Saturday, 28 February 2026

श्रीमद्भगवद्गीता-18

श्रीमद्भगवद्गीता


28-02-2026

ब्लॉग-18

 

            अठारहवॉं अध्याय

अर्जुन ने कृष्ण से अनेक प्रश्न पूछे. कृष्ण ने उनके उत्तर भी दिए. पर अर्जुन के मन को समाधान नहीं मिला. संन्यास और कर्मयोग में से किसे अपनाएँ, इसे लेकर उनके मन में उलझन बनी ही रही. कृष्ण ने उनसे जो भी कहा उसमें सन्न्यास और कर्मयोग दोनों की बातें हैं. किंतु उसमें संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग को अपनाने पर अधिक जोर है.  

     अपनी उलझन को दूर करने के लिए अर्जुन ने कृष्ण से संन्यास और कर्मयोग के तत्वों को अलग-अलग जानना चाहा. अर्जुन ‘त्याग’ का तत्व पूछ कर वस्तुतः कर्मयोग का तत्व पूछ रहे हैं. कृष्ण उन्हें समझाते हैं कि त्याग तीन प्रकार का होता है. इन तीनों में कर्मों के प्रति आसक्ति और फल पाने की इच्छा का त्याग ही सच्चा अथवा सात्विक त्याग है, क्योंकि कर्म प्रकृतितः किसी से छूटते नहीं हैं. पर कर्म के प्रति आसक्ति और फ़ल पाने की कामना छूट सकती है.

       यहॉ पूरी गीता का उपसंहार है- यहॉं अर्जुन को त्याग और संन्यास के तत्वों को बताने के पश्चात कृष्ण ने कर्म और मनुष्य के भिन्न प्रकार के भेद बता कर पुनः कर्म से लिप्त न रहने की विधि को स्पष्ट किया है. अंततः कर्म अकर्म का पूर्णतः ज्ञान हो जाने पर अर्जुन कृष्ण के कहने से नही अपनी इच्छा से युद्ध में प्रवृत हो गए.

अर्जुन ने पूछा:

