Wednesday, 31 May 2017

समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा-3 अंतिम कड़ी


 रचनाकार में प्रकाशित  29-05-2017

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
                                                                      3
अगहन माह से जाड़े का आरंभ और पूस माह तक इसका प्रसार माना जाता है – “अगहन पूस हेमंत ही जान.” अगहन में हल्की ठंढक पड़ने लगती है. छाँह में बैठने पर देह में कँपकँपी-सी लगने लगती है. लोग घरों से निकलकर धूप लोर्हने लगते हैं. औरतें गलियों में खाट खींच धूप-छाहीं में बैठ जाती हैं और स्वेटर आदि बुनने लगती हैं. कवयित्री ने अगहन के ऐसे ही एक क्षण का बहुत सुंदर चित्रण किया है-
भुइले बहुत मगन हैं। ....
गलियों में खाट खींचकर
औरतें धूप मुनने लगी हैं
पूरी यह धरती
उनकी ही काढ़ी हुई चादर—
ये देखो कैसे महीन बेल-बूटे.                (अगहन)
घरों के पास के पेड़ों की झाँझर पत्तियों से छन कर धरती पर आते घूप के टुकड़े किसी चादर पर काढ़े गए बेल-बूटों की तरह दमक रहे है. इन औरतों के लिए एक साझा चूल्हा है. अगहन. ये एक साथ बैठी हैं, चूल्हे पर चढ़ी हुई है केतली, कुल्हड़ में चाय चल रही है. प्रत्येक का जीवन मानो सोंधा-सा कुल्हड़ हो गया है.
‘पूस‘ शीर्षक में लोगों को इस माह की ठिठुराती ठिठुरन कवयित्री की अपनी अनुभूत नहीं है, यह ठिठुरन प्रेमचंद “पूस की रात” कहानी के किसान की अनुभूत है और कोहरा तो चेखव की घोड़ागाड़ी में जुता हुआ है.
लोकप्रचलित कहावत है- “माघ फागुन शिशिर बखान”. माघ माह में जाड़ा उतरने लगता है. पेड़ों से पत्ते झड़ने शुरू हो जाते हैं. लोग कपड़ों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. पूस की अपेक्षा उनके शरीर पर कपड़े कम होने लगते हैं. फलतः ठिठुरन सताने लगती है. लोक में ठिठुरन से बचने के लिए बच्चे-बड़े हल्के कपडे पहनते हैं और जो अभाव में होते हैं वे घेंकुरी मारकर (घुटनों में माथा डाल) अपनी ठिठुरन भगाते हैं. कवयित्री का यह चित्रण देखें-
‘जाड़ा रइया
तोरा डरे घेंकुरी लगइया’
यह डर माघ के कड़क जाड़े का है. कवयित्री की दृष्टि में यह डर एक पवित्र घाव है. जिसमें सारा जहान घेंकुरी लगाया है. घाव में घेंकुरी ? माघ की ठिठुरन के डर में किसानों को जो अनुभूति होती है वह ‘घाव’ से व्यंजित नहीं होती.
फागुन महीने के लिए एक लोक व्यंजना है- “भर फागुन बुढ़ऊ देवर लागे, भर फागुन”. गाँवों में जो फगुआ गाया जाता है, यह उसका एक स्वर भी है. कवयित्री अपने ‘फागुन’ गीत को फगुआ-गान के इस टुकड़े से आरंभ करती हैं. वह अनुभव करती हैं कि मानो फागुन ही कटहली चंपा (एक सुगंधित फूल) के रूप में लोक-रगों में फूल रहा है. इस चंपा पुष्प की सुगंध सर्पों को इतनी पसंद है कि जहाँ यह फूल होता है वहाँ इसकी डालों से ये लिपटे रहते हैं. इसी लिए इस फूल का एक नाम नाग चंपा भी है. फागुन का महीना जब भी आता है लोग इन साँपों की तरह ही फागुनी भावों से लिपट जाते हैं. इस फागुनी रोमल संचार को यह प्रकृति भी खुला खेलती हैं-
बौरा गई है गिलहरी-
खीरी के पेड़ों पर बैठी गौरैया
एक पंख उठाए हुए
लेती है अँगड़ाई मीठी!
यह फागुन महीना ही ऐसा है कि बिना बात के ही उद्गारों के सोते फूट पड़ते हैं, आकाश की तरह साफ
मन से. फिर फागुन के रस से भरे कवयित्री के मन में एक विचार उड़ आता है चील-चाल से.-
एक विचार उड़ रहा है
चील-चाल से।
चील आकाश में उड़ती तो है मंद चाल से लेकिन उसका ध्यान अपने शिकार पर टिका रहता है. अवसर देखते ही वह शिकार पर झपट्टा मार उसे अपनी चोंच में दबोच लेती है. शिकार को बचने का भी अवसर नहीं मिलता. फागुन के महीने में भी कुछ लोक-चीलें मँडराती रहती हैं. कब झपट्टा मार दें कहा नहीं जा सकता.
फागुन के कुछ अनुभव कवयित्री ने ‘फागुनी बयार’ में दिया है. फागुन के महीने में कवयित्री किसी झील के एक किनारे बैठी हैं. अचानक कँपकँपी बढ़ाती फागुनी हवा उनसे टकराती है. उन्हें लगता है वह हहरकर (.यहाँ हहरकर विशेषण सटीक नहीं लगता) उनसे कहती है - देखो उस किनारे झील के पानी में पाँव डाले कोई बाँसुरी बजा रहा है. स्वर में कोई कोलाहल नहीं है. उसमें मंद समीरण की ध्वनि है जिसके प्रभाव में झील के पानी की सतह पर छोटी छोटी शांत बीचियाँ उभर-मिट रहीं हैं. मानो झील के कानों में गोरख (नाथपंथ के सद्गुरु) की बानी गूँज रही हो- हबकि न बोलिब, थपकि न चलिब, धीरे रखिब पाँव. लेकिन वह इसे आचरण में उतार नहीं पाती. वह अपने समंदरपन (सबकुछ हो रहने) से थक चुकी है. एक अगस्त्य प्यास (जो उसकी सारी बेचैनियों को पी जाए) की बाट जोहती उसकी लहरें उसी में डूब रही हैं. क्या गजब है, कहीं शांति की भी बाट जोही जाती है. यह तो अपने प्रयासो के प्रति जागरुक होने से बंचित रहने की चतुराई भी हो सकती है. नयी कविता के प्रयास कुछ ऐसे ही प्रतीत होते हैं.
प्रकृति की गति का क्रम भी बहुत अद्भुत और रोचक है. जेठ की गर्मी से राहत के लिए वह आषाढ़ माह में आकाश में बादलों के टुकड़े फैला देती है, कभी सूरज पर आवरण डाल देते हैं तो कभी चाँद को घेर कर बैठक करने लगते हैं. ये बादल सावन में आकाश में और उँचा उठ ढंढा होकर बारिश की झड़ी लगा देते हैं, भादो में उसे घटाटोप आच्छादित कर धारासार बरस जाते हैं. अगहन पूस में बारिशोपरांत जाड़ा तो आएगा ही क्योंकि पर्यावरण की हवा में जल-बूंदों की नमी धीरे धीरे ही जाएगी, इतना धीरे कि माघ फागुन में वातावरण को सम होने का अवसर मिल सके, प्रकृति अपने पुरानेपन को झाड़े और नए को उगने का अवसर दे.
चैत माह में इस नवांकुरण की गति ऐसी होती है कि प्रकृति का कोई भी अंग इससे अछूता नहीं रहता. खेत, बाग, जेल, जन सभी एक रंग (नया होने के) में रंग जाते हैं, मानो पूरे कुँए में ही भंग पड़ गई हो, कोई किसी की नहीं सुनता. इस धुन मे कुछ युवा जेल में कैदी हो गए हैं. कवयित्री के अनुसार बसंत ने गवाही दी होती अर्थात यह आकलन किया गया होता कि इनपर बसंतागम का प्रभाव है तो ऐसा नहीं होता. प्रकृति जानती है ये बेकसूर हैं. इसीलिए पीपल के टूसे के रूप में वह जेल की दीवार फोड़कर अंदर घुस गई है. पत्ते सिर हिलाकर उनके निरपराध होने की खबर दे रहे हैं. कोयल जन्मों से उनकी फरियाद में कुहुक रही है. हालाँकि कोयल इतनी चूजी नहीं होती. चूजी होना तो मनुष्य का स्वभाव है.
“चैत : एक अनंत-सा प्रसव” गीत में कवयित्री ने प्रकृति के प्रसव-रहस्य की ओर संकेत किया है. बसंत ऋतु में प्रकृति में जो भी हरियाली और नयापन दीख पड़ता है वह उसके नव-प्रसव का ही परिणाम है. प्रसव के पूर्व कारकों पर बसंत छा जाता है. कवयित्री पर भी यह बसंत छाया है. उनकी रातें नहीं कटतीं, उसी तरह जैसे हँसुए से पकठोसा कटहल नहीं कटता. अब यह उपमा बड़ी विचित्र है. पकठोसा कटहल के काटने में काटकर अलग करने का भाव है और रात के कटने में रात के बीतने का भाव है. इस कटने और बीतने में क्या साधर्म्य है. खैर, बसंती हवा बह रही है, फिजाँ में होली के जले सम्हत की गंध है. कल होली है शायद, वह लोगों को होली की शुभकामनाएँ देती हैं-
ह्वट्सएप पर छिड़क देती हूँ शुभकामनाएँ
जैसे कबूतरों को दाने।                                ( चैत : एक अनंत-सा प्रसव)
समय ही ऐसा है. अब शुभकामाएँ भी दी नहीं जातीं, छिड़क दी जाती हैं जैसे कबूतरों को दाने दिए जाते हों, वे कहीं पड़ें जिसे चुगना हो चुग ले, न चुगना हो न चुगे. फिर वह कुछ चित्रण में लग जाती हैं. इस समय आकाश चिनके हुए आईने की तरह है, उनके बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उनका आँचल अब उनके लिए पूरा नहीं पड़ता. बोतल तिरछी कर पानी पीते, पसीना पोंछते कहीं भी सो जाते हैं. यह गजब का सिलसिला है-
सो जाते हैं फिर से गुड़ी मुड़ी होके।
है यह अजब सिलसिला।
घुटनों के बीच गाड़कर अपना पूरा वजूद
अपने ही गर्भ में गुड़प होना
और जन्म देना खुद को दोबारा हर रोज।      (चैत : एक अनंत-सा प्रसव)
घुटनों में अपना वजूद गाड़, जैसे वे गर्भस्थ हो रहे हों और फिर वहीं से एक नए वजूद का जन्म लेना, यह एक सिलसिला चल निकलता है वजूद के अनंत प्रसव का.
बैसाख, बसंत का उत्तर पक्ष. सूरज की तपन बढ़ने लगती है. सूरज की बढ़ती तपन के साथ जायसी की नागमती की विरह पीड़ा में भी तपन बढ़ती जाती थी. किंतु कवयित्री ने अपने इस ‘बैसाख’ कविता में एक ऐसा पात्र चुना है जिसे सूरज की तपन पसंद है. इस तपन से उन्हें प्रसन्नता होती है. वह है बैसाखनंदन अर्थात गधा या गधा जैसे स्वभाव वाले लोग जिनका काम ही है जीवन भर गठरी ढोना.
बैसाखनंदन ये
लादे गठरियाँ
लो फिर चले घाट पर-                   (बैसाख)
घाट पर याने जीवन के घाट पर. गठरी ढोते हुए भी उनके कान चौकस रहते हैं. वे हवा में तैरती कनबतियों को चौकस (कान उठाकर) होकर सुनते हैं. जमाने को देह की भूख (रसावेग) की आँखों से देखते दम साधे आगे बढ़ते जाते हैं-
भूख देह की आँख है।.....
रसावेग में इनकी
नस-नस फड़कती-सी है!
पर ये रसावेग साधे हुए
बढ़ रहे हैं घाट तक
मौन योगी-से। (बैसाख)
अपने एक ब्लॉगपोस्ट “शब्दों का सफर” में वाडनेरकर ने लिखा है कि बैसाख माह ही गधी का प्रसव काल है.
जेठ माह, गर्मी का पूर्व पक्ष है और आषाढ़ उत्तर पक्ष- “ग्रीषम जेठ आषाढ़ बखान.” जेठ माह में कड़ाके की धूप होती है. दिन में लू चलने लगती है. छाँह पाने के लिए लोग परीशान हो उठते हैं. जेठ की तपन को कवयित्री ने चार शीर्षकों में अनुभव किया है- ‘जेठ-1’, ‘जेठ की दुपहरिया’, जेठी ‘पूर्णिमा’ और ‘दुपहरिया जेठ की’. जेठी पूर्णिमा को छोड़ शेष तीन शीर्षकों में जेठ की दुपहरिया का ही चित्रण है.
लेकिन ‘जेठ-1’ की दुपहरी में वह झुलसाती तपन नहीं है जिसके लिए जेठ का महीना जाना जाता है. इसमें तो किसी बरगद की छाँव में खड़ी/बैठी कवयित्री को उस छाँव में बिछे धूप के टुकड़े ऐसे लगते हैं जैसे इस दुपहरिया ने धूल की चटाई पर फैंसी बिंदिया-चूड़ियाँ सजा दी हो एक मनिहारिन की तरह-
जेठ की यह दुपहरी
बरगद की छाँह-तले.....
बिंदिया-चूड़ियाँ फैंसी
सजा रही हों देखो-
धूल की चटाई पर
मनिहारिन-सी                              (जेठ-1)
उन्हें लगता है यह दुपहरी बरगद की चानी (शिखर) पर धूप की थाप दे रही है और हवा अपनी उँगलियों से उसकी जटाएँ सुलझा रही है. वह थोड़ी चिड़चिड़ी हो गई है कदाचित धूप की तपन से. इस हवा में आराम तो नहीं है पर जीव जीव का साथ कैसे छोड़े. थोड़ा ही आराम दे सके तो दे ले.
‘जेठ की दुपहरिया में’ गर्मी की सताती प्यास को बुझाने के लिए रखा प्याऊ का घड़ा / कंठ तक लबालब भरा घड़ा / थोड़ा-सा मता गया है , क्योंकि इसमें जेठ की धधकती हुई लू में / उड़ती हुई जब गदराए आमों की गंध प्रेम-पत्र की तरह आकर घुल गई है. जेठ की दुपहरी को झेलने के लिए कुछ उपाय तो प्रकृति स्वयं करती है और कुछ सहयोग जीव का भी होता है. दुपहरी की यह धूप कई तरह से सताती है. बाहर निकलो देह को जलाती है और घर के अंदर रहो तो पढ़ते पढ़ते विद्यार्थी पुस्तकों पर ही नींद में झूलते हुए लुढ़क जाते है.
जेठ के महीने में कभी कभी बड़े बड़े भयंकर बवंडर उठते हैं, जो एकाएक उत्पन्न होते हैं और जो भी उसकी चपेट में आ गया उसे चोटिल कर आगे बढ़ जाते हैं. ‘जेठी पूर्णिमा’ में कवयित्री ने एक ऐसे ही बवंडर का चित्र प्रस्तुत किया है. यह बवंडर उन्हें उस सनकी बाप की तरह लगा जो बच्चे को एकबारगी पीट देता है जिससे बच्चा बुरी तरह डर जता है, इस बवंडर की चोट से गड्ढों में फँसा पानी उस डरे बच्चे के हृदय-सा हकर हकर (पानी के छलकने की ध्वनि) करने लगता है. इस बच्चे के लिए जेठ-पूर्णिमा का चाँद ताबीज का काम देता है. ताबीज टोन टोटका के अलावे डर कम करने के लिए भी बाँधे जाते हैं. कवयित्री सोचती हैं कि यही बच्चा बडा होकर बडे बडे सपने देखेगा. देखेगा कि आकाश में एक बग्घी उड़ रही है जिसमें रेस के हारे हुए घोड़े जुते हुए हैं. पूर्णिमा का इकलौता चाँद उसे उस बग्घी का एक छिटका हुआ पहिया सा लगेगा. इन पंक्तियों में कवयित्री चुग के यथार्थ को अभिव्यक्त कर रही हैं. वह चिंतित हैं कि जो छिटके हुओं (जीवन से) के संताप को झेला होगा वही छिटके पहिए को बग्घी में लगा सकेगा. लेकिन समाज से छिटके हुओं को समाज से जोड़ने की कला क्या इन्हें आती है-
क्या तुमको आता है पहिया लगाना?
क्या तुमने झेले हैं संताप
छिटके हुओं के?                      (जेठी पूर्णमा)
किसी भी समाज की एक अपनी जमीन होती है. क्या किसी खास समाज-रचना का आग्रह लेकर उस जमीन से छिटकी इकाई उससे जोड़ी जा सकती है.
‘दुपहरिया जेठ की’ में जेठ की दुपहरी कवयित्री को उनके अपने बचपन में पढ़े जासूसी उपन्यास ‘ट्रेजर आइलैंड‘ की तरह लगती है-
आज तलक
लू के भभूखों से पटी पड़ी
दुपहरिया यह जेठ की
फड़फड़ाया करती है मेरे भीतर
जासूसी उपन्यास-सी।
अंत में थोड़े से शब्द अपने इस लेख के संबंध में—
अनामिका के इस गीत-गुच्छ की ओर मेरा ध्यान उनके एक सर्वथा नए प्रयास के लिए गया. इसके अध्ययन में मेरा ध्येय ‘बारामासा’ शीर्षक से दिए इस गीत-गुच्छ की पूर्ववर्ती बारहमासे से तुलना करना नहीं था. प्रसंगवश पूर्ववर्ती बारहमासे और इस बारामासे की केंद्रीयता दिखाने का प्रयास करना पड़ा. पूर्ववर्ती बारहमासा की अवधारणा से इस बारामासा ( मूलत: बारहमासा ही) की अवधारणा एकदम भिन्न है. यह मुझे षड्ऋतु वर्णन कोटि की रचना लगी. मेरे हिसाब से इसका शीर्षक ऋतु-विलास होना चाहिए था.
यह लेख समीक्षा नहीं है, अपितु एक सार-अध्ययन है. सार-अध्ययन इसलिए क्योंकि इसमें आज के परिप्रेक्ष्य के प्रतिबिम्ब आपको नहीं मिलेंगे. किंतु इसमें कविता-गुच्छ की कविताओं के मर्मों के उद्घाटन का पूरा प्रयास किया गया है. आम समीक्षाएँ जो देखने में आती हैं उनमें न तो विषय ही स्पष्ट हो पाता है न इसमें कविताओं के समझने का प्रयास दीख पड़ता है. इनमें समीक्षक कवि और कविता के मर्मोद्घाटन की अपेक्षा अपना ही उद्घाटन करते अधिक दीखते हैं.
इस लेख में किसी भी वादी समीक्षा के प्रति मेरा झुकाव नहीं है. इन वादी समीक्षाओं और आलोचनाओं ने हिंदी आनोचनाओं का बंटाढार ही किया है. हिंदी आलोचना का नया अस्तित्व गढ़ना अब आवश्यक हो गया है.
शेषनाथ प्र श्री
गोरखपुर

