श्रीमद्भगवद्गीता
24-02-2026
ब्लॉग-13
तेरहवॉं अध्याय
इस
अध्याय में मनुष्य के शरीर और उसमें स्थित आत्मा की चर्चा की गई है. कृष्ण कहते
हैं कि मनुष्य का शरीर क्षेत्र है और आत्मा उसमें क्षेत्रज्ञ के रूप में निवास
करता है. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विचार सांख्य विवेचन में प्रकृति और पुरुष नाम से
किया गया है. वह कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष के भेद को पहचान कर अपने ज्ञान-चक्षुओं
से जो परमात्मा को जान लेता है वह मुक्त हो जाता है. सब काम प्रकृति करती कराती है.
यह जान लेने से कर्म बंधनकारी नहीं होते.
# हिन्दी पद्यकार०-भगवान अब अर्जुन को शरीर की
वास्तविक स्थिति को बताते हैं. कहते हैं -यह शरीर भौतिक तत्वों से बना क्षेत्र है. मैं उसके अंतः में स्थित क्षेत्रज्ञ (आत्मा) हूँ. मैं ही शरीर को गति देता हूँ
जिससे वह अपनी क्षमता को प्रकट करता है.
श्री भगवान ने कहा :
यह
शरीर कौंतेय1! क्षेत्र है ऐसा
कहा गया है
जो
जानता इसे कहते
क्षेत्रज्ञ उसे ज्ञानी जन ।1।
और
जान क्षेत्रज्ञ मुझे ही
सब क्षेत्रों में भारत!
ज्ञान जो
है क्षेत्रज्ञ क्षेत्र
का, ज्ञान वही,मत मेरा ।2।
वह
क्षेत्र क्या है कैसा है,क्या विकार, क्या किससे2
ऐसे ही क्षेत्रज्ञ
कौन व क्या प्रभाव सुन मुझसे ।3।
ऋषियों
ने गाया बहुविधि है इसे पृथक छंदों में
कहा पदों में ब्रह्मसूत्र
के हेतु दिखा निश्चित कर ।4।
नोटः- कुछ भगवद्गीताओं में तेरहवॉं अध्याय निम्न
श्लोक से आरंभ होता हैः
प्रकृतिं पुरुषं चैव
क्षेत्र क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ।।
# रूपा०- प्रकृति पुरुष क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ किसे कहते केशव! ।
मैं जानना चाहता हूँ यह ज्ञान और ज्ञेय क्या है ।। यह श्लोक शांकरभाष्य, गीतारहस्य और गीता प्रेस की प्रतियों में नहीं है.
# हि.प०-भगवान यहॉं अर्जुन को ज्ञान और अज्ञान का
भेद बता रहे हैं:
महाभूत
पॉंच बुद्धि मन अहं प्रकृति दस इंद्रिय
इंन्द्रिय-विषय पॉंच गंध रस रूप शब्द
स्पर्श तथा ।5।
इच्छा
द्वेष चेतना सुख-दुख देह-पिण्ड व धीरज
इन्ही विकारों का समूह सविकार क्षेत्र कहलाता ।6।
मान, दंभ का भाव नहीं सारल्य
क्षमा स्थिरता
गुरु-सेवा शुचिता अंतर्बहि3 मन-संयमन अहिंसा ।7।
इह4 परलोक के
भोगों में वैराग्य, अभाव अहं का
जन्म जरा
मृत्यु व्याधि व दुख को दोष समझना ।8।
अनासक्ति का भाव,
ममत्व न पुत्र
स्त्री घर में
सदा चित्त का सम रहना प्रिय अप्रिय को पाने में ।9।
मुझमें
ध्यानयोग के द्वारा
एकभक्ति का होना
व स्वभाव
एकांत वास का प्रीति न भोगी जन में ।10।
नित्य
निरत5 अध्यात्मज्ञान में तत्व-अर्थ-परिदर्शन6
ये सब ज्ञान कहा इसके
विपरीत अज्ञान कहाता ।11।
# हि.प०-भगवान अब उस जानने योग्य को कहते हैं
जिसे जानकर मनुष्य परम आनंद (अमरता) को
प्राप्त होता हैः
अब मैं कहूँगा ज्ञेय जानकर जिसे मोक्ष नर पाता
वह अनादि ब्रह्म है कहते जिसे न सत न असत ही ।12।
उसके सभी
ओर हाथ पद शीश और मुख आँखें
सभी ओर कान
वाला वह सर्व
व्याप्त कर स्थित ।13।
सर्वेन्द्रिय-विषयों7
का ज्ञाता किन्तु बिना इन्द्रिय के
अनासक्त
हो जग-भर्ता8 गुणरहित गुणों का भोक्ता ।14।
सभी प्राणियों
के बाहर भीतर वह और चराचर9
अविज्ञेय10 सूक्ष्म होने से
वह समीप दूर हो भी ।15।
अविभक्त हो भी
विभक्त-सा स्थित सब प्राणी में
वही ज्ञेय सबका उत्पादक
भर्ता संहारक है ।16।
वह11 है ज्योति ज्योतियों की व तम से परे
कहाता
ज्ञानरूप
जानने योग्य वह ज्ञानप्राप्य12,सब-उर
में ।17।
क्या है ज्ञान ज्ञेय
क्षेत्र यह
कहा तुझे थोड़े
में
इसे जानकर भक्त
मेरा मेरा स्वरूप
पा लेता ।18।
# हि.प०-भगवान अब प्रकृति और पुरुष के बारे में
बता रहे है:
समझो प्रकृति पुरुष दोनों का कोई आदि नही है
जानो
तू उत्पन्न प्रकृति से गुणों13 विकारों14 को भी ।19।
प्रकृति
हेतु से होते हैं
उत्पन्न कार्य व कारण
सुखों दुखों के भोक्तापन में पुरुष15 हेतु कहलाता ।20।
पुरुष प्रकृति में स्थित होकर प्रकृति-गुणों16को
भोगे
उॅच नीच योंनियों में गुण-संग17 जन्म का कारण ।21।
पुरुष
रूप से परमात्मा रह तन में भी है पर18, वह
उपद्रष्टा19
भोक्ता अनुमन्ता20 भर्ता और
महेश्वर ।22।
पुरुष
प्रकृति को इसप्रकार जो साथ गुणों के जाने
सभी तरह
वर्तता हुआ भी
जन्म नहीं फिर लेता ।23।
कई
देखते ध्यानयोग से स्वयं
आत्म को स्व में
कई देखते ज्ञानयोग
से
कर्मयोग से कई उसे ।24।
अन्य
जो ऐसा नहीं जानता उपासता सुन पर से
श्रुत
अनुसार आचरण करके मृत्यु पार
कर जाता ।25।
# हि.प०- भगवान अर्जुन को बता रहे हैं कि जड़ जंगम प्राणी कैसे जन्मते
हैं:
जितने भी जड़ जंगम प्राणी होते हैं उत्पन्न, सभी
भरतर्षभ! तू जान उत्पन्न क्षेत्रज्ञ क्षेत्र के संग21 से ।26।
सभी
नष्ट होते भूतों में देखे जो
परमेश्वर
नाशरहित समभाव में स्थित वही देखता सच में ।27।
क्योंकि
मनुज जो सम देखे सर्वत्र ईश को सबमें
करे न
स्वयं नष्ट अपने को पाता वही परम गति ।28।
जो
सब तरह प्रकृति के द्वारा
कर्म वर्तते22 देखे
और अकर्ता देखे निज को वह
यथार्थ लखता है ।29।
पृथक भाव प्राणियों के जब देखे एक परम23 में
व सबका
विस्तार परम से परम ब्रह्म वह पाता ।30।
होने
से अनादि व निर्गुण वह अव्यय
परमात्मा
देह
में रह भी करे न कुछ कौंतेय! लिप्त न होता ।13।
यथा
गगन सर्वत्र व्याप्त है सूक्ष्म न कहीं लिपटता
तथा व्याप्त सर्वत्र आत्मा तन
में लिप्त न होती ।32।
जैसे सूर्य
एक ही करता जग
संपूर्ण
प्रकाशित
वैसे ही क्षेत्रज्ञ
क्षेत्र को ज्योतित करता भारत! ।33।
यों जाने
जो ज्ञानचक्षु से क्षेत्र क्षेत्रज्ञ
का अंतर
और प्रकृति से अलग स्वयं को परम ब्रह्म पाते हैं ।34।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग नाम का तेरहवॉं
अध्याय समाप्त
1कुन्तीपुत्र 2. किस विकार से क्या होता है 3. भीतर भाहर 4. इस लोक 5. लगातार लगे रहना 6. तत्व के अर्थरूप परमात्मा को देखना 7. सभी इन्द्रियों की विषय-वासना 8. संसार का पोषण कर्ता 9. चर और अचर है 10. न जानने योग्य 11. वह ब्रह्म 12.तत्वज्ञान से प्राप्त किए जाने वाला 13. त्रिगुणात्मकपदार्थ14.राग द्वेषादि 15. परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) 16.प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को 17. त्रिगुणों का साथ 18. देह से भिन्न आत्मा 19. पास रह कर देखनेवाला 20. अनुमोदन करने वाला 21. संयोग से 22. किए जाते हुए 2. परमात्मा
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