        महाबाहु  जानना चाहता  मैं  संन्यास का  तत्व तथा        

       तत्व त्याग का केशिनिषूदन! हृषीकेश हे! अलग अलग ।1

श्री भगवान ने कहा

      कितने बुध1 जानें  सन्न्यास को  त्याग काम्यकर्मों का

      और  कई  सब  कर्म-फलों  का  त्याग, त्याग  कहते  हैं ।2

      कई  मनीषी  कहें  कर्म  सब  दोषयुक्त3  त्यागना सही  

      कई  कहें  तप यज्ञ  दान  के  कर्म  त्यागना  ठीक  नहीं ।3

      निश्चय  मेरा  भरतश्रेष्ठ4!  सुन  पहले  त्याग  विषय में   

      पुरुषव्याघ्रहे!  कहा  गया  है  त्याग  तीन  तरह  का ।4। 

      यज्ञ  दान तपरूप  कर्म  हैं  त्याज्य नहीं,  करने लायक

      तीनों  ही  तप यज्ञ दान  शुचि6  करते  मनीषियों  को ।5

      इन्हें तथा  अन्य   कर्मों   को  पार्थ!  चाहिए  करना    

      त्याग  आसक्ति  फलेच्छा को, मत मेरा श्रेष्ठ सुनिश्चित ।6।  

      त्याग  नहीं  है  उचित शास्त्र में  नियत किए कर्मों का

      करना  त्याग  मोह  से  उनका  तामस8  त्याग कहाता ।7

      दुख-सम  जान  कर्म  को, जो  डर  देह-कष्ट  से, त्यागे

      पाता  नहीं त्याग का फल वह रजस9 -त्याग करके भी ।8

      शास्त्र - नियत  कर्म  को  जो  कर्तव्य   जानकर  करते

      तज  आसक्ति फलेच्छा अर्जुन! त्याग वही सात्विक10है ।9

      जिसे न द्वेष अश्रेय11 कर्म से श्रेयकर्म12-आसक्त  न जो

      सत्वगुणी वह  बुद्धिमान  संशयविमुक्त  त्यागी  सच्चा ।10

# हिन्दी पद्यकार०-त्याग की स्थिति बताकर भगवान अब कर्म की स्थिति स्पष्ट करते हैं:

      संभव  नहीं  अशेष  त्याग  सब  कर्मों  का  मनुजों से   

      अतः  कर्म-फल  का  त्यागी  ही  त्यागी  कहा गया है ।11

      त्यागे जो  न  कर्म-फल उनको मृत्यु  बाद  भी  होता

      अच्छा बुरा मिश्र तीन फल, कभी13 न फलत्यागी को ।12

      कर्म  सिद्ध  होते  जिससे  तू  पॉंच  हेतु  जान  मुझसे

      महाबाहु!  कृतांत-सांख्य14  में कहे  गए  वे  विधिवत ।13।           

      इसमें15 कर्ता  अधिष्ठान व  करण16 विविध  तरह  के       

      अलग   अलग  चेष्टाएं  नाना,  दैव17 पॉचवा  कारण ।14।   

      कर्म  मनुष्य  जो  भी  करता  है  देह  चित्त वाणी  से

      शास्त्रविहित  या शास्त्रविमुख ये पॉच  हेतु  हैं  उसके ।15

      ये पॉंच  हेतु  होने  पर  भी  जो  लखे ‘आत्मा’  कर्ता

      दुर्मति  नहीं   ठीक  देखता  बुद्धि  अशुद्ध   है  उसकी ।16

      भाव नहीं  जिसमें  मैं  कर्ता’, बुद्धि  अलिप्त कर्मों से

      लोगों18 को  वह  मार मारता नहीं न पाप से बॅधता ।17

# हि.प०-भगवान बताते हैं कि ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता के जुड़ने से प्राणियों में कर्म प्रवृत्त होता है-

       ज्ञाता  ज्ञेय  ज्ञान  त्रिविध19  ये   कर्म-प्रेरणा   होती

       होता  त्रिविध  कर्म-संग्रह  भी कर्ता  करण  क्रिया है ।18

       गुणभेदों  से  तीन  प्रकार के  कर्ता  ज्ञान  कर्म  होते 

       कहे गए गुण-सांख्य20-शास्त्र  में सुनो यथावत मुझसे ।19।         

       पृथक पृथक  प्राणी में  देखे  जिससे एकभाव अव्यय,   

       अविभक्त  सत्ता  को, जानो  उसे  ज्ञान  तू  सात्विक ।20। 

       ज्ञान से जिस सब प्राणी में  नाना  विभिन्न भावों को 

       अलग अलग जानता मनुज वह  ज्ञान जान राजस है ।21

       किंतु ज्ञान एक ही बात में हो आसक्त ‘यही सब कुछ’   

       कारण बिना,अर्थ बिन समझे ज्ञान तुच्छ वह तामस ।22।   

       कर्म  रहित-कर्ताभिमान21 से और शास्त्रनिश्चित  जो    

       राग द्वेष बिन किया फलेच्छामुक्त पुरुष से, सात्विक ।23

       पर  जो  कर्म  भोग-इच्छा या  अहंकार  से  श्रम  से

       जाते   किए  मनुज   द्वारा  वे  राजस   कर्म  कहाते ।24

       बिन   सोचे  सामर्थ्य  हानि  हिंसा व  परिणामों को

       कर्म किया जाता जो  मोह  से  तामस  कर्म  कहाता ।25

       कर्ता रागरहित उत्साही अहं-वचन22 से शून्य सुधीर23

       सिद्ध-असिद्ध कार्य में रहता निर्विकार, वह सात्विक ।26

       रागी24 कर्म-फलेच्छु लुब्ध25जो हिंसा भरा अशुचि26है

       हर्ष- शोक  में  लिपटा  कर्ता   कहलाता   है  राजस ।27

 

       चंचल-बुद्धि अशिक्षित अॅंकड़ू  हठी जो धूर्त विषादी

       और  दीर्घसूत्री   आलस   से   भरा   कहाता  तामस ।28

       गुणानुसार   तीन  तीन  हैं   भेद   बुद्धि   धीरज  के

       उसे धनंजय!  सुन कहता हूँ  पूर्णरूप से अलग-अलग ।29

       जो जानती प्रवृत्ति-निवृत्ति27भय-अभय मोक्ष व बंधन      

       कार्य अकार्य को पार्थ! बुद्धि वह कहलाती है सात्विक ।30

       धर्म-अधर्म  अकार्य-कार्य  को  जिससे  ठीक  तरह से   

       जान न पाता  मनुज  पार्थ!  वह  बुद्धि राजसी होती ।31

       पार्थ! तमस से घिरी बुद्धि   माने अधर्म धर्म को  जो

       ऐसे सब पद28उलट अर्थ  में माने  बुद्धि तामसी  वह ।32

       धारे मनुज  समत्वयुक्त29  जिस  सत्वाचारी  धृति से

       इंद्रियक्रिया प्राण मन को हे पार्थ! सात्विकी धृति वह ।33

       मनुज  फलेच्छा युक्त धारता जिस धृति  से हे अर्जुन! 

       धर्म आसक्ति काम  अर्थ को पार्थ! राजसी  धृति  वह ।34

       जिस धृति से भय नींद पार्थ! चिंता विषाद मद सारे

       धारे   रहता   दुष्टबुद्धि   नर, धृति  तामसी  कहाती ।35

       सुख भी  तीन  तरह  के हैं  सुन तू  मुझसे  भरतर्षभ!

       जिसमें भजन ध्यान-अभ्यास से  अंत  दुखों का होता ।36

       सुख जो विष-सा  लगे आदि में  फल में हो अमृत-सा  

       आत्मज्ञान  के बुद्धि-प्रसाद से पैदा  वह सुख सात्विक ।37

 

       जो सुख  इंद्रिय विषय योग से  भासे प्रथम सुधा-सा

       फल में  विष-सा  लगे  सुख  वह राजस  कहलाता है ।38

       जो  सुख भोग-काल  में  फल  में मोहग्रस्त  करता है

       आलस नींद प्रमाद  से उपजा  कहा  गया वह तामस ।39

       पृथ्वी पर या  नभमंडल में  देवों  में  या अन्य  कहीं 

       वस्तु  नहीं ऐसी जो बंचित प्रकृतिजन्य30  त्रिगुणों से ।40।       

# हि.प० -भगवान बताते हैं कि वर्णों के कर्म स्वभावतः पैदा हुए हैं. ये  त्रिगुण के आधार पर विभक्त किए गए हैं. सभी कर्म सदोष होते हैं-  अतः सहज कर्मों को त्यागना ठीक नहीं है-

