Monday, 23 February 2026

श्रीमद्भगवद्गीता-12

 

श्रीमद्भगवद्गीता   


                            

23-02-2026

ब्लॉग-12

 

                             बारहवॉं अध्याय                                  

कृष्ण ने अपने पूर्व के वचनों में दो तरह की उपासनाओं की चर्चा की है. एक में कहा है कर्मयोग की सिद्धि के लिए अक्षर (निर्गुण) की उपासना करने को और दूसरी में कहा है- समबुद्धि से युक्त हो परमेश्वर में बुद्धि और सभी कर्म अर्पित कर सगुण की उपासना करने को. अर्जुन जानना चाहते हैं कि इन दोनों योगों के जाननेवालों में उत्तम कौन है. उत्तर में कृष्ण उन्हें विस्तार से बताते हैं कि मुझमें मन लगाकर सदा ध्यान और भजन में चित्त लगाए जो परम श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं वे उत्तम योगी हैं. अक्षर में आसक्तचित्त साधकों को योग साधना में क्लेश अधिक होता हैं क्योंकि आसक्ति के कारण उनमें देहाभिमान की मात्रा होती है.

अर्जुन ने पूछा:

       यों जो सतत युक्त1 भक्त जन तुझ-साकार सगुण को            

       व जो निर्गुण ब्रह्म उपासते कौन   योगविद2  उत्तम ।1

श्री भगवान ने कहा:

        जो मुझमें मन लगा नित्यरत भजते3 अति श्रद्धा से              

        मेरे सगुण रूप को  मुझको मान्य  श्रेष्ठ  योगी  वह ।2     

        जो  अविनाशी  निराकार  अव्यक्त और  निश्चल व

        चिंतनपरे   सर्वव्यापी   ध्रुव   निर्विकार  को   पूजे ।3

        वे  इंद्रिय-संयमी  पुरुष सब  प्राणि-हितों में तत्पर

        सबमें   ही   समभाव  बरतते   मुझे  प्राप्त  होते  हैं ।4

        निराकार ब्रह्म में चित्तासक्त4 जनों को कष्ट अधिक  

        देहमानियों को  अव्यक्त5-गति कठिनाई से मिलती ।5

            अर्पित  कर  सब कर्म  मुझे जो  भक्त मेरे  परायण6      

        भक्तियोग  से  भजते  हैं  मुझ सगुणरूप  ईश्वर को ।6

        पार्थ!  किए जो मन मुझमें  मैं अपने  उन भक्तों का

        करता  हूँ  उद्धार शीघ्र ही मृत्युरूप-जग-निधि7  से ।7

        मुझमें  मन को लगा और तू  बुद्धि  लगा मुझमें ही

        इसके   बाद   निवास  करेगा  तू  मुझमें  निःसंशय ।8

        कर न सके यदि तू दृढ़  स्थिर मुझमें अपने मन को

        इच्छा कर अभ्यासयोग8  से मुझे धनंजय! पाने की ।9

        यदि अभ्यास-अशक्त9 तू मेरे हित हो कर्म-परायण10  

        मेरे लिए  कर्म  करता भी, प्राप्त सिद्धि  को होगा ।10

        आश्रित हुआ मेरे,साधन भी उक्त11अशक्त करने में  

        जीत बुद्धि और मन को सब कर्म-फलों  को त्यागो ।11

        श्रेष्ठ ज्ञान अभ्यास-कर्म  से ध्यान12 ज्ञान से उत्तम

        श्रेष्ठ  कर्मफल-त्याग ध्यान से  त्याग शांति देता है ।12

        सब जीवों में द्वेषरहित  सबका  प्रेमी  करुणाकर

        क्षमावान सुखदुख में सम अनहं13ममता से खाली ।13      

        दृढ़-निश्चय14संतुष्ट सदा वश किए देहेन्द्रिय15योगी  

        अर्पित किए  बुद्धि मन  मुझमें भक्त मुझे प्यारा है ।14

        जो उद्विग्न नहीं प्राणी  से प्राणि उद्विग्न  न जिससे

        भय उद्वेग  हर्ष  ईर्ष्या से जो अलिप्त  प्रिय मुझको ।15

        जो इच्छा-दुखरहित दक्ष16 शुचि17और पक्षपाती न 

        त्यागी सब कर्मारम्भों18का भक्त मेरा मुझे प्रिय है ।16  

        जो   द्वेष  शोक  करता  न हर्ष   और इच्छा ही

        त्यागी अच्छे  बुरे कर्म का वह  सभक्ति  प्रिय मेरा ।17

       जो सम  शत्रु  मित्र में  व मानापमान  में  सम  हो

       शीतउष्ण  सुखदुख-द्वंद्वों में सम  आसक्ति रहित हो ।18

       जो समझे स्तुति निंदा सम मितभाषी तुष्ट19कुछ में20  

       स्थिरमति जो अनिकेत21 वे भक्तिमान् प्रिय मुझको ।19

       श्रद्धायुक्त परायण मुझमें जो इस धर्म्य22 अमृत को  

       सेवें अति  निष्काम  प्रेम  से वे मुझको अतिप्रिय  हैं ।20

             भक्तियोग नाम का बारहवॉं अध्याय समाप्त

1.निरंतर भजन में लगे 2. योग का ज्ञाता 3. सदा भजन ध्यान में लगे 4. आशक्तचित्त 5. अव्यक्त से जुड़ी गति 6. आश्रय में 7. संसार रूपी सागर 8. कीर्तन मनन पठन आदि से बार बार प्रयत्न कर 9. बार बार प्रयत्न करने में असमर्थ 10. मुझको पाने के लिए शास्त्र में कहे कर्म करने में लीन हो जा  11. ऊपर बताए कर्म 12. परमेश्वर का ध्यान 13. अहंकार रहित 14. मुझमें दृढ निश्चय वाला 15. देह की इन्द्रियों को 16. आलस्य छोड़ कर कर्म करने वाला 17. बाहर भीतर से पवित्र 18. सब कर्मों के आरम्भ का 19. संतुष्ट 20. जितने में निर्वाह हो 21. ठिकाना अस्थिर 22.धर्ममय

 शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

७१५ डी. पर्वतीपुरम, चक्शाहुसैन,

बशारतपुर, गोरखपुर, २७३००४, उत्तर प्रदेश 

Email- sheshnath250@gmail.com 


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