Sunday, 31 January 2016

अंगुलिमाल / कहानी


रचनाकार में प्रकाशित   31.01.2015


पूर्व प्रसंग 
समय लगभग ईस्वी पूर्व 500. ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध लोगों तक अपनी देशना पहुँचाने के लिए गाँव गाँव भ्रमण करते थे. भ्रमण करते हुए एक बार वह कोशल महाजनपद की राजधानी सावत्थी (श्रावस्ती) के एक गाँव में थे. वहाँ वह अपने शिष्यों के बीच अपनी देशना देते थे. आस-पास के गाँव के लोग भी उनकी देशना सुनने आते थे. धर्म-देशना के समय तथागत को अनुभव हुआ कि गाँव के लोग कुछ सहमे-से लग रहे हैं. कोई भी पुरवासी खुले मन से इस देशना में नहीं आ रहा. जो आ रहे हैं उनका भी ध्यान देशना को सुनते समय उनकी ओर न होकर अन्य ओर विचलित होता रहता है जैसे कि उनके मन में उनकी ओर किसी हानि पहुँचाने वाले तत्व के आ जाने का भय लगा हो. उन्होंने इस भासित होने वाले तथ्य से अपने शिष्यों को आगाह किया. क्योंकि वे भिक्षाटन के लिए गाँवों में जाते रहते है.
उन्होंने स्वयं भी पुरवासियों की मनस्थिति को जानने की चेष्टा की. उन्हें ज्ञात हुआ कि इस अंचल के पुरवासियों के मन पर किसी अंगुलिमाल नाम के डाकू का आतंक छाया हुआ है. वह दुर्दांत है. वह जंगल से होकर जानेवाले पथिकों और व्यापारियों की हत्या कर उनके दाएँ हाथ की एक-एक उँगली काट लेता है. उँगली के लिए वह तीर्थयात्रियों की भी हत्या कर देता है. वहाँ के वासियों के मन में उसका भय इस कदर समाया हुआ है कि उन लोगों ने जंगल के बाट से जाना आना बंद कर दिया है. वह जंगल से निकल कर पुरवासियों के घर में भी घुस जाता है और उस घर के सदस्यों की हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता है. उन काटी गई उँगलियों की माला बनाकर उसने अपने गले में पहन रखी है. वह यहाँ के लोगों में अंगुलिमाल के नाम से जाना जाता है. उसका शरीर विशाल है. उसके चेहरे पर बड़ी बड़ी मूँछें हैं. घने लटियाए हुए बिखरे बाल हैं. बड़े बड़े, लाल लाल, आग बरसाते नेत्र, उँगलियों में बड़े बड़े कटार-से नाखून और उसकी बलिष्ठ भुजाओं की कसी हुई मांसपेशियें ने उसे इतना खूंखार बना रखा हैं कि प्रतीत होता है वह हाथियों को भी चनौती दे डालता होगा.
तथागत को एक दिन यह भी ज्ञात हुआ कि अंगुलिमाल ने अबतक 999 उँगलियाँ अपनी माला में गूँथ ली है. माला में 1000 उँगलियों के गूँथने की उसकी प्रतिज्ञा है. उन्हें किसी स्रोत से यह भी ज्ञात हुआ कि इन्हीं दिनों उसकी माँ उससे मिलने जाने वाली है. वह उससे अक्सर मिलने जाती है. लेकिन इस बार वह थोड़ी डरी हुई है. सम्राट उसे जीवित या मृत पकड़ने की आज्ञा अपने सैनिकों को दे चुके हैं. उसीसे उसे अवगत कराने वह उसके पास जानेवाली है. उसके मन में उधेड़बुन है कि जाने इस बार क्या होगा. क्योंकि अगुलिमाल की माला के पूरी होने अब केवल एक उँगली की ही आवश्यकता है..
तथागत को जब ये तथ्य ज्ञात हुए तो वह कुछ चिंतित हो उठे. उन्होंने सोचा, हत्या करने का अंगुलिमाल का यह कृत्य अब चरम पर पहुँच चुका है.
तथागत को मनुष्य के मनस की गहनतम जानकारी थी. उन्होंने अंगुलिमाल के डाकू बनने की पृष्ठभूमि की सूक्ष्म छानबीन की. उन्हें ज्ञात हुआ कि अंगुलिमाल मगध जनपद के किसी गाँव के ब्राह्मण का पुत्र है. वह कोशल महाजनपद के सम्राट प्रसेनजित का राजपुरोहित है. ध्यान में डुबकी लगाकर उन्होंने उसके मनस की गति को भी जाना. उन्होंने अनुभव किया कि उसके अंतस्तल में, गहरे में कहीं करुणा की बूंदें दबी हुई हैं. वे उद्रेक की स्थिति में नहीं हैं. इसका कारण उसके मन पर हिंसा का अनिवार भार है.
उन्होंने मन में कुछ निश्चय किया और बिना किसीसे कुछ चर्चा किए जंगल की ओर चल पड़े.
डाकू अंगुलिमाल का यह अंगुलिमाल नाम उसके बचपन का नाम नहीं था. बौद्ध-धर्म की पुस्तकों में उल्लिखित है कि कोशल नरेश सम्राट प्रसेनजित के दरबार के राजपुरोहित के घर एक बालक ने जन्म लिया, सुंदर गोलमटोल. उसके चेहरे पर एक कांति खेलती थी. घर में आनंद ही आनंद था. परंपरा के अनुसार राजपुरोहित बच्चे की जन्मकुंडली बनवाने राजज्योतिषी के पास गए. राजज्योतिषी ने बच्चे के जन्म की घंटा-घटी पूछी. राजपुरोहित ने बताई. बच्चे के जन्म की घटी सुनते ही राजज्योतिषी के माथे पर बल पड़ गए. माथे पर बल पड़ते देख पुरोहित जी कुछ घबड़ाए. पूछा-
         “क्या हुआ ज्योतिषी जी? सब ठीक तो है न?”
         “इस घटी में आकाश में अशुभ नक्षत्रों का उदित होना दिखाई दे रहा है. शिशु के जन्म के समय क्या आपको कोई अनहोनी दिखी थी?”
          “हाँ ज्योतिषी जी, रात के जिस प्रहर में इस शिशु का जन्म हुआ, वह घड़ी बहुत डरावनी प्रतीत हो रही थी. आकाश में तारों की जो स्थिति हो रही थी उसे देखकर प्रतीत हो रहा था कि किसी यात्री को लूटने के लिए डाकू आकाश में तलवारें उछाल रहे हैं.”
“ राजपुरोहित जी, इस अशुभ योग में जन्मे बच्चे डाकू और हत्यारा होते हैं. कुंडली से यह भी संकेत मिल रहा है कि यह पिछले जन्म में कोई यक्ष था, मनुष्यों का हत्यारा.”
यह सुनकर राजपुरोहित को तो मानो काठ मार गया. बहुत मन्नतों के बाद घर में एक बालक भी आया तो ऐसा भवितव्य लेकर. घर में सभी के मन में उदासी छा गई. उनके मन में आया, क्यों न इस शिशु का नाम ‘हिंसक’ ही रख दिया जाए.
किन्तु पुरोहित दम्पति विचारवान थे. उन्होंने बहुत सोचा. युगप्रचलित तर्क-वितर्कों का सहारा लिया. अंततः उनका मन इस निषकर्ष पर आकर स्थिर हो गया कि भवितव्य पर किसी का वश नहीं चलता. बहुत विचार विमर्श के बाद उन्होंने निश्चित किया कि यह बालक परमात्मा की देन है. परमात्मा के आगे किसी की नहीं चलती. राजज्योतिषी से परामर्श कर उन लोगों ने उस बालक का नाम लोक-प्रथा के अनुसार ‘अहिंसक’ रखा. इस प्रथा में यह माना जाता है कि ऐसा नाम रखने से वैसा ही प्रभाव उसपर पडेगा. स्यात कहीं ऐसा हो भी जाए कि बार-बार उसे ‘अहिंसक’ कहकर पुकारने से उसके मन पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़े कि उसके मन में कभी हिंसा का भाव आए ही न. राजपुरोहित के इस प्रयास में उनके दो-एक शिक्षक साथियों ने भी उनका साथ दिया. गुरुकुल के एक आचार्य ने अहिंसक की प्रारंभिक शिक्षा को संभाला और हर संभव प्रयास किया कि उसके मन में हिंसा का विचार कभी आए ही न. उसके आगे की शिक्षा पर दूसरे आचार्य ने मनोयोगपूर्वक ध्यान दिया. इसतरह उसके स्नातक के पूर्व की शिक्षा सम्पन्न हुई.
अहिंसक पढ़ने में बहुत तेज था. वह बहुत मेधावी भी था. हर विषय में उसकी प्रतिभा बढ़ी चढ़ी थी. चाहे शास्त्र चाहे शस्त्र, सबमें उसकी प्रतिभा अनूठी थी.
पुरोहित ने सम्राट से परामर्श कर अहिंसक को स्नातक की शिक्षा के लिए तक्षशिला भेज दिया. सम्राट एवं उनके दो-एक अन्य अधिकारियों के पुत्र-पुत्री भी स्नातक की शिक्षा के लिए वहीं जा रहे थे. उस समय उँची शिक्षा के लिए तक्षशिला विश्वविद्यालय ही एकमात्र ऐसा स्थान था जहाँ बहुत ही प्रतिभाशाली शिक्षक पढ़ाने का कार्य करते थे. दूर-दूर से प्रतिभाशाली विद्यार्थी उँची शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ आते थे.
विद्या के ये सभी अर्थी एक ही आचार्य के अधीन शिक्षा ग्रहण करने लगे.
कुछ ही समय में अहिंसक अपने गुरु का प्रिय हो गया. सीखने, समझने और मेधा में वह बहुत कुशाग्र था. अपने अन्य साथियों से वह हर बात में बढ़ा चढ़ा था. गुरु ही नहीं गुरु-पत्नी भी अहिंसक के सौम्य व्यवहार से बहुत प्रसन्न थीं. कोशल-राजकुमारी भी शस्त्राभ्यास अधिकतर अहिंसक के साथ ही करती थी. आचार्य के शिक्षालय में उसे अन्य शिष्यों की अपेक्षा अधिक सुविधाएँ उपलब्ध थीं. अहिंसक के साथ इन लोगों का अपनी अपेक्षा अधिक प्रिय व्यवहार और उसे उनसे अधिक सुविधाएँ दिए जाते देख उसके कुछ साथियों के मन में उसके प्रति ईर्ष्या होने लगी. उसके प्रति उनकी यह ईर्ष्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही चली गई. कभी कभी ये अहिंसक से उलझ भी जाते थे. लेकिन उससे पार नहीं पा पाते थे. कहते हैं उसमें सात हाथियों के बराबर का बल था.
जब अहिंसक को किसी भी तरह उसके साथी नीचा नहीं दिखा सके तब उन लोगों ने सोचा, क्यों न ऐसा प्रयास किया जाए कि आचार्य जी उसे दीक्षा ही न दें. इसके लिए वे उनके मन में उसके प्रति घृणा के भाव उत्पन्न करने की चेष्टा करने लगे. वे आए दिन गुरु के पास उसकी उलाहना लेकर आने लगे. ऐसी ऐसी उलाहनाएँ जो आचार्य के मन में अहिंसक के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करते थे. एक दिन इन लोगों ने उसपर यह भी दोष मढ़ दिया कि अहिंसक गुरुमाता के प्रति कुदृष्टि रखता है. वह आचार्य से अपने को अधिक बुद्धिमान भी समझता है.
अहिंसक के प्रति निरंतर इन उलाहनाओं को सुनकर गुरुजी के क्रोध का पारावार नहीं रहा. उनकी भौंहें क्रोध वमन करने लगीं. वह उसे कठोर दंड, कदाचित मृत्युदंड देने का अवसर ढूँढ़ने लगे. किंतु शिक्षक के रूप में वह ऐसा नहीं कर सकते थे. ऐसा करना संस्था के नियमों के प्रतिकूल तो था ही, उनकी प्रतिष्ठा के भी प्रतिकूल होता. अतः उन्होंने शिक्षा-सत्र के समाप्त होने की प्रतीक्षा की.
धीरे धीरे शिक्षा का सत्र समाप्त हुआ. आचार्य ने अहिंसक से कहा-
          “अहिंसक, अब तुम्हारी शिक्षा समाप्त हुई. गुरुदक्षिणा देने के लिए तत्पर हो जाओ”.
उस समय शिक्षा सम्पन्न हो जाने पर दीक्षा दी जाती थी. किंतु उसका स्वरूप आज के दीक्षांत जैसा नहीं था. उस समय जिस आचार्य के अधीन शिष्य शिक्षा ग्रहण करता था वह आचार्य ही उसे दीक्षा देते थे. और दीक्षा के लिए आचार्य को शिष्य द्वारा दक्षिणा देने की परंपरा थी. शिष्य आचार्य से पूछते थे- “गुरुजी, क्या देकर मैं आपको प्रसन्न करूँ”. और गुरुजी जो माँगते थे उसे उन्हें देना पड़ता था.
दीक्षा के लिए जब अहिंसक आचार्य के सामने आया तो गुरुजी ने उससे दक्षिणा में 1000 उँगलियाँ माँग लीं. गुरुजी किसी तरह उसे मारना चाहते थे. सोचा, उँगलियाँ इकट्ठा करने के लिए उसे अनेक हत्याएँ करनी पड़ेंगीं. ऐसा करने में वह स्वयमेव मारा जाएगा. और उनका प्रतिशोध भी पूरा हो जाएगा. उन्होंने अहिंसक से कहा-
“दक्षिणा में तुमसे मुझे मनुष्य के दाएँ हाथ की एक हजार उँगलियाँ चाहिए. और प्रत्येक उँगलियाँ अलग अलग मनुष्य की होनी चाहिए.”
उसके इर्ष्यालु साथियों ने जब यह सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुए. उनकी मनोकामना पूरी हो रही थी. लेकिन गुरुमाता और राजकुमारी के हृदय को बहुत ठेस लगी. ये दोनों अहिंसक से बहुत स्नेह करतीं थीं. गुरुदक्षिणा में अहिंसक से गुरु की ऐसी माँग को लेकर वे भौंचक थीं. ऐसा क्या हो गया कि आचार्य अहिंसक के प्रति इतने असहिष्णु हो गए. अहिंसक के व्यवहार में पूरे सत्र में ऐसा कुछ नहीं दिखा जो आचार्य को रुष्ट करने का कारण बने. और किसी तरह उससे रुष्ट ही हो गए हों तो दीक्षा देने के लिए उसे हत्या की ओर उन्मुख करने की क्यों आवश्यकता आ पड़ी.
वे गुरुदक्षिणा में आचार्य की इस माँग को लेकर बहुत असहज थीं. उनके मन में विद्रोह के भाव उठने लगे थे. किंतु विश्वविद्यालय के नियम बहुत कठोर थे. उनके अभिभावक भी उनसे सहमत नहीं हो सकते थे.
आचार्य ने अहिंसक से दक्षिणा में जब मनुष्य की उँगलियाँ माँगी तो वह  हतप्रभ हो गया. स्तब्ध होकर आचार्य की ओर देखता रह गया. उसके नेत्रों में विस्मय और उदासी थी. नेत्रों के कोरों में आँसू की कुछ बूँदें छलक आईं थीं. वह समझ नहीं पा रहा था कि आचार्य ने उससे उँगलियाँ क्यों माँगी. इससे तो मेरे प्रति उनकी घृणा ही व्यक्त हो रही है. शस्त्र और शास्त्रज्ञान में उनको उसने कभी निराश नहीं किया. उनकी सेवा में उसने कोई त्रुटि नहीं की. हाँ अपने साथियों से अवश्य वह कभी कभी उलझ पड़ता था. पर इसमें भी उसके साथी ही उसे उलझने के लिए बाध्य कर देते थे. उनका चिढ़ाना कोई कबतक सहता रहे.
एक बार उसके मन में हुआ कि दक्षिणा में आचार्य की इस अव्यावहारिक माँग पर वह प्रश्न उठाए. पर कुछ सोचकर मौन रह गया. विशवविद्यालय के नियम आचार्य के ऐसी अव्यावहारिक माँगों पर कोई व्यवस्था नहीं देते.
वह संकल्प का पक्का था. अबतक वह विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करता आया था. दीक्षा के नियमों के प्रति भी वह आदर ही बरतेगा. उसने सोचा- इस माँग के पीछे गुरुजी के मन में क्या है यह तो वह नहीं जानता पर दीक्षा पूरी तभी हो सकेगी जब गुरु द्वारा माँगी गई दक्षिणा दे दी जाए. वह यह दीक्षा पूरी करेगा ही. गुरु की आज्ञा का पालन करना धर्मानुकूल कहा गया है.
जब उसके माता-पिता को इसका पता चला तो वे बहुत उद्विग्न हो गए. उन्हें ज्योतिषी की भविष्यवाणी सचमुच में घटती प्रतीत हो रही थी. उन्होंने अभीतक अहिंसक से ज्योतिषी की भविष्यवाणी की चर्चा नहीं की थी. अब उन्हें उचित प्रतीत हुआ कि उसकी चर्चा अहिंसक से कर दें. अहिंसक ने इस भविष्यवाणी को सुना, पर विचलित नहीं हुआ. किंतु उसके नेत्र अदृष्ट में टिक गए. कुछ क्षण तक उसके चेहरे पर अनेक भाव चढ़े उतरे, फिर स्थिर हो गए. कदाचित उस क्षण उसके मन में जो भाव तिरे उनमें क्रोध और क्षोभ दोनों का मिश्रण था. उसके मन में अपने साथियों के प्रति एक क्षण के लिए वितृष्णा उत्पन्न हो गई. उसके अधरों के हलचल और उससे खिंची कपोल की रेखाओं में यह स्पष्ट दिखा. उसके विषण्ण चेहरे पर उसका क्षोभ भी स्पष्ट दिख रहा था-
          “माता-पिता ने इस तथ्य से मुझे अवगत नहीं कराया. किंतु मुझे अवगत कराके वे करते भी क्या. अवगत कराने पर यह भी हो सकता था कि शिक्षा ग्रहण करने के लिए मैं तक्षशिला तक पहुँच ही न पाता. तक्षशिला भेजने के पूर्व पिता ने मुझे योग्य गुरुओं के पास रखा. इन गुरुओं के पास रहकर मेरे मन में अनूठे-अनूठे भावों का संचार हुआ. किसीको हानि पहुँचाने की बात मैंने कभी सोची ही नहीं. हाँ कभी कभी क्रोध अवश्य आता था और मैं कभी बहुत उग्र भी हो जाता था पर किसी पर प्रहार कर उसे चोट पहुँचाने की बात मेरे मन में कभी नहीं आई. अब जब दक्षिणा के लिए 1000 उँगलियाँ इकट्ठी करनी हैं तो मुझे लोगों को गहरी चोटें पहुँचानी पड़ेंगी. इसके लिए उनकी हत्या भी करनी पड़ेगी.”
यह सोच कुछ पल के लिए वह बहुत उद्विग्न हो उठा. क्या भवितव्य लेकर उसने जन्म लिया है.
उसके माता-पिता से उसकी यह उद्विग्नता देखी नहीं जा रही थी. पर साहस भी नहीं हो पा रहा था कि वे उससे कुछ कहें. माता के नेत्रों में तो रुँधे आँसू पछाड़ खा रहे थे. पर पिता ने साहस किया.
“पुत्र, अदृष्ट को कदाचित तुमसे यही कराना अभीष्ट है. दीक्षा लेनी है तो गुरु को यह भेंट देनी ही पड़ेगी. दीक्षा देने में असमर्थ होने पर दीक्षा के लिए राजा से धन माँगने का विधान है. पर यहां तो कटी हुई उँगलियाँ जुटानी है. यह अमानुषिक कार्य है. सम्राट तो इसके लिए तुम्हें अनुमति भी नहीं दे सकते. उलटे ऐसा करने से रोकने के लिए तुम्हें कारागार में डलवा सकते हैं. हाँ एक विकल्प है तुम्हारे पास, दीक्षा तुम लो ही न. यह निर्णय तुम्हें ही करना पड़ेगा. हम चाहते हैं तुम जो भी निर्णय लो पूरे मन से लो. स्मरण करो, पिता की आज्ञा के पालन में भगवान परशुराम ने थोड़ा भी आगा-पीछा नहीं किया था. अपने फरसा के एक ही प्रहार से उन्होंने अपनी माता का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया था. उन्होंने परिणाम की थोड़ी भी परवाह नहीं की थी. तब भगवान परशुराम को समाज का सामना नहीं करना पड़ा था किंतु आज तुम्हें लोगों का और स्वयं राज्यशक्ति का भी सामना करना पड़ेगा.”
पिता की बातों से उसे थोड़ा तोष हुआ. उसने मन बना लिया कि दीक्षा लेनी है तो आचार्य की आज्ञा का पालन करना ही होगा. और वह आचार्य द्वारा माँगी गई भेंट को जुटाने के लिए उद्यत हो गया.
उँगलियाँ इकट्ठा करने से पूर्व उसने पिता से परामर्श किया. क्यों न पहले कुछ प्रबुद्ध लोगों से उनकी सहमति लेकर उनकी एक उँगली माँगने की चेष्टा की जाए.
पिता से उत्तर मिला- “पुत्र, यह राजा शिवि का युग नहीं है”.
अंततः दीक्षा के लिए उँगलियाँ इकट्ठी करने का ध्येय अहिंसक के मन में दृढ़ हो गया. इसके लिए उसने ऐसे स्थान को ढूँढ़ा जहाँ से यात्रियों को मारकर वह उनकी उँगली भी काट ले और वह किसी की पकड़ में भी न आ सके. इस हेतु उसे कोशल महाजनपद के सावत्थी (श्रावस्ती) का जंगल अधिक सुरक्षित लगा. सावत्थी कोशल जनपद की राजधानी थी और मगध की सीमा से सटे मल्लगण से कुछ ही दूरी पर थी, घने जंगलों से घिरी (आज के गोरखजपुर और बस्ती जनपद के बीच कहीं, तब यह क्षेत्र घोर वनाच्छादित था). जंगल में घनी झाड़ियों से अटे एक स्थान पर उसने अपना अड्डा जमाया और अपना वांछित कार्य करने लगा. वह जंगल से होकर हाट-व्यापार के लिए जाने वालों, यहाँ तक कि तीर्थयात्रियों की भी हत्या करने लगा और उनकी उँगलियाँ काटकर वापस जंगल में लुप्त होने लगा. उसने हत्या करने के लिए हर तरह के अस्त्र–शस्त्र - तलवार, तीर धनुष आदि अपने पास रख छोड़े थे. जब पथिक जंगल से होकर जाना बंद कर देते तब वह निकट के पुरवासियों के घरों पर आक्रमण कर उनके परिवार वालों की हत्या कर उनकी उँगलियाँ काट लेता.
जब वह प्रथम उँगली के लिए एक पथिक की हत्या करने चला था तो उसे लगा था कि उसका हृदय जैसे विद्रोह कर देगा. उसने कभी कोई हत्या नहीं की थी. पल भर के लिए उसके भागते डग शिथिल होते होते रह गए थे. उस क्षण उसे अपने मन को कड़ा करना पड़ा था. मन कड़ा करने में ही उसके हाथ से तीर चल गया था और पथिक ढेर हो गया था. घायल पथिक की छटपटाहट देख उसे मूर्च्छा सी आने को हुई थी. वह कभी किसी व्यक्ति को पीड़ा से छटपटाते नहीं देखा था. पीड़ित की चीख ने उसके हृदय को मानो चीर दिया था. पर तत्क्षण उसके मन में गुरु को दीक्षा देने की विवशता सामने तड़ित सी झलकी मार गई थी. वह शीघ्र ही संभल गया था. प्रतिज्ञा मनुष्य से क्या-क्या नहीं करा लेती है.
इसके बाद क्रूरता जैसे उसकी संगिनी हो गई.
पहले तो लोगों ने इसे अप्रत्याशित आक्रमण समझा. पर जब आए दिन हत्याएँ होने लगीं और गाँव-घरों में भी घुसकर निर्दोष गृहस्थ परिवारों की  हत्या कर उनकी उँगलियाँ काटी जाने लगीं तब लोगों की समझ में आया कि ये हत्याएँ संज्ञान में की जा रही हैं. क्योंकि इसमें लूट की घटनाओं के चिह्न नहीं थे. तब इन अप्रत्याशित और आपात घटनाओं के प्रति लोग सतर्क हो गए. धीरे धीरे उन लोगों ने पता भी लगा लिया कि ये हत्याएँ एक डाकू कर रहा है. किसीने यह भी लक्ष्य कर लिया कि वह डाकू उन काटी गई उँगलियों की एक माला बनाकर अपने गले में पहन रखा है. उस दिन से वह लोगों में अंगुलिमाल के नाम से जाना जाने लगा.
अंगुलिमाल की क्रूरता का ओर नहीं था. वह उंगलियों को काट कर उनकी गिनती ठीक रहे इसके लिए वह उन्हें वृक्षों की डालों पर एक जंगली डोर से बाँधकर टाँग देता था. किंतु वन की चिड़ियाँ उनका मांस खाने के लिए उसे बिखेर देती थीं. इससे जब उँगलियों की गिनती में अव्यवस्था होने लगी तब उसने उन उँगलियों को वन की एक पतली और दृढ़ लत्तर में बाँधकर माला बनाकर उसे गले मे पहन लिया था..
अंगुलिमाल के इस कृत्य से पुरवासी भयाक्रांत हो उठे थे. लोगों में भीतर तक डर समा गया था. प्रत्येक क्षण वे अपने और अपने परिवार को असुरक्षित मानने लगे थे. बुद्ध की देशनाओं में जब वे बैठते थे तो इसी अँगुलिमाल का भय उन्हें सताता रहता था. वे देशना को भयोद्विग्न मन से ही सुनते थे. जब उन्होंने किसी भी तरह इस संकट को टलते नहीं देखा तो अपनी रक्षा के लिए सम्राट से याचना की. और आए दिन हो रही इस घटना की समूची कहानी बताई. सम्राट को लोगों ने यह भी बताया कि उनके सैनिकों ने बहुत प्रयास किया पर इस हत्या को वे रोक नहीं सके. सम्राट ने सुना और एक बड़ी सेना लेकर वह लअंगुलिमाल को मारने के लिए चल पड़े.
तथागत बुद्ध की धर्म-देशना उस जंगल के निकट के ही एक गाँव में हो
रही थी जो अंगुलिमाल के विचरण-क्षेत्र से बहुत दूर नहीं था.
जब तथागत को अंगुलिमाल के संबंध में कुछ पुरवासियों से और कुछ उनके अपने अंतर्ज्ञान से सारी स्थिसि समझ में आ गई तब वह बिना किसी से कुछ कहे जंगल के पथ पर आगे चल पड़े.
पुरवासियों ने समझा कि तथागत दैनिक भ्रमण के लिए निकल रहे हैं. कुछ दूर जाएँगें फिर लौट आएँगें. किंतु उनके कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने लक्ष्य किया कि तथागत जिस पथ पर अग्रसर हो रहे हैं वह तो अंगुलिमाल के विचरण-क्षेत्र की ओर जाता है. उन्होंने तथागत को सावधान किया. “भगवन, उस ओर ही डाकू अंगुलिमाल का बास है. वह आपको पाएगा तो मार डालेगा. बहुत निर्मम है वह. उधर आप मत जाइए. शिष्यों ने भी उन्हें रोका.
लेकिन तथागत नहीं माने. तथागत ने उन लोगों से कहा- “मुझे रोको मत. आज मैