03-02-2026
ब्लॉग-6
श्रीमद्भगवद्गीता
छठा अध्याय
कृष्ण ने कर्मयोग की सिद्धि के लिए समबुद्धि (सबको समान रूप से देखने वाली बुद्धि) के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया है. वह समबुद्धि प्राप्त करने के उपायों को भी बताते हैं. वह कहते हैं. सच्चा योगी व संन्यासी वही है जो कर्मफल की आशा रखे बिना स्थिर समबुद्धि से संसार के कर्मों को अपना कर्तव्य समझ कर करता रहे. बुद्धि स्थिर करने के लिए इंद्रियनिग्रहरुपी कर्म और योग का अभ्यास वह स्वयं करे. जिसकी आत्मा योग से युक्त व दृष्टि सम होती है वह सभी प्राणियों को अपने में और सभी प्राणियों में अपने को देखता है. योग कभी विनष्ट नहीं होता समबुद्धिरुपी योग एक जन्म में सिद्ध न हो तो पूर्वजन्म के संस्कार ही पूर्वागत जन्म के अभ्यास को आगे बढ़ा देते हैं जिससे सिद्धि मिल जाती है.
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हिन्दी पद्यकार०- फिर प्रभु ने अर्जुन को बताया कि बुद्धि कैसे सम हो व योग कैसे
सिद्ध होः
श्री भगवान ने कहा: (योगी
अर्थात कर्मयोगी)
जो करता करणीय
कर्म बिन चाहे कर्म-फ़लों को
वह है सन्न्यासी योगी, न क्रिया अग्नि का त्यागी1 ।1।
कहें जिसे
सन्न्यास समझ तू कर्मयोग वह पांडव!
संकल्पों को त्यागे
बिन होता न कोई योगी
है ।2।
योगेच्छुक
मुनि हेतु, कहा निष्काम कर्म है साधन
योगारुढ़2
पुरुष हित शम3 है हेतु कर्म
का आगे ।3।
इन्द्रिय
के भोगों कर्मों में जब वह हो आसक्त नहीं
त्यागी तब सब संकल्पों का योगारुढ़
कहाता ।4।
मनुज करे
उद्धार स्वयं का नहीं गिराए निज को
क्योंकि
बंधु आप वह अपना और शत्रु भी अपना ।5।
जीता
जिसने स्वयं स्वयं को बंधु स्वयं वह अपना
जो न आप अपने
को जीते शत्रु बने अपना ही ।6।
जिसकी अंतःवृत्ति
शांत मानापमान सुख-दुख में
व सर्दी गर्मी
में पाता नित्य
परम आत्मा को ।7।
ज्ञानविज्ञान से
तृप्तात्मा जो निर्विकार,विजितेन्द्रिय4
मिट्टी स्वर्ण अश्म5
जाने सम,योग-युक्त6 कहलाता
।8।
मित्र
सुहृद7 अरि उदासीन8 मध्यस्थ बंधु पापात्मा
साधु
द्वेष्य9 में बुद्धि रखे सम वह अतिश्रेष्ठ मनुजहै ।9।
इच्छाविरत
विमुख संग्रह से व अंतः मन वश कर
योगी एकाकी
एकांत हो मन
को रखे परम में ।10।
शुद्ध
भूमि में जिसपर कुश मृगछाला वस्त्र विछे हों
कर स्थिर
स्थापित आसन जो अति ऊॅंच न नीचा ।11।
उस आसन पर बैठ क्रियाएँ चित्तेंद्रिय की वश कर
आत्मशुद्धि हित करें एकमन योगाभ्यास निरंतर ।12।
काया सिर
ग्रीवा सम धारे अचल और स्थिर हो
इधर उधर
न देख
देखते नासिकाग्र थिर
बैठे ।13।
ब्रह्मचारिव्रत10
में स्थित जो आत्मशांत व निर्भय
मन संयम्य11
चित्त मुझमें कर बैठे मेरे परायण ।14।
योगी कर मन को वश ऐसे सदा लगा मन प्रभु में
मुझस्थित
निर्वाण परम की शांति प्राप्त कर लेता ।15।
अर्जुन!
जो खाते अतिशय या खाते नहीं तनिक भी
अति सोते
हों या जगते हों सिद्ध न योग उन्हें हो ।16।
होता सिद्ध योग दुखनाशक
यथायोग्य जो करते
सोना जगना कर्म-आचरण12नपातुला
आहारविहार ।17।
वश
में किया चित्त जब होता परमात्मा में स्थित
तब सब भोगों13 से निस्पृह नर कहलाता
है योगी ।18।
दीए की लौ ज्यों
अकंप हो वायुरहित स्थल पर
करता
त्यों अभ्यास योग का मन संयत कर योगी ।19।
जिस
स्थिति में मन निरुद्ध हो शांत योग सेवन से
जिसमें
कर साक्षात परम14का होता तुष्ट परम में ।20।
बुद्धिग्राह्य इंद्रियातीत जो आत्यंतिक सुख योगी
जाने
जिस स्थिति में उसमें स्थित हुआ न विचले ।21।
जिस स्थिति को पा योगी को रुचता लाभ न दूजा
और जहां स्थिर होने से
अति दुःख भी न डिगाए ।22।
उसको
दुख-स्पर्श-वियोग15या योग कहा है जानो
उसे चाहिए करना निश्चित बिना चित्त
उकताए ।23।
त्याग सभी
नि:शेषरूप संकल्पजनित भोगों को
मन द्वारा इंद्रिय-समूह को सभी
ओर से वशकर ।24।
धैर्ययुक्त-बुद्धि द्वारा वह शनैः-शनैः16 उपरत17
हो
मन
को कर स्थिर अपने में कुछ भी करे न चिंतन ।25।
जहॉं जहॉं
अ-स्थिर चंचल मन विचरण करता है
वहॉं
वहॉं से रोक उसे
वह परमात्मा में लगाए ।26।
जिसका मन है शांत पाप भी नष्ट शांत
रजोगुण
ऐसे ब्रह्मभूत
योगी को उत्तम सु ख मिलता है
।27।
ऐसे करता योग-अभ्यास नित छूट पाप से योगी
ब्रह्म-योग से प्राप्त
सुखों का सुख से अनुभव करता ।28।
आत्मा जिसकी योगयुक्त है वह सबको सम देखे
निज को सब भूतों18 में देखे सब भूतों
को निज में।29।
जो मुझको सर्वत्र
देखता और सभी को मुझमें
मेरे लिए अलोप19नहीं वह उसके हेतु
अलोप न मैं ।30।
सर्वप्राणि-स्थित मुझको जो एक भाव हो भजता
सब कुछ बरत
रहा भी योगी मुझमें बरत रहा है ।31।
अर्जुन! जो अपनी उपमा दे सभी जगह सम देखे
वैसा ही देखे सुख या दुख श्रेष्ठ
परम योगी वह ।32।
# हि. प०- भगवन! मन चंचल हठी और बली है इससे समत्व योग कैसे सधेगा?
अर्जुन बोले:
मधुसूदन! यह साम्य भाव से योग
कहा जो तूने
मैं न देखता, चंचल मन है, योग यह संभव
होगा ।33।
क्योंकि कृष्ण! मन चंचल प्रमथी20जिद्दी
और बली है
मैं मानता
रोकना इसका कठिन
वायु के जैसा ।34।
# हि.प०- भगवान ने उन्हें आश्वस्त किया कि अभ्यास व वैराग्य से मन का निग्रह हो जाता है-
श्री भगवान ने कहा :
निस्संदेह
चित्त चंचल है महाबाहु! निग्रह दुष्कर
कुन्तीपुत्र! अभ्यास वैराग्य से पर हो
जाता निग्रह ।35।
योग उसे
दुष्प्राप्य मेरे मत स्ववश नहीं मन जिसका
वशीचित्त21 साधक प्रयत्न कर योग उपाय से पाता ।36।
# हि.प०- अर्जुन ने भगवान से पूछा- श्रद्धा से भरे साधक को यदि योग सिद्ध न हो अर्थात वह योग से भ्रष्ट हो जाए तो वहकिस गति को प्राप्त होता है?
