श्रीमद्भगवद्गीता
24-02-2026
ब्लॉग-14
चौदहवॉं अध्याय
सृष्टि का सब कर्तृत्व प्रकृति का ही है. पर एक ही प्रकृति से विविध सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है? मानवी सृष्टि भी त्रिगुण प्रकृति का ही विस्तार है. स्थावर सृष्टि भी उसी का विस्तार है. कृष्ण कहते हैं- प्रकृति मेरी योनि है, मैं ही उसमें गर्भ रखता हूँ और मैं ही उनका वीजदाता पिता हॅूं. प्रकृति से ही सत रज तम तीनों गुणों की उत्पत्ति होती हैं. ये ही तीनों गुण देही (क्षेत्रज्ञ) को देह (क्षेत्र) में बॉंध लेते हैं. इन्हीं की मात्राओं की कमी बेशी से किसी की प्रमुख वृत्ति निर्मित होती है.
# हि.प०-यहॉं भगवान अर्जुन को फिर से उस परम ज्ञान को बता रहे हैं-
श्री भगवान ने कहा:
फिर मैं कहूँगा परम ज्ञान जो उत्तम सब
ज्ञानों में
जिसे जान मुक्त हो मुनिजन परम सिद्धि को पाए
।1।
कर धारणा ज्ञान की इस जो प्राप्त स्वरूप को मेरे
जन्म न लेते सृष्टि-आदि में व्याकुल हों न प्रलय
में ।2।
मूल प्रकृति योनि मेरी मैं गर्भ रखूँ चिद1 उसमें
सभी प्राणियों की होती उत्पत्ति उसी
से भारत! ।3।
होते हैं जितने प्राणी उत्पन्न सभी योनियों2 में
माता उनकी प्रकृति पिता कौंतेय! बीज-दाता मैं ।4।
महाबाहु! उत्पन्न प्रकृति से सत रज तम गुण
तीनों
मिलकर देते
बॉंध
देह में अविनाशी देही
को ।5।
इनमें सत् निर्मल होने से रहितविकार प्रकाशक
अनघ3! बॉंध देता
देही को ज्ञान और सुख-संग4 से
।6।
रागरूप रजगुण को जानो तृष्णासक्ति5 से जन्मा
कर्मों
के फल-संग बॉधता प्राणी को कौंतेय! यही ।7।
तम जानो अज्ञानजनित है देहमानियों6 को मोहे
यह आलस निद्रा प्रमाद से
उन्हें बॉंधता भारत! ।8।
सत्व लगाता सुख में रजगुण कर्मप्रवृत्त7 करता है
तमस ज्ञान को ढॅंक भारत! करता प्रमाद में उन्मुख
।9।
दबा रजोगुण व तमगुण को भारत! बढ़े सतोगुण
रजस बढ़े दाब सत तम व तमस दबा सत रज को ।10।
जब अंतः
व देहेंद्रिय8 में निर्मल
ज्ञान उपजता
तब जानना चाहिए यह कि बढ़ा
हुआ सतगुण है ।11।
भरतश्रेष्ठ! रज के बढ़ने पर कर्म-प्रवृत्ति, लोभ,कामी9
कर्मारंभ स्वार्थवश, इच्छा व अशांति
हैं जगतीं ।12।
कुरुनंदन!
तमगुण
बढ़ने पर अंधकार अंतर में
अप्रवृत्ति
कर्तव्य-कर्म में
मोह प्रमाद जनमते ।13।
बढ़े
काल में सतगुण के जब मनुज
मृत्यु पाता है
जाता
वह निर्मल लोकों को उत्तम वेत्ताओं10 के ।14।
बढ़े रजस में
मरे जो, जन्मे कर्मासक्त
जनों में
मरता बढ़े तमोगुण
में जो मूढ़ योनि
में जन्मे ।15।
पूण्य कर्म का फल सात्विक व निर्मल कहा गया है
दुख
राजस कर्मों का फल अज्ञान
तमस कर्मों का ।16।
ज्ञान सतोगुण से पैदा हो लोभ उत्पन्न रजगुण से
करता
है उत्पन्न तमोगुण मोह प्रमाद11अज्ञान सभी ।17।
सात्विक जाते उच्चलोक को राजस मृत्युलोक रहते
निंदनीय तमगुण में स्थित पुरुष अधोगति को पाते ।18।
द्रष्टा जब देखे
त्रिगुणों के सिवा न
कोई कर्ता
जाने गुण से पर निज को मेरे
स्वरूप को पाता ।19।
देहोत्पत्ति-हेतु12
त्रिगुणों का कर मनुष्य उल्लंघन
जन्म जरा मृत्यु
के दुख से छूट अमरता पाए
।20।
# हिन्दी पद्यकार०अर्जुन ने पूछा- भगवन! त्रिगुण से परे हो गए मनुष्य कैसे होते हैं:
अर्जुन ने पूछा:
होते युक्त लक्षणों से किन त्रिगुणातीत13मनुष्य
प्रभो!
क्या उनके आचरण, वे होते त्रिगुणों से अतीत कैसे ।21।
# हि.प०- भगवान बताते हैं कि त्रिगुणातीत मनुष्यों में मोह प्रकाश और मनुष्य-सुलभ प्रवृत्तियॉ भी अच्छे से प्रवृत हो जाएँ तो उनमें द्वेष नहीं होता और प्रवृत न हों अर्थात निवृत हों तो उन्हें उनकी चाह नहीं होती.
श्री भगवान ने कहा:
पाने पर प्रकाश14 मेाह15 व
कर्म-प्रवृत्ति16 के,पांडव!
गुणातीत17 करते न द्वेष, न चाहें
प्राप्त न होने पर ।22।
उदासीन साक्षी-सा स्थित विचल न जो त्रिगुणों से
गुण ही अपना काम करें यह समझ अडिग जो रहता ।23।
जाने सम स्वर्णाश्म-मृदा18 जो समस्थित
दुख-सुख में
सम हो प्रिय अप्रिय में स्तुति निंदा में सम
भाव भरा ।24।
मित्र
शत्रु मानापमान में सम, व सब आरम्भों19 में
कर्ता
का अभिमान नहीं वह
गुणातीत कहलाता ।25।
अव्यभिचारी20 भक्तियोग से जो मेरी सेवा करता
होता पात्र ब्रह्म
पाने का
लॉंघ गुणों को तीनों
।26।
क्योंकि ब्रह्म अविनाशी
शाश्वत धर्म और अमृत का
और सुखों का ऐकांतिक
मैं एकमात्र आश्रय हूँ ।27।
गुणत्रयविभागयोग नाम का चौदहवॉं अध्याय समाप्त
1चेतन 2. मनुष्य पशु आदि योनि 3. अर्जुन 4. सुख के योग से 5. तृष्णा और आसक्ति 6. देह के अभिमानियों को 7. कर्म में लगाता है 8. देह और इन्द्रियों 9. कामना से भरा 10. तत्व को जानने वालों 11. आलस्य 12. देह उत्पत्ति के कारणरूप त्रिगुण 13. तीनों गुणों से परे 14. सतोगुण के कार्यरूप प्रकाश 15. रजोगुण के कार्यरूप मोह 16. तमोगुण के फलरूप कर्म की प्रवृत्ति 17. गुणों से परे 18. सोना, पत्थर, मिट्टी 19. कर्मों के शुरू करने में 20. सदाचारी या अविरोधी
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