श्रीमद्भगवद्गीता
24-02-2026
ब्लॉग-15
पंद्रहवॉं अध्याय
वेदों में परमेश्वर की रची हुई सृष्टि का अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में वर्णन मिलता है. कृष्ण ने इस अध्याय में उसी रुपक का उदाहरण लेकर कहा है कि सृष्टि के विस्तार (सांख्यवादियों के कृति के पसारे) का बीज मेरा ही सनातन अंश है. फिर उन्होंने परमेश्वर के सब रूपों में श्रेष्ठ पुरुषोत्तमरूप का वर्णन किया है.
# हिन्दी पद्यकार०-इस अध्याय में भगवान ने इस संसार को ऐसा पीपल का वृक्ष कहा है, जो अविनाशी है, जिसकी परमेश्वररूपी जड़ ऊपर की ओर ब्रह्मारूपी शाखा नीचे की ओर है और वेद इसके पत्ते हैं.
श्री भगवान ने कहा:
ऊपर जड़1
नीचे शाखा2,इस जग-पीपल3अव्यय4 को
पत्ते जिसके वेद कहे, जो
जाने
इसे वेद जाने ।1।
उसकी विषय-कोंपलों की शाखाएँ बढ़ी
त्रिगुण5 से
फ़ैली
हुई अधो ऊपर हैं सभी जगह सब दिक् में
और मनुष्य-लोक में
कर्मों का बंधन
जो बॉंधे
व्याप रहीं वे
जड़ें6 सभी लोकों में ऊपर
नीचे ।2।
इस जगतरु का रूप न वैसा मिले
यहॉं सोचे में
न तो आदि
अंत है इसका और न है स्थिति
ही
अतः वासना7 के दृढ़ मूलों
वाले जग-पीपल को
दृढ़ असंग वैराग्य-शस्त्र से काट
जड़ों
से पूरा ।3।
तत्पश्चात चाहिए करनी खोज परम8 उस पद की
जिसे प्राप्त होकर मनुष्य फिर नहीं लौटते जग में
और करे संकल्प शरण हूँ मैं उस आदिपुरुष की
जिससे चिर संसार-वृक्ष की सृष्टि हुई विस्तृत है ।4।
मोह मान
से रहित हुए आसक्ति-दोष जो जीते
नित्य
लगे जो परमात्मा में औ कामना रहित हैं
मुक्त हो
गए हैं जो सुख-दुखसंज्ञक9
द्वंद्वों से भी
पाते उस अविनाशी पद को मोहरहित साधक वे ।5।
जो पद10 पा लौटे न जगत में मनुज,धाम
वह मेरा
उस पद को न सूर्य-चद्र
न अग्नि प्रकाशित करते ।6।
जीवात्मा
इस देह
में है मेरा ही अंश सनातन
मन पॉंचों इंद्रियों प्रकृति में स्थित, को वह खींचे ।7।
जिस तन को छोड़े देही11, ले मन इंद्रियॉं वहॉं से
प्राप्त
देह में ले जाता ज्यों वायु गंध स्रोतों12
से ।8।
श्रवण
नेत्र मन का रसना का और त्वचा नाकों का
आश्रय
ले सेवन करता यह13सभी विषय भोगों का ।9।
देह
त्याग जाते, शरीर में स्थित विषय भोगते भी
जीवात्मा
को मूढ़ न जानें ज्ञान-चक्षु14 ही जानें ।10।
योगीजन
जानें सयत्न निज उर-स्थित आत्मा को
अविवेकी
अंतःअशुद्ध न जाने इसे यत्न
कर भी ।11।
सूरज में जो तेज जगत को पूर्ण प्रकाश से भर दे
और
तेज जो अग्नि चंद्र में जान
तेज वह मेरा
।12।
मैं प्रवेश कर पृथ्वी में धारता स्वतेज से प्राणी
अमृतरूप
चॉंद होकर पोषता सभी औषधि
को ।13।
सभी प्राणियों के तन-स्थित प्राण-अपान15से
जुड़ मैं
होकर
के जठराग्नि पचाता अन्न मैं चार तरह के ।14।
मैं ही हूँ
सम्पूर्ण प्राणियों के अंतः
में स्थित
और मुझी
से होता संशय-नाश ज्ञान स्मृति भी
मैं ही हूँ जानने
योग्य सब वर वेदों के
द्वारा
व वेदांत
का कर्ता मैं ही और वेद-ज्ञाता भी ।15।
दो प्रकार के पुरुष लोक में
होते हैं क्षर
अक्षर
क्षर
कहते सब भूतों16 को व अक्षर
जीवात्मा को ।16।
उत्तम पुरुष अन्य ही इनसे
परमात्मा कहलाता
वह
अव्यय ईश्वर त्रिलोक में जाकर सबको
पोषे17 ।17।
क्योंकि परे मैं
नाशवान से उत्तम अविनाशी
से
इसीलिए हूँ लोक
वेद में मैं
प्रसिद्ध ‘पुरुषोत्तम’ ।18।
इस प्रकार
जो मोह रहित जानता मुझे
पुरुषोत्तम
सर्वभाव से भजता भारत!
जान सभी कुछ मुझको ।19।
इसप्रकार यह शास्त्र गुह्यतम तुझसे कहा अनघ! मैं
भारत!
इसे जान होता है ज्ञानवान कृतकृत्य मनुज ।20।
पुरुषोत्तमयोग नाम का पंद्रहवॉं अध्याय समाप्त
1 परमात्मारूपी मूल 2. ब्रह्मारूपी शाखा 3. संसाररूपी वृक्ष 4. अविनाशी 5. तीनों गुणों से 6. अहं, वासनारूप 7. अहं और ममतारूप वासना 8. परमात्मा 9. सुख दुःख बताने वाला 10. परम पद परमात्मा 11. जीवात्मा 12. गंध के स्थान 13. जीवात्मा 14. ज्ञानरूप चक्षु वाले 15. शुद्ध अशुद्ध वायु 16. नाशवान. 17. पोषण करे