Tuesday, 2 May 2017

समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा-2



  शेषनाथ प्रसाद


                                                                  2
अनामिका का ‘बारामासा’ आषाढ़ माह से शुरू होता है.
‘बारामासा’ शब्द हिंदी की हरियाणवी बोली का है. इसका अर्थ होता है बिरह गान. ‘बारामासा’ शैली की ऐसी कविताओं के लिए अधिक प्रचलित शब्द है ‘बारहमासा’, जो हिंदी की अन्य बोलियों में प्रयुक्त हुआ है. ‘बारहमासों’ में कवि किसी विरहिणी की मनोभूमि में प्रवेश कर उसकी विरहानुभूतियों को शब्द देते रहे है, प्रकृति उनकी विरहानुभूतियों के उद्दीपन के रूप में प्रयुक्त होती रही है उनकी जीवमसंगिनी बन कर. किंतु इस ‘बारामासा’ में कवयित्री ने किसी विरहानुभूतिशीला की मनोभूमि में न प्रवेश कर स्वयं अपने अनुभवों को शब्द दिया है. प्रकृति इसमें कवयित्री की न सहचरी है न उनके भावों को उद्दीप्त करती है. यह उनके निकट की भी नहीं लगती.
उन्होंने ग्रीष्म ऋतु के आषाढ़ के गिरते पारे में प्रकृति को कभी दूर से देखा, उसके आंगन में रबी की बालियों से पक कर छूट गिरे अन्न-कणों की खुशबुओं और मिट्टी की टटा रही जिह्वा पर आषाढ़ की पहली सिहरती हुई गिरती बूँदों के आस्वाद को अपनी गठरी में समेट लिया. जब वह ऋतु-यात्रा-लेखन में प्रवृत हुईं तो वह गठरी भी उनके साथ थी. उस गठरी में उक्त के अतिरिक्त और भी बहुत सारी निधियाँ उन्होंने भर रखी हैं, जिसमें उनका अधीत भी है, और भी जाने क्या-क्या हैं, यह उनको भी नहीं मालूम. यह गठरी उन्होंने ढीली ढाली बाँध रखी है. इसे लेकर वह काल की पीठ पर लद गई हैं. इस “जिसकी (काल की) पीठ पर लदी” वाक्य-खंड से कवयित्री ने कौन सा बिंब खडा किया है समझ से परे है. हम तो यही जानते हैं कि जीवन काल में प्रवहमान रहता है. और काल में ही सबकुछ होता है. उसे सब का पता होता है. महाभारत सीरियल में इसका बहुत ही सार्थक प्रयोग हुआ है. लेकिन कवयित्री तो कहती हैं उनकी गठरी से उनकी निधियाँ कैसे गिर गईं यह काल भी नहीं जानता.
आखिर यह गठरी है कैसी. मेरे जाने यह गठरी उनकी स्मृति की गठरी है, चुस्त नहीं ढीली ढाली बँधी, कदाचित लापरवाही से. स्मृति से जब निधियों के गिरने के क्रम मे (अर्थात् भूलने के क्रम में)      जतन से संभाला गया उनका ऋतु-विलास गिरने अर्थात भूलने को होता है तो उसे वह सायास पूरे स्मृतिपटल पर फैला लेती हैं. और इसी ऋतु-विलास को वह शब्दों की काया देती हैं. इस काया में वह अपने बारह महीनों की अनुभव-यात्रा के अंकन के लिए अपनी भावयित्री प्रतिभा के साथ प्रस्तुत होती हैं. लेकिन लगता है इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी नहीं है. गठरी (स्मृति) में बँधी निधियाँ जल्दी  में बाँधी गई हैं. इसीलिए स्मृति की गठरी में ढीला-ढालापन है. इन निधियों के रखने में कोई तरतीब नहीं है अतः वह बेडौल है और कवयित्री उसके बेडौलपन का दुख झेल रही हैं. यह दुख नहीं, इसे कष्ट कहना चाहिए,  बारहो महीने के मौसम पर लिखी गई कविताओं से इस दुख या कष्ट का क्या सरोकार है, कुछ स्पष्ट नहीं होता.
‘बारामासा’ शीर्षक से प्रस्तुत इस कविता-गुच्छ की पहली कविता आषाढ़-1 पूरे बारामासे की भूमिका-सी है. इसकी सुष्ठु पंक्तियों से संकेत मिलता है कि इस बारामासे की भावसंपत्ति पूर्व के बारहमासों से अलग होगी. इसमें हृदयावेगों के स्थान पर बौद्धिक आवेग की प्रमुखता रहेगी. उन्होंने अपनी स्मृति की गठरी से गिरते ऋतु-विलास को संभाल कर उसे एक नए ढंग से अधुनातन शब्दों और बिंबों से सजाकर प्रस्तुत किया है-
                ये जो नसों का जंजाल
                पसरा पड़ा है मेरे भीतर-
                दीमकों की बाँबियों-सा सिहरता है,
                जग जाती है गुदगुदी इसमें
                अव्यक्त बूँदों से लदी हुई
                   ये जो हवा चलती है ऐसे
                   आषाढ़ में.                       (आषाढ़-2)
इन पंक्तियों में कवयित्री प्रकृति के साथ हैं. इसमें गीष्म ऋतु के उपरांत वर्षागमन के पद-चाप की आहट अव्यक्त बूँदों से लदी हुई/ ये जो हवा को उन्होंने सुंदर शब्द संयोजन के साथ एक मनोहारी बिंब रच कर प्रस्तुत करने की कोशिश की है. किंतु इसका आस्वाद लेने के लिए इस बिंब के एकाध शब्द पर आँखें जब ठहरती हैं तो उनके अर्थ को गुन कर आँखों में किरकिरी पैदा हो जाती है. पाठक इस बिंब के ‘जंजाल’ शब्द पर ध्यान दें. जंजाल का अर्थ होता है- प्रपंच, उलझन, किसी समस्या में फँसना. इससे मुहावरा भी बना है, “जी का जंजाल.” अब कवयित्री के भीतर नसों का जाल पसरा है या जंजाल? नसों से होकर ही हमारा जीवन रक्त-गति में समूचे शरीर में प्रवहमान है. और इन्हें वे जंजाल से लगते हैं. आर्द्र हवाओं के नम-स्पर्श से यह नसों का उनका जाल दीमकों की बाँबियों-सा सिहरता है. दीमकों की बाँबियाँ तो किसी गहरी चोट या किसी धमक से ही सिहरती हैं. तो क्या कवयित्री के भीतर पसरे नसों के जाल को ये हवाएँ चोट पहुँचाती हैं? किंतु चोट से गुदगुदी तो नहीं उभरती. फिर उनके फेफड़ों में हवा के ये बलबुले (?) डुब डुब करते हुए उन्हें उनके बचपन की याद दिला देते हैं, जब वह पपीते के फोंके से साबुन के बुलबुले उड़ाती थीं (यह तो किसी भी मौसम का खेल है). कभी वह किन्हीं बरसाती हवावों में शहर के मुहाने पर स्थित भुतही कोठी में चली गई थीं जहाँ उन्हें कुछ अधलिखे प्रेमपत्र मिले थे जो बारिस के झोंकों से सिहर सिहर जाते थे. बारिश की प्रबलता का यहाँ सुंदर चित्रण है. भुतही कोठी में उन्मत्त बरसाती झोंकों से—
                ...चरमराते थे दरवाजे
                तो ढनढनाने-सा लगता था
                      वह अधखुला-सा दराज-
                अपनी ही मेज से आधा बहिष्कृत
                तिरछा होकर अटका,
                आधा लटका यों ही
                       अधर में कहीं।
                कुछ अधलिखे प्रेमपत्र
                धरे हुए थे उसमें सदियों से।              (आषाढ़-2)
इस प्रेमपत्र के बहाने कवयित्री उन विरहिणियों के प्रति कहीं अपनी सहानुभूति तो नहीं प्रकट कर रहीं!
सावन भादो के महीने वर्षा ऋतु के लिए जाने जाते हैं. कवयित्री को सावन में सावन की पहली झड़ी से साक्षात होता है. वह बारिश में अपनी बच्ची के साथ छतरी लिए बाहर निकली हैं. हहाती हवा बह रही है. छतरी वश में नहीं आ रहीं. कंधे भींगने लगे हैं. हवा का बहाव इतना तीव्र है कि उनके, बच्ची के और बारिश के पाँव कहीं के कहीं पड़ रहे हैं (बारिश की धार कम-अधिक तिरछी हो जा रही है). उनके सामने ही फुटपाथ के पेड़ की डाली टूट गिरती है. वह पेड़ के दुख से दुखी होती है. पर कुछ बोलती नहीं, संसार के दैनिक व्यापार में सम्मिलित हो जाती हैं. सामने देखती हैं डाली की ओट लिए अंगीठियाँ सुगबुगा उठी हैं. भुट्टे सिंकने लगे हैं और सिंकने लगा है उनका अकेलापन.
                भुट्टों की लय में ही धीरे धीरे
                सिंकने लगा है
                ये मेरा अकेलापन
                एक मीठी आँच पर
                फिर से.                        (सावन की पहली झड़ी)
कवयित्री ने बारिश को जैसा देखा, महसूस किया. यहाँ उस पूरे दृश्य का अच्छा चित्रण हुआ है. ध्यान देने योग्य है, बारिश के मौसम में मीठी आँच पर भुट्टे को भुनता देख कवयित्री किसी मधुर स्मृति में खो जाती हैं. उनका अकेलापन उन्हें अखरने लगता है. यह नहीं पता चलता कि वह भीड़ में अकेली हैं या जीवन में. क्या उनकी मीठी आँच में सिंकने की स्मृति पूर्व के बारहमासों की विरहिणियों की विरहानुभूतियों से तुल्य हो सकती हैं. यह मैं अधिक समर्थ और सक्षम समीक्षकों पर छोड़ता हूँ.
भादो के महीने में वर्षा ऋतु का अनुभव उन्होंने तीन शीर्षकों में किया है- ‘’भादो की शाम’’, ‘भादो’ और ‘’खूँटी पर बरसाती : भादो की शाम’’. किसी विषय को टुकड़ों में बाँट कर देखना या अनुभव करना, यह आधुनिक प्रवृत्ति है. शायद इसीलिए किसी विषय या समस्या पर ऐसे लोगों की पकड़ नहीं बन पाती.
भादो में वर्षा का रूप प्रचंड हो जाता है. आकाश में बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं, घटाओं में काले मेघ ताबड़तोड़ दौड़ने लगते हैं, तीव्र गर्जन के साथ बिजलियों के तीर चलने लगते हैं, फिर घारासार बारिश से नदियाँ प्रचंड वेग से समुद्र की तरफ दौड़ पड़ती हैं. किसी अनुभूतिशील या अनुभूतिशीला को प्रकृति का यह रूप अनेक उद्दीपनों से भर दे सकता है किंतु भादो की एक शाम कवयित्री को कुछ और ही अनुभूत होता है-
                टूट पड़ा आसमान
                जिनकी मसें भी नहीं भींगी थीं
                वे भी टूट गिरे डाली से !
                उर्वारुकमिवबन्धनात....
                .........................
                वेसे आराम से नहीं, अफरा तफरी में
                वे छूटे उद्दंड झटके से
                एकदम खचाक!
                बीच सड़क टूट गिरे
                वे युवा शरीर--                           (भादो की शाम)
पूरी कविता में कवयित्री प्रकृति के साथ नहीं दिखतीं. ‘’टूट पड़ा आसमान’’ में वर्षा की प्रलयंकरता की ध्वनि तो है किंतु कविता के शीर्षक में भादो न रहे तो इस मुहाबरे का अर्थ विपत्ति का टूट पड़ना होगा. डाली से भी यहाँ वृक्ष की डाली का द्योतन नहीं होता. “जिसकी मसें भी नहीं भींगी” पंक्ति पर ध्यान देने पर ‘डाली’ से किसी अभिभावक की सूचना मिलती है, डाली से टूट गिरने वाले से भी उनके लाढ़ले–लाढ़िली का द्योतन होता है. उर्वारकमिवबंधनात अर्थात जिस प्रकार कँकड़ी या खरबूजा अपनी लत्तर से खुद छूट जाते हैं (यह कवयित्री का किया अर्थ है) वैसे ही वे युवा भी अपने अभिभावकों से छूट जाते हैं. यह उपमा सटीक नहीं लगती. टूटने और छूटने में क्या समान धर्म है. एक खुद अपनी डंठल से छूटता है और दूसरे वैसे आराम से नहीं, अफरा तफरी में एक उद्दंड झटके से एकदम खचाक  छूट जाते हैं और बीच सड़क टूट गिरते हैं. आगे की एक पंक्ति में टूटने का कारण बताया गया है-टूट पड़ी ऐसी तो बिजली. यह बिजली बारिश की बिजली नहीं है. इस बिजली के नाम लोगों ने गैंगरेप, रोज रेड, आदि रख लिया है. इस अप्राकृत कारणों से खिन्न होकर कवयित्री मानवीय अनुभूति में डूब जाती हैं.
‘भादो’ शीर्षक कविता में वह थोडी दार्शनिक हो गई हैं. “उस दिन” उनहोंने अपने को एक बीज में समो लिया. बीज को खाद पानी तो मिला पर खिलने के लिए आकाश का आमंत्रण चाहिए था, वह (ध्वन्यामंत्रण) उन्हें टिटिहरी से मिला. बीज में अंकुरण हुआ, फूल पत्ती आई पर विकास के लिए अनुकूल अवसर न पाकर रूखी पड़ी सृष्टि को दादुर से आर्द्र भावों का स्नेह मिला. यह दादुर भावार्द्रता की बूँदों में लिपटा शास्त्रीय गीतों के बोलों से (बारिश के मौसम में कहीं शास्त्रीय संगीत चल रहा होगा) निकल कर कवयित्री की पीढ़िया तक चला आया था. पीढ़िया अर्थात प्राणों के छोर तक. यहाँ वह अनुभूति मे डूबी लगती हैं. कदाचित इस कविता में वर्षा को वह जीवन के सूत्रण के ऱूप में देख रही हैं.
“खूँटी पर बरसाती : भादो की शाम” में वह घनघोर बारिश में घरों के मिटे नंबरों मे आह से अपना घर खोजती हैं. बारिश में भींगी बरसाती को अपना वजूद मानकर उसे घर के बाहर वाली खूँटी पर टाँग देती हैं और साड़ी का फेटा बाँध कर घर के काम में लग जाती हैं. बरसात में घर-गृहस्ती कैसे अस्त व्यस्त हो जती है इसका सुंदर चित्रण है.
आश्विन और कार्तिक शरद ऋतु का महीना है, वर्षा ऋतु के बादल अपनी प्रचंडता खोकर अब धुनी हुई रूई के समान आकाश में तैर रहे है. कवयित्री उनसे छनकर आ रही आसिन की पहलौंठी धूप का आनंद ले रही हैं. वह घर बैठे अनुमान लगा रही हैं कि ऐसे सुहाने मौसम में बंगाली टोले में शहनाइयाँ बज रहीं होंगी. उनके मन में एक व्यंग्य उभरता है. शादियों में दस द्वारों से मिट्टी खनकर लाई जाती है उनमें से एक द्वार वारांगनाओं का द्वार भी होता है. इस मिट्टी में होता है- बासी सिंगार  / बाराँगनाओं का कवयित्री के शब्दों में ये ऐसी कलाकृतियाँ हैं जिन्हें दुनिया की सारी थकानें अँकवार लेती हैं.
“आसिन की दोपहरी” की धूप चटकीली और तीखी होती है. जूतों में तब्दील होने के पहले / चमड़े इसी धूप में सूखते हैं /इसी धूप में सूख कर /कद्दू कमंडल बनते हैं.
‘कातिक’ के महीने में कवयित्री को सोनपुर के मेले की स्मृति आती है. सोनपुर के मेले में ग्रमीण महिलाओं में गोदना गोदवाने की परंपरा होती है. उनमें से अपने हाथों पर, कोई अपने नाम का तो कोई अपने साईँ के नाम का गोदना गोदवाती हैं. उसका स्थान अब टैटू ने ले लिया है. तब मेला जाते हुए मेलाघुमनियों के उनके साईँ उनसे चुहल करते थे- ‘का हो, का गोदना गोदाई ‘. घर लौटने पर कोई पूछे कि हो किसकी लुगाई /तो झट से हाथ दिखाओ ओर छुट्टी. फिर कवयित्री की नजर चाँद पर जाती है. वह कल्पना में खो जाती हैं-आकाश में चाँद ने गोदवाए थे गोदने /रात के नाम के / सी-सी-सी करते हुए. किंतु उनकी आँखों में चाँद के गोदने का सौंदर्य नहीं ठहरता, धरती पर  स्वस्तिक का गोदते हुए गोदना  हिटलर उन्हें याद आ जाता है जिसने खून की नदियाँ बहा दी थी. युग की पीड़ा से कौन पीड़ित नहीं होगा. उनकी नानी ने गोदना गोदवाए थे कि युद्ध से उनके नाना लौटेंगे तो उन्हें दिखाएँगी. पर नाना लौटे कहाँ. ये सारी घटनाएँ कातिक में ही घटीं.
‘कातिक की शाम’ में उन्हें लगता है यह शहर एक घायल तेंदुआ है / क्या जाने कब झपट्टा मारे. कहीं और जाने को लोग चकितनयन (या चौकसनयन?) निकलते हैं खरगोश के समान. कवयित्री ने शहर में एक मृगमरीचिका भी निर्मित कर ली है घायल तेंदुआ की भयंकरता को दिखाने के लिए कि मरीचिका से त्रस्त मृग कैसे उससे बाहर निकले. सोचती हैं वे निकले तो होंगे जरूर पर गए कहाँ होंगे- दूर वन में या डरते काँपते लोगों के मन में. फिर वह इसे दादी के किस्से में ढाल देती हैं. किस्सा सुनाकर दादी कहती थीं किस्सा गया वन में /सोचो अपने मन में  और हंसने लगती थीं. यह कातिक की शाम भी उन्हें वैसी ही हँसती हुई लगती है. याने कातिक की तीखी धूप से घायल हुआ शहर एक किस्सा का हिस्सा है जिसे ईशारों में सुनाकर कातिक की शाम व्यंग्य में हँसती है.

