श्रीमद्भगवद्गीता
16-02-2026
ब्लॉग-8
आठवॉं अध्याय
कर्मयोग में अर्जुन को रस आने लगा है. कृष्ण के सामने उन्होंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी है. वह अध्यात्म, ब्रह्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ जैसे पारिभाषिक पदों को समझना चाहते है. वह यह भी जानना चाहते है कि अंत समय में वे कर्मयोग से युक्त पुरुषों द्वारा किस प्रकार जाने जाते हैं? कृष्ण उन पदों के अर्थ अर्जुन को बिस्तार से बताते हैं. कहते हैं कि जो मेरे स्वरूप को पहचान लेता है मैं उसे नहीं भूलता. अतः सभी कालों में तू मेरा स्मरण करता हुआ युद्ध कर. इसके बाद अक्षर कौन है, संसार का कब और कैसे संहार होता है तथा परमेश्वर को प्राप्त और अप्राप्त मनुष्य की क्या गति होती है, की चर्चा करते हैं.
# हिन्दी पद्यकार०-अर्जुन,भगवान की देशना में अभी तक अध्यात्म, ब्रह्म, अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञ के बारे में सुनते रहे, अब उनके अर्थ जानना चाहते हैं:
अर्जुन ने पूछा:
क्या अध्यात्म ब्रह्म क्या है क्या कर्म
कहो पुरुषोत्तम!
किसे कहा
अधिभूत नाम से
कहें किसे अधिदैवत ।1।
कौन यहॉं
अधियज्ञ? देह
में कैसे यह मधुसूदन!
युक्त1 पुरुष से अंत
समय
तू कैसे जाने जाते?
।2।
श्री भगवान ने कहा:
ब्रह्म परम अक्षर अध्यात्म है मूल
भाव जीवों का2
कर्म सृष्टिव्यापार
रचे जो भूतभाव3 चराचर ।3।
क्षरस्थिति अधिभूत प्राणि की और पुरुष3 अधिदैवत
मैं
ही हूँ अधियज्ञ4 देह
में श्रेष्ठ देहभृत5 अर्जुन! ।4।
मरते समय देह त्यागे
जो मुझे
स्मरण करके
पाता
वह मेरे स्वरूप को तिल
संदेह
न इसमें ।5।
करके जो स्मरण
भाव, जो देह अंत में छोड़े
पाए उसी
भाव को वह कौंतेय! हो जिनमें भावित6
।6।
अतः करो स्मरण मुझे
सब समय युद्ध भी कर तू
अर्पित किए बुद्धि मन मुझमें प्राप्त हो मुझे असंशय ।7।
योग-अभ्यासयुक्त मन से
जो इधर उधर न भटके
परम
पुरुष का चिंतन-कर्ता पार्थ! परम को पाता ।8।
जो
करता स्मरण सूक्ष्म-अति सूक्ष्म अनादि जगधाता7
सूर्य-सदृश8 अज्ञान परे
सर्वज्ञ अचिंत्य नियंता ।9।
भक्तियुक्त
वह अंत समय दृढ़चित्त योगबल द्वारा
सम्यक थिर भौं बीच प्राण कर प्राप्त परम को होए ।10।
कहें वेदविद
अक्षर जिसको वीतराग प्रविशें9 जिसमें
ब्रह्मचर्यव्रत रखें10जिसे पाने को
वह पद-सार11सुनो ।11।
रोक
इंद्रियों को विषयों से मन निरुद्ध करके उर
में
स्थापित कर प्राण शीश में योगधारणा11 में स्थित-।12।
ऊँ एकाक्षर
ब्रह्म
उचार जो मुझे स्मरण करता
जाता छोड़ मनुष्य देह वह उत्तम
गति पाता है ।13।
नित्य करे स्मरण
पार्थ!
जो हो अनन्यमन मेरा
मुझमें नित्ययुक्त12 उस योगी को मैं
पूर्ण सुलभ हूँ ।14।
मुझे प्राप्त
कर महतात्मा जन परम सिद्धि को पाए
प्राप्त न होते पुनर्जन्म को
क्षणभंगुर घर दुख का ।15।
ब्रह्मलोक तक सभी लोक हैं अर्जुन! पुनरावर्ती13
मुझे
प्राप्त होने पर,पर कौंतेय!
न जन्म
पुनः हो ।16।
जो ब्रह्मा
के सहसयुगी14 दिन जाने और सहस्रयुगी
ब्राह्मरात्रि को जाने, वे ही अहोरात्रि15 को जाने ।17।
सभी व्यक्त
जन्मे अव्यक्त16 से
ब्राह्मदिवस के उगते
ब्राह्मरात्रि-आरंभ
काल में लीन
अव्यक्त में होते
।18।
वही प्राणि समुदाय पार्थ! हो हो उत्पन्न प्रकृतिवश
होते
रात लीन हो जाते
जन्में दिन उगते ही ।19।
उस
अव्यक्त से परे अन्य जो भाव अव्यक्त17सनातन
सभी
प्राणियों के विनाश पर भी वह नष्ट न होता
।20।
उस अक्षर अव्यक्त भाव को पूत परमगति कहते
पाकर
जिसको
जीव न लौटे धाम परम वह मेरा ।21।
जिसके
अंतर्गत सब प्राणी व्याप्त जगत जिससे है
परमपुरुष
वह लभ्य18 पार्थ! है एकनिष्ठ भक्ती से ।22।
भरतश्रेष्ठ! मैं काल कहूँगा
दोनों
जिसमें योगी
देह
त्याग कर गए
लौटते और न लौटते
वापस ।23।
अग्नि ज्योति दिन शुक्लपक्ष छह मास उत्तरायण
के
काल19
गए तन त्याग ब्रह्म्रविद परमब्रह्म्र को पाते ।24।
धुँआ
रात्रि के कृष्णपक्ष
छह मास दक्षिणायन के
काल
गए तन त्याग योगिजन चंद्रज्योति पा20 लौटें ।25।
शुक्ल21कृष्ण22दो मार्ग
सनातन कहे गए हैं जग के
जा न लौटता एक
मार्ग से जा पथ
दो से लौटे ।26।
पार्थ! ये
दोनों मार्ग जानता
जो कोई भी योगी
पड़ता नहीं मोह में अर्जुन! योगयुक्त रह हर क्षण ।27।
इसे तत्व से जान दान
तप यज्ञ वेद में कहे
गए
पुण्य फ़लों को छोड़ है पाता नित्य परम पद23
योगी ।28।
अक्षरबह्म्रयोग
नाम का आठवॉं अध्याय समाप्त
1 परमात्मा से युक्त चित्त वाले 2. जीवात्मा ३. उत्पत्ति-नाश वाला पदार्थ ३.पदार्थ में स्थित सचेतन अधिष्ठाता 4. प्रधान यज्ञ 5. देहधारियों में 6. भाव किए हो 7. जग धारक को 8. सूर्य-समान ज्योति वाला 9. प्रवेश करें 10. व्रह्म्चार्य का आचरण करें 11. परमात्मा संबंधी योगधारणा 11. परम पद के बारे में संक्षेप में 12. सदा लीन 13. पुन: दोहराने वाले 14. एक सहस्रयुग चतुर्युग का 15. काल के तत्व 16. व्रह्मा की सूख्स्म देह 17. परम दिव्या पुरुष 18. प्राप्त होने योग्य 19. काल में गए 20. शुभ भोग पा 21. देव यान 22. पितृ यान 23. परमात्म पद
शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
Email- sheshnath250@gmail.com
715 D, Parvatipuram, chaksahussain,
Basharatpur, Gorakhpur, 273004. UP.
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