वर्तमान में बातों का घालमेल करना इतना आसन हो गया है कि किसी भी बात पर सहसा विश्वाश नहीं होता. अब डाक्टर संचेती को पद्म पुरस्कार मिला तो एक नया मसला खड़ा हो गया. उनपर आरोप लग गया कि उनहोंने अन्ना को गलत दावा दे दी जिससे उनकी सेहत ख़राब हो गई. अन्ना को आज कहना पड़ा कि नहीं उन्होंने गलत दवा नही दी .अब किसपर विश्वास किया जाय किसपर नहीं. आज यह आम प्रवृति बन गई है. समाज का ढांचा ही ऐसा बन गया है जिसमें यह प्रवृति निरादृत नहीं मानी जाती. कई बार ऐसा लगता है कि यह जानबूझ कर .किया जाता है. यह प्रवृति शीर्ष से लेकर निचले पायदान तक देखी जाती है. स्वस्थ समाज के निर्माण में इस प्रवृति का बना रहना घातक है.
Tuesday, 31 January 2012
Thursday, 26 January 2012
बीमारी से उठने के बाद अन्ना ने अपना आन्दोलन फिर से शुरू कर दिया है. यह एक अच्छी खबर है.इस आन्दोलन को देश में एक नैतिक वातावरण भी बनाना है. आज की राजनीति उच्छ्रिंखल हो गई है. और
राजनीतिक लोग राजनीतिबाज. देखने में तो यह भी आता है की आज राजनीति एक धंधा बनकर रह गई है.
अतः इस आन्दोलन में अन्ना जी को फूंक फूंक कर कदम रखना होगा. वाणी का असंयम बुरा परिणाम भी ला सकता है. यहाँ तक की मजाक में कही गई बात भी जहर का काम कर सकती है. आज का राजनीतिक वातावरण भी जहरीला हो गया है. कुछ कुछ वैसा ही जैसा इंदिरा गाँधी के समय में हो गया था. तब जे. पी की भी
चरित्रहत्या से परहेज नहीं किया गया था.
अन्ना की टीम भी ठीक ही कर रही है. यह उन्ही उम्मीदवारों को वोट न देने की अपील कर रही है जो भ्रष्टाचार
के विरोध में हों और मजबूत लोकपाल के पक्ष में हो. अन्ना का यह विचार की ग्रामसभा संसद के ऊपर हो सुनाने में तो अच्छा लगता है पर इसका रूप क्या होगा दिमाग में स्पष्ट तौर पर उभर उभर पाता. इसके लिए
बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ेगी.एक कानूनविद की तरह अन्ना जी को इसका ढांचा अपने दिमाग में रखना होगा.
Wednesday, 4 January 2012
आन्दोलन थमेगा नहीं
अन्ना का आन्दोलन थमता सा लग रहा है. उनकी टीम में अगली पंक्ति के लोगों का व्यक्तित्व उतना प्रभावशाली नहीं है.उनकी विश्वसनीयता पर भी उंगलियाँ उठाई जा चुकी हैं. ख़ुशी की बात है कि टिप्पड़ियों की उत्तेजना से ये बच निकले हैं. मेरे मन के किसी कोने में यह विश्वास अभी बना हुआ है की टीम अन्ना इस आन्दोलन को विखरने नहीं देगी . थोडा समय अधिक भले ही लग जाये.
Monday, 26 December 2011
नाना जी के साथ अन्ना का फोटो
अन्ना के आन्दोलन ने राजनीति के वर्तमान स्तर को उघाड़ कर रख दिया है. सिंडिकेट की कोख से जन्मी इंदिरा-कांग्रेस ने बाड़ लगाकर जिन्हें एकता का पाठ पढ़ाया था आज वे उच्छ्रिन्खल हो गए हैं. होना ही था. क्योंकि इंदिरा गाँधी ने स्वतंत्रता और और स्वाभिमानी लोगों को राजनीति से दूर रखने की परंपरा डाल दी थी. आज यह परंपरा अपने चरम पर है. अन्य दल अन्ना की आलोचना में कुछ मर्यादा का भी ख्याल रखते हैं लेकिन कांग्रेसियों के लिए मर्यादा कोई मायने नहीं रखती. बेनीप्रसाद वर्मा द्वारा अन्ना की आलोचना कुछ इसी प्रकार की है. अरविन्द केजरीवाल का त्वरित जवाब भी उस कछुए के जवाब की तरह है जिसे बगुले उड़ा ले जा रहे थे.चरवाहों के जवाब में कछुए ने जब मुंह खोला तो उसका क्या हश्र हुआ कहने की आवश्यकता नहीं. हाँ किरण बेदी ने जो फोटो ट्विट किया है वह समयोचित है. देखना है कि नाना जी के साथ अपना फोटो देख कर दिग्विजय सिंह क्या प्रतिक्रिया देते हैं.
नाना जी के साथ अन्ना का फोटो होना इस बात का सबूत नहीं है कि वह आर एस एस से सम्बंधित होंगे
ही. अब तो यह भी साफहो गया है कि सन अस्सी के बाद नाना जी सामाजिक kaaryakarta हो गए थे. नाना
जी के साथ उनका फोटो में होना सामाजिक कार्यकर्ता का का भी सबूत हो सकता है.
नाना जी के साथ अन्ना का फोटो होना इस बात का सबूत नहीं है कि वह आर एस एस से सम्बंधित होंगे
ही. अब तो यह भी साफहो गया है कि सन अस्सी के बाद नाना जी सामाजिक kaaryakarta हो गए थे. नाना
जी के साथ उनका फोटो में होना सामाजिक कार्यकर्ता का का भी सबूत हो सकता है.
Sunday, 18 December 2011
BAT ANNAON SE
अन्ना के पिछले अनशन के दौरान उनके समर्थकों ने अपने माथे पर " मैं भी अन्ना हूँ " का पट्टा बांध रखा
था. ये अन्ना उसी जनमानस के हिस्से हैं जो सांसदों को चुनते हैं.
ये सांसद संसद का सदस्य होने के पूर्व पार्टियों के उम्मीदवार होते हैं . इन उम्मीदवारों में इन अन्नाओं में से
भी कोई हो सकता है .अतः इन्हें स्वयं नैतिकता को भी साधना पड़ेगा. व्यवस्था को बदलने के साथ आदमी
का प्रयोग भी साथ साथ ही साधना होगा .गाँधी ने पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नैतिकता का बारीकी से
ध्यान रखा था. जयप्रकाश नारायण को इसके लिए समय नहीं मिला. जे पी आन्दोलन साथ देने वाले ये नैतिक से दिखनेवाले लोग मछली पकड़ने के लिए ध्यान लगाये बगुले की तरह सत्ता पाने का साधन भर बना बैठे.
अन्ना समर्थक इन अन्नाओं के साथ भी यह खतरा बना हुआ है. देश को नैतिक बल देने वाली कोई नैतिक
ताकत देश में दिखाई नहीं देती .अन्ना को aur इन अन्नाओं को इस पर भी काम करना पड़ेगा .
था. ये अन्ना उसी जनमानस के हिस्से हैं जो सांसदों को चुनते हैं.
ये सांसद संसद का सदस्य होने के पूर्व पार्टियों के उम्मीदवार होते हैं . इन उम्मीदवारों में इन अन्नाओं में से
भी कोई हो सकता है .अतः इन्हें स्वयं नैतिकता को भी साधना पड़ेगा. व्यवस्था को बदलने के साथ आदमी
का प्रयोग भी साथ साथ ही साधना होगा .गाँधी ने पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नैतिकता का बारीकी से
ध्यान रखा था. जयप्रकाश नारायण को इसके लिए समय नहीं मिला. जे पी आन्दोलन साथ देने वाले ये नैतिक से दिखनेवाले लोग मछली पकड़ने के लिए ध्यान लगाये बगुले की तरह सत्ता पाने का साधन भर बना बैठे.
अन्ना समर्थक इन अन्नाओं के साथ भी यह खतरा बना हुआ है. देश को नैतिक बल देने वाली कोई नैतिक
ताकत देश में दिखाई नहीं देती .अन्ना को aur इन अन्नाओं को इस पर भी काम करना पड़ेगा .
DESH KE ANNAON SE
समय आ गया है कि देश के अन्नाओं से बात की जाए. यह सही है कि लोकपाल बिल संसद को ही बनाना है.
और ये सांसदों के विवेक पर हमला भी करते हैं. ये भूल जाते हैं कि ये संसद भी हमारे ही बीच से गए हैं. और
सांसद चुने जाने के पूर्व ये पार्टियों के चुने हुए होते हैं. और ये यह भी जानते हैं कि पार्टियों से टिकट पाने के लिए
कितनी मारामारी होती है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इन टिकटार्थियों में इन अन्नाओं में से कोई नहीं होगा.
अतः अन्ना का साथ देने वाले इन अन्नाओं को अन्ना के प्रति वैसा वैसा ही डिवोसन पैदा करना पड़ेगा जैसा
गाँधी के प्रति गांधीवादियों का था. अन्ना को भी अपने विचार और भाषा पर ध्यान देना होगा. क्योंकि अन्ना और उनके अन्नाओं को यह भी करना है कि देश में एक नैतिक धारा भी बहने लगे.
देश में एक नैतिक क्रांति की अत्यंत आवश्यकता है. गाँधी युग में गाँधी के नाते जो नैतिक धारा बही उसीका नतीजा था की जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रथम राष्ट्रपति के चुनाव में अपना मनचाहा नहीं करा सके . नेहरू जी
राजेंद्र प्रसाद को पसंद नहीं करते थे wah अपने pichhe चलाने वाले को ही इस इस पर देखना चाहते थे.लेकिन उस समय के सांसदों की नैतिकता और seewabhiman ne
और ये सांसदों के विवेक पर हमला भी करते हैं. ये भूल जाते हैं कि ये संसद भी हमारे ही बीच से गए हैं. और
सांसद चुने जाने के पूर्व ये पार्टियों के चुने हुए होते हैं. और ये यह भी जानते हैं कि पार्टियों से टिकट पाने के लिए
कितनी मारामारी होती है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इन टिकटार्थियों में इन अन्नाओं में से कोई नहीं होगा.
अतः अन्ना का साथ देने वाले इन अन्नाओं को अन्ना के प्रति वैसा वैसा ही डिवोसन पैदा करना पड़ेगा जैसा
गाँधी के प्रति गांधीवादियों का था. अन्ना को भी अपने विचार और भाषा पर ध्यान देना होगा. क्योंकि अन्ना और उनके अन्नाओं को यह भी करना है कि देश में एक नैतिक धारा भी बहने लगे.
देश में एक नैतिक क्रांति की अत्यंत आवश्यकता है. गाँधी युग में गाँधी के नाते जो नैतिक धारा बही उसीका नतीजा था की जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रथम राष्ट्रपति के चुनाव में अपना मनचाहा नहीं करा सके . नेहरू जी
राजेंद्र प्रसाद को पसंद नहीं करते थे wah अपने pichhe चलाने वाले को ही इस इस पर देखना चाहते थे.लेकिन उस समय के सांसदों की नैतिकता और seewabhiman ne
Saturday, 17 December 2011
anna ka aandolan aur sarkar
अन्ना अपने आन्दोलन को परिणाम तक पंहुचाना चाहते हैं. यह आन्दोलन अब जनांदोलन का रूप लेता जा रहा है. अन्ना ने जो मांग रखी हैं वे किसी संस्था के कर्मचारियों की मांग नहीं हैं. यह जनता की मांग है. जनता भ्रष्टाचार से बहुत पीड़ित है. यहाँ तक की जिन प्रतिनिधियों को वह सांसदों के रूप में चुन कर भेजती है वे भी उसके मालिक बन बैठते हैं और भ्रस्ताचार दूर करने के बजाय और लिप्त होते जाते हैं.
सरकार का दृष्टिकोण इस आन्दोलन के प्रति स्वस्थ नहीं है. इसके बिरोध में वह अजीब अजीब तर्क पेश करती जा रही है.कहती है कानून बनाना संसद का कम है लेकिन अन्ना की टीम कानून तो न कानून बना रही है न इसे लागू करने को कह रही है. वह तो सख्त लोकपाल बिल के लिए अपना एक ढांचा भर दे रही है. संसद के सांसदों को संसद के बहार का आदमी ही चुनता है. अब ये ही लोग एक संजीदा व्यक्ति के नेतृत्व में अपनी मनसा को सरकार के समक्ष रखती है तो उस व्यक्ति को बाहरी करार देकर संसद के काम में हस्तक्षेप मानती है. यह उचित नहीं जन पड़ता. जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन पर भी इंदिरा सरकार ने भी ऐसे ही ओछे आरोप लगाये थे. और जे पी को आवारा लफंगों से निपटने वाली धरा में गिरफ्तार किया गया था. यह सरकार और इस सरकार के लोग भी अन्ना पर बड़े ही ओछे और अशिष्ट आरोप लगते जा रहे हँ.
सरकार लाख कोशिश कर ले इसे दबाने या कुचलने का. यह आन्दोलन रंग layega hi
सरकार का दृष्टिकोण इस आन्दोलन के प्रति स्वस्थ नहीं है. इसके बिरोध में वह अजीब अजीब तर्क पेश करती जा रही है.कहती है कानून बनाना संसद का कम है लेकिन अन्ना की टीम कानून तो न कानून बना रही है न इसे लागू करने को कह रही है. वह तो सख्त लोकपाल बिल के लिए अपना एक ढांचा भर दे रही है. संसद के सांसदों को संसद के बहार का आदमी ही चुनता है. अब ये ही लोग एक संजीदा व्यक्ति के नेतृत्व में अपनी मनसा को सरकार के समक्ष रखती है तो उस व्यक्ति को बाहरी करार देकर संसद के काम में हस्तक्षेप मानती है. यह उचित नहीं जन पड़ता. जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन पर भी इंदिरा सरकार ने भी ऐसे ही ओछे आरोप लगाये थे. और जे पी को आवारा लफंगों से निपटने वाली धरा में गिरफ्तार किया गया था. यह सरकार और इस सरकार के लोग भी अन्ना पर बड़े ही ओछे और अशिष्ट आरोप लगते जा रहे हँ.
सरकार लाख कोशिश कर ले इसे दबाने या कुचलने का. यह आन्दोलन रंग layega hi
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