक शिक्षा को संभाला और हर संभव प्रयास किया कि उसके मन में हिंसा का विचार कभी आए ही न. उसके आगे की शिक्षा पर दूसरे आचार्य ने मनोयोगपूर्वक ध्यान दिया. इसतरह उसके स्नातक के पूर्व की शिक्षा सम्पन्न हुई.
अहिंसक पढ़ने में बहुत तेज था. वह बहुत मेधावी भी था. हर विषय में उसकी प्रतिभा बढ़ी चढ़ी थी. चाहे शास्त्र चाहे शस्त्र, सबमें उसकी प्रतिभा अनूठी थी.
पुरोहित ने सम्राट से परामर्श कर अहिंसक को स्नातक की शिक्षा के लिए तक्षशिला भेज दिया. सम्राट एवं उनके दो-एक अन्य अधिकारियों के पुत्र-पुत्री भी स्नातक की शिक्षा के लिए वहीं जा रहे थे. उस समय उँची शिक्षा के लिए तक्षशिला विश्वविद्यालय ही एकमात्र ऐसा स्थान था जहाँ बहुत ही प्रतिभाशाली शिक्षक पढ़ाने का कार्य करते थे. दूर-दूर से प्रतिभाशाली विद्यार्थी उँची शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ आते थे.
विद्या के ये सभी अर्थी एक ही आचार्य के अधीन शिक्षा ग्रहण करने लगे.
कुछ ही समय में अहिंसक अपने गुरु का प्रिय हो गया. सीखने, समझने और मेधा में वह बहुत कुशाग्र था. अपने अन्य साथियों से वह हर बात में बढ़ा चढ़ा था. गुरु ही नहीं गुरु-पत्नी भी अहिंसक के सौम्य व्यवहार से बहुत प्रसन्न थीं. कोशल-राजकुमारी भी शस्त्राभ्यास अधिकतर अहिंसक के साथ ही करती थी. आचार्य के शिक्षालय में उसे अन्य शिष्यों की अपेक्षा अधिक सुविधाएँ उपलब्ध थीं. अहिंसक के साथ इन लोगों का अपनी अपेक्षा अधिक प्रिय व्यवहार और उसे उनसे अधिक सुविधाएँ दिए जाते देख उसके कुछ साथियों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या होने लगी. उसके प्रति उनकी यह ईर्ष्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही चली गई. कभी कभी ये अहिंसक से उलझ भी जाते थे. लेकिन उससे पार नहीं पा पाते थे. कहते हैं उसमें सात हाथियों के बराबर का बल था.
जब अहिंसक को किसी भी तरह उसके साथी नीचा नहीं दिखा सके तब उन लोगों ने सोचा, क्यों न ऐसा प्रयास किया जाए कि आचार्य जी उसे दीक्षा ही न दें. इसके लिए वे उनके मन में उसके प्रति घृणा के भाव उत्पन्न करने की चेष्टा करने लगे. वे आए दिन गुरु के पास उसकी उलाहना लेकर आने लगे. ऐसी ऐसी उलाहनाएँ जो आचार्य के मन में अहिंसक के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करते थे. एक दिन इन लोगों ने उसपर यह भी दोष मढ़ दिया कि अहिंसक गुरुमाता के प्रति कुदृष्टि रखता है. वह आचार्य से अपने को अधिक बुद्धिमान भी समझता है.
अहिंसक के प्रति निरंतर इन उलाहनाओं को सुनकर गुरुजी के क्रोध का पारावार नहीं रहा. उनकी भौंहें क्रोध वमन करने लगीं. वह उसे कठोर दंड, कदाचित मृत्युदंड देने का अवसर ढूँढ़ने लगे. किंतु शिक्षक के रूप में वह ऐसा नहीं कर सकते थे. ऐसा करना संस्था के नियमों के प्रतिकूल तो था ही, उनकी प्रतिष्ठा के भी प्रतिकूल होता. अतः उन्होंने शिक्षा-सत्र के समाप्त होने की प्रतीक्षा की.