(अगली कड़ी में समाप्य)

Monday, 24 April 2017

समकालीन कविता में बारहमासा


कविता को समर्पित ‘आलोचना’ के सहस्राब्दी अंक 57 को पढ़ते समय मेरा ध्यान बरबस कवयित्री अनामिका की कविता ‘बारामासा’ पर टिक गया, इस ‘बारामासा’ शीर्षक ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी. क्योंकि कहाँ तो नवकवितावादी अपने पूर्व की कविताओं का कलेवर हर स्तर पर बदल डालने का संकल्प लेकर आगे बढ़े थे, और बदले भी, और कहाँ अनामिका ने विषयवस्तु ही पुराना ले लिया.  संवेदना में कितना पुरानापन और नयापन है यह इन कविताओं में डूबने पर ही पता चलेगा. यह परखना रोचक होगा. यह भी देखना रोचक होगा कि नई कविता का जो रूप हमारे सामने है उसमें कविता का जो बहुत कुछ खो गया है, इस बारामासा में उन संवेदना के तंतुओं को घना करने में कवयित्री को कितनी रुचि है और उसे कितना घना पर पाई हैं.
आलोचना का यह सहस्राब्द्र्यांक 57 कुछ विशिष्ट है. इस अंक की प्रस्तुति ‘कविता की उत्तरजीविता’ शीर्षक से सम्पादकीय लिख कर की गई है. सम्पादकीय लिखा है सम्पादक अपूर्वानंद ने. अभी पिछली शताब्दी में कविता का कुछ लोगों ने अंत कर दिया था, तो अपूर्वानंद जी का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. वह चिंता से भर गए हैं. इस चिंता में उन्हें जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडार्नो याद आने लगे हैं. अडार्नो ने एक विचार दिया है निगेटिव डायलेटिक्स का- “आश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बरता है”. आश्वित्ज कंसेन्ट्रेशन कैंप में जर्मनी विरोधियों को नजियों ने बंदी बनाकर और बहुत प्रताड़ना देकर मार डाला. अडार्नो इससे इतने विचलित हो गए कि उनके ह्रदय का करुणा-जल सूख गया. उन्होंने कविजनों को संदेश दे दिया कि ऐसी स्थिति में कविता लिखना बर्बरता होगी. हालाँकि मैंने महसूस किया है कि अत्याचारियों के खिलाफ कविता एक बहुत बड़ा हथियार होती है. हमारे मार्क्सवादी कवि भी पूँजीवादी सोच के विरुद्ध लड़ने के लिए कविता को एक हथियार के रूप में ही इस्तेमाल करने की बात करते हैं. यदि आश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बरता है तो उसका हथियार के रूप मे प्रयोग करना तो और बर्बरता ढाना ही होगा.
जब अडार्नों ने यह विचार रखा तो पता नहीं उनके ध्यान में महाभारत का युद्ध था या नहीं. पर पत्रिका के सम्पाकीय लिखनेवाले के ध्यान में अवश्य होना चाहिए था. वह तो उनकी नाड़ियों में प्रवाहित है. इस युद्ध में भी बर्बरता बरती गई थी. इसमें मानवी उर्जा का इतना ह्रास हुआ कि उस क्षति से उबरने में भारत को सहस्राब्दियाँ लग गईं. जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी पर जो बम गिराए गए वह भी बर्बरता ही थी. उसकी पीड़ा जापान की आज की पीढ़ी तक भुगत रही है. किंतु न तो भारत के न जापान के ही बौद्धिक इतना निराश हो बैठे कि वे ह्रदय के स्फोट को एक बर्बर कार्य मान लिए हों. इन संस्कृतियों के प्राणों में विधेयकता है. महाभारत तो समय में हमसे बहुत दूर है पर जर्मनी के कन्संट्रेशन कैंप में ढाए जा रहे जुल्म के लगभग समांतर ही जापान पर बम गिराए गए थे. इस जापान ने अपने प्राणों की उर्जा का उपयोग कर इस बर्बरता को झेल लिया. पता नहीं अडार्नों के चिंतन में जर्मनी के प्राणों की उर्जा का योग था या नहीं.
खैर, अडार्नों का आयातित चिंतन न तो कविता का अंत कर सका, न उसकी उत्तरजीविता को ही कभी बाधित कर सका और न ही कविता लिखने को कभी बर्बरता में तब्दील कर पाया. कविता लिखी जाती रही और उसे हमेशा हृदय का स्फुरण ही समझा गया. हाँ ऐसा शोर मचाने वालों ने उसमें पोर पोर विचारों को पिरोया जरूर (भावों से दूरी बनाई), पर ये विचार कविता में कितना सौंदर्य भर पाए यह शोध का विषय है. कविता पर तमाम तरह के मुखौटे थोपे गए, कुछ नया लाने के प्रयास में. किंतु सभी प्रयास अल्पजीवी रहे. उसे सीमा में बाँधने की कोशिश की. किंतु हिंदी कविता वादों के घेरे में नहीं आ सकी. कविजनों में अभिव्यक्ति की बेचैनी भरी छटपटाहट थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. पर उनमें अनुभव और अनुभूति की भरी पूरी समृद्धि भी थी, इसपर विवाद खड़ा हो सकता है.  इनकी प्रामाणिकता की बातें खूब की गईं. पर अब ये कविताएँ कुछ थोड़े से बौद्धिकों तक सिमट कर रह गई हैं. एक समय में सहृदय होते थे जो कविता-पुस्तकों को खोज-खोज कर पढ़ते थे. आज उनका स्थान जन ने ले लिया है और मेरे अनुभव में ये बौद्धिक ही वे जन हैं. इनका आश्रयस्थल जीवन का व्यापक क्षेत्र नहीं वरन् कॉफी-हाउस और पुस्तक विमोचन-मंच हैं. ये अपनी रचनाओं को पढ़े जाने के लिए जन की खोज कर रहे हैं. अभी दैनिक हिंदुस्तान में सुधीश पचौरी का इसपर एक खूबसूरत व्यंग्य आया है.
जो हो, मेरी उत्सुकता इस कवितांक की ‘बारामासा’ कविता में है. यह कवयित्री द्वारा वर्ष के बारह महीनों के नाम से अलग-अलग लिखी गई कविताओं का एक गुच्छ है. कवयित्री ने हर महीने की बदलती ऋतु के अनुसार अपने को उससे जोड़कर जो मन में अनुभूत किया है उसे ही पिरोया है. हिंदी कविता में छायावाद के बाद आज की तिथि तक यह एक अभिनव और साहसिक प्रयोग है. अभिनव इसलिए कि बारहमासा गीतों में जो संवेदनाएँ परंपरा से रूढ़ हो गईं हैं उनका इन कविताओं में दर्शन नहीं होता. ये विशुद्ध बुद्धिवादी कविताएँ हैं. और साहसिक इसलिए कि परंपरागत संवेदनाभूति के स्थान पर इसमें नया चिंतनानुभव और परिप्रेक्ष्य देने की चेष्टा की गई है.
‘बारहमासा’ नाम से एकांत श्रीवास्तव की भी एक कविता देखने को मिली है पर वह बहुत संक्षिप्त है, और चलताऊ है.   
कवयित्री ने अपने कविता-गुच्छ के लिए ‘बारहमासा’ की जगह ‘बारामासा’ शीर्षक चुना है. यह शब्द हिंदी की हरियाणवी बोली का है. इसका अर्थ होता है विरह गान. हिंदी की अन्य बोलियों में भी इस तरह के गीत बहुप्रचलित हैं. वहाँ इन्हें ‘बारहमासा’ कहा जाता हैं. ऐसी कविताओं के लिए ‘बारहमासा’ पद ही अधिक प्रचलित है.
कवयित्री ने अपने गीत-गुच्छ के लिए यद्यपि ‘बारामासा’ शीर्षक चुना है पर इनके गीत विरहानुभूति के गीत नहीं हैं. ये विरह के गान नहीं हैं. वर्ष के हर माह के मौसम-परिवर्तन को वर्ष भर में कवयित्री ने जैसा अनुभूत किया है, उसे इन कविताओं में बुनने का नहीं वरन् चित्रित करने का प्रयास किया है. इसमें प्रकृति उनकी जीवनानुभूतियों के साथ एकरूप नहीं हैं. इस कवितागुच्छ पर कुछ लिखने के पूर्व परंपरागत ‘बारहमासा’ की प्रकृति और स्वरूप को परखना युक्तिसंगत होगा.
‘बारहमासा’ मूल रूप में लोक बोलियों में गाया जानेवाला गीत है. हिंदी की लगभग हर बोली में ‘बारहमासा’ के गीत गाए जाते हैं. गामीण अपनी सीमाओं में जीते हैं. उनके जीने के अपने ढंग होते हैं. जब वे दिन भर के अपने कामों को निपटा कर थके-हारे होते हैं तो शाम को खा-पीकर चौपाल में या अन्यत्र ढोल झाल के साथ इकट्ठे होते हैं और गा-बजाकर अपना मनोरंजन करते हैं--कभी भजन, कभी कबीर का निर्गुन, तो कभी रामचरित मानस के दोहे गाकर. कभी वे निपुण गवैयों को बुलाकर  ‘आल्हा’ और ‘कुँअर विजयमल’ जैसे वीर गीत सुनते हैं तो कभी ‘सोरठी बृजभार’ और ‘विहुला बाला-लखंदर’ जैसे विरह के गान भी सुनते हैं. इन विरह-गीतों ‘में बारहमासा’ के गीत भी होते हैं.
यह लोक गीत की एक आकर्षक विधा है. इसमें लोक कवि द्वारा किसी विरहिणी स्त्री की पीड़ा गूँथी हुई होती है जो वह अपने प्रियतम के विछुड़ने से भोग रही होती है. विरहिणी हर पल पति की बाट जोहती है. पति अथवा प्रियतम दूर है. महीने पर महीने बीत रहे हैं पर वह नहीं आता. हर महीने प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों के साथ पत्नी अथवा प्रिया की मानसिक दशा में भी परिवर्तन होते हैं. कभी उनका मन आकाश में आषाढ़ के भटकते बादलों में प्रियतम को खोजने के लिए भटक जाता है, तो कभी सावन के झकोरों में झूमते उसके अलक उसके बदन से टकराकर उसे पति-स्पर्श की स्मृति से भर पीड़ा देते हैं. भादो की धारासार बारिश में वह मदन-अंगड़ाइयों से बेहाल हो जाती है. वैसे ही शरद, हेमंत, शीत. बसंत और ग्रीष्म ऋतुओं में पति वियोग से होने वाली मंद-तीव्र पीड़ाओं की अनुभूति उसे सताती हैं. वर्ष भर की ऋतुओं के उतार चढ़ाव के साथ उनकी विरहानुभूति में होने वाले परिवर्तन ही बारहमासा में गुंफित रहते हैं. लोक-कवि अपने बीच विरह में घुलती विरहिणियों की विरहानुभूति को अत्यंत जीवंत रूप से पिरोए रहते हैं और बारहमासा गायक उसमें इतना डूब कर गाते हैं कि सुनने वाले की आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहता. लोग उसे रस ले-लेकर सुनते हैं.
बारहमासा कविता वस्तुतः लोक कविता का वह विशिष्ट रूप है जिसमें प्रकृति एवं लोक जीवन की तरलतम अनुभूति का करुणापूर्ण और मोहक दर्शन होता है.
साहित्य मे यह ग्यारहवीं शती से मिलता है. इसका प्राचीनतम साक्ष्य अब्दुल रहमान कृत संदेशरासक का विरह-प्रसंग है (हिंदी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ- पृ 315, योगेंद्र प्रताप सिंहा) अपभ्रंश साहित्य की नेमिनाथ चउपई में भी बारहमासा का प्रसंग है. रासो काव्यों में, बीसलदेव रासो और ढोला मारूरा दूहा में भी बारहमासा का उपयोग हुआ है. ‘बीसलदेव’ में रानी राजमति पति बीसलदेव को एक ब्राह्मण द्वारा संदेश भेजती है जिसमें उनसे एक वर्ष के विछुड़न के, प्रत्येक माह में झेले गए, कष्टों का वर्णन है. दूसरे में मारवणी, प्रियतम ढोला को एक ढाढ़ी द्वारा संदेश भेजती है जिसमें वर्ष भर में भोगे गए उसके कष्टों का वर्णन है. विद्यापति ने भी बारहमासा पर हाथ आजमाया है. किंतु यह विधा साहित्य में गति न पा सकी. बारहमासा विधा को गति मिली अवधी भाषा के प्रेमाख्यानक काव्यों में भक्तिकाल में. पद्मावत के ‘नागमति वियोग’ वर्णन में मलिक मुहम्मद जायसी ने बारहमासा विधा का बड़ा ही सटीक और साहित्यिक प्रयोग किया है. रीतिकाल में बारहमासा कविता ने कवि-शिक्षा का रूप ले लिया. इसके पश्चात उन्नीसवीं सदी के अंत तक बारहमासा के गीत लोक काव्यों में ही मिलते हैं.
‘विरह-गीतों के लिए बारहमासा’ एक रूढ़ हो गई विधा है. ‘बीसलदेव रासो’ में यह गीत सावन माह से शुरू होकर आषाढ़ माह तक और ‘ढोला मारूरा दूहा’ में कार्तिक माह से शुरू होकर आश्विन माह तक जाता है. लेकिन पद्मावत में यह आषाढ़ से शुरू होकर जेठ माह तक जाता है.
अधुनातन हिंदी काव्य में कवयित्री ने ‘बारहमासा’ को एक नए रूप में प्रस्तुत किया है. उन्होंने इस शीर्षक से अपने कविता-गुच्छ के लिए आधुनिक मनस्थिति और तदनुरूप आधुनिक शब्दावली का चयन किया है. ऋतुओं को आधुनिक छवि देने की कोशिश की है. किंतु यह आधुनिकता उनके द्वारा निर्मित कतिपय बिम्बों और मुक्त छंद के पंक्ति-विन्यासों में ही अधिक देखने को मिलती है. हाँ भावभूमि में उन्होंने अनुभूति के स्थान पर अनुभव को प्रतिष्ठित किया है. पहली कविता की कुछ पंक्तियाँ बारामासा की भूमिका-सी लगती हैं. किंतु इसे लिखते समय बारहमासे की परंपरागत पीठिका की स्मृति उनमें बनी हुई-सी लगती है. बारामासा चुँकि विरह गान के रूप में प्रचलित है, कदाचित ईसीलिए उन्होंने अपनी कविता का आरंभ दुख से किया है, ऋतु भी आषाढ़ की चुनी है.
                मेरा दुख
                जल्दी में
                ढीली बाँधी गई गठरी का दुख है. 
                                          (आषाढ़ में धरती-1)
‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग-वर्णन’ में नागमति की बारहमासी अनुभूति उसके वियोग से प्रारंभ होती है जो उसे हीरामन तोते के बहकावे में आकर पति रतन सिंह के सिंहल चले जाने से होता है. वह दुखी हो जाती है. उसके दुख का पारावार नहीं है. पर वह करे क्या. प्रतीक्षा ही कर सकती है. वह प्रतीक्षारत हो जाती है. इतने में आषाढ़ का महीना आ जाता है. आकाश में घुमड़ते विकीर्ण मेघ उसकी नाड़ियों में जाने कैसी वेदना भर देते हैं. वह दुखानुभूति से भर ताती है. यह दुख विरह का है, और जीवंत है. ‘बारामासा’ की कवयित्री किसी के वियोग में नहीं हैं. उन्हें किसी के वियोग का दुख नहीं है.  वह किसी दुखानुभूति में नहीं हैं. लगता है जब वह कविता लिखने बैठीं तो उन्होंने दुख का आह्वान कर लिया. वह दुख ढीली बाँधी गई गठरी का ही दुख सही (गठरी तो उन्होंने ही बाँधी होगी). यह गठरी ही उन्हें दुख दे रही है, संभवतः अपने बेडौलपन के कारण. अब इसमें जीवंतता कहाँ से होगी. इसे दुख नहीं कष्ट कहना चाहिए. इसमें मानवीय संवेदना (गहराई में अनुभूत हुई जो अनुभूति बन गई हो) का कहीं अता पता नहीं है. क्योंकि यदि गठरी कसकर बाँधी गई होती तो? संभव है तब कष्ट कम होता या होता ही नहीं (गठरी बाँधने का कौशल कष्ट कम कर देता है). इस गठरी में है भी क्या, उनके द्वारा बटोरी गई कुछ निधियाँ- भाषाओं की लुप्तप्राय ध्वनियाँ, बारह ऋतुओं का विलास (हमें तो छै ही ऋतुओं का पता है, पश्चिम में चार ही होती हैं), अंतःसत्वा चुप्पियाँ (मानों युप्पियाँ कहीं मँडरा रहीं थीं), बाली से छूट गिरे अन्नकणों की खुशबुएँ और आषाढ़ माह की पहली बूँदों का आस्वाद. कवयित्री ने गठरी में बाँधी गई निधियों को कुछ शब्द सोंदर्य से मढ़ कर पेश किया है-जैसे,
                आस्वाद
                मिट्टी की टटा रही जिह्वा पर
                आषाढ़ की पहली
                सिहरती हुई बूँद का.      (आषाढ़ मे धरती-1)
किंतु ये निधियाँ उनकी अनुभूति में स्फुरित निधियाँ नहीं हैं, सामान्य अनुभव की चीजें हैं. व्याकरण में अनुभव और अनुभूति में अंतर किया गया है. अनुभव का अर्थ है बाहर का अनुभव अर्थात बुद्धि का अनुभव और अनुभूति का अर्थ है भीतर का अनुभव अर्थात हृदय द्वारा अनुभूत. किसी की पीठ पर लद कर अनुभव ही लिया जा सकता है जैसे वायुयान पर सवार होकर मंत्री लोग लेते हैं.
अनुभव में भी कुछ गहराई होती है. अनुभव की सीमा लाँघ लेने पर ही अनुभूति में प्रवेश मिलता है. कवयित्री महसूस करती हैं कि वह काल की पीठ पर लदी हैं. याने वह समय से बाहर हैं. पर हमारा अनुभव है कि हम समय में हैं. समय के बाहर होने पर तो हम आईंस्टीन की सापेक्षता के शिकार हो जाएँगे, काल की पीठ पर लदने का सवाल ही कहाँ रहेगा. समय तो हमारे जीवन का एक आयाम है. जीवन काल के आयाम में बहता है, उसकी पीठ पर लद कर नहीं चलता. “समय की पीठ पर’’ वाक्यांश में काव्य की ध्वनि–सी निकलती प्रतीत होती तो है पर इसमें काव्य है नहीं. इसे पढ़कर हमारे हृदय की कोई पंखुड़ी नहीं खुलती. इस मायने में संस्कृत भाषा के कवियों के अनुभव और अनुभूतियाँ ध्यान देने योग्य हैं.
कवयित्री के बारामासे में विरहानुभूति न होकर ऋतुओं का विलास है. उनकी बड़े जतन से सँजोई गई गठरी की निधियाँ एक-एक कर गिरती जा रही हैं, उन्हीं में ऋतुओं का विलास भी गिरता है और वह उनके समूचे मानस-क्षेत्र पर छा जाता है. उनके बारामासा में ऋतुओं का यह विलास ही चित्रित है. इस तरह बारहमासा का परंपरागत कथ्य उनके बारामासे में ऋतु विलास से स्थानापन्न हो गया है. मेरी दृष्टि से इस कविता-गुच्छ का समेकित शीर्षक ऋतु विलास होना चाहिए, बारामासा नहीं.  
                                                     ( अधूरा )

