Friday, 9 January 2026

 

                         श्रीमद्भगवद्गीता

                                पहला अध्याय

 कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच हो रहे युद्ध को संजय हस्तिनापुर में बैठे दूर-दृष्टि1 से देखते रहे. युद्ध भीषण था. युद्ध के दसवें दिन जब भीष्मपितामह घायल होकर पृथ्वी पर गिर गए, तब यह बताने के लिए संजय राजा धृतराष्ट्र के पास गए. पितामह का घायल होना सुन धृतराष्ट्र विकल हो उठे. वह संजय से युद्ध का हाल पूछने लगे।

विकल धृतराष्ट्र ने संजय से पूछाः

       कुरूक्षेत्र की  धर्म-भूमि में  जुटे  ले इच्छा रण की

       संजय!  कहो  किया  क्या  मेरे और  पांडु-पुत्रों ने ।1।

संजय ने बताया:                           

      राजन!  देख   व्यूहबद्ध  निर्भय  पांडव-सेना  को

       जा समीप  आचार्य द्रोण के कहा  सुयोधन नृप ने ।2।

       देखें यह  आचार्य  पांडु-पुत्रों  की व्यूहरची   सेना

       जिसे रचा है द्रुपदपुत्र ने शिष्य आपके  बुद्धिबली ।3।

         इसमें  बड़े  बड़े  धनु  वाले  योद्धा   भीमार्जुन-से 

       सात्यकि और विराट, द्रुपद हैं महारथी राजा भी ।4।

       धृष्टकेतु   काशी-नरेश   हैं  चेकितान   बलशाली

       पुरुजित  कुंतीभोज शैब्य हैं  समर-वीर नरपुंगव ।5।

 

1 व्यास ने संजय को दूर-दृष्टि दी थी. ‘’दूर-दृष्टि कोई अनहोनी बात नहीं है. आज भी अमेरिका में एक व्यक्ति, टेड सीरियो है,जो हजारों मील दूर घट रही घटनाओं के चित्र और ध्वनि को पकड़ लेता है. दूर-दृष्टि दूर तक देखने की शक्ति है और दिव्यदृष्टि- अलौकिक को देखने की शक्ति’. ओशो

       युधामन्यु   विक्रमी उत्तमौजा  प्रवीर  सौभद्र बली

       पॉंचो  पुत्र  द्रौपदी  के  जो  अगम  महान  रथी  हैं ।6।

       अपनी  सेना में विशिष्ट  जो जानें उन्हें  द्विजोत्तम!

       कहता  हूँ   संज्ञार्थ1  सुनें  जो  सैन्य-प्रमुख  हैं  मेरे ।7।

       आप  भीष्म व  वीर  कर्ण हैं  कृपाचार्य  रण-जेता

       अश्वत्थामा व  विकर्ण  हैं  सोमदत्त-सुत  भूरिश्रवा ।8।

       और बहुत से शूर मेरे हित  अपनी  छोड़ जीवेच्छा 

       डटे  हुए हैं  लड़ने को  सब  रण-पटु  युद्धविशारद ।9।

       सैन्य हमारी है  अजेय  यह  भीष्मपितामह-रक्षित

       पांडव-सैन्य भीम-अभिरक्षित2 को जीतना सुगम है ।10।

       स्थित हो कर  सैन्य-व्यूह के  सब  प्रवेश-द्वारों पर

       सभी ओर से करें भीष्म की  आप  सभी मिल रक्षा ।11।

       इसी समय  कुरुवृद्ध  पितामह ने दहाड़ सिंहों-सा

       फ़ॅूंका   अपना   शंख  हर्ष  से   भरा  क्रूर  दुर्योधन ।12।                        

       साथ  बज  उठे  शंख नगाड़े  ढोल मृदंग  नरसिंघे

       गूँज  उठा  आकाश  नाद  से  शोर  हुआ   भयंकर ।13।

       तब  महान रथ में जिसमें  थे जुते  श्वेत वर घोड़े

       बैठे  कृष्ण  और अर्जुन  ने  दिव्य  शंख निज  फूँके ।14।                

        हृषीकेश  ने  पांचजन्य3 को  देवदत्त4  को अर्जुन

       पौण्ड्र  नाम  के  महाशंख को  फूँके भीम  वृकोदर ।15।

       फ़ॅूंके  शंख अनंतविजय निज   कुंतीपुत्र  युधिष्ठिर

        सहदेव-नकुल ने  फूँके शंख सुघोष मणिपुष्पक ।16।             

        वीर शिखंडी  महारथी वर काशिराज  धनुधारी 

       धृष्टद्युम्न  राजा विराट व अपराजित सात्यकि  ने-।17।

       महाबाहु  सौभद्र   द्रौपदी-पुत्र  महीप  द्रुपद भी

       शंख   बजाए  अपने  अपने  घोर नाद -सा करते  ।18।

 