धीरे धीरे शिक्षा का सत्र समाप्त हुआ. आचार्य ने अहिंसक से कहा-
          “अहिंसक, अब तुम्हारी शिक्षा समाप्त हुई. गुरुदक्षिणा देने के लिए तत्पर हो जाओ”.
उस समय शिक्षा सम्पन्न हो जाने पर दीक्षा दी जाती थी. किंतु उसका स्वरूप आज के दीक्षांत जैसा नहीं था. उस समय जिस आचार्य के अधीन शिष्य शिक्षा ग्रहण करता था वह आचार्य ही उसे दीक्षा देते थे. और दीक्षा के लिए आचार्य को शिष्य द्वारा दक्षिणा देने की परंपरा थी. शिष्य आचार्य से पूछते थे- “गुरुजी, क्या देकर मैं आपको प्रसन्न करूँ”. और गुरुजी जो माँगते थे उसे उन्हें देना पड़ता था.
दीक्षा के लिए जब अहिंसक आचार्य के सामने आया तो गुरुजी ने उससे दक्षिणा में 1000 उँगलियाँ माँग लीं. गुरुजी किसी तरह उसे मारना चाहते थे. सोचा, उँगलियाँ इकट्ठा करने के लिए उसे अनेक हत्याएँ करनी पड़ेंगीं. ऐसा करने में वह स्वयमेव मारा जाएगा. और उनका प्रतिशोध भी पूरा हो जाएगा. उन्होंने अहिंसक से कहा-
“दक्षिणा में तुमसे मुझे मनुष्य के दाएँ हाथ की एक हजार उँगलियाँ चाहिए. और प्रत्येक उँगलियाँ अलग अलग मनुष्य की होनी चाहिए.”
उसके इर्ष्यालु साथियों ने जब यह सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुए. उनकी मनोकामना पूरी हो रही थी. लेकिन गुरुमाता और राजकुमारी के हृदय को बहुत ठेस लगी. ये दोनों अहिंसक से बहुत स्नेह करतीं थीं. गुरुदक्षिणा में अहिंसक से गुरु की ऐसी माँग को लेकर वे भौंचक थीं. ऐसा क्या हो गया कि आचार्य अहिंसक के प्रति इतने असहिष्णु हो गए. अहिंसक के व्यवहार में पूरे सत्र में ऐसा कुछ नहीं दिखा जो आचार्य को रुष्ट करने का कारण बने. और किसी तरह उससे रुष्ट ही हो गए हों तो दीक्षा देने के लिए उसे हत्या की ओर उन्मुख करने की क्यों आवश्यकता आ पड़ी.
वे गुरुदक्षिणा में आचार्य की इस माँग को लेकर बहुत असहज थीं. उनके मन में विद्रोह के भाव उठने लगे थे. किंतु विश्वविद्यालय के नियम बहुत कठोर थे. उनके अभिभावक भी उनसे सहमत नहीं हो सकते थे.
आचार्य ने अहिंसक से दक्षिणा में जब मनुष्य की उँगलियाँ माँगी तो वह  हतप्रभ हो गया. स्तब्ध होकर आचार्य की ओर देखता रह गया. उसके नेत्रों में विस्मय और उदासी थी. नेत्रों के कोरों में आँसू की कुछ बूँदें छलक आईं थीं. वह समझ नहीं पा रहा था कि आचार्य ने उससे उँगलियाँ क्यों माँगी. इससे तो मेरे प्रति उनकी घृणा ही व्यक्त हो रही है. शस्त्र और शास्त्रज्ञान में उनको उसने कभी निराश नहीं किया. उनकी सेवा में उसने कोई त्रुटि नहीं की. हाँ अपने साथियों से अवश्य वह कभी कभी उलझ पड़ता था. पर इसमें भी उसके साथी ही उसे उलझने के लिए बाध्य कर देते थे. उनका चिढ़ाना कोई कबतक सहता रहे.
एक बार उसके मन में हुआ कि दक्षिणा में आचार्य की इस अव्यावहारिक माँग पर वह प्रश्न उठाए. पर कुछ सोचकर मौन रह गया. विशवविद्यालय के नियम आचार्य के ऐसी अव्यावहारिक माँगों पर कोई व्यवस्था नहीं देते.
