श्रीमद्भगवद्गीता
20-02-2026
ब्लॉग- 9
नवॉं अध्याय
कृष्ण अब अर्जुन को वह गूढ़ रहस्य बताते हैं जिसे
जानकर वह संसार के जन्म-मरण के च्रक्र से मुक्त हो जाएँगे. कृष्ण कहते हैं- मैं इस संपूर्ण
सृष्टि को अव्यक्त रूप से व्याप्त किए हुए हूँ. मेरे व्यक्त रूप को भक्ति द्वारा पहचान
कर मुझे अनन्य भाव से भजते हुए मेरी शरण में आना ही बह्म्रप्राप्ति का राजमार्ग है.
इस व्यक्त रूप की उपासना प्रत्यक्ष ज्ञान देने वाली है और सबके लिए सुलभ है. वह
अर्जुन को उनके सभी कर्म उन्हें अर्पण करने को कहते हैं.
ऐसा करने से वह शुभ अशुभ कर्मों के फलरूप बंधनों से मुक्त रहेंगे.
# हिन्दी पद्यकार०-यहॉं भगवान अर्जुन को दुखरूपी जगत से मुक्त होने व भगवान को पाने के उपाय बता रहे हैं.
श्री भगवान ने कहा:
दोषदृष्टि से रहित तुझे अब गूढ़ ज्ञान विज्ञान सहित
कहूँगा
मैं तू जान जिसे होगा
प्रमुक्त
पापों से ।1।
ज्ञान
यह राजा
विद्याओं का गुह्यों1 का पवि2 उत्तम
धर्मयुक्त आचरण-सुगम3
अक्षर प्रत्यक्ष फलवाला ।2।
जो न रखे श्रद्धा इस धर्म में प्राप्त
न होता मुझको
मृत्युयुक्त
संसार-चक्र में करते भ्रमण परंतप! ।3।
मेरे निराकार
रूप से व्याप्त
जगत यह सारा
प्राणी
सब स्थित मुझमें पर
स्थित नहीं मैं उनमें ।4।
मुझमें
स्थित प्राणि नहीं,
पर देख मेरा योगैश्वर4
उनका उद्भावक
पोषक मैं आत्मा मेरी न
उनमें ।5।
महत5 वायु सर्वत्र विचर ज्यों रहे सदैव गगन में
सभी प्राणियों
को वैसे ही
मान तू मुझमें स्थित
।6।
कल्प-अंत6 में सभी प्राणि लय होते मेरी प्रकृति
में
कल्प-शुरू में मैं
उनको
कौंतेय! पुनः रचता हूँ
।7।
इस
समस्त प्राणी समूह को जो परतंत्र प्रकृतिवश7
अपनी प्रकृति स्ववश8 करके मैं बार बार रचता हूँ ।8।
उन रचना
कर्मों में मेरे उदासीन-सा रागरहित
रहने से बॉंधते
नहीं हैं
कर्म धनंजय! मुझको ।9।
प्रकृति अध्यक्षता में मेरी है
रचती जगत चराचर
इसी हेतु
से
होता है कौंतेय! जगत-परिवर्तन ।10।
मूढ़ अवज्ञा करते मेरी मान मनुष्य-तनधारी
श्रेष्ट भाव जानते
न वे मुझप्राणि-महा9 ईश्वर का ।11।
व्यर्थ ज्ञान कर्म आशा के, ऐसे जन अविवेकी
धारण करते
प्रकृति आसुरी और राक्षसी मोहन10 ।12।
किंतु प्रकृति दैवी के
आश्रित एकनिष्ठ महतात्मा
जान आदि
भूतों का अक्षर11 पार्थ! मुझे भजते वे ।13।
नित्ययुक्त12 मुझमें दृढ़व्रत13 वे यत्नशील
वे प्रेमल
कीर्तन
करते नमस्कार कर करें
उपासना
मेरी ।14।
ज्ञानयज्ञ से पूज मुझे कुछ एकीभाव उपासें
कुछ
उपासते पृथक भाव से मुझ- विराटरूपी को ।15।
मैं ही
क्रतु, स्मार्त यज्ञ मैं स्वधा14
और औषधि मैं
मैं ही मंत्र अग्नि
और घृत, मैं ही हवन-क्रिया हूँ ।16।
मैं
ही जग का धाता माता पिता पितामह
मैं ही
मैं ही पवित
ॐ वेद्य15 हूँ, साम यजुः ऋक मैं ही ।17।
सबकी
गति भर्ता16 प्रभु साक्षी शरण निवास हितू17मैं
उत्पति प्रलय बीज अविनाशी व निधान18 स्थिति हूँ ।18।
मैं ही तपता सूर्यरूप