अर्जुन ने पूछा:
श्रद्धा22
हो पर कृष्ण! असंयम से मन योग-विचल हो
योगी योगसिद्धि को न पा
किस गति को पाता है ।37।
महाबाहु!23वह जगत-निराश्रय और
ब्रह्म-पथ-मोहित
दुहूँ ओर से भ्रष्ट हो होता छिन्न अभ्र-सा24
नष्ट तो न! ।38।
मेरे इस संशय-छेदन25
में कृष्ण! सर्वथा
क्षम तू ही
तुझे छोड़ छिन्न कर सकता कोई
न इस संशय को ।39।
# हि.प०-भगवान ने कहा- वे योगी पूर्वजन्म के अभ्यास के प्रभाव से अगले जन्म में भी सिद्धि पाने का यत्न करते हैं- अर्जुन तू भी योगी हो जा-
श्री भगवान ने कहा:
नाश न उनका पार्थ! लोक
में या न लोक परे में
तात! नहीं
दुर्गति पाते कल्याणकर्म
जो करते ।40।
पुरुष योग
से भ्रष्ट प्राप्त
हो
लोक पुण्यवानों के
रह कर वर्षों
वहॉं जन्मता घर में शुद्ध26 श्रीमन
के ।41।
या वह लेता जन्म योगियों ज्ञानवान के कुल
में
इस प्रकार
का जन्म लोक में यहॉं बहुत दुर्लभ है ।42।
अनायास संस्कार
बुद्धि27 का पूर्वजन्म
का पाता
उस प्रभाव से अधिक प्राप्ति का यत्न करे कुरुनंदन! ।43।
खिंचे28 परम में पूर्व अभ्यास से योगभ्रष्ट अवश वह
साम्ययोग - जिज्ञासु29 वेद के काम्य-कर्म को लांघे ।44।
योगी जो सयत्न अभ्यासरत जन्म अनेक से सिद्ध हुआ
और पाप
से शुद्ध
हुआ इस जन्म परमगति पाता ।45।
योगी
श्रेष्ठ तापसों से है श्रेष्ठ
ज्ञानियों से भी
बढ़ सकाम कर्मियों से भी अर्जुन! हो जा योगी ।46।
तदपि योगियों में भी सारे उत्तम सिद्ध मैं समझूँ
उसे मुझे जो अंतः में
रख श्रद्धा से भजता
है ।47।
आत्मसंयम (ध्यान)योग नाम का छठॉं अध्याय समाप्त
1. केवल अग्नि और क्रियाओं को त्यागने वाला 2. पूर्ण योगी हो गए 3. शान्ति 4. इन्द्रियों को जीत लिया है 5. पत्थर 6. भगवान् को प्राप्त 7. सखा 8. पक्षपातरहित 9. वैर रखने वाला 10. ब्रह्मचारी के व्रत 11. संयम कर 12. कर्मों में चेष्टा 13. वासनाओं 14. परमात्मा 15. दुख्ररूपी संसार के संयोगों से अलगाव 16. धीरे धीरे 17. विरक्त 18. प्राणियों को 19. अदृश्य 20. दुःख देने वाला 21. जिसका चित्त वश में हो 22. योग में श्रद्धा 23. कृष्ण 24. बादल-सा 25. संशय को मिटाने में 26. शुद्ध आचरण वाले 27. समबुद्धि का संस्कार 28. आकर्षित 29. समतारूपी योग में इच्छुक
शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
७१५, पार्वतीपुरम, चकसाहुसेन,
बशारतपुर, गोरखपुर, २७३००४
Email- sheshnath@250gmail.com