वह संकल्प का पक्का था. अबतक वह विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करता आया था. दीक्षा के नियमों के प्रति भी वह आदर ही बरतेगा. उसने सोचा- इस माँग के पीछे गुरुजी के मन में क्या है यह तो वह नहीं जानता पर दीक्षा पूरी तभी हो सकेगी जब गुरु द्वारा माँगी गई दक्षिणा दे दी जाए. वह यह दीक्षा पूरी करेगा ही. गुरु की आज्ञा का पालन करना धर्मानुकूल कहा गया है.
जब उसके माता-पिता को इसका पता चला तो वे बहुत उद्विग्न हो गए. उन्हें ज्योतिषी की भविष्यवाणी सचमुच में घटती प्रतीत हो रही थी. उन्होंने अभीतक अहिंसक से ज्योतिषी की भविष्यवाणी की चर्चा नहीं की थी. अब उन्हें उचित प्रतीत हुआ कि उसकी चर्चा अहिंसक से कर दें. अहिंसक ने इस भविष्यवाणी को सुना, पर विचलित नहीं हुआ. किंतु उसके नेत्र अदृष्ट में टिक गए. कुछ क्षण तक उसके चेहरे पर अनेक भाव चढ़े उतरे, फिर स्थिर हो गए. कदाचित उस क्षण उसके मन में जो भाव तिरे उनमें क्रोध और क्षोभ दोनों का मिश्रण था. उसके मन में अपने साथियों के प्रति एक क्षण के लिए वितृष्णा उत्पन्न हो गई. उसके अधरों के हलचल और उससे खिंची कपोल की रेखाओं में यह स्पष्ट दिखा. उसके विषण्ण चेहरे पर उसका क्षोभ भी स्पष्ट दिख रहा था-
          “माता-पिता ने इस तथ्य से मुझे अवगत नहीं कराया. किंतु मुझे अवगत कराके वे करते भी क्या. अवगत कराने पर यह भी हो सकता था कि शिक्षा ग्रहण करने के लिए मैं तक्षशिला तक पहुँच ही न पाता. तक्षशिला भेजने के पूर्व पिता ने मुझे योग्य गुरुओं के पास रखा. इन गुरुओं के पास रहकर मेरे मन में अनूठे-अनूठे भावों का संचार हुआ. किसीको हानि पहुँचाने की बात मैंने कभी सोची ही नहीं. हाँ कभी कभी क्रोध अवश्य आता था और मैं कभी बहुत उग्र भी हो जाता था पर किसी पर प्रहार कर उसे चोट पहुँचाने की बात मेरे मन में कभी नहीं आई. अब जब दक्षिणा के लिए 1000 उँगलियाँ इकट्ठी करनी हैं तो मुझे लोगों को गहरी चोटें पहुँचानी पड़ेंगी. इसके लिए उनकी हत्या भी करनी पड़ेगी.”
यह सोच कुछ पल के लिए वह बहुत उद्विग्न हो उठा. क्या भवितव्य लेकर उसने जन्म लिया है.
उसके माता-पिता से उसकी यह उद्विग्नता देखी नहीं जा रही थी. पर साहस भी नहीं हो पा रहा था कि वे उससे कुछ कहें. माता के नेत्रों में तो रुँधे आँसू पछाड़ खा रहे थे. पर पिता ने साहस किया.
