Wednesday, 25 February 2026

श्रीमद्भगवद्गीता -15

श्रीमद्भगवद्गीता 


 

24-02-2026

ब्लॉग-15

                              पंद्रहवॉं अध्याय

वेदों में परमेश्वर की रची हुई सृष्टि का अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में वर्णन मिलता है. कृष्ण ने इस अध्याय में उसी रुपक का उदाहरण लेकर कहा है कि सृष्टि के विस्तार (सांख्यवादियों के कृति के पसारे) का बीज मेरा ही सनातन अंश है. फिर उन्होंने परमेश्वर के सब रूपों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तमरूप का वर्णन किया है.

# हिन्दी पद्यकार०-इस अध्याय में भगवान ने इस संसार को ऐसा पीपल का वृक्ष कहा है, जो अविनाशी है, जिसकी परमेश्वररूपी जड़ ऊपर की ओर ब्रह्मारूपी शाखा नीचे की ओर है और वेद इसके पत्ते हैं.

श्री भगवान ने कहा:

       ऊपर जड़1 नीचे शाखा2,इस जग-पीपल3अव्यय4 को

       पत्ते   जिसके  वेद  कहे,  जो  जाने  इसे  वेद जाने ।1

       उसकी विषय-कोंपलों की शाखाएँ बढ़ी त्रिगुण5 से

       फ़ैली  हुई अधो ऊपर हैं  सभी  जगह सब दिक् में  

       और  मनुष्य-लोक  में  कर्मों  का  बंधन  जो  बॉंधे  

       व्याप  रहीं  वे  जड़ें6 सभी  लोकों  में  ऊपर  नीचे ।2

       इस जगतरु का रूप न  वैसा  मिले  यहॉं  सोचे में

       न तो  आदि अंत है  इसका  और न है   स्थिति ही

       अतः वासना7 के  दृढ़  मूलों  वाले  जग-पीपल को

       दृढ़  असंग   वैराग्य-शस्त्र  से  काट   जड़ों  से  पूरा ।3

       तत्पश्चात चाहिए  करनी खोज परम8 उस पद की     

       जिसे प्राप्त  होकर मनुष्य फिर  नहीं लौटते जग में

         और करे  संकल्प  शरण हूँ  मैं  उस  आदिपुरुष की        

       जिससे चिर संसार-वृक्ष   की  सृष्टि  हुई विस्तृत है ।4।          

       मोह मान  से रहित  हुए  आसक्ति-दोष  जो जीते

       नित्य  लगे  जो परमात्मा में औ कामना रहित  हैं

       मुक्त  हो  गए हैं  जो  सुख-दुखसंज्ञक9  द्वंद्वों  से भी

       पाते उस  अविनाशी पद  को  मोहरहित साधक वे ।5

       जो पद10 पा लौटे न जगत में मनुज,धाम वह मेरा

       उस  पद  को न  सूर्य-चद्र न अग्नि प्रकाशित  करते ।6

       जीवात्मा इस  देह  में  है  मेरा  ही  अंश सनातन

       मन  पॉंचों इंद्रियों  प्रकृति में स्थित, को वह खींचे ।7

       जिस तन को  छोड़े देही11, ले मन इंद्रियॉं  वहॉं से

       प्राप्त  देह  में  ले जाता ज्यों वायु  गंध  स्रोतों12  से ।8

       श्रवण नेत्र मन का रसना का और त्वचा नाकों का

       आश्रय ले सेवन करता यह13सभी विषय भोगों का ।9

       देह त्याग जाते, शरीर में स्थित विषय भोगते भी

       जीवात्मा को  मूढ़ न जानें  ज्ञान-चक्षु14 ही  जानें ।10

       योगीजन  जानें  सयत्न निज उर-स्थित आत्मा को  

       अविवेकी अंतःअशुद्ध  न जाने  इसे  यत्न  कर भी ।11

       सूरज  में जो  तेज जगत को  पूर्ण प्रकाश से भर दे

       और तेज जो  अग्नि चंद्र  में  जान  तेज  वह  मेरा ।12

       मैं  प्रवेश कर  पृथ्वी में  धारता स्वतेज  से  प्राणी