Monday, 12 December 2016

नोटबंदी


विगत ८ नवम्बर को १००० और ५०० के नोटों के प्रचलन को बंद करने की मोदी जी की घोषणा ने देश में भूचाल-सा ला दिया. जनता में एक थर्राहट-सी आ गई - जाने क्या होगा. लेकिन इन पुराने नोटों के बदलने के कई तौर तरीकों ने जनता को कुछ आश्वस्त किया. इस कदम को भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाया गया जानकर लोग बैंकों में लाईन में लग गए, नोट वापस करने या खाते में जमा करने के लिए और नए नोट पाने के लिए. राजनीतिज्ञों को तो मोदी जी की खिलाफत के लिए एक नया अस्त्र मिल गया. उनको तर्क मिला लाईन में लगे लोगों को हो रही तकलीफों का. बैंकों में प्रतिदिन लग रही विराट कतारों में लोगों को तकलीफें हो भी रही थीं. कई लोग तो लम्बी क़तार में देर तक लगे रहने की थकान सह नहीं सके. वे गस खाकर गिरने लगे. कईयों की मृत्यु तक हो गई. किन्तु जनता के धीरज ने जवाब नहीं दिया.  किसानों की खेती पर भी असर पड़ा. छोटे व्यापारी भी चरमराने लगे. फिर भी सीमा पर लगे जवानों के कष्टकर मुश्तैदी का उदाहरण लेकर नोटबंदी से हो रहे कष्टों को झेलते रहे और मोदी जी के नोटबंदी के निर्णय को वाजिब कदम ठहराते रहे. यहाँ तक कि इस कदम का विरोध कर रहे विपक्ष के क्षेत्र की जनता में भी अधिकांश, पत्रकारों के सामने मोदी जी के कदम की सराहना करते रहे. हालांकि लोगों ने यह अवश्य टिपण्णी की और अब भी कर रहे हैं कि इस कदम के कार्यान्वयन के लिए सरकार की तैयारी आधी अधूरी है.