“पुत्र, अदृष्ट को कदाचित तुमसे यही कराना अभीष्ट है. दीक्षा लेनी है तो गुरु को यह भेंट देनी ही पड़ेगी. दीक्षा देने में असमर्थ होने पर दीक्षा के लिए राजा से धन माँगने का विधान है. पर यहां तो कटी हुई उँगलियाँ जुटानी है. यह अमानुषिक कार्य है. सम्राट तो इसके लिए तुम्हें अनुमति भी नहीं दे सकते. उलटे ऐसा करने से रोकने के लिए तुम्हें कारागार में डलवा सकते हैं. हाँ एक विकल्प है तुम्हारे पास, दीक्षा तुम लो ही न. यह निर्णय तुम्हें ही करना पड़ेगा. हम चाहते हैं तुम जो भी निर्णय लो पूरे मन से लो. स्मरण करो, पिता की आज्ञा के पालन में भगवान परशुराम ने थोड़ा भी आगा-पीछा नहीं किया था. अपने फरसा के एक ही प्रहार से उन्होंने अपनी माता का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया था. उन्होंने परिणाम की थोड़ी भी परवाह नहीं की थी. तब भगवान परशुराम को समाज का सामना नहीं करना पड़ा था किंतु आज तुम्हें लोगों का और स्वयं राज्यशक्ति का भी सामना करना पड़ेगा.”
पिता की बातों से उसे थोड़ा तोष हुआ. उसने मन बना लिया कि दीक्षा लेनी है तो आचार्य की आज्ञा का पालन करना ही होगा. और वह आचार्य द्वारा माँगी गई भेंट को जुटाने के लिए उद्यत हो गया.
उँगलियाँ इकट्ठा करने से पूर्व उसने पिता से परामर्श किया. क्यों न पहले कुछ प्रबुद्ध लोगों से उनकी सहमति लेकर उनकी एक उँगली माँगने की चेष्टा की जाए.
पिता से उत्तर मिला- “पुत्र, यह राजा शिवि का युग नहीं है”.
अंततः दीक्षा के लिए उँगलियाँ इकट्ठी करने का ध्येय अहिंसक के मन में दृढ़ हो गया. इसके लिए उसने ऐसे स्थान को ढूँढ़ा जहाँ से यात्रियों को मारकर वह उनकी उँगली भी काट ले और वह किसी की पकड़ में भी न आ सके. इस हेतु उसे कोशल महाजनपद के सावत्थी (श्रावस्ती) का जंगल अधिक सुरक्षित लगा. सावत्थी कोशल जनपद की राजधानी थी और मगध की सीमा से सटे मल्लगण से कुछ ही दूरी पर थी, घने जंगलों से घिरी (आज के गोरखजपुर और बस्ती जनपद के बीच कहीं, तब यह क्षेत्र घोर वनाच्छादित था). जंगल में घनी झाड़ियों से अटे एक स्थान पर उसने अपना अड्डा जमाया और अपना वांछित कार्य करने लगा. वह जंगल से होकर हाट-व्यापार के लिए जाने वालों, यहाँ तक कि तीर्थयात्रियों की भी हत्या करने लगा और उनकी उँगलियाँ काटकर वापस जंगल में लुप्त होने लगा. उसने हत्या करने के लिए हर तरह के अस्त्र–शस्त्र - तलवार, तीर धनुष आदि अपने पास रख छोड़े थे. जब पथिक जंगल से होकर जाना बंद कर देते तब वह निकट के पुरवासियों के घरों पर आक्रमण कर उनके परिवार वालों की हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता.
जब वह प्रथम उँगली के लिए एक पथिक की हत्या करने चला था तो उसे लगा था कि उसका हृदय जैसे विद्रोह कर देगा. उसने कभी कोई हत्या नहीं की थी. पल भर के लिए उसके भागते डग शिथिल होते होते रह गए थे. उस क्षण उसे अपने मन को कड़ा करना पड़ा था. मन कड़ा करने में ही उसके हाथ से तीर चल गया था और पथिक ढेर हो गया था. घायल पथिक की छटपटाहट देख उसे मूर्च्छा सी आने को हुई थी. वह कभी किसी व्यक्ति को पीड़ा से छटपटाते नहीं देखा था. पीड़ित की चीख ने उसके हृदय को मानो चीर दिया था. पर तत्क्षण उसके मन में गुरु को दीक्षा देने की विवशता सामने तड़ित सी झलकी मार गई थी. वह शीघ्र ही संभल गया था. प्रतिज्ञा मनुष्य से क्या-क्या नहीं करा लेती है.
इसके बाद क्रूरता जैसे उसकी संगिनी हो गई.