       ब्राह्मण  क्षत्रिय  वैश्य शूद्र के  कर्म  स्वभाव से उपजे

       किए  गए  हैं  गुण  आधार  पर  ये  विभक्त  परंतप! ।41

       ब्राह्मण के स्वभाव-कर्म हैं क्षांति31 शौच  मन-निग्रह

       आस्तिकबुद्धि ज्ञान व तप दम32 औ विज्ञान सरलता ।42

       शौर्य   तेज   चातुर्य   धीरता  पीठ  न  फ़ेरे  रण  में

       स्वामी-भाव  दान  स्वभावतः  कर्म   क्षत्रियों  के  हैं ।43

       गोपालन  व्यापार  और कृषि  वैश्य-कर्म  स्वभावज33

       ऐसे   ही   शूद्रों   का  है   स्वाभाविक  कर्म   सुसेवा ।44

       मनुज लगे निज निज  कर्मों में  परम सिद्धि  हैं पाते

       होते  प्राप्त  सिद्धि  को  कैसे  वह प्रकार  अब सुन तू ।45

       जिससे  हैं  उत्पन्न प्राणि ये व्याप्त जगत  यह जिससे

       पूज  उसे  अपने  कर्मों  से  मनुज   सिद्धि  पा जाता ।46।      

       पर-आचरित धर्म से उत्तम  धर्म विगुण34 भी अपना     

       नियत  स्वधर्म कर्म  करता नर  प्राप्त न हो पापों को ।47

       ठीक नहीं  कौंतेय! त्यागना सहज कर्म हो दोष लिए

       धुऑ-घिरी   अग्नि   जैसा  सब  कर्म  सदोष  होते  हैं ।48

       मति जिसकी  सर्वत्र  अरागी35 चाहरहित अंतर्जित36

       प्राप्त  परम नैष्कर्म्य-सिद्धि37 को हो सन्न्यास के द्वारा ।49

# हि.प०-भगवान बताते हैं कि मनुष्य किस प्रकार निष्कर्मता (कर्म न करने का भाव) प्राप्त कर सिद्धि प्राप्त कर सकता है-

       ब्रह्म जो निष्ठा परम ज्ञान की, सिद्धिप्राप्त मनुज को

       जिस  प्रकार  हो  प्राप्त उसे  कौंतेय!  सुनो  थोड़े में ।50

       शुद्ध बुद्धि  से  युक्त  धैर्य  से  संयत  कर  इंद्रिय को

       छोड़  शब्द आदि विषयों को राग द्वेष को  तज कर ।51

       मित38आहारी निर्जन सेवी वश कर वाणी तन मन

       नित्य  परायण ध्यान योग के व वैराग्य  के आश्रित ।52

       अहंकार बल दर्प  परिग्रह39 काम क्रोध को तज कर

       ममतारहित  प्रशांत  मनुज  है  पात्र   ब्रह्म पाने का ।53

       ब्रह्मस्थित  साधक प्रसन्न मन शोक न करे न इच्छा

       सभी  प्राणियों  में  सम  मेरी  परम-भक्ति पाता  है ।54

       मैं  जो जितना, परम भक्ति  से व वह तत्व से जाने

       और  तत्व  से  जान मुझे  तत्क्षण  प्रविष्ट  हो मुझमें ।55

       भक्तपरायण  वह  मेरा नित  सभी  कर्म  करके भी

       अव्यय  अविनाशी  पद  पाता  पाकर मेरा  अनुग्रह ।56

       मन  से  सभी  कर्म  अर्पण  कर  मुझमें  मेरे परायण

       आलंबन  कर  साम्यबुद्धि  का मुझमें  हो  मन वाला ।57

       मुझमें  चित्त  लगा  पा  मेरी  कृपा  तरे  सब  संकट

       सुनी  न  मेरी बात  अहं  वश  प्राप्त  पतन को होगा ।58

# हि.प०-अर्जुन! तू यह युद्ध नहीं करेगा तो तेरा क्षत्रिय स्वभाव जबरदस्ती तुझे युद्ध में लगा देगा-

       अहंकारवश   मान   रहा   जो  ‘ मैं  न युद्ध  करूँगा’

       मिथ्या यह निश्चय ये40तेरी क्षत्रिय-प्रकृति करा लेगी ।59

       निज  स्वभावजनित41  कर्मों  से  कुंती -पुत्र  बॅंधा तू

       नहीं चाहता  युद्ध  मोहवश  उस-वश42  हो  तू करेगा ।60

       सभी  प्राणियों   के   अंतः  में  रह  ईश्वर  माया  से   

       देह-यंत्र  में  चढ़े   प्राणि  को  घुमा  रहा  है  अर्जुन! ।61।   

       अतः शरण  में  जा ईश्वर  की  सब प्रकार से भारत!   

       होगी प्राप्त  कृपा से  उसकी  शाश्वत शांति परम पद ।62

       यों  अति  गूढ़   गूढ़तर मैंने  ज्ञान  कहा  यह  तुझसे

       इसपर  तू  पूरा  विचार  कर  करो हो इच्छा  जैसी ।63

       फिर भी  सुन अति गोपनीय इस परम वचन को मेरे

       तू अति प्रिय  हो मित्र  मेरा मैं अतः तेरे हित कहता ।64

       भक्त मेरा बन  मन मुझमें कर पूजो और प्रणाम करो   

       तू  प्रिय  मुझे  प्राप्त  होगा, मैं  सत्य  प्रतिज्ञा  करता ।65

       छोड़  सभी  धर्मों43  को मुझमें, मात्र शरण  आ मेरी

       शोक न  कर मुक्त  कर  दूँगा  तुझे तेरे सब अघ44  से ।66

       कभी न  कहना गूढ़  वचन यह उसे, न भक्त ,सुने न

       और जो  हो  तपरहित रखे जो दृष्टि दोष की  मुझमें ।67

       जो  मनुष्य  यह  गूढ़  वचन  मेरे  भक्तों  में  कहेगा

       मुझमें  परम भक्ति  कर होगा  प्राप्त निशंक मुझे  ही ।68

       कोई   नहीं  मनुष्यों  में  है  उस-सा  प्रियकर  मेरा

       उसके  बढ़  मेरा  प्रिय  होगा  अन्य  न कोई  भू पर ।69

       हम  दोनों  का  धर्म-संवाद यह जो अध्ययन करेगा  

       होऊंगा   मैं   ज्ञानयज्ञ   से   पूजित   उसके    द्वारा ।70

       सुन भी  लेगा जो श्रद्धा से  दोष-दृष्टि से रहित इसे

       पाएगा   हो   पापमुक्त   शुभ   लोक  पुण्यकर्ता  के  ।71

       सुन  तो  लिया न एकचित्त  हो पार्थ!  कहा जो मैंने

       नष्ट  हुआ  कि  नहीं  धनंजय!  मोह  तेरा अज्ञानज4572

अर्जुन ने कहा :

       मोह  गया  स्मृति  पाया मैं  अच्युत!  तेरी  कृपा से

       संशयरहित   हुआ   अब   मैं   मानूँगा   तेरी  आज्ञा ।73

# हि.प०-संजय ने इस धर्म-वार्ता का यों उपसंहार किया।

 संजय ने कहा:

       इसप्रकार  श्री   वासुदेव  व  पार्थ  महात्मा  का  मैं

       रोमांचित  कर  देने वाला अद्भुत  वह  संवाद सुना ।74

       व्यास-कृपा  से  सुना परम इस  गुह्य  योग को  मैंने

       स्वयं  कृष्ण  योगेश्वर  को  साक्षात   पार्थ  से  कहते ।75

       राजन!  यह  संवाद  अनोखा  पूत  कृष्ण  अर्जुन का

       पुनि  पुनि  कर स्मरण  हो रहा  बार बार  मैं हर्षित ।76

       कर करके स्मरण मुझे  वह  रूप विलक्षण  हरि का

       बहुत  बड़ा  आश्चर्य   हो  रहा  बार-बार  हर्षित  हूँ ।77

       जहॉं  योगेश्वर  कृष्ण और  हैं  जहॉं  धनुर्धर  अर्जुन

       वहीं  जीत श्री  अचल  नीति  है व  विभूति मेरे मत ।78

       मोक्षसंन्यासयोग नाम का अठारहवाँ अध्याय समाप्त 

1 विद्वान 2. कामना भरे 3. दोष से जुड़ा  4. अर्जुन 5. अर्जुन  6. पवित्र

7. यज्ञ दान ताप 8. तमोगुण युक्त 9. रजोगुण युक्त त्याग 10. सतोगुण युक्त 11. अकल्याणकारी कर्म 12. कल्याणकारी कर्म 13. किसी भी काल में  14. सांख्य योगियों के सिद्धांत में 15. कर्म की सिद्धि में 16. साधन 17. शुभाशुभ कर्मों का संस्कार 18. प्राणियों 19. तीन प्रकार से  20. गुणों की संख्या बताने वाला शास्त्र  21. कर्तापन के अभिमान से रहित  22. अहंकार के वचन 23. धीरज वाला  24. आसक्त  25. लोभी  26. अपवित्र  27. प्रवृत्ति-कौन कर्म करना चाहिए, निवृत्ति- कौन कर्म नहीं करना 28. पदार्थ 29. समता के भाव से जुड़ा  30. प्रकृति से उत्पन्न  31..अपराध क्षमा करना  32. इन्द्रियसंयम  33. स्वभाव से उत्पन्न  34. गुणरहित 35. राग से मुक्त  36. अंत:करण को जीता जो 37. निष्काम कर्म के भाव की सिद्धि  38. कम  39. धनादि संग्रह  40. इस युद्ध को 41. स्वभाव से जन्मे कत्रिय कर्म  42. उसके अर्थात क्षत्रिय स्वभाव के वश होकर 43. कर्तव्यकर्मों को (जैसे-क्षत्रिय आदि का धर्म या कर्तव्यकर्म)   44. पापों से  45. अज्ञान से उत्पन्न 


शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव 

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