22-02-2026
ब्लॉग-11
श्रीमद्भगवद्गीता
ग्यारहवॉं
अध्याय
अर्जुन ने कृष्ण से प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश की बातें सुनीं और कृष्ण के अक्षय महात्म्य को भी सुना तो उनके मन में उनके विश्वरूप को देखने की इच्छा जाग उठी. अपनी इच्छा उन्होंने कृष्ण के सामने रखी. कृष्ण ने उन्हें अपना विश्वरूप दिखलाया. संजय ने उस विश्वरूप को अपनी दूरदृष्टि से और अर्जुन ने उसे दिव्यदृष्टि से देखा.
# हिदी पद्यकार०-भगवान के यह कहने पर कि वह जगत को अपने एक ही अंश से व्याप्त कर रखा है. अर्जुन ने उनसे उनका विश्वरूप दिखाने की इच्छा कीः
अर्जुन ने कहा:
मुझ पर करने हेतु अनुग्रह परम गुह्य
अध्यात्मपरक
तूने
कहे जो वचन हो
गया नष्ट मोह
यह मेरा ।1।
क्योंकि सुना है कमलनेत्र! उत्पत्ति नाश भूतों का
सविस्तार तुझसे
मैंने अक्षय महात्म्य
भी तेरा ।2।
पुरुषोत्तम! कहते तू
निज को
जैसा है ऐसा ही
मैं
चाहता देखना
तेरा ईश-रूप परमेश्वर!
।3।
प्रभो!
रूप ऐश्वर तेरा
यदि मानो देख सकूँ मैं
अपने उस
अव्यय स्वरूप को दिखलाओ योगेश्वर! ।4।
श्री भगवान ने कहा:
देख पार्थ! सैकड़ों
हजारों रूपों
को अब मेरे
दिव्य
अनेक तरह के नाना
आकृतियों वर्णों के ।5।
देख रुद्र
वसु आदित्यों को मरुतों अश्विनियों को
और
देख आश्चर्य अनेक जो
भारत! पूर्व न देखे ।6।
अभी
देख एकस्थ1 देह में मेरी
जगत चराचर
और
देखना चाहो जो भी गुडाकेश!
वह देखो ।7।
पर
तू इन अपनी ऑखों से
देख न मुझे सकेगा
दिव्य चक्षु देता
मैं तुझको देख मेरा योगैश्वर
।8।
# हि.प०-अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान ने उन्हें अपना दिव्य रूप दिखाया.
संजय ने कहा:
ऐसा
कह हे राजन! फिर उन महायोगेश्वर हरि ने
दिखलाया अर्जुन को
अपने दिव्यरुप ऐश्वर2 को ।9।
उसमें
थे नाना मुख ऑखें
अद्भुत बहु दर्शन थे
नाना दिव्य आभरण3 कर में आयुध4 दिव्य उठाए ।10।
दिव्य गंध के लेप
लगे थे दिव्य वस्त्र स्रक5 धारे
विस्मय भरे अनंतरूप वह देव
सर्वतोमुख6 थे ।11।
नभ में सहस
सूर्य उगने से जो उत्पन्न
प्रभाएँ
दिव्य महात्मा की प्रकांति7 से
समता रखें कदाचित ।12।
उस क्षण उस श्रीकृष्णदेव के एक जगह तन-स्थित8
अर्जुन ने नाना
प्रकार से देखा
बॅंटा
जगत को ।13।
तब
विस्मय से देख धनंजय हुए हर्ष-रोमांचित
शिर से कर प्रणाम
देव को हाथ जोड़ यों
बोले ।14।
अर्जुन ने कहा:
देख रहा मैं देव! देह में तेरी सब
देवों को
और दीख पड़ते विशेष समुदाय प्राणियों के हैं
कमलासन
पर विराजमान ब्रह्मा को व शंकर को
और
दिव्य सर्पों को सब ऋषियों को देख रहा हूँ
।15।
नाना उदर
बाहु मुख ऑखें
विश्वेश्वर! तेरे
हैं
सभी ओर
से तुझ अनंतरूपी को देख
रहा मैं
नहीं दीखता आदि तेरा
न अंत तेरा ही
दीखे
विश्वरूप हे! कहीं
मध्य
का पता नहीं है
तेरे ।16।
देख रहा
हूँ
मुकुट चक्र व धारण किए गदा
हो
दीप्तिमान
सब ओर हो रही तेज राशि
है तेरी
सभी ओर से अप्रमेय9 तू दिखते कठिनाई से
अग्निसदृश देदीप्यमान10 तू सूर्य-कांति वाले हो
।17।
तुम्हीं
जानने योग्य
परम अक्षर हो
और विश्व के परम निधान हो तू ही
तुम ही रक्षक धर्म सनातन के भी
पुरुष
सनातन अव्यय मेरे
मत में ।18।
आदि मध्य व अंतरहित अतिप्रभ11 तू
अनत12 बाहु शशि-भानुरूप
नेत्रों के
ज्वलित
अग्निमुख तू
प्रतेज से अपने
तपा रहे हो जग को देख
रहा मैं ।19।
स्वर्ग
भूमि के बीच व्योम
फ़ैला व
सभी दिशाएँ पूरित एक तुझी
से
देख
तेरे इस उग्र
रूप को अद्भुत
व्यथित हो रहे तीनों
लोक महात्मन्! ।20।
वे ही सब समुदाय देव के करें
प्रवेश तुझी में
कीर्तन
करते कई भयातुर हाथ जोड़ कर तेरी
सिद्धों मर्हिर्षयों के ये समुदाय स्वस्ति’यों
कह के
स्तुति करते
उत्तम उत्तम स्तोत्रों
से तेरी ।21।
सब आदित्य
रुद्र सब वसु व विश्वेदेव
मरुद्गण
पितरों का समुदाय उष्मपा यक्ष साध्यगण राक्षस
सिद्धों का समुदाय अश्विनीद्वय गंधर्व सभी
ही
देख रहे हैं निर्निमेष13 तुझको सब
चकित हुए से ।22।
महाबाहु! तेरा महान यह रूप अनेक मुखों का
बहु नेत्रों बहु बाहु उरू15बहु व
अनेक चरणों का
बहु
उदरों बहु दाढ़ों के विकराल रूप भयकारी
लोग
विकल हो रहे देख हो रहा विकल हूँ मैं भी ।23।
नभ
को छूते दीप्तिमान व युक्त विविध वर्णों से
फैलाए आनन प्रकाश से युक्त विशाल ऑंखों के
रूप देख
तेरा यह विष्णो! डरा हुआ अंतः में
छूट
गया है धैर्य मेरा व
मन की शांति गई है ।24।
दाढ़ों
से विकराल हो रहे तेरे
भयद मुखों को
प्रलयानल-सा14देख प्रज्वलित,मुझे कौंध से उसकी
सूझ रही
हैं नहीं दिशाएँ समाधान
नहीं है
जगन्निवास!
देवाधिदेव हे! हो प्रसन्न तू मुझ पर ।25।
ये वे ही हैं सब के सब
धृतराष्ट्र-पुत्र युद्धार्थी
पृथ्वीपालों के अनेक
समुदायों
के संग होकर
और भीष्म द्रोण कर्ण भी
तीव्र वेग से बढ़ते
मुख्य
मुख्य योद्धाओं के संग प्रखर हमारे दल के ।26।
सब प्रवेश कर रहे तीव्रता से अति खिंचे हुए से
तेरे
भयद मुखों में जो विकराल
दाढ़ वाले हैं
कई
एक अति चूर्ण सिरों के साथ चीथड़े-से हो
तेरे दॉंतों के अंतर
में दिखते फंसे हुए हैं
।27।
जैसे जल-प्रवाह
बहुतेरे नदियों के बह बह के
जाते चले दौड़ते गति
से सागर ओर मचल के
वैसे
ही नरलोक-वीर कर रहे
प्रवेश तेजी से
सभी ओर
से दीप्तिमान तेरे इन खुले मुखों में ।28।
ज्वलित
अग्नि में मोहग्रस्त हो जैसे दौड़ पतिंगे
अपना ही
विनाश करने को त्वर16प्रविष्ट होते हैं
वैसे
ही कर रहे प्रवेश
ये लोग बड़े वेगों
से
निज को ही विनष्ट
करने को तेरे बड़े मुखों में ।29।
ग्रसते हुए
सर्व लोकों को अपने ज्वलित मुखों से
सभी ओर से
चाट रहे हो बार बार रसना से
विष्णो! उग्र
प्रभा यह तेरी तप्त
तेज के द्वारा
सारे जग
को चतुर्व्याप्त कर तपायमान करती है ।30।
बता कृपा कर
मुझे
कौन तू उग्र रूप वाले हो
देवश्रेष्ठ! नत नमन तुझे है
तू प्रसन्न हो जाओ
मैं
जानना चाहता तुझको कौन
आदि पुरुष तू
नहीं
जानता भली भॉंति मैं क्या प्रवृत्ति है तेरी ।31।
# हि.प०-भगवान ने कहा- मैं इन सब वीरों को पहले ही मार चुका हूँ:
श्री भगवान ने कहा:
बढ़ा हुआ
मैं महाकाल हूँ नाशक सब लोकों का
प्रवृत हूँ
संहार हेतु इस समय
यहॉं
इन सबके
जो विपक्ष
में स्थित योद्धा खड़े
युद्ध लड़ने को
तू न लड़ो
तो भी ये सारे
यहॉं न बचने वाले ।32।
अतः उठो तू प्राप्त करो यश जीत शत्रुओं को इन
भोगो वह
समृद्ध
राज्य संपन्न धान्य व धन से
ये मारे जा
चुके सभी हैं मुझ
द्वारा पहले ही
बस निमित्त
मात्र बन जाओ वीर सव्यसाची17तू ।33।
द्रोण जयद्रथ
कर्ण भीष्म व अन्य शूरवीरों को,
हते हुए मेरे
द्वारा ये, उन्हें युद्ध में मारो
थोड़ा भी
भय करो नहीं तू युद्ध करो निर्भय
हो
निःसंशय तू जीतोगे इन अरियों को इस रण
में ।34।
# हि.प०-संजय ने राजा धृतराष्ट्र से कहा कि प्रभु का वह महाकालरूप देख अर्जुन डर गए. तब वह प्रभु का गुणगान कर उनका वही चतुर्भज रूप देखना चाहा.
संजय ने कहा :
केशव
के इस कहे वचन
को सुनकर
हाथ जोड़,
कर नमन सकंप किरीटी18
डरा हुआ अति
नमस्कार कर फिर वह
बोले अति गदगद वाणी केशव
से ।35।
अर्जुन ने कहा:
हृषीकेश!
तेरे लीला- कीर्तन से
जग होता हर्षित पाता
रागों को
भाग रहे राक्षस दिक्
में डर इससे
करते हैं प्रणाम
सिद्धगण समुचित ।36।
क्यों न
करें वंदना महात्मन! तेरी
आदिकर्तृ19 ब्रह्मा
के श्रेष्ठ भी उनसे
जगन्निवास! देवेश! असत
व सत् तू
उनसे परे जो अक्षर है
तू वह भी ।37।
आदि देव तू
पुरुष पुरातन तू ही
जग के
परम निधान और ज्ञाता भी
तुम्ही
ज्ञेय हो परमधाम
भी हो तू
जगत
व्याप्त है तुझ अनंतरूपी से ।38।
वरुण चंद्र यम वायु अग्नि तू ही हो
तुम्ही प्रजापति
ब्रह्मा ब्रह्म-पिता20भी
नमस्कार है तुझे
हजारों बार नमन
बार बार
है
नमन प्रणाम नमस्ते ।39।
नमन अग्र से पीछे से सर्वात्मन!
सभी ओर से नमस्कार
है तुझको
हे अनंत सामर्थ्य पराक्रम
वाले!
सर्वरूप हो सबको
व्याप्त किए तुम
।40।
सखा मान हे यादव! कृष्ण! सखा हे!
जो भी मैंने तुझे कहा
हो हठ से
नहीं जानते हुए प्रभाव
को तेरे
कभी
प्रेम से या प्रमाद में पड़ कर
।41।
हुआ कभी हो
तिरस्कार हॅंसी
में
शय्यासन21 भोजन विहार
में मुझसे
सखा समक्ष या
हुआ अकेले
में हो
क्षमा करो तू अप्रमेय!
अच्युत! सब ।42।
पिता
तुम्ही इस लोक चराचर के हो
पूजनीय हो व गुरुओं के गुरु
भी
तुझ समान है
नहीं
त्रिलोक में कोई
अन्य हो
सके अधिक कोई भी कैसे ।43।
स्तुति करने
योग्य अतः तुझ-प्रभु को
करता हूँ
प्रणिपात22 प्रमन23 को तेरे
पिता
पुत्र के पत्नी पति मित मित24 के
सहते ज्यों अपराध सहो तू मेरे ।44।
पूर्व न देखा रूप देख हूँ हर्षित
विकल हो रहा मन भी
मेरा भय से
मुझे दिखाओ विष्णुरूप वह अपना
जगन्निवास! देवेश! प्रसन्न
हो मुझ पर ।45।
मैं वैसे ही तुझे देखना चाहूँ
गदा चक्र हो
हाथ शीश मुकुट
हो
सहसवाहु!
हे विश्वमूर्ति! हो जाओ
उसी चतुर्भुज
रूप मनोहारी में ।46।
# हि.प०-भगवान ने अर्जुन को अपना पूर्व का चतुर्भुज रूप दिखाया-
श्री भगवान ने कहा :
मैं प्रसन्न हो योगशक्ति
से अपनी
सबका आदि
असीम परम
तेजोमय
तुझे दिखाया
विश्वरूप निज अर्जुन!
तेरे
सिवा न देखा पूर्व किसी ने ।47।
कुरुप्रवीर25! यह रूप लोक
में मेरा
दिख सकता
न तेरे सिवा किसी को
न ही वेद
अध्ययन न यज्ञ दानों से
न ही
क्रिया न उग्र
तपस्या से ही ।48।
विकल न हो न हो विमूढ़ तू तिल भी
उग्र
रूप यह देख मेरा तू ऐसा
प्रीतियुक्त हो निडर
देख तू फिर से
वही चतुर्भुत रूप
मेरा वैसा ही
।49।
संजय ने कहा:
इस
प्रकार कह
वासुदेव ने फिर तब
अर्जुन को निज
रूप दिखाया वैसा26
सौम्यरूप हो पुनः
महत आत्मा ने
धैर्य
बॅंधाया
डरे हुए अर्जुन
को
।50।
अर्जुन ने कहा:
तेरे
सौम्य मनुष्यरूप को देख जनार्दन! इस क्षण
स्थिरचित्त
हुआ मैं पाया स्वभाविक स्थिति को ।51।
श्री भगवान ने कहा :
दुर्लभ
है दर्शन इसका जो रूप मेरा यह देखा
इसे देखने को रहते हैं
देव सदा लालायित ।52।
देखा
है जैसा मुझको
न देख सकेगा वैसा
वेदों से तप से दानों
से और न
यज्ञ-पूजा से ।53।
यों अनन्य भक्ति से ही
मैं ज्ञेय तत्वतः अर्जुन
और
देखने, व प्रविष्ट27 होने में शक्य28परंतप!
।54।
पांडव! मेरे लिए कर्म करता जो भक्त परायण
अनासक्त निर्वैर प्राणियों से वह प्राप्त मुझे हो ।55।
विश्वरूपदर्शन नाम का ग्यारहवॉं अध्याय समाप्त
1 एक जगह स्थित 2. ऐश्वर्य से भरे 3. शस्त्र 4. आभूषण 5. दिव्या माला 6. सब ओर मुख किए 7. प्रखर ज्योति 8. तन में स्थित 9. जिसके लिए प्रमाण की जरूरत नहीं 10. प्रकाशमान 11 अत्यंत प्रभावान 12 अनंत 13. अपलक 14. जंघा 15. प्रलय की अग्नि के सामान 16. तेजी से 17. अर्जुन 18. अर्जुन 19. आदि कर्ता 20. ब्रह्मा के पिता 21. शय्या और आसन 22. प्रणाम 23. प्रसन्नता हेतु 24. मित्र मित्र के 25. अर्जुन 26. चतुर्भुज रूप 27. एकीभाव से प्राप्त होने में 28. हो सकने योग्य