पहले तो लोगों ने इसे अप्रत्याशित आक्रमण समझा. पर जब आए दिन हत्याएँ होने लगीं और गाँव-घरों में भी घुसकर निर्दोष गृहस्थ परिवारों की  हत्या कर उनकी उँगलियाँ काटी जाने लगीं तब लोगों की समझ में आया कि ये हत्याएँ संज्ञान में की जा रही हैं. क्योंकि इसमें लूट की घटनाओं के चिह्न नहीं थे. तब इन अप्रत्याशित और आपात घटनाओं के प्रति लोग सतर्क हो गए. धीरे धीरे उन लोगों ने पता भी लगा लिया कि ये हत्याएँ एक डाकू कर रहा है. किसीने यह भी लक्ष्य कर लिया कि वह डाकू उन काटी गई उँगलियों की एक माला बनाकर अपने गले में पहन रखा है. उस दिन से वह लोगों में अंगुलिमाल के नाम से जाना जाने लगा.
अंगुलिमाल की क्रूरता का ओर नहीं था. वह उंगलियों को काट कर उनकी गिनती ठीक रहे इसके लिए वह उन्हें वृक्षों की डालों पर एक जंगली डोर से बाँधकर टाँग देता था. किंतु वन की चिड़ियाँ उनका मांस खाने के लिए उसे बिखेर देती थीं. इससे जब उँगलियों की गिनती में अव्यवस्था होने लगी तब उसने उन उँगलियों को वन की एक पतली और दृढ़ लत्तर में बाँधकर माला बनाकर उसे गले मे पहन लिया था..
अंगुलिमाल के इस कृत्य से पुरवासी भयाक्रांत हो उठे थे. लोगों में भीतर तक डर समा गया था. प्रत्येक क्षण वे अपने और अपने परिवार को असुरक्षित मानने लगे थे. बुद्ध की देशनाओं में जब वे बैठते थे तो इसी अँगुलिमाल का भय उन्हें सताता रहता था. वे देशना को भयोद्विग्न मन से ही सुनते थे. जब उन्होंने किसी भी तरह इस संकट को टलते नहीं देखा तो अपनी रक्षा के लिए सम्राट से याचना की. और आए दिन हो रही इस घटना की समूची कहानी बताई. सम्राट को लोगों ने यह भी बताया कि उनके सैनिकों ने बहुत प्रयास किया पर इस हत्या को वे रोक नहीं सके. सम्राट ने सुना और एक बड़ी सेना लेकर वह लअंगुलिमाल को मारने के लिए चल पड़े.
तथागत बुद्ध की धर्म-देशना उस जंगल के निकट के ही एक गाँव में हो
रही थी जो अंगुलिमाल के विचरण-क्षेत्र से बहुत दूर नहीं था.
जब तथागत को अंगुलिमाल के संबंध में कुछ पुरवासियों से और कुछ उनके अपने अंतर्ज्ञान से सारी स्थिसि समझ में आ गई तब वह बिना किसी से कुछ कहे जंगल के पथ पर आगे चल पड़े.
पुरवासियों ने समझा कि तथागत दैनिक भ्रमण के लिए निकल रहे हैं. कुछ दूर जाएँगें फिर लौट आएँगें. किंतु उनके कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने लक्ष्य किया कि तथागत जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं वह तो अंगुलिमाल के विचरण-क्षेत्र की ओर जाता है. उन्होंने तथागत को सावधान किया. “भगवन, उस ओर ही डाकू अंगुलिमाल का बास है. वह आपको पाएगा तो मार डालेगा. बहुत निर्मम है वह. उधर आप मत जाइए. शिष्यों ने भी उन्हें रोका.
लेकिन तथागत नहीं माने. तथागत ने उन लोगों से कहा- “मुझे रोको मत. आज मैं रुक गया तो अनर्थ हो जाएगा.
जब वह नहीं माने तो कुछ शिष्य उनके साथ हो लिए. किंतु तथागत ज्यों ज्यों घने बीहड़ में आगे बढ़ते गए, शिष्य धीरे धीरे कम होने लगे. तथागत जब अंगुलिमाल के निकट पहुँचे तब वह अकेले थे.