से जल लेता
बरसाता
मैं ही
असत् और सत् अर्जुन! मृत्यु अमृत
भी मैं ही ।19।
त्रिवेदोक्त काम-कर्मों19के कर्ता
अनघ20व सोमप21
करते विनती
स्वर्ग प्राप्ति की पूज यज्ञ से मुझको
होते प्राप्त
इंद्रलोक को अपने
पुण्य-फलों से
दिव्य भोग
भोगते हैं वे स्वर्गलोक के दैवी
।20।
वे उस विशद स्वर्गलोक के भोग भोग कर पूरा
क्षीण पुण्य
के होते ही हैं मृत्युलोक को आते
यों त्रिवेद में कहे
हुए वे काम-धर्म के आश्रित
लगे
कामना में भोगों की आवागमन
को पाते ।21।
भक्त अनन्य चिंतन करते जो
उपासते हैं ‘मुझको
करता वहन योग
क्षेम मैं मुझ-रत22 उन भक्तों का ।22।
जो सकाम23 भक्त पूजते अन्य देव
श्रद्धा से
करते वे
पूजन मेरा ही पर कौंतेय! अविधि24 वह ।23।
क्योंकि सर्व यज्ञों का भोक्ता व स्वामी भी मैं ही
वे जानते न
मुझे तत्व से
पाते अतः पतन
को ।24।
पूज
देव देव को पाते पूज पितर पितर को
प्रेत पूज प्रेतों को मिलते मुझे पूज कर
मुझको ।25।
जो जल पुष्प पत्र फल अर्पित मुझे
करे अंतः से
मुझमें उस तल्लीन
भक्त की
प्रेम-भेंट मैं लेता ।26।
तू
जो करता कर्म यज्ञ
व दान और भोजन भी
और तपस्या भी जो सब कौंतेय! मुझे अर्पण कर ।27।
यों कर अर्पण मुक्त रहे शुभअशुभ कर्मबंधन से
ऐसे हो सन्न्यासयुक्त तू
मुक्त लीन हो मुझमें
।28।
सब प्राणी में सम-व्यापक मैं कोई नही
प्रियाप्रिय25
मुझे
भक्ति से भजते जो हैं मैं
उनमें
वे मुझमें ।29।
यदि
हो घोर दुराचारी भी भजे अनन्य हो मुझको
वह मानने योग्य साधु
है सम्यक निश्चय वाला ।30।
वह होता
तत्क्षण धर्मात्मा नित्य शांति को पाता
सत्य जान
कौंतेय! भक्त मेरा न नष्ट होता है
।31।
जो भी
वैश्य शूद्र स्त्रियाँ पापयोनि
वाले हों
पार्थ! परमगति पाते सब ही होकर मेरी शरण में ।32।
जो हैं पुण्यशील ब्राह्मण,राजर्षि भक्त,उनका26क्या
पा तू अतः अनित्य27देह सुखरहित भजन
कर मेरा ।33।
होकर मुझमें मनवाला बन
भक्त नमन
पूजा कर
यों लग
मुझसे शरण मेरी हो
मुझे प्राप्त तू होगा ।34।
राजविद्याराजगुह्ययोग नाम का नवॉं अध्याय
समाप्त
1 गोपनीय 2. पवित्र 3.
साधने में सुगम 4. ईश्वरी योगशक्ति 5. महान 6. कल्पों के अंत में 7. प्रकृति के वश
में होने से 8. अपने वश में कर 9. प्राणियों का बड़ा ईश्वर 10. मोहित करने वाले 11.
अविनाशी 12. निरंतर लगे हुए 13. दृढ निश्चय वाला 14. पितरों का अन्न 15. जानने
योग्य 16. भरण पोषण करने वाला 17. हित करने वाला 18. वह स्थान जहां सभी जीव लय हो
जाते हैं 19. इच्छा भरे कर्म 20. पाप रहित 21. सोम रस पीने वाले 22. मुझमें लीन
23. कामना से भरे 24. विधि रहित 25. प्रिय और अप्रिय 26. वे तो परम गति को प्राप्त
करते ही हैं 27. क्षणभंगुर
शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
७१५ डी, पार्वतीपुरम, चक्शाहुसैन,
बशारतपुर, गोरखपुर, २७३००४, उ. प्र.
ईमेल- sheshnath250.gmail.com
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