लेकिन विपक्ष की भूमिका अद्भुत है. जनता को हो रही कष्टों का बहाना लेकर वह सरकार पर हमलावर है. उन्हें लग रहा है निकट भविष्य में होनेवाले चुनावों में इसका लाभ उन्हें मिल सकता है. ठीक वैसे ही जैसे बिहार के विधानसभा चुनाव के पहले साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को वापस करने की मुहिम से हुआ था जो कुछ मार्क्सवादी लेखकों की हत्या और असहिष्णुता का बहाना लेकर हुआ था. बाद में इस हुए मोदी वेरोध की पोल खुल गई थी. विपक्ष इस बात की चर्चा तक करने से बच रहा है कि इस नोटबंदी ने कश्मीर में हो रही पत्थरबाजियों की पोल खोलकर रख दी है. पकिस्तान में आतंक को फीड करनेवाले आत्महत्या तक कर रहे हैं. देश में भी भ्रष्टाचार ने किस तरह अपने पाँव फैलाए हैं वह प्रतिदिन अवैध रूप से बटोरे जा रहे नए पुराने नोटों के पकडे जा रहे जखीरे से पता चल रहा है. इस भ्रष्टाचार में बैंक मेनेजर, बैंक कर्मचारी, अन्य साधारण कर्मचारी, कारोबारी और यहाँ तक कि राजनेता तक शामिल है. इन राजनेताओं में सांसद-विधायक तक अछूते नहीं हैं. इस विरोध में सबसे अधिक मुखर हैं - मायावती, ममता, राहुल और केजरीवाल.  मायावती जो अपने को दलितों की देवी कहती हैं, दलितों में विवेक जगाने के बजाय नोटों की माला पहनना अधिक पसंद करती हैं क्योंकि दलितों में विवेक जग जाएगा तो वे गैर-दलितों की तरह ऐसे प्रश्नों की बौछार कर देंगे जिससे उनकी जमीन खिसकने लग सकती है. विवेकहीन ही अपनी नेतृ को महारानी कहना पसंद कर सकते हैं. नोटबंदी से उन्हें कष्ट है क्योंकि चुनाव बिना नोट के जीते नहीं जा सकते. और इतने अल्प समय में बहुत सारे नए नोट जुटाए नहीं जा सकते. पुराने तो काम आयेंगे नहीं. अतः अपने समर्थकों को भ्रम में डालो ताकि उनका विवेक जागने न पाए. ममता ने जिस तरीके से मार्क्सवादी सरकार को अपदस्थ किया वह तरीका वह अब भी अपना रही हैं. और उस तरीके में बेशुमार नए नोटों की जरूरत पड़ेगी. दूसरे अगर नोटबंदी कहीं अपेक्षित प्रभाव डाल सकी तो ममता की सरकर प्रभावित होने लगेगी. और राहुल या कांग्रेस को तो यह नोटबंदी महाघोटाला लगती है, किसप्रकार यह कदम महाघोटाला है वह इसे संसद में ही बताएँगे जिससे मोदी जी की बोलती बंद हो जाए. जनता को इसका इन्तजार करना पड़ेगा. वैसे सभी जानते हैं कांग्रेस संभवतः अपने अस्तित्व की अन्तिम लड़ाई लड़ रही है. कहीं ऐसा न हो कि नोटबंदी के खिलाफ संसद में होनेवाला उनका भाषण कुछ अति पर चला जाए और उनकी पार्टी  को उसके डैमेज कंट्रोल में लग जाना पड़े. और केजरीवाल? राजनेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर ही ये पब्लिसिटी पाए, आरोपों से मुग्ध हुए नवयुवकों की सहानुभूति पाकर वह सत्ता में आए. मोदी जी उनकी नजर में एक अपशकुन की तरह हैं. इसीलिए वे उनका पुरजोर विरोध कर अपना अपशकुन टालते हैं. वह अपने को सच्चरित्र तो घोषित किये ही हैं, अपने समर्थकों को भी सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे रखे हैं. पर देखने में आ रहा है कि इनका एक सांसद अभी अभी लोकसभाध्यक्ष द्वारा सांसद-चरित्र की अवहेलना करने पर दण्डित कर संसद की कुछ कार्यवाहियों से बचित कर दिया गया है. एक विधायक घरेलू हिंसा में आरोपित है. पर स्वयभू चरित्रवान राजनेता बेफिक्र हैं. जब केजरीवाल अपनी छींक आने का कारण भी मोदी को मानते हैं तो नोटबंदी के प्रत्यक्ष कारण तो मोदी ही हैं. यह नोटबंदी उनके लिए घोर अपशकुन है. राहुल तो इसे महाघोटाला ही कहकर रह गए, पर यह पंजाब की एक सभा में इस महाघोटाले को व्योरेवार बतानेवाले हैं.

एक बात तो विल्कुल स्पष्ट है कि विपक्ष अपने अपने कारणों से नोटबंदी के विरोध में है. किन्तु मोदी के मन में नोटबंदी को लागू करने के पीछे क्या उनके मन में महज भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई छेडने की ही बात थी. जब औरों के लिए चुनाव सामने है तो चुनाव तो भाजपा को भी लड़ने हैं. अगर विपक्ष इस नोटबंदी के पीछे भाजपा की चुनावी गंध को सूँघता है तो एकबारगी उसे झुठलाया तो नहीं जा सकता.

जो भी हो नोटबंदी के इस मुहिम में मोदी जी का धैर्य और साहस वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुनने लायक है. मिलिटरी वाले तो यह कहने से अपने को रोक नहीं पा रहे हैं कि वर्षों बाद ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जिसे पाकर देश का बल कई गुना बढ़ गया है. इस मुहिम के पीछे कौन कौन सी मनसा मोदी जी के मन में है हमें नहीं मालूम पर इस मुहिम को सफल बनाने के उनके प्रयास इमानदारी से भरे हैं.

अब प्रश्न उठता है कि नोटबंदी वास्तव में क्या एक सही कदम है अर्थव्यवस्था के पक्ष में. क्या इस कदम से देश भ्रष्टाचारमुक्त हो जाएगा? इस एक कदम से भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी यह कहना खयाली पुलाव पकाने जैसा ही होगा, किन्तु इस लक्ष्य की ओर यह एक कारगर कदम अवश्य है. एक और बात साफ़ हो रही है कि भ्रष्टाचार की पाँव पसरता है इसके तौर तरीके भी ध्यान में आते जा रहे है जो investigation काम आयेंगे. मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ किन्तु अर्थशास्त्रियों के विचार पढ़ता रहता हूँ. और यह बात सामने आ रही है कि कई अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था पर इसके पड़नेवाले अच्छे प्रभाव के प्रति आश्वस्त नहीं हैं लेकिन निराश भी नहीं हैं. हाँ डा मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था पर इसके पड़नेवाले विपरीत प्रभाव से आगाह अवश्य किया है. किन्तु इससे इस उठाए गए कदम का महत्त्व कम नहीं हो जाता. फिलवक्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव परीशान करनेवाला है.  ऐसे समय में अर्थशास्त्रियों के विचारों को प्रमुखता मिलनी चाहिए राजनीतिज्ञों के शोर शराबे के बरक्स.

संभव है विपक्ष के नोटबंदी के विरोध में कुछ दम हो किन्तु जिस तरह से वह विरोध कर रहा है, यह वैसा ही है जैसा वह GST का विरोध कर रहा था. बहुत बाद में उसकी समझ में आया कि उस बिल को संसद से पास करवाना ही चाहिए.  

Wednesday, 8 June 2016

उड़ता पंजाब


'गैंग ऑफ बासेपुर'' के फ़िल्मकार अनुराग कश्यप की नयी फिल्म 'उड़ता पंजाब' पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चला दी है. समाचार के अनुसार उसने फिल्म में से करीब अस्सी से अधिक स्थानों पर प्रयुक्त 'पंजाब' शब्द हटाने को कहा है. ट्रिब्यूनल ने तो फिल्म के नाम से भी 'पजाब' शब्द को हटाने को कहा है. अनुराग कश्यप को यह मंजूर नहीं है. अखबारों में आए उनके वक्तव्यों से यही लगता है कि वह पजाब के युवकों को नशाखोरी के खिलाफ सन्देश देना चाहते हैं कि नशा एक बहुत बुरी चीज है. 

लेकिन सेंसर बोर्ड फिल्म से 'पंजाब' शब्द क्यों हटवाना चाहता है इसपर उनके अपने तर्कों के साथ अभी तक उनका कोई वक्तव्य देखने को नहीं मिला. वह अपने किन तर्कों के सहारे फिल्म में 'पंजाब' को रखने पर बल दे रहे हैं, यह न बताकर, सीधे सेंसर बोर्ड पर तानाशाही का आरोप लगा रहे हैं. वह यहीं नहीं रुकते वल्कि सेंसर बोर्ड की तुलना कोरिया के तानाशाही शासन से कर डालते हैं. और विडम्बना देखिये 'आप' के केजरीवाल और कांग्रेस के राहुल गांधी अनुराग के समर्थन में इसे एक अवसर के रूप में लपक लेते हैं. वह अवसर क्या है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमले का अवसर, ठीक जे एन यु काण्ड और फिल्म संस्थान के अध्यक्ष पद की नियुक्ति के मसले को जैसे लपक लिया था. बहाना क्या है, अभ्व्यक्ति की आजादी. अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ही साहित्य अकादमी के पुरस्कार को कुछ लेखकों-कवियों के द्वारा लौटाया गया था. उसका असली उद्देश्य क्या था अब किसी से छिपा नहीं. अनुराग कश्यप ऐसे अबोध नहीं कि वह यह सब नहीं जानते हों. इनके एक समर्थक एक फिल्म-नेता कहते हैं, फिल्म के खिलाफ पंजाब सरकार को कोर्ट जाना चाहिए. इस वक्तब्य के पीछे उनकी मनसा क्या है? इसमें क्या राजनीति की बू नहीं आती? अनुराग कश्यप ही क्यों नहीं कोर्ट चले जाते. ऊल जूल वक्तव्य देने के बजाय सेंसर बोर्ड यदि लिखित आदेश नहीं देता तो यही लेकर वह कोर्ट जा सकते हैं की उन्हें बोर्ड से फिल्म में कटिंग के लिए लिखित आदेश दिलाया जाए. पंजाब सरकार के पास कोर्ट जाने के क्या आधार है जबतक कि फिल्म रिलीज नहीं हो जाती.

नशाखोरी एक बहुत बुरी आदत है. पजाब में यह समस्या खतरनाक मोड़ पर पहुँच गई है. लेकिन क्या यह समस्या केवल पंजाब की ही है. क्या महाराष्ट्र में यह समस्या खतरे के विन्दु तक नहीं पहुँच चुकी है. समाचारों में तो महाराष्ट्र को भी नशाखोरी से ग्रस्त पदेश बताया जाता है. फिर उड़ता पंजाब ही क्यों, उड़ता महाराष्ट्र क्यों नहीं. बेहतर होता इस फिल्म का कोई एक सामान्य नाम होता जिसमें किसी प्रदेश को लक्ष्य न किया गया होता. इस फिल्म में संशोधनों की सलाह पर अनुराग की इस किस्म की प्रतिक्रियाओं से तो यही लगता है कि वह किसी निहित उद्देश्य के तहत पंजाब को लक्ष्य किया है. फिल्म सेंसर बोर्ड कोई प्रभुता संपन्न संस्था नहीं वरन भारतीय सरकार के शासनान्तार्गत एक संस्था है, जबकि कोरिया एक प्रभुतासंपन्न सरकार है. अनुराग कश्यप की इस तुलना में क्या कोई राजनीतिक निहितार्थ नहीं दिखाई देता?

"उड़ता पंजाब" यदि ज्यों का त्यों पंजाब में प्रदर्शित हो जाए और वहां कोई राजनीतिक तूफ़ान उठ खड़ा हो तो क्या कश्यप उसे रोक सकते हैं? इसका राजनीतिक उपयोग नहीं होगा क्या इसकी कोई गारंटी दी जा सकती है. अभी फिल्म रिलीज नहीं हुई और अभी से 'आप' और कांग्रेस ये दोनों दल इसका लाभ लेने के लिए आतुर हो उठे हैं. फिल्म रिलीज होने पर ये कैसा तूफ़ान खडा करेंगे इसका अनुमान अभी से लगाया जा सकता है. यह प्रत्याशित है कि पंजाब में जभी यह दिखाई जाएगी पंजाबी लोग इसका विओध करेंगें. इस फिल्म को पंजाब के लिए वे एक लांछन के रूप में ले सकते हैं. क्या यह उसी तरह का चित्रण नहीं है जैसा मकबूल फ़िदा हुसैन ने हिन्दू देवी देवताओं के प्रति किया था. अनुराग जी फिल्म भी साहित्य का एक हिस्सा है. उसे आग्रही नहीं होना चाहिए. अभिव्यक्ति की आजादी के जितने बड़े शत्रु कमुनिस्ट सरकारें है भारतीय सरकारे तो ऐसी नहीं दिखती. हाँ अभिवक्ति की आजादी के नाम पर धंधा चलाने वाले बहुत दिखाई देते हैं..