उधर उसकी माँ भी उससे मिलने के लिए चल पड़ी थी. उसे मारने लिए सम्राट के एक बड़ी सेना लेकर चल पड़ने की सूचना उसे सूचना देने के लिए..
इधर अंगुलिमाल चौकन्ना हो जंगल से होकर जाने वाले बाटों को देख रहा था. उसे एक बाट से उसकी माँ आती दिखी. अपनी माँ को अपनी ओर आते देख वह कुछ सोच में गड़ गया. विधाता ने क्या लिख रखा है मेरे लिए. एक हजारवीं उँगली के लिए अन्य कोई नहीं मिला तो मुझे अपनी माँ की भी हत्या करनी पड़ सकती है. एक पल के लिए लाल डोरों से पटे उसके नेत्रों में माँ की वह गोद स्मरण हो आई जिसमें उसने कभी किलकारी मारी थी. जिसके अधरों के स्पर्श से उसके कपोलों में स्नेह का संचार हो उठता था, एक गुरु को दिए वचन से बँधा मुझे माँ की भी हत्या करनी पड़ेगी. ऐसा उसके मन में होते ही उसके नेत्रों से अश्रु की कुछ बूँदें उसके कपोलों पर ढुलक आईं.
तभी अन्य मार्ग से आते एक बटोही उसे दिख गया जो कदाचित उसी की ओर आ रहा था. वह कोई बटोही नहीं, स्वयं तथगत थे.
अंगुलिमाल तथागत के आने के प्रति अनभिज्ञ था. उसने समझा कोई पथिक आ रहा है. वह प्रसन्न हुआ कि अब उसे एक हजारवीं उँगली पाने की प्रतीक्षा में अपनी माँ की हत्या नहीं करनी पड़ेगी.
वह उस पथिक की ओर झपटा. किंतु कुछ निकट आने पर उसने देखा, वह उसी की ओर आ रहा है. उसकी चलने की गति देखकर थोड़ा अचंभित हुआ. कोई भूले भटके ही इधर आता है, वह भी चौकन्ना और भयभीत हुआ-सा. पर इसके शरीर में तो तनिक भी भय के चिह्न नहीं दिखाई देते. यह चौकन्ना हुआ आगे नहीं बढ़ रहा है. उसकी चाल में एक मतवालापन है. फिर भी उसने पथिक को तेज स्वर में टोका-
“ऐ पथिक”.
यह कड़क स्वर सुन बुद्ध पीछे मुड़े तो देखा, सामने एक काला पहाड़-सा विकराल व्यक्ति खड़ा है. और अंगुलिमाल ने देखा, यह कोई पथिक नहीं, एक संन्यासी है. इसके मुख पर शांति के भाव छलक रहे हैं.. उसकी समूची देह में एक सरलता खेल रही है. यह किसी सामान्य पुरुष की अपेक्षा प्रभावान है. इसके साथ एक आभामंडल-सी है. यह देख कुछ क्षण के लिए वह अपनी क्रूरता को भूल गया. उसने सोचा- “यह संन्यासी किसी अन्य देश से आया प्रतीत होता है, तभी यह मेरे भय से अपरिचित है. इसे सावधान कर देना चाहिए. मैं तो अपनी क्रूरता के लिए तो अभिशप्त हूँ किंतु इस संन्यासी के निश्छल भाव को देखकर इस संन्यासी पर हथियार चलाना मुझे उचित प्रतीत नहीं होता“. यह सोच उसने संन्यासी को चेतावनी दी.
         “संन्यासी, क्या तू नहीं जानता कि यह अंगुलिमाल का क्षेत्र है? मैं अंगुलिमाल हूँ. मैं स्वभाव से क्रूर हूँ. जो भी इधर आता है मैं उसे मार डालता हूँ. लगता है तू इधर भटक कर आ गए हो.”