      शंखों का यह भयद घोष  गूँजा भू-नभ दोनों में

       चीरा हृदय धार्तराष्ट्रों6 का घोर  तुमुल  नादों ने ।19।

       राजन! तदनंतर मोर्चों पर देख  डटे कुरुजन को

       युद्ध छेड़ने  हेतु कपिध्वज7  निज गांडीव उठाए ।20।

       और महीपत!8 हृषीकेश से कहा वचन यह स्थिर

       अच्युत!9खड़ा करें रथ मेरा मध्य उभय सेना के ।21।

       जब तक देख न लूँ मैं इन युद्धेच्छु खडे़ वीरों को

       योग्य  मुझे लड़ना किनसे है रण में  मैं भी जानूँ ।22।

        दुष्टबुद्धि  दुर्योधन  के इन  युद्ध-हितू  मित्रों  को

       उतावले लड़ने आए जो उनको  थोड़ा समझ लूँ ।23।

संजय ने आगे कहाः

        यों कहने पर गुडाकेश10 के हृषीकेश11ने भारत!12  

       उत्तम रथ अपना ले जाकर मध्य उभय  सेना के ।24।

       खड़ा किया सामने पितामह द्रोण महीपतियों के

       और कहा तू देख पार्थ! इन युद्धेच्छुक कुरुओं को ।25।

       तब देखा उस उभय  सैन्य में वहां पार्थ ने,ताऊ                                                       

       पुत्र  पौत्र  दादा मामा  आचार्य भ्रातृ मित्रों को ।26।

       उन्हें  सुहृद  व ससुर दिखे उस सेना में  युद्धातुर      

       देख वहाँ कौंतेय13उपस्थित सभी बंधुओं को तब।27।

       कहा कृष्ण से शोकयुक्त हो अति करुणा से भर के

अर्जुन ने कहाः

       कृष्ण! सामने खड़े यहॉ युद्धेच्छु देख अपनों को- ।28।

       शिथिल  हो रहे अंग मेरे  है सूख रहा मुख मेरा

       कॉंप   रहा   सारा  शरीर  तन  रहे  रोंगटे  मेरे ।29।      

       छूट  रहा  गांडीव  हाथ  से दहक रही त्वचा  है

       भ्रमित हो रहा मन मैं हूँ  असमर्थ  खड़ा होने में ।30।

      केशव! देख रहा अपने  विपरीत यहॉं अपनों को

      मार गिराने में इनको पर श्रेय14न दिखता मुझको ।31।

      कृष्ण!चाहता नहीं राज्य मैं न ही जीत-सुख चाहूँ

      हमें लाभ क्या राज्य भोग  से व गोविंद! जीने से ।32।

      जिनके लिए चाहते हम सुख-भोग राज्य वे सारे

       छोड़ चाह जीवन धन की  हैं  खड़े  यहॉ युद्धातुर ।33।

      वे  आचार्य  पितामह  चाचा  पुत्र  पौत्र व  ताऊ

      मामा  साले   ससुर  सगे  संबंधी   यहॉं  डटे   हैं ।34।

       मुझे मार दें  भले ये, चाहता मैं न मारना इनको

      मुझे त्रिलोकी भी मिल जाए मधुसूदन! पृथ्वी क्या।35।

      इन धृतराष्ट्र-सुतों  को हत कर हमें हर्ष क्या होगा

      हत इन  आततायियों को हम पाप करेंगे जनार्दन! ।36।

      अतः नही हम योग्य कि इन धृतराष्ट्रसुतों को मारें

      माधव! अपने  कुटुम्बियों को मार  सुखी हों  कैसे ।37।

      यद्यपि  इनकी बुद्धि  लोभ  से भ्रष्ट,  नहीं ये देखें 

      पाप जो होता  मित्र-द्रोह से  कुल विनष्ट करने से ।38।

      तो भी जनार्दन! कुलक्षय से उत्पन्न दोष हम जानें

      बचने को इस पाप-कर्म से क्यों न सोचना चाहें? ।39।

      हो जाता  कुलधर्म सनातन नष्ट क्षरण से कुल के         

      धर्म  नष्ट  होने  से  कुल  में पाप व्याप्त हो जाता ।40।

      कृष्ण!  अधर्म बढ़ने से  होतीं कुल-स्त्रियॉं दूषित

      वार्ष्णेय! स्त्रियॉं  मलिन तो कुलज15 वर्णसंकर हों ।41।

      ले  जाते  कुल   कुलघ्न  को नरक  वर्णसंकर ये

      बंचित श्राद्ध और तर्पण से पितर पतित हों इनके ।42।

      इन्हीं   वर्णसंकरकारक   दोषों  से  कुलघाती  के

      हो जाते हैं  जाति-धर्म कुल-धर्म विनष्ट सनातन ।43।

 

       जिनके हों कुलधर्म जनार्दन! नष्ट मनुष्यों को उन 

       होता नरकवास  चिर ऐसा  सुनते  हम आए  हैं ।44।

       अहो खेद यह महा पाप करने का हम निश्चय कर                                     

       उद्यत हैं सुख राज्य-लोभ से अपनों को हतने को ।45।

       मुझ-निरस्त्र16सामना-विरत17को धार्तराष्ट्र18 ये सारे                                           

       मारें लेकर  अस्त्र  हाथ में   तो भी शुभ है  मेरा ।46।   

# अनु०इस तरह विषाद से ग्रस्त अर्जुन दुविधा में पड़ गए-लडूँ या न लडूँ. वह लड़ने से विरत हो अपने धनुष-बाण त्याग कर उदास-मन रथ में पीछे बैठ गएः

संजय ने कहा:

        इसप्रकार कह युद्धभूमि में शोक-उद्विग्न हो अर्जुन

       बैठ गए पीछे रथ में  वर धनुष बाण तज अपना ।47।           

         अर्जुनविषादयोग नाम का पहला अघ्याय समाप्त 

 शब्दार्थ :   1. याद दिलाने के लिए  2. भीम के संरक्षण में 3,4. शंखों के नाम 5. बड़े पेट वाले 6. धृततराष्ट्र के पुत्र 7. अर्जुन 8. राजा धृतराष्ट्र 9. अर्जुन 10.अर्जुन 11. कृष्ण 12. धृतराष्ट्र 13. अर्जुन 14. भलाई 15. कुल में उत्पन्न 16.  अस्त्रविहीन 17. लड़ने से विरत 18. धृतराष्ट्र के पुत्र

प्रेषक:

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव 

email- sheshnath@gmail.com 

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