Thursday, 11 February 2016

श्लील-अश्लील




एक बार स्वर्ग की नर्तकी उर्वसी को अपने रूप यौवन पर बड़ा अभिमान हो गया था. उसने ऋषियों को चुनौती दे डाली थी- वे मेरा नृत्य देख कर अपने आपको रोक नहीं सकेंगे.
तो इंद्र ने उसके कहने पर एक नृत्य सभा का आयोजन किया और ऋषियों को भी बुला भेजा.
उर्वशी ने इंद्रसभा में वस्त्रउतार नृत्य प्रारंभ किया. नृत्य बहुत सुंदर था, सभी सभासद और ऋषि उर्वशी का नृत्य देख मंत्रमुग्ध हो गए.
तभी नृत्य करते करते उर्वसी ने अपना एक अंगवस्त्र उतार फेंका और नृत्य जारी रखा. एक ऋषि से उर्वशी का यह नृत्य देखा नहीं गया. उसने सभा छोड़ दी.
नृत्य रत उर्वशी ने इधर एक-एक अंगवस्त्र उतार कर फेकने शुरू किेए उधर एक-एक ऋषि सभा छोडकर जाने लगे, लेकिन एक ऋषि हठी निकला. उसने सभा नहीं छोड़ी. उर्वशी को लगा अब उसका गर्व टूटने ही वाला है. और तब उसने अपने शरीर का अंतिम वस्त्र भी उतार फेंका. नृत्य वास्तव में सुंदर और अद्भुत था. सभा में उपस्थित वह अंतिम ऋषि उठा और तालियों से उर्वशी के नृत्य की प्रशंसा की किंतु सभा से उठकर गया नहीं. बोला, उर्वशी, तुम्हारा नृत्य अद्भुत है परंतु एक कमी अभी भी रह गई है. एक वस्त्र अभी भी शेष रह गया है तुम्हारा, तुम उसे भी उतार फेंको. ऋषि का ईशारा था, यह देह भी तो एक वस्त्र ही है जिससे उसके होने (beeing) को सजाया गया है.
यह वाक्य कान में पड़ते ही उर्वशी नृत्य करते करते रुक गई. ऋषि का अर्थ उर्वशी की समझ में आया और वह पछाड़ खाकर ऋषि के पैरों पर लुढ़क गई. उसका सारा अभिमान चूर चूर हो गया था.