“अंगुलिमाल, मैं भटककर इधर नहीं आया हूँ. मैं स्वयं अपनी इच्छा से तुम्हारे पास आया हूँ. मैं तुम्हें जानता हूँ. हत्या को तुमने अपना धर्म बना लिया है. पर हत्या करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, यह भी मैं जानता हूं. मुझे यह भी ज्ञात है कि आज किसी की हत्या कर तू 1000 वीं उँगली अपनी उँगलियों की माला में जोड़ने वाले हो. तुम्हें 1000 उँगलियाँ अपने गुरु को दक्षिणा में देनी है. तुम मुझे नहीं जानते. मैं गौतम बुद्ध हूँ. अबतक तू निर्दोषों की हत्या करता रहा है शिकार की तरह. तुम मेरी हत्या कर उस 1000 वीं उँगली को प्राप्त करो. उँगलियाँ प्राप्त करने के लिए प्रारंभ में तूने लोगों से स्वेच्छा से उँगलियाँ देने की प्रार्थना की थी. मैं स्वेच्छा से तुम्हें अपनी उँगली देने आया हूँ. यही इच्छा लेकर तुम्हारी माँ भी तुम्हारे पास आनेवाली है. किंतु मैं नहीं चाहता कि तुम मातृहंता बनो. अभीतक तुम पूर्ण पापी नहीं बन सके हो. माता की हत्या कर तुम पूर्ण पापी बन जाओगे. जिसकी कहीं क्षमा नहीं हो सकेगी.“
अंगुलिमाल बुद्ध की ये बातें सुनकर चौंका. इस संन्यासी को तो सबकुछ पता है. उसके प्रभाव को एक ओर झिटक कर बोला-
“संन्यासी, मैं किसी बुद्ध को नहीं जानता. मैं केवल अपने गुरु को जानता हूँ. प्रारंभ में लोगों ने मुझे उँगलियाँ नहीं दी इस कारण मैं हत्या में प्रवृत नहीं हुआ हूँ. मुझे ये 1000 अँगलियाँ अपने गुरु को दक्षिणा में देनी हैं. इस समय मुझे एक ही धुन है, 1000 वीं उँगली को प्राप्त करने की. तेरी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं किंतु मैं अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हट सकता. किंतु तुम्हें मारना भी नहीं चाहता. अतः मैं पुनः कहता हूँ तू चला जा. मैं किसी और को मारकर 1000 वीं उँगली प्राप्त कर लूँगा.”
अंगुलिमाल तथागत को नहीं जानता था. उनके संबंध में हवा में तिरती सूचनाएँ भी उस तक नहीं पहुँच सकीं थीं हालाँकि सम्राट प्रसेनजित तक बुद्ध के सावत्थी में आने की सूचना हो चुकी थी. वास्तव में तक्षशिला में अंगुलिमाल जब अभी अहिंसक नाम से ही स्नातक का छात्र था बुद्ध अभी गौतम ही थे. वह अभी बुद्ध नहीं हुए थे. उन्हें 43 वर्ष की अवस्था में बुद्धत्व की प्राप्ति हुई. उस समय अंगुलिमाल वनस्थ हो गया था.
बुद्ध ने कहा-
“मैं यहाँ से जाने के लिए नहीं आया हूँ. मैं तुझसे पुनः कहता हूँ. तू मुझे मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर.“
“तू नहीं मानता, तो ठहर मैं अभी तुझे मारता हूँ. “
अंगुलिमाल खाँड़ लेकर संन्यासी को मारने दौड़ा. लेकिन यह देखकर वह अचंभा में पड़ गया कि जितना ही वह संन्यासी की ओर दौड़ रहा है संन्यासी से उसकी दूरी कम नहीं हो रही. तेज गति से भागने वालों को भी दौड़ कर पकड़ते उसे देर नहीं लगती थी. पर इस संन्यासी को वह नहीं पकड़ पा रहा है. उसे लगा, जितना वह संन्यासी की ओर भाग रहा है संन्यासी भी उसी गति से पीछे की ओर भाग रहा है. (बुद्ध ने अपनी अंतर्शक्ति के बल पर उसे एक विभ्रम में डाल दिया था.)
