Friday, 27 February 2026

श्रीमद्भगवद्गीता -16

 श्रीमद्भगवद्गीता

27-02-2027 


ब्लॉग-16

 

                              सोलहवॉं अध्याय

कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के भेद से संसार में जैसी विचित्रता उत्पन्न होती है उसी तरह मनुष्यों में भी दो भेद दैवी सम्पद वाले और आसुरी सम्पद वाले होते हैं. वह उनके कर्मों का वर्णन कर बताते हैं कि उन्हें कौन सी गति प्राप्त होती है.

# हिन्दी पद्यकार० -भ्गवान अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य दैवी और आसुरी संपद के लक्षणों के साथ उत्पन्न होते हैं.

श्री भगवान ने कहा:

(दैवी संपद के लक्षण हैं:)                                                                                                                                                                                                                                                

       ज्ञान - योग1 में  दृढ़  स्थिति   अंतःशुद्धि  निडरता

       यज्ञ2 दान इंद्रिय-दम3तप स्वाध्याय हृदय-मन-आर्जव41

       सत्य  अहिंसा  क्रोधरहितता  मन  की  शांति अनिंदा 

       दया  प्राणियों  पर  लज्जा  मृदुता  अलोभ  अचपलता ।2

       क्षमा  तेज  धृति5  शत्रुरहितता अमानिता6 व शुचिता

       भारत!   ये  उनके   लक्षण  जो  उगे7   दैवि-सम्पद  में  3 

आसुरी संपद के लक्षणः

        पार्थ!   दंभ  अभिमान  दर्प   अज्ञान   क्रोध  निष्ठुरता

        ये  लक्षण  उनके   जन्मे  जो  पुरुष  असुर  सम्पद  में ।4

# हि.प०- दैवी संपद और आसुरी संपद के प्रभावः

        दैवी   सम्पद    मुक्ति   हेतु   आसुरी  हेतु  बंधन  का

        तू  जन्मे   दैवी  सम्पद  में  शोक    कर  तू पांडव! ।5

# हि.प०-भगवान अर्जुन से कहते हैं. लोक में दो स्वभाव वाले प्राणी हैं-दैवी और आसुरीः

        प्राणि-सृष्टि   लोक  में  दो  हैं   पार्थ!  आसुरी  दैवी  

        दैवि  कहा विस्तरशः मैंने सुन आसुरी सृष्टि को अब ।6

        आसुर हों किसमें प्रवृत्त8 हों किससे निवृत्त9 न जानें 

         तो वाह्यशुद्धि उनमें न  श्रेष्ठ आचार सच-पालन ।7

        वे  कहते  हैं जग असत्य है  बिन  आश्रय बिन ईश्वर

        पैदा  स्वतः   स्त्री-पुरुष   से   मात्र  वासना  कारण ।8

        उक्त  दृष्टि  का  आश्रय  ले  वे  मंद  बुद्धि  नष्टात्मन10   

        होते  जग  के  शत्रु   क्रूरकर्मा  विनाश   का  कारण ।9

       आश्रय  ले  दुष्पूर11  काम  का   मान-दंभ-मद-माते  

       अशुचिव्रती12  मोहवश  गह आचार भ्रष्ट जग-विचरें ।10 

       मरने  तक  रहने वाली  अति चिंताओं  के आश्रित    

       तत्पर काम भोग  में मानें-  जो सुख है यह  ही है 11

       अतः बॅंधे शत आशपाश13  में काम  क्रोध  के आश्रित

       काम-भोग  के लिए  अनीति से  धन-संग्रह  में लगते ।12

       प्राप्त  आज  इतना,  सोचें, कल  पूर्ण  मनोरथ होगा

       इतना  धन  है  पास  और  कल वह  भी होगा  मेरा ।13

       मारा  गया   शत्रु  वह   मुझसे   और  अन्य मारूँगा

       मैं  ईश्वर  भोगी  मैं  ही  मैं  सिद्ध   सुखी  बलशाली ।14

       मैं  कुटुंब  वाला  धनाढ्य मैं अन्य  कौन मुझ सम  है

       यज्ञ  करूँ   दान  मौज  वे  यों अज्ञान  से  मोहित ।15

       तरह  तरह  से  भ्रमित-चित्त   फंसे   मोह-फंदों में

       कामभोग-आसक्त  लोग  ये  अशुचि  नरक में  गिरते ।16

       मान  स्वयं   को  श्रेष्ठ  धमंडी  चूर  हुए  धन-मद  में

       नाममात्र   यज्ञों   द्वारा   विधिरहित  करें   वे  पूजा ।17

 

       अहंकार  बल   दर्प   कामना   क्रोधाश्रित   परनिंदक   

       अपने पर शरीर में थित14 मुझहृद-यामी15 से द्वेष करें।18

       ऐसे  क्रूर  स्वभाव  अशुचि  उन  द्वेषी  नराधमों  को

       बार-बार डालता  मैं  जग  में  असुर-योनियों  में ही ।19

       मूढ़  जन्म  जन्मान्तर  में  आसुरी   योनि   को   पाए

       प्राप्त   हों   कौंतेय!  मुझे  वे  पाते  और  अधोगति ।20

       काम  क्रोध  लोभ  ये  तीनों   द्वार  त्रिविध  नरक के

       करते  नाश  आत्मा  का,  त्यागना   चाहिए   इनको ।21

       इन  तमरूप   नरक-द्वारों  से  रहित  हुआ पुरुष जो

       करता   है  मंगल  अपना  कौंतेय!   परमगति  पाता ।22

       जो तज  शास्त्र-विधान आचरण  मनमाना करता है

       वह न सिद्धि  और सुख पाता  पाता नहीं परमगति ।23

       तेरे लिए  प्रमाण शास्त्र  है  कार्य-अकार्य  निर्णय  में

       जान शास्त्र  से नियत कर्म  ही तुझे उचित है करना ।24

       देवासुरसंपद्विभागयोग नाम का सोलहवॉं अध्याय समाप्त

1 ज्ञान व कर्मयोग में 2. यज्ञ का आचरण 3. इन्द्रिय-संयम 4. सरलता 5. धीरज 6. मान का अभाव 7.उत्पन्न 8. लगें 9. अलग हों 10. नष्ट स्वभाव वाला 11. पूरा न होने वाली वासना 12. मिथ्या सिद्धांत के लिए 13. आशा के बंधन में 14. स्थित 15. ह्रदय में रहने वाले मुझ अन्तर्यामी से.  

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव 

715 D, Parvatipuram, Chakshahussain,

Basharatpur, Gorakhpur, 273004, U P

Email-sheshnath250@gmail.com

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