Monday, 8 February 2016

अंगुलिमाल : उत्तर प्रसंग/कहानी

रचनाकार में प्रकाशित       8-2-2016




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उत्तर प्रसंग
तथागत अंगुलिमाल को साथ लेकर उस स्थान पर आ गए जहाँ वह ठहरे हुए थे. वहाँ उनके शिष्य बड़ी व्याकुलता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. अभी तक उनके शिष्यों के हृदय की बढ़ी हुई धड़कनें थमी नहीं थीं. वे प्रशनाकुल हुए बड़ी तेज गति से तथागत के समीप सिमट आए और उनका कुशल-क्षेम पूछने लगे.
तथागत ने वन में घटी घटना से अपने शिष्यों को अवगत कराया और फिर अपने नए शिष्य से उनका परिचय कराया-
           “ये हैं हमारे संघ के नए संन्यासी, अंगुलिमाल. ये तुम लोगों के साथ ही रहेंगे. तुमलोग इनसे किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न करना. इनके संबंध में किसी से कोई चर्चा भी न करना”.
तथागत की देशना में किसी तरह के प्रचार का स्थान नहीं था. उनका प्रयोग-क्षेत्र मनुष्य था.
अंगुलिमाल ने बौद्ध-संन्यासी का चीवर धारण कर लिया. वह तथागत की नित्य की दैनिक देशना में सम्मिलित होने लगा और अन्य संन्यासी शिष्यों के साथ भिक्षा के लिए भी जाने लगा. पुरवासियों को उसके संबंध में कुछ भी पता नहीं होने दिया गया. उन्हें केवल इतना ही पता था कि भगवान वन में अंगुलिमाल के विचरण-भेत्र की ओर गए थे. किसलिए गए, कहाँ तक गए, कब आए, अंगुलिमाल से उनकी भेंट हुई या नहीं, इसका उन्हें कुछ भी पता नहीं हुआ. क्योकि यह प्रयाण बुद्ध की दैनिक चारणा का अंग था. पुरवासियों को क्या पड़ी थी कि वे भगवान के शिष्यों से, उनके साथ क्या घटा, क्या नहीं घटा इसकी पड़ताल करें. कुछ घटा होता तो आश्रम में कुछ हलचल अवश्य होती.
उधर उसकी माँ भी वन से वापस आ गई. आकर अपनी दैनिक चर्या में लग गई. अंगुलिमाल के बुद्ध का शिष्य बन जाने से वह बहुत प्रसन्नचित थी. उसका पुत्र सम्राट के हाथ में पड़ने से बच गया था. यदि पड़ जाता तो उसे मृत्यु की सजा निश्चत थी.
भले ही उसका पुत्र डाकू-हत्यारा हो गया था, उस माँ के मन में पुत्र के प्रति आक्रोश का भाव होते हुए भी उसके प्रति अभी भी स्नेह शिथिल नहीं हुआ था. उसका स्नेह ही उसे पुत्र से मिलने जाने के लिए बाध्य कर देता था. वन में जिस समय उसने पुत्र को तथागत के चरणों में झुके देखा उसके नेत्र छलछला आए थे. एक क्षण के लिए उसकी ममता में ऊफान सा आ गया था. उस क्षण उसके मन में हुआ कि वह पुत्र को अपनी आँचल में समेट ले, पर उसने अपने को रोक लिया था. भावावेश के क्षण में भी उसे लगा कि वह क्षण उस कृत्य के लिए उपयुक्त नहीं था.     
अंगुलिमाल तथागत के साथ उनके प्रवासाश्रम में आ गया, बौद्ध आश्रम में निभाई जाने वाली सभी चर्याओं को उसने अपना भी लिया. आश्रम में ध्यान  करना अनिवार्य था. वह ध्यान के लिए भी बैठने लगा पर ध्यान साध नहीं पाता था. ध्यान-मुद्रा में बैठकर ज्योंही वह नेत्र मूँद कर अपने भीतर प्रवेश करने का प्रयत्न करता उसके मन में उसके वे हत्या-कृत्य उभर आते जो उसने 999 उँगलियों को प्रप्त करने के लिए किए थे. वह आत्मग्लानि से भर जाता और घबराकर ध्यान से उठ जाता.
वह दिन-रात पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा. किंतु अपने संन्यासी साथियों पर वह इसे प्रकट नहीं होने देता था.
उसकी समूची सूचनाएँ नित्य तथागत तक पहुँचती रहती थीं. पर ये सारी सूचनाएँ उसकी बाह्य गतिविधि की ही होती थीं.
अगुलिमाल इससे अनभिज्ञ था. उसकी अनभिज्ञता में तथागत उसके प्रति अपने कर्तव्य निभा रहे थे. उसके मन में घट रही अंतर्घटनाओं को वह उसके मन पर अपना ध्यान फेंक कर जान लेने में समर्थ थे. उनके संबंध में ये तथ्य मिलते हैं कि जहाँ वह अपने शिष्यों के साथ ठहरते थे, यदि वहाँ कोई जनश्रद्धा-स्थल होता, तो अपने शिष्यों से, उस स्थल पर ध्यान फेंक कर, यह जानने को कहते कि देखो इस स्थल की सही स्थिति क्या है. उनके शिष्य उस पर अपना घनीभूत ध्यान फेंक कर उन्हें बताते कि वहाँ किसी साधु की या किसी तपस्वी की समाधि है.
इसी बीच तथागत को सूचना प्राप्त हुई कि सम्राट प्रसेनजित उनका दर्शन करना चाहते हैं.
वास्तव में सम्राट वहाँ के पुरवासियों की प्रार्थना पर एक बड़ी सेना लेकर अंगुलिमाल को पकड़ने के लिए उसी समय चल पड़े थे जब तथागत जंगल की ओर प्रयाण किए थे, अंगुलिमाल से मिलने. मार्ग में उन्हें सूचना प्राप्त हुई कि तथागत अपने शिष्यों के साथ उसी जंगल के पास के गाँव में ठहरे हुए हैं जो अगुलिमाल का विचरण-क्षेत्र है. सम्राट ने पहले तथागत के दर्शन करने का निर्णय लिया.
सम्राट की सूचना पाते ही तथागत ने उन्हें बुला लिया. तथागत के पास आकर सम्राट ने उनका अभिवादन किया और उनसे अपने आने का उद्देश्य बतायाः
           “यहाँ के पुरवासियों की प्रार्थना पर हम यहाँ आए हैं. किसी अंगुलिमाल नाम के डाकू ने उनके प्राण संकट में डाल रखा है. वे उससे बहुत आतंकित हैं. जो भी जंगल के मार्ग से जाता है वह उनकी हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता है. हम अपने सैनिकों के साथ उसे पकड़ने आए हैं.”
तथागत ने सम्राट की बातें सुनीं. पूछा-
           “सम्राट, यदि मैं अंगुलिमाल को आपके सामने ला दूँ, तो आप उसके साथ क्या करेंगे.”
सम्राट ने कहा- 
          “मैं उसपर आक्रमण नहीं करूँगा. उसे आपके आश्रम में रहने की अनुमति दे दूँगा”.
तथागत ने अपनी दायीं ओर कुछ दूरी पर बैठे एक सन्यासी की ओर इंगित कर सम्राट से कहा-
          “वह रहा आपका अंगलिमाल, दाढ़ी मूंछें कटी हुई, संन्यासी वेश में”
उसे देखते ही सम्राट कुछ डग कूद गए और तलवार खींच लिए. तथागत ने कहा- “सम्राट अब तलवार की कोई आवश्यकता नहीं”.
सम्राट कुछ क्षण उसे देखते रह गए.  पुरवासियों ने सम्राट के सामने डाकू अंगुलिमाल का जो चित्र खींचा था, यह अंगुलिमाल उससे एकदम भिन्न था. पुरवासियों ने सम्राट के समक्ष उसे बड़ी बड़ी दाढ़ी-मूँछों, शीश पर अग्नि की लपटों-सा फड़-फड़ाते बालों और कठोरता लिए खिंचे खूंखार चेहरे वाला चित्रित किया था. और यह जो सामने है एकदम श्मश्रुविहीन, सौम्य, शांतचित्त और शीतल स्वभाव का है. सम्राट के मन में तुरंत यह बात कौंध गई, जिसे हम वश में नहीं कर पाए उसे तथागत ने....
बुद्ध का वचन सुन सम्राट ने तलवार वापस अपने म्यान में रख ली. उनकी अनुमति लेकर उसे अपने पास बुलाया, उसे चीवर भेंट किया और प्रवासाश्रम में रहने की अनुमति दे दी. और तथागत के प्रति अपनी धन्यता व्यक्त कर तथा उनकी अनुमति लेकर राजधानी सेना सहित श्रावस्ती के लिए प्रस्थान कर गए.
अंगुलिमाल को यह सब अद्भुत लगा. उसके वन्य जीवन में उसकी माँ के अतिरिक्त कोई उससे मिलने नहीं आता था. सहानुभूति के कुछ शब्द तो उससे कोई कैस कहता. उसके कर्म ही वैसे थे. किंतु उसके मन में कहीं कुछ पड़ गई गाँठें खुलती सी उसे अवश्य अनुभूत हुईं.
उसके मन की गतियों पर बुद्ध की अंतर्दृष्टि निरंतर बनी हुई थी. उसके मन को उसके पूर्वकृत्य बहुत व्याकुल किए हुए थे. इसके कारण ध्यान छोड़कर वह बीच ही में उठ जाता और अनमना हो टहलने लगता. जब उसे किसी पर उसकी की गई क्रूरता का दृश्य उसके सामने उभरता तो उसके रोम-रोम सिहर उठते. हत्या करते समय कभी उसके हाथ काँपे नहीं थे.
उसकी इस मानसिक गतिविधि को ताड़कर बुद्ध ने उसके मानसिक भाव के अनुरूप ही ध्यान की एक विधि दी. उसे विपस्सना ध्यान करने को कहा. इस ध्यान में तीन चरण होते हैं- पहले चरण में साधक को अपने मन में उठते हुए भावों- कृत्यों, विचारों- को साक्षी भाव से देखना होता है. दूसरे में भीतर जाती साँसों और तीसरे में बाहर निकलती साँसों को देखना होता है. बौद्ध साहित्य कहता है स्वयं बुद्ध ने इसी ध्यानविधि से ज्ञान प्राप्त किया था.
अंगुलिमाल के लिए यह बहुत ही उपयुक्त ध्यान था. उसके मन में  उसके पूर्वकृत्य बार बार उभर आते थे. और वह ग्लानि से भर जाता था. वह यह ध्यान मनोयोग से करने लगा और उसे यह सधने भी लगा. ध्यान में जब भी उसका कोई पूर्वकृत्य उभरने से उसका मन उद्विग्न होने लगता, वह उन कृत्यों को अंतर्मन से सायास देखने लगता. वैसा करने से उसके उभरते कृत्य विरल होने लगते और वह धीरे धीरे स्वस्थ-चित्त हो जाता और उसका ध्यान घना होने लगता.
तथागत उसे ध्यान में थोड़ी सफलता प्राप्त करते देख आश्वस्त हुए. वह उसकी चित्त-दशा में हो रहे परिवर्तन पर अधिक ध्यान दे रहे थे. वह प्रतीक्षा में थे कि उन्हें एक अवसर मिले और वह अंगुलिमाल के चित्त पर एक परिवर्तनकारी प्रयोग करें.
शीघ्र ही उन्हें एक सुयोग भी मिल गया.
एक दिन अंगुलिमाल संन्यासियों के साथ जब आश्रम की ओर लौट रहा था तो मार्ग में एक पुरवासी के घर से उसे एक स्त्री के रोने का स्वर सुनाई पड़ा. गृहस्वामी से पूछने पर उसे ज्ञात हुआ कि उसकी पुत्रवधू प्रसव की पीड़ा से तड़प रही है. उसके प्रसव में कठिनाई हो रही है. प्रसव पीड़ा झेल रही उस स्त्री के प्रति उसके मन में करुणा उमड़ आई. उसके मन में हुआ कि उसकी पीड़ा को न्यून करने के लिए उसकी कुछ सहायता की जानी चाहिए. किंतु तत्काल उसेकोई उपाय नहीं सूझा.
वह आश्रम आकर तथागत को बताया और पूछा- “भगवन उस गर्भवती स्त्री की पीड़ा को न्यून करने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ”.
तथागत ने उससे कहा- “अंगुलिमाल, पीड़ा झेलती उस गर्भवती स्त्री के पास जाओ और कहो-
         ‘बहन, जबसे मैंने जन्म लिया है, मुझे स्मरण नहीं होता कि मैंने अपने संज्ञान में किसी जीवित प्राणी की हत्या की हो. इस सत्य के द्वारा आपकी पीड़ा कम हो और सुख प्राप्त हो, आपके गर्भ में पल रहा शिशु भी सुख प्राप्त करे’.
अंगुलिमाल ने तथागत के उस कथन को सुना, किंतु उसे यह कथन सत्य के परे लगा. उसने इस कथन के प्रति अपनी हिचकिचाहट प्रकट की.
वास्तव में तथागत पहले अंगुलिमाल के मन की स्थिति को जानना चाहते थे. अपने पहले कथन को मानने में उसकी हिचकिचाहट देख उन्होंने यह जान लिया कि वह जन्म से हिंसक प्रवृत्ति का नहीं है. उसकी हिचकिचाहट का अर्थ था कि उसे उनका वह कथन उसके प्रति सत्य को व्यक्त करता प्रतीत नहीं हुआ.
किसी की मनस्थिति को जानने का उनका यह अपना ढंग था. एक सत्य घटना आपके सामने रखूँ. जब बट-वृक्ष के नीचे नरकंकाल जैसा शरीर लिए बैठे तथागत को सुजाता की खीर खाकर ज्ञान प्राप्त हुआ था, सुजाता उन्हें बट वाले बाबा कहने लगी थी. वहाँ के ग्रामवासी भी उन्हें बट वाला बाबा मानकर उनके पास अपने भले के लिए आशीर्वाद माँगने जाने लगे थे. एक दिन एक ग्रामणी रोती हुई अपने अभी अभी मृत पुत्र को लेकर उस बट वाले बाबा के पास आई और उसे जीवित कर देने का आग्रह करने लगी. तथागत ने उसकी प्रार्थना ध्यान से सुनी. उन्होंने उस ग्रामणी से कहा-
         “तुम एक मुट्ठी सरसो लाओ. यह सरसो उस घर का होना चाहिए जिस घर में कोई मृत्यु न हुई हो. मैं तुम्हारे पुत्र को जीवित कर दूँगा”.
ग्रामणी वापस गई और अपने ग्राम के हरएक घर घूम आई किंतु उसे एक भी घर ऐसा नहीं मिला जिसके घर किसी की मृत्यु न हुई हो. आकर उसने  स्थिति बताई. तथागत ने उससे कहा-
         “मृत्यु जीवन का ध्रुव सत्य है.  इसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता”.
अंगुलिमाल की हिचकिचाहट को देख तथागत ने उसे एक दूसरा कथन सुझाया. उन्होंने पूर्व कथन को थोड़ा सुधारा और कहा, उससे कहना-
          “बहन, मैं जन्म से ही उदार हृदय का हूँ. मुझे स्मरण नहीं होता कि मैंने अपने संज्ञान में किसी जीवित प्राणी की हत्या की हो. इस सत्य के द्वारा आपको सुख प्राप्त हो, आपके गर्भ में पल रहा शिशु भी सुख प्राप्त करे”.
तथागत का यह कथन उसे अपने अस्तित्व के निकट का और उपयुक्त लगा. वह उस गर्भवती स्त्री के पास गया और तथागत के उस कथन को आशीर्वादस्वरूप उससे कहा. करुणा से भरे हृदय वाले अंगुलिमाल के उस आशीर्वाद के संवेदनशील शब्द-तरंगों ने उस गर्भवती स्त्री पर अनुकूल प्रभाव डाला. उसने एक शिशु का आसान प्रसव किया.
जब सम्राट के सामने अंगुलिमाल का रहस्य प्रकट हुआ, इसे ग्रामवासियों ने भी जाना. सम्राट को उसे चीवर भेंट करते देख उनके मन मे उसके प्रति थोड़ी सहानुभूति जगती दिखी. उसके आशीर्वाद से गर्भवती स्त्री को प्रसव पीड़ा से मुक्त हो जाने की घटना ने उनमें उसके प्रति सहानुभूति को और गहरा कर दिया. किंतु कुछ ग्रामवासी अभी भी उससे रुष्ट थे. वे अपने स्वजनों की हत्या करने वाले को भूल नहीं पा रहे थे.
अंगुलिमाल भिक्षाटन के लिए अभी तक अपने संन्यासी साथियों के साथ जाता था. तथागत ने अब उसे अकेले जाने को कहा. स्यात उनका ध्यान उन ग्रामवासियों की ओर था जो उससे अभी भी रुष्ट थे. वह जानना चाहते थे कि उसके अकेले होने पर वे उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं. उसके साथ उनके द्वारा किए जाने वाले व्यवहार का उनुमान अवश्य रहा होगा पर उसकी चर्चा तथागत ने उससे नहीं की. वह चाहते थे कि अंगुलिमाल स्वयं उस व्यवहार का अनुभव करे. यह अनुभव उसका अपना अनुभव होगा और उससे निपटने की सूझ भी उसकी अपनी होगी. इसीसे उसके अस्तित्व में खिलावट आएगी.
तथागत की अनुमति लेकर भिक्षाटन के लिए अब वह गाँव में अकेले ही  निकलना आरंभ किया. पहले ही दिन गाँव में प्रवेश कर जब वह एक गृहस्वामी  के द्वार पर भिक्षा के लिए खड़ा हुआ, अभी पात्र आगे बढ़ाया भी न था कि उसे भिक्षा देने से मना हो गया. और ज्योंही अगले गृहस्वामी की ओर आगे बढ़ा, एक पत्थर उसके शीश पर लगा. उसने हाथ से अपना शीश पकड़ लिया. पर रुका नहीं, आगे ही बढ़ा. अभी दूसरे गृहस्वामी तक वह पहुँचा भी न था कि उसके शरीर पर एक डंडा आकर लगा. किंतु उसके डग रुके नहीं, अगले गृहस्वामियों की ओर बढ़ते गए. उसपर प्रहार होने भी नहीं रुके. और इतने प्रहार हुए कि चोटों से आहत हो वह धरती पर गिर गया. जब संध्या तक वह आश्रम नहीं पहुँचा तो उसके साथी उसे ढूँढ़ने निकले. उन्हें वह ग्राममार्ग के एक स्थान पर घायल पड़ा मिला. वे उसे उठाकर आश्रम ले आए, सेवा सुश्रुषा किए. तभी तथागत आ गए. उन्होंने उससे पूछा-
          “अंगुलिमाल, जब ग्रामवासी तुम पर प्रहार कर रहे थे तो तुम्हारे मन में क्या हो रहा था?”
          “भगवन, मेरे मन में उनके प्रति थोड़ा भी क्रोध नहीं आया. जब भी उनके प्रहार मुझपर होते थे, एक क्षण के लिए मेरे द्वारा उनके स्वजनों की की गई हत्याएँ मुझे स्मरण हो आती थीं.”
          “किंतु वे तुम्हें चोट पहुँचा रहे थे. चोट से तुम्हें पीड़ा होती होगी.”
          “यह तो मात्र चोट लगने की पीड़ा है. इन लोगों ने तो अपने स्वजनों के खोने की पीड़ा सही है. भगवन, मेरे प्रति उनके मन में आया क्रोध स्वाभाविक था.”
         “अंगुलिमाल, तुम भिक्षाटन के लिए अकेले जाते रहना. यह तुम्हारे ध्यान की साधना का एक अंग है. तुम्हारे साथ ग्रामवासी जो भी व्यवहार करें बिना उसके प्रति प्रतिक्रिया किए उन व्यवहारों के प्रति अपने मन में उठते भावों का साक्षी बने रहना.”
वह अब और उल्लास से भिक्षाटन पर जाने लगा. किंतु उसके प्रति ग्रामवासियों के क्रोध में कोई न्यूनता नहीं आई. अब वे प्रहार पत्थर, डंडे से नहीं वरन क्रोध-वाण से उसपर आक्रमण करते रहे. वे किसी भी तरह उसके प्रति नम्रता वरतने की मुद्रा में नहीं प्रतीत होते थे.
अंततः तथागत को बीच में पड़ना पड़ा. वह अंगुलिमाल के प्रति अब पूर्णतः आश्वस्त थे. उन्होंने ग्रामवासियों को समझाया. यह अंगुलिमाल अब तुम लोगों को कोई हानि नहीं पहुँचाएगा. इसका दायित्व मेरा है. भूत में इसने जो हानि तुम्हें पहुँचाई है उसे होनी मान लेनी चाहिए. इसी में तुम्हारी भलाई है. पूर्व कृत्य को सदा स्मरण किए रहने से जीवन की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकेगी. कालवश तुम्हारे परिवार में कोई मृत्यु होती है तो उसे तुम्हें भुलानी ही पड़ती है. तुमलोग इस अंगुलिमाल को स्वीकार कर लो. यह तुम्हारे लिए हितकारी ही सिद्ध होगा.
ग्रामवासियों ने तथागत की इस देशना को शीश झुकाकर स्वीकार किया.
                                                  7-2-2016