वह क्रोध से चिल्लाया-
“संन्यासी, तू कह रहा है कि तुझे मारकर मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँ,
और मैं तुझे मारने चला तो तू पीछे भागता जा रहा है. “
बुद्ध बोले, “मैं कहाँ भाग रहा हूँ. मैंने तो वर्षों पहले भागना छोड़ दिया. मैं  अब पूर्णतः स्थिर हूँ. भाग तो तुम रहे हो. तुम अपने अंदर ढूँढ़ के देखो. तुम्हारा मन चौबीसों घड़ी भाग रहा है. भाग कर मुझे पकड़ो और मारो. हाँ, मुझे मारने के पूर्व तुम मेरा एक कार्य कर दो.“
          “ कहो.”
          “उस वृक्ष की एक पत्ती तोड़ो.”
अंगुलिमाल ने पास के वृक्ष की डाल से एक पत्ती तोड़ी और बुद्ध को देने के लिए हाथ बढ़ाया. बुद्ध ने कहा,
“इसे मुझे मत दो. इसे तुम पुनः उस डाल से उसी स्थान पर जोड़ दो जहाँ से उसे तोड़े हो.”
   “यह कैसे हो सकता है. जो पत्ती टूट गई उसे पुनः जोड़ा नहीं जा सकता.“
बुद्ध ने कहा-
“डाल से तुम पत्ती तोड़ सकते हो किंतु उस पत्ती को उस डाल के उसी स्थान पर तुम जोड़ नहीं सकते. तो सोचो, जिस जीवन को तुम पुनः दे नहीं सकते उसे तुम छीन कैसे सकते हो.”
बुद्ध द्वारा ये वाक्य ऐसे समस्वर में कहे गए थे कि इसकी चोट सीधे उसके हृदय पर पड़ी. उसकी हृत्तंत्री झंकृत हो उठी. यह झंकृति अंगुलिमाल के पोर-पोर, रंध्र-रंध्र को बेध गई. उनके उस मर्मस्पर्शी स्वर को सुन वह अंतर्विमुग्ध अवाक रह गया. ऐसी अनुभूति उसे इसके पहले कभी नहीं हुई थी. बुद्ध की बातें सुनकर उसके शरीर के अणु-अणु में न जाने क्या होने लगा कि उसके कठोर शरीर में मृदुता आने लगी, उसका तना-अकड़ा शरीर ढीला पड़ने लगा. उसके मुखमंडल पर स्पष्ट दिख रहे तनावों की बंकिम लकीरें शिथिल होने लगीं. बुद्ध को मारने को उठा हाथ उठा ही रह गया. ढीली होती उँगलियों से खाँड़ भूमि पर गिर गया. उसका शीश झुकने लगा. वह निढाल हो गया और अंततः उसका शीश बुद्ध के चरणों में झुक गया. कुछ ही भणों में वहाँ बहुत कुछ घट गया. जो अंगुलिमाल कभी खूंखारता का पर्याय होता था वह अब सरलता की मूरत लग रहा था. उसके भीतर घट चुकी अतींद्रिय अंतर्घटना ने उसमें बुद्ध का शिष्य बनने की लालसा भर दी. उसके मुँह से सहसा फूट पड़ा-
“भगवन, अंगुलिमाल आपके चरणों में है. आप मुझे अपनी शरण में ले लें, मुझे अपना शिष्य बना लें.”
और करुणावान तथागत ने उसे अपना शिष्य बना लिया.
उस समय प्रकृति भी मनोहर हो उठी थी. अंगुलिमाल की क्रूरता से वन के जिन पत्थरों, वृक्षों, वृक्षों की पत्तियों, फुनगियों और झाड़ियों में मृत्यु का ग्रास बने लोगों की अनवरत चीखों, चीत्कारों ने घुलकर उन्हें कठोर बना दिए थे उनमें अब मर्मर ध्वनि की अनुगूँज भरने लगी. धीरे धीरे मंद मंद हवाओं के स्फुरण से वन की हरीतिमा मनोमय हो रही थी.
जब उसकी माँ वहाँ पहुँची, अंगुलिमाल तथागत का शिष्यत्व ग्रहण कर चुका था.
-----शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव