Thursday, 12 February 2026

12-02-2026   


ब्लॉग-07

श्रीमद्भगवद्गीता

                                सातवॉं अध्याय

कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि संदेहरहित होकर परमेश्वर का ज्ञान कैसे प्राप्त होगा? वह कहते हैं- इस संसार में मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं है. पुरुष व प्रकृति से समन्वित यह सृष्टि मेरा ही पर व अपर रूप है. माया के परे के मेरे इस अव्यक्त रूप को पहचान कर जो मुझे भजते हैं, उनकी बुद्धि सम हो जाती है. वह पूर्णरूप से मुझे जान लेते है. जीवन खंड में नहीं अखंड में है.

# हिन्दी पद्यकार०-भगवान अर्जुन को सृष्टि के रहस्य से भी परिचित कराते हैं-

श्री भगवान ने कहा:

      पार्थ!  मेरे  परायण मुझमें  चित्तलगा योग-रत  हो

       असंदिग्ध  जानेगा  जैसे  मुझे समग्रतः  उसे  सुनो ।1।

       कहूँगा मैं  विज्ञानसहित  यह ज्ञान तुझे  पूर्णता से

       जिसे जान कुछ और न रहता शेष यहाँ जानने को ।2।

       कोई  एक  सहस्रों में  मुझे  पाने  हेतु  यत्न करता 

       इन प्रयत्नरत  सिद्धों में मुझे  एक यथार्थ  से जाने ।3।

       पृथ्वी जल नभ अग्नि वायु मन  अहं  बुद्धि  में ऐसे

       आठ प्रकार से हुई विभाजित जानो मेरी प्रकृति है ।4।

       यह है अपरा1 प्रकृति मेरी तू जान प्रकृति परा2 भी        

       महाबाहु!3 धारता मैं जिससे इस सम्पूर्ण जगत को ।5।

       इन्हीं प्रकृतियों के जुड़ने से  समझ  हुए सब प्राणी

       सारे  जग  का  प्रलयरूप  उत्पत्तिरूप  हॅूं  मैं   ही  ।6।

 

      मेरे  सिवा  धनंजय!  कोई  कारण  परम  न  दूजा                     

       सूत्र  पिरोए4 मणियों-सा जग गुंथा  हुआ है मुझमें ।7।

       जल में  रस मैं  सूर्य चंद्र में  प्रभा  ओ३म्  वेदों में

       पुरुषों में  पुरुषत्व  शब्द  मैं  कुंति-पुत्र! नभ में  हूँ ।8।

       पृथ्वी में  हूँ  पूत गंध  मैं  तेजस  प्रखर  अनल  में 

       जीवन-शक्ति सभी  प्राणी  में तपस्वियों में तप मैं । 9। 

       पार्थ! सनातन बीज मुझे ही जान प्राणियों का सब

       मैं ही बुद्धि  बुद्धिमानों की तेज तेजस्वियों का भी ।10।

       भरतर्षभ! मैं बलवानों में बल हूँ कामासक्ति रहित5

       और काम  धर्मानुकूल जो सभी  प्राणियों में मैं ही ।11।     

       जान सत्व-रज-तम  से उपजे  भाव मुझी से  होते

       किंतु  नहीं  हूँ  मैं  उनमें  न  वे  मुझमें  स्थित   हैं ।12।

       इन  तीनों  गुणरूप भाव से मोहित  सर्व जगत है

       जाने  वह न  इनसे पर मुझ-अव्यय अविनाशी को ।13।

       यह   है  मेरी  त्रिगुणमयी  दैवी  माया  दुस्तरतर

       इस माया  से  तर  जाते जो  होते  मेरी  शरण में ।14।

       अर्जुन! भजते  चार तरह  के सत्कर्मी जन मुझको

       अर्थार्थी  जिज्ञासु  आर्त6  व  निष्कामी  भरतर्षभ! ।16।

       उनमें  भी  जो एकभाव रत7 एकभक्ति8 वे उत्तम

       मैं अत्यंत प्रिय उन्हें और हैं वे अत्यंत प्रिय मुझको ।17।

       ये सब  हैं उदार पर ज्ञानी   मेरे मत  स्वरूप मेरे         

       वह मुझसे अभिन्न दृढ़ स्थित उत्तम गति से मुझमें ।18।

       बहुजन्मों के  अंत जन्म में जान परम ही सबकुछ                            

       ज्ञानवान  भजते  मुझको,  ऐसे  दुर्लभ  महतात्मा ।19।

       जिन कामों11ने हरा10ज्ञान जिनका,उसकी ही शर्तें

      मान स्वभाव से प्रेरित निज वे अन्य देव को भजते ।20।

       जो-जो भक्त  देव जिस जिस के रूप पूजना चाहे

       उसी देव में मैं उस-उस की  श्रद्धा  थिर  कर देता ।21।

       उस श्रद्धा  से जुड़  सकाम वे  वही  देव आराधें

       होती  पूर्ण  कामना  उनकी  विहित12 की  हुई मेरी ।22।

       पर उन  अल्पबुद्धि लोगों का  नाशवान फ़ल होता

       देव   भजे   देव  को पाते  पाते मुझे  भक्त  मेरे ।23।

       जिसे ज्ञात  न  सर्वश्रेष्ठ अविनाशी मेरा भाव परम   

       मुझ-अव्यक्त  को  बुद्धिहीन  वे मानें नर तनधारी ।24।      

       ढॅका  योगमाया से  मैं होता न  प्रकट  सब-आगे13  

       मूढ़़ जानते  नहीं  ठीक   मुझ-अजन्मा  अव्यय को ।25।

       अर्जुन! जो हो चुके  आज हैं  और जो  होंगें  आगे 

       मैं उन सबको जान रहा पर  वे  सब मुझे न जानें ।26।

       समुत्पन्न14 द्वेष  इच्छा से  द्वंद्व-मोह  में भारत!

       प्राप्त हो रहे जन्म मरण को प्राणी सकल परंतप!15।27।

       नष्ट हो गए  पाप  सभी जिन पुण्यकर्तृ16  पुरुषों के

       द्वंद्व-मोह से रहित व्रती वे भजें मुझे  दृढ़ता  से ।28।

       जरा मरण से मुक्ति  हेतु जो यत्न करे मुझ-आश्रित

       लेते जान ब्रह्म अध्यात्म व अखिल कर्म को सब वे ।29।

       साधिभूत अधिदैव सहित जो साधियज्ञ मुझे17जाने

       मुझमें  चित्त  किए वे जानें  मुझको अंत समय भी ।30।

        ज्ञानविज्ञानयोग नाम का सातवॉं अध्याय समाप्त

1. जड़ 2. चेतन 3. अर्जुन 4. धागे में गुंथे हुए 5. काम रहित 6. दुखी  7. मुझमें एक भाव से लीन 8. अनन्य भक्ति वाला 9. परमात्मा 10. हर लिया गया 11. भोगों 12. रची गई 13. सबके आगे 14. सामान रूप से जन्मे 15. अर्जुन 16. पुण्य करने वालों 17. सबका आत्मरूप 

Wednesday, 4 February 2026

 



03-02-2026

ब्लॉग-6

श्रीमद्भगवद्गीता

                                   छठा अध्याय

कृष्ण ने कर्मयोग की सिद्धि के लिए समबुद्धि (सबको समान रूप से देखने वाली बुद्धि) के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया है. वह समबुद्धि प्राप्त करने के उपायों को भी बताते हैं. वह कहते हैं. सच्चा योगी व संन्यासी वही है जो कर्मफल की आशा रखे बिना स्थिर समबुद्धि से संसार के कर्मों को अपना कर्तव्य समझ कर करता रहे. बुद्धि स्थिर करने के लिए इंद्रियनिग्रहरुपी कर्म और योग का अभ्यास वह स्वयं करे. जिसकी आत्मा योग से युक्त व दृष्टि सम होती है वह सभी प्राणियों को अपने में और सभी प्राणियों में अपने को देखता है. योग कभी विनष्ट नहीं होता समबुद्धिरुपी योग एक जन्म में सिद्ध न हो तो पूर्वजन्म के संस्कार ही पूर्वागत जन्म के अभ्यास को आगे बढ़ा देते हैं जिससे सिद्धि मिल जाती है.

# हिन्दी पद्यकार०- फिर प्रभु ने अर्जुन को बताया कि बुद्धि कैसे सम हो व योग कैसे सिद्ध होः

श्री भगवान ने कहा:    (योगी अर्थात कर्मयोगी)

      जो करता करणीय कर्म  बिन चाहे कर्म-फ़लों को

      वह  है सन्न्यासी योगी, न क्रिया अग्नि  का त्यागी1 ।1।

      कहें  जिसे सन्न्यास समझ तू कर्मयोग  वह पांडव!

      संकल्पों  को  त्यागे बिन  होता न  कोई  योगी  है ।2।

      योगेच्छुक मुनि हेतु, कहा निष्काम कर्म है साधन

      योगारुढ़2  पुरुष हित  शम3 है  हेतु कर्म  का आगे ।3।

      इन्द्रिय के भोगों कर्मों में जब वह हो आसक्त नहीं

      त्यागी  तब  सब  संकल्पों  का  योगारुढ़  कहाता ।4।

     मनुज  करे  उद्धार स्वयं का नहीं गिराए निज को

      क्योंकि बंधु आप वह  अपना और शत्रु भी अपना ।5।

      जीता जिसने स्वयं स्वयं को बंधु स्वयं वह अपना

      जो न  आप  अपने को जीते  शत्रु बने  अपना ही ।6।

      जिसकी अंतःवृत्ति शांत मानापमान  सुख-दुख में

      व सर्दी  गर्मी  में  पाता  नित्य  परम  आत्मा को ।7।

     ज्ञानविज्ञान से तृप्तात्मा जो निर्विकार,विजितेन्द्रिय4

     मिट्टी स्वर्ण अश्म5 जाने सम,योग-युक्त6  कहलाता ।8। 

      मित्र सुहृद7 अरि उदासीन8 मध्यस्थ बंधु पापात्मा

      साधु द्वेष्य9 में बुद्धि रखे सम वह अतिश्रेष्ठ मनुजहै ।9।

        इच्छाविरत विमुख संग्रह से व अंतः मन वश कर

      योगी  एकाकी  एकांत  हो  मन को रखे  परम में ।10।

      शुद्ध भूमि में जिसपर कुश मृगछाला वस्त्र विछे हों                                  

      कर स्थिर स्थापित आसन जो अति ऊॅंच न नीचा ।11।                     

      उस आसन पर बैठ क्रियाएँ चित्तेंद्रिय की वश कर           

      आत्मशुद्धि  हित करें एकमन योगाभ्यास निरंतर ।12।  

        काया सिर ग्रीवा सम धारे अचल और  स्थिर हो

        इधर उधर न  देख  देखते  नासिकाग्र  थिर  बैठे ।13।

       ब्रह्मचारिव्रत10 में स्थित जो आत्मशांत व निर्भय

        मन  संयम्य11 चित्त मुझमें  कर बैठे  मेरे परायण ।14।

        योगी कर मन को वश ऐसे सदा लगा मन प्रभु में

        मुझस्थित निर्वाण परम की शांति प्राप्त कर लेता ।15।

        अर्जुन! जो खाते अतिशय या खाते नहीं तनिक भी

        अति सोते हों या जगते हों  सिद्ध न योग उन्हें हो ।16।

       होता सिद्ध  योग  दुखनाशक यथायोग्य जो करते 

        सोना जगना कर्म-आचरण12नपातुला आहारविहार ।17।

       वश में किया चित्त जब होता परमात्मा में स्थित

       तब सब भोगों13 से निस्पृह नर कहलाता है योगी ।18।

      दीए  की लौ  ज्यों अकंप हो  वायुरहित स्थल पर

      करता त्यों अभ्यास योग का मन संयत कर योगी ।19। 

       जिस स्थिति में मन निरुद्ध हो शांत योग सेवन से 

       जिसमें कर साक्षात परम14का होता तुष्ट परम में ।20।

       बुद्धिग्राह्य  इंद्रियातीत जो आत्यंतिक  सुख योगी   

       जाने जिस स्थिति में उसमें स्थित हुआ न विचले ।21।

       जिस स्थिति को पा योगी को रुचता लाभ न दूजा                                 

     और जहां स्थिर होने से अति दुःख भी न डिगाए ।22।

      उसको दुख-स्पर्श-वियोग15या योग कहा है जानो 

      उसे चाहिए करना निश्चित  बिना चित्त  उकताए ।23। 

      त्याग सभी  नि:शेषरूप  संकल्पजनित भोगों को

      मन द्वारा  इंद्रिय-समूह  को  सभी ओर से वशकर ।24।

      धैर्ययुक्त-बुद्धि  द्वारा वह शनैः-शनैः16 उपरत17 हो

      मन को कर स्थिर अपने में  कुछ भी करे न चिंतन ।25।

      जहॉं जहॉं  अ-स्थिर चंचल मन विचरण करता है

      वहॉं  वहॉं से  रोक उसे  वह  परमात्मा  में लगाए ।26।

      जिसका मन  है  शांत पाप भी नष्ट शांत रजोगुण

      ऐसे  ब्रह्मभूत  योगी  को  उत्तम सु ख  मिलता  है ।27।

      ऐसे  करता योग-अभ्यास नित छूट पाप से  योगी   

      ब्रह्म-योग से प्राप्त सुखों का सुख से अनुभव करता ।28।

       आत्मा जिसकी  योगयुक्त है वह सबको  सम देखे   

       निज को   सब भूतों18 में देखे सब भूतों  को निज में।29।

      जो मुझको  सर्वत्र  देखता  और सभी  को मुझमें

       मेरे लिए अलोप19नहीं वह उसके हेतु अलोप न मैं ।30।

       सर्वप्राणि-स्थित  मुझको जो एक भाव हो भजता

       सब  कुछ  बरत रहा भी योगी मुझमें बरत रहा है ।31।

       अर्जुन!  जो अपनी उपमा  दे सभी जगह सम देखे                       

       वैसा  ही देखे  सुख या दुख  श्रेष्ठ  परम  योगी वह ।32       

# हि. प०- भगवन! मन चंचल हठी और बली है इससे समत्व योग कैसे सधेगा?

अर्जुन बोले:    

      मधुसूदन! यह  साम्य  भाव से योग  कहा जो तूने

       मैं न देखता, चंचल मन है, योग  यह  संभव होगा ।33।

       क्योंकि कृष्ण! मन चंचल प्रमथी20जिद्दी और बली है

       मैं   मानता  रोकना  इसका  कठिन  वायु  के जैसा ।34।

# हि.प०- भगवान  ने उन्हें आश्वस्त किया कि अभ्यास व वैराग्य से मन का निग्रह हो जाता है-

श्री भगवान ने कहा :

       निस्संदेह  चित्त  चंचल है  महाबाहु!  निग्रह दुष्कर

        कुन्तीपुत्र! अभ्यास वैराग्य से  पर  हो जाता निग्रह ।35।

        योग उसे दुष्प्राप्य मेरे मत स्ववश नहीं मन जिसका

       वशीचित्त21  साधक प्रयत्न कर योग उपाय से पाता ।36।

# हि.प०- अर्जुन ने भगवान से पूछा- श्रद्धा से भरे साधक को यदि योग सिद्ध न हो अर्थात वह योग से भ्रष्ट हो जाए तो वहकिस गति को प्राप्त होता है?

अर्जुन ने पूछा:

      श्रद्धा22  हो पर कृष्ण! असंयम से मन योग-विचल हो             

       योगी योगसिद्धि  को न  पा  किस गति को  पाता है ।37।

       महाबाहु!23वह जगत-निराश्रय और ब्रह्म-पथ-मोहित             

       दुहूँ ओर से भ्रष्ट हो होता छिन्न अभ्र-सा24 नष्ट तो न! ।38।

       मेरे इस संशय-छेदन25  में कृष्ण!  सर्वथा  क्षम तू ही  

       तुझे  छोड़ छिन्न कर  सकता  कोई न इस संशय  को ।39।

# हि.प०-भगवान ने कहा- वे योगी पूर्वजन्म के अभ्यास के प्रभाव से अगले जन्म में भी सिद्धि पाने का यत्न करते हैं- अर्जुन तू भी योगी हो जा-

श्री भगवान ने कहा:

      नाश न उनका  पार्थ!  लोक  में या न  लोक परे में

       तात!   नहीं  दुर्गति  पाते  कल्याणकर्म   जो  करते ।40।

       पुरुष  योग  से  भ्रष्ट  प्राप्त  हो  लोक  पुण्यवानों के 

       रह कर  वर्षों वहॉं  जन्मता घर में शुद्ध26 श्रीमन के ।41।

       या वह लेता  जन्म  योगियों  ज्ञानवान  के  कुल में 

       इस  प्रकार का जन्म  लोक में यहॉं  बहुत दुर्लभ  है ।42।

       अनायास  संस्कार  बुद्धि27  का   पूर्वजन्म  का  पाता

       उस प्रभाव से अधिक प्राप्ति  का यत्न  करे कुरुनंदन! ।43।            

       खिंचे28 परम  में पूर्व अभ्यास से योगभ्रष्ट अवश वह  

       साम्ययोग - जिज्ञासु29 वेद के  काम्य-कर्म को लांघे ।44।

       योगी जो सयत्न अभ्यासरत जन्म अनेक से सिद्ध हुआ     

       और  पाप से  शुद्ध  हुआ  इस जन्म परमगति पाता ।45।                      

       योगी  श्रेष्ठ तापसों  से  है श्रेष्ठ  ज्ञानियों  से भी                  

       बढ़ सकाम कर्मियों से भी  अर्जुन! हो जा योगी ।46।

          तदपि  योगियों में भी सारे उत्तम सिद्ध मैं समझूँ

          उसे मुझे  जो अंतः में  रख  श्रद्धा  से  भजता  है ।47।            

        आत्मसंयम (ध्यान)योग नाम का छठॉं अध्याय समाप्त

1. केवल अग्नि और क्रियाओं को त्यागने वाला 2. पूर्ण योगी हो गए 3. शान्ति  4. इन्द्रियों को जीत लिया है 5. पत्थर 6. भगवान् को प्राप्त 7. सखा 8. पक्षपातरहित 9. वैर रखने वाला 10. ब्रह्मचारी के व्रत 11. संयम कर 12. कर्मों में चेष्टा 13. वासनाओं 14. परमात्मा 15. दुख्ररूपी संसार के संयोगों से अलगाव 16. धीरे धीरे 17. विरक्त 18. प्राणियों को 19. अदृश्य 20. दुःख देने वाला 21. जिसका चित्त वश में हो 22. योग में श्रद्धा 23. कृष्ण 24. बादल-सा 25. संशय को मिटाने में 26. शुद्ध आचरण वाले 27. समबुद्धि का संस्कार 28. आकर्षित 29. समतारूपी योग में इच्छुक

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

७१५, पार्वतीपुरम, चकसाहुसेन,

बशारतपुर, गोरखपुर, २७३००४

Email- sheshnath@250gmail.com