       अमृतरूप चॉंद  होकर पोषता  सभी  औषधि को ।13

       सभी प्राणियों के तन-स्थित प्राण-अपान15से जुड़ मैं

       होकर के  जठराग्नि पचाता अन्न  मैं चार तरह के ।14

       मैं  ही   हूँ  सम्पूर्ण   प्राणियों  के  अंतः में  स्थित

       और  मुझी से  होता  संशय-नाश ज्ञान स्मृति भी

       मैं ही  हूँ  जानने  योग्य  सब  वर  वेदों  के द्वारा

       व  वेदांत  का  कर्ता   मैं  ही  और वेद-ज्ञाता  भी ।15

       दो प्रकार के पुरुष  लोक  में  होते  हैं  क्षर  अक्षर  

       क्षर कहते  सब भूतों16 को व अक्षर जीवात्मा  को ।16

      उत्तम पुरुष अन्य ही  इनसे   परमात्मा कहलाता

      वह अव्यय ईश्वर  त्रिलोक में  जाकर  सबको पोषे1717

      क्योंकि  परे  मैं नाशवान  से  उत्तम  अविनाशी  से

      इसीलिए  हूँ  लोक  वेद  में  मैं  प्रसिद्ध  पुरुषोत्तम18

      इस  प्रकार  जो मोह  रहित जानता मुझे पुरुषोत्तम 

      सर्वभाव से  भजता  भारत!  जान सभी कुछ मुझको ।19

      इसप्रकार  यह शास्त्र  गुह्यतम तुझसे  कहा अनघ! मैं

      भारत!  इसे  जान होता है  ज्ञानवान कृतकृत्य मनुज ।20

           पुरुषोत्तमयोग नाम का पंद्रहवॉं अध्याय समाप्त

1 परमात्मारूपी मूल  2. ब्रह्मारूपी शाखा  3. संसाररूपी वृक्ष  4. अविनाशी 5. तीनों गुणों से 6. अहं, वासनारूप 7. अहं और ममतारूप वासना  8. परमात्मा 9. सुख दुःख बताने वाला 10. परम पद परमात्मा 11. जीवात्मा 12. गंध के स्थान 13. जीवात्मा 14. ज्ञानरूप चक्षु वाले 15. शुद्ध अशुद्ध वायु 16.  नाशवान. 17. पोषण करे   

Tuesday, 24 February 2026

श्रीमद्भगवद्गीता-14

 श्रीमद्भगवद्गीता 


24-02-2026

ब्लॉग-14

                               चौदहवॉं अध्याय

सृष्टि का सब कर्तृत्व प्रकृति का ही है. पर एक ही प्रकृति से विविध सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है? मानवी सृष्टि भी त्रिगुण प्रकृति का ही विस्तार है. स्थावर सृष्टि भी उसी का विस्तार है. कृष्ण कहते हैं- प्रकृति मेरी योनि है, मैं ही उसमें गर्भ रखता हूँ और मैं ही उनका वीजदाता पिता हॅूं. प्रकृति से ही सत रज तम तीनों गुणों की उत्पत्ति होती हैं. ये ही तीनों गुण देही (क्षेत्रज्ञ) को देह (क्षेत्र) में बॉंध लेते हैं. इन्हीं की मात्राओं की कमी बेशी से किसी की प्रमुख वृत्ति निर्मित होती है.

# हि.प०-यहॉं भगवान अर्जुन को फिर से उस परम ज्ञान को बता रहे हैं-

श्री भगवान ने कहा:

       फिर मैं कहूँगा परम ज्ञान जो उत्तम सब ज्ञानों में

       जिसे जान मुक्त हो मुनिजन परम सिद्धि को पाए ।1

       कर धारणा ज्ञान की इस जो प्राप्त स्वरूप को मेरे

       जन्म न लेते सृष्टि-आदि में व्याकुल हों न प्रलय में ।2

       मूल प्रकृति  योनि मेरी  मैं गर्भ रखूँ  चिद1 उसमें            

       सभी प्राणियों की होती  उत्पत्ति उसी  से भारत! ।3

       होते  हैं  जितने प्राणी उत्पन्न सभी  योनियों2  में  

       माता उनकी प्रकृति पिता कौंतेय!  बीज-दाता मैं ।4

 

       महाबाहु! उत्पन्न प्रकृति से सत रज तम गुण तीनों

       मिलकर  देते   बॉंध  देह  में  अविनाशी  देही  को ।5 

       इनमें  सत्  निर्मल  होने से रहितविकार  प्रकाशक

       अनघ3! बॉंध देता देही  को ज्ञान और सुख-संग4 से ।6

       रागरूप  रजगुण को जानो  तृष्णासक्ति5  से जन्मा

       कर्मों  के फल-संग बॉधता  प्राणी को  कौंतेय! यही ।7

       तम जानो अज्ञानजनित  है देहमानियों6  को  मोहे

       यह  आलस निद्रा  प्रमाद  से उन्हें  बॉंधता भारत! ।8        

       सत्व लगाता सुख  में रजगुण  कर्मप्रवृत्त7  करता है

       तमस ज्ञान को ढॅंक भारत! करता प्रमाद में उन्मुख ।9

       दबा रजोगुण व तमगुण  को भारत!  बढ़े सतोगुण

       रजस बढ़े दाब सत तम व तमस दबा  सत रज को ।10

       जब  अंतः व  देहेंद्रिय8  में  निर्मल  ज्ञान  उपजता

       तब जानना चाहिए  यह कि  बढ़ा हुआ सतगुण है ।11

       भरतश्रेष्ठ! रज के बढ़ने पर कर्म-प्रवृत्ति, लोभ,कामी9

       कर्मारंभ  स्वार्थवश, इच्छा व  अशांति  हैं  जगतीं ।12

       कुरुनंदन!  तमगुण   बढ़ने  पर अंधकार  अंतर  में

       अप्रवृत्ति  कर्तव्य-कर्म   में   मोह   प्रमाद   जनमते ।13

       बढ़े काल में सतगुण  के  जब  मनुज मृत्यु पाता है

       जाता  वह  निर्मल लोकों को उत्तम  वेत्ताओं10  के ।14।

       बढ़े  रजस  में  मरे जो,  जन्मे  कर्मासक्त  जनों  में

       मरता  बढ़े  तमोगुण  में  जो  मूढ़   योनि  में जन्मे ।15

       पूण्य कर्म का फल सात्विक व निर्मल  कहा गया है

       दुख  राजस कर्मों  का फल  अज्ञान तमस कर्मों का ।16

       ज्ञान सतोगुण  से पैदा हो  लोभ उत्पन्न रजगुण  से  

       करता है उत्पन्न तमोगुण मोह प्रमाद11अज्ञान सभी ।17

       सात्विक जाते उच्चलोक को राजस  मृत्युलोक रहते

       निंदनीय तमगुण में स्थित पुरुष अधोगति को पाते ।18

       द्रष्टा  जब   देखे  त्रिगुणों  के  सिवा   कोई  कर्ता

       जाने गुण  से  पर  निज को  मेरे  स्वरूप को  पाता ।19

       देहोत्पत्ति-हेतु12 त्रिगुणों   का  कर मनुष्य उल्लंघन   

       जन्म  जरा  मृत्यु  के  दुख  से   छूट  अमरता  पाए ।20    

# हिन्दी पद्यकार०अर्जुन ने पूछा- भगवन! त्रिगुण से परे हो गए मनुष्य कैसे होते हैं:

अर्जुन ने पूछा:

      होते युक्त लक्षणों से किन त्रिगुणातीत13मनुष्य प्रभो!          

      क्या उनके  आचरण, वे  होते त्रिगुणों से  अतीत कैसे ।21

# हि.प०- भगवान  बताते हैं कि त्रिगुणातीत मनुष्यों में मोह प्रकाश और मनुष्य-सुलभ प्रवृत्तियॉ भी अच्छे से प्रवृत हो जाएँ तो उनमें द्वेष नहीं होता और प्रवृत न हों अर्थात निवृत हों तो उन्हें उनकी चाह नहीं होती.

श्री भगवान ने कहा:

       पाने पर  प्रकाश14 मेाह15 व कर्म-प्रवृत्ति16 के,पांडव!  

       गुणातीत17 करते न  द्वेष, न चाहें  प्राप्त    होने पर ।22 

       उदासीन साक्षी-सा स्थित  विचल न  जो त्रिगुणों से  

       गुण ही अपना काम करें यह समझ अडिग जो रहता ।23

       जाने सम स्वर्णाश्म-मृदा18 जो समस्थित दुख-सुख में  

       सम हो प्रिय अप्रिय में स्तुति निंदा में सम भाव भरा ।24

       मित्र शत्रु  मानापमान  में  सम, व सब आरम्भों19 में

       कर्ता  का  अभिमान  नहीं  वह  गुणातीत  कहलाता ।25

       अव्यभिचारी20  भक्तियोग  से  जो  मेरी सेवा करता

       होता  पात्र  ब्रह्म  पाने   का  लॉंघ  गुणों  को  तीनों ।26

       क्योंकि  ब्रह्म  अविनाशी शाश्वत धर्म और अमृत का

       और  सुखों   का  ऐकांतिक  मैं   एकमात्र  आश्रय  हूँ ।27             

         गुणत्रयविभागयोग नाम का चौदहवॉं अध्याय समाप्त

1चेतन 2. मनुष्य पशु आदि योनि 3. अर्जुन 4. सुख के योग से 5. तृष्णा और आसक्ति 6. देह के अभिमानियों को  7. कर्म में लगाता है  8. देह और इन्द्रियों 9. कामना से भरा 10. तत्व को जानने वालों 11. आलस्य  12. देह उत्पत्ति के कारणरूप त्रिगुण 13. तीनों गुणों से परे 14. सतोगुण के कार्यरूप प्रकाश 15. रजोगुण के कार्यरूप मोह 16. तमोगुण के फलरूप कर्म की प्रवृत्ति 17. गुणों से परे 18. सोना, पत्थर, मिट्टी 19. कर्मों के शुरू करने में 20. सदाचारी या अविरोधी