31-01-2026
ब्लॉग-5
श्रीमद्भागवद्गीता
पॉंचवॉ अध्याय
कृष्ण के, पहले कर्मसंन्यास की फिर कर्मयोग की प्रशंसा करने पर, अर्जुन असमंजस में पड़ गए. उन्होंने कृष्ण से उस एक निश्चित मार्ग को जानना चाहा जो उनके लिए कल्याणकर हो. कृष्ण ने कहा–‘कर्मयोग’ और ‘कर्मसंन्यास’ दोनों श्रेयस्कर हैं, किंतु कर्मयोग विशेष रूप से योग्य है. क्योंकि सब कर्म प्रकृति की ही क्रीड़ा है. ईश्वर (कोई निर्माता नहीं, एक रचनात्मक शक्ति) किसी से न कर्म करने को कहता है न कर्म छोड़ने को. कर्म के योग से युक्त हुए बिना, मनुष्य को संन्यास प्राप्त करना कठिन है.
# हिन्दी पद्यकार०-अर्जुन ने कृष्ण से उस एक निश्चित मार्ग को जानना चाहा जो उनके लिए श्रेयष्कर हो-
अर्जुन ने जानना चाहा:
कभी प्रशंसा कर्मसन्न्यास1की
कर्मयोग की कभी करे
उनमें से जो एक मेरे हित कृष्ण! कहो निश्चित कर ।1।
श्री भगवान ने बताया:
(योग-कर्मयोग, सांख्य-ज्ञानयोग )
कर्म-योग
व कर्म-सन्न्यास है दोनो मार्ग श्रेयस्कर
किंतु अपेक्षा
कर्म-सन्न्यास के कर्म-योग
है उत्तम ।2।
समझ नित्य-सन्न्यासी उसको जिसमें द्वेष न इच्छा
महाबाहु! जो द्वंद्वरहित, हो बंध-मुक्त2
सुखपूर्वक ।3।
कर्मयोग व सांख्य3
पृथक हैं कहें मूढ़ न कि पंडित
मनुज एक में भी सम्यक थित4 फल पाए दोनों का ।4।
पाते तत्व
ज्ञानयोगी
जो वही कर्मयोगी
भी
योग सांख्य को फल में देखे
एक, वही सच देखे ।5।
महाबाहु! बिन येाग सिद्ध सन्न्यस्त कठिन है होना
योगी
मननशील ब्रह्म को शीघ्र
प्राप्त
होता है ।6।
जिसका मन इंद्रियाँ
स्ववश हैं, अंतःकरण विमल है
सर्वात्मा5
हो आत्मा जिसकी लिप्त न कर्म कर योगी ।7।
माने यों
तत्वज्ञ सांख्ययुत6 कुछ भी
नहीं करे वह
छूने खाने
शयन
सूँघने श्वसन देखने चलने
में ।8।
ऑंखें खोल-बंद करने श्रुतिवाणी7 ग्रहण
विसर्जन में
बरत रहीं इन्द्रियाँ स्वयं ही निजनिज के विषयों
में ।9।
करके अर्पण कर्म ब्रह्म8 को अनासक्त जो कर्म करे
लिपायमान होता न पाप से पद्मपत्र से जल ज्यों ।10।
योगी करते
कर्म मात्र काया मन बुद्धि इंद्रियों से
अपनी
अंतःशुद्धि हेतु ही त्याग संग आसक्ति सभी।11।
योगी त्याग कर्मफल
अपने ब्रह्मरूप शम9 पाता
पुरुष सकामी
कामहेतु से फलासक्त हो बॅंधता ।12।
मन से त्याग सभी कर्मों को पुरुष जितेंद्रिय देही10
न कुछ कर
करा सुख से रहता नौ द्वारों11 के
पुर में ।13।
रचता प्रभु न कर्म लोगों
के और न कर्तृत्वों को
न ही कर्मफल-संयोगों12
को,प्रकृति बरतती इनको ।14।
प्रभु न लेता पाप किसी का और न पुण्य ही लेता
ढॅंका
हुआ है ज्ञान अज्ञान से मोहित जीव उसी से ।15।
जिनका
वह अज्ञान परम13 के तत्वज्ञान
से विनशा14
उनका
ज्ञान प्रकाशित करता सूर्य सदृश परम को ।16।
स्थिति जिनकी
परमात्मा में बुद्धि मनस तद्रूपी15
पापरहित
ज्ञान से हो, वे जन्म
पुनः न लेते।17।
विद्याविनययुक्त ब्राह्मण में
श्वान हस्ति गौ सबमें
और
श्वपच16 में ज्ञानी देखें परम
तत्व को एकल ।18।
अंतः जिनका
समस्थित17 जीते जी लोक
वे जीतें
क्योंकि
बह्म्र निर्दोष और सम17अतः ब्रह्म-स्थित वे।19।
जो न मुग्ध
प्राप्त हो प्रिय को न उद्विग्न पा अप्रिय
स्थिरबुद्धि असंशय वह ब्रह्मज्ञ ब्रह्म-स्थित
है ।20।
बाह्यविरक्त18
पुरुष पाता है ध्यानजनित19 अंतःसुख
ब्रह्मयोग20 में एक हुआ
वह अक्षय सुख पाता है ।21।
इन्द्रिय-विषय21 योग से उपजे भोग हेतु दुख के हैं
वे अनित्य कौंतेय! न रमते उनमें कभी
विवेकी ।22।
देहत्याग से
पूर्व जो सहने में समर्थ इस
तन में
काम-क्रोध से जगे वेग को
योगी वही सुखी है
।23।
जो आत्मा
में रमे आत्म में सुखी
आत्म में ज्ञानी
साधक वह है ब्रह्मरूप निर्वाणब्रह्म को पाता
।24।
जिनके संशय मिटे पाप मिट गए इंद्रियॉं वश में
सर्वप्राणि-हित में रत जो ऋषि परमब्रह्म को पाते ।25।
काम क्रोध से रहित चित्तजित
परमब्रह्म के साक्षी
ज्ञानी पुरुषों को सुप्राप्त है ब्रह्म सभी दिशा से
।26।
छोड़ बाह्य
भोग बाहर, कर दृष्टि बीच भौंहों
के
नथुनों में चलते अपान22 व प्राणवायु को सम कर ।27।
जिसकी
हैं इंद्रियॉं बुद्धि मन वश में
मोक्षप्रवृत23 जो
भय
इच्छा व क्रोधहीन जो मुनि वह मुक्त सदा है ।28।
सभी प्राणियों
का प्रेमी
व भोक्ता तप यज्ञों का
लोकमहेश्वर
जान मुझे
नर परम शांति को पाता ।29।
कर्मसंन्यासयोग नाम का पॉंचवॉं अध्याय समाप्त
1 कर्म का त्याग ( ज्ञानयोग) 2.संसार के बंधन से मुक्त 3. सांख्य या ज्ञान योग 4. स्थित 5. सभी प्राणियों की आत्मा 6. सांख्ययोगी 7. सुनने और बोलने में 8. ब्रह्म अर्थात परमात्मा को अर्पण 9. शान्ति 10. देहवान 11. दो आँखें, दो कान, नाक के दो छिद्र, गुदा मार्ग, मूत्रेन्द्रिय, मुख 12. कर्मफल पाने के संयोगों को 13. परमात्मा को 14. विनष्ट हो गया है 15. उसीके तरह की 16. चांडाल 16. समभाव में स्थित हो 17. समभाव 18. बाहरी विषय से विरत 19. परमात्मा के ध्यान से उत्पन्न 20. ब्रह्मरूपी योग 21. इन्द्रियों के विषय के रस 22. अशुद्ध वायु 23. मोक्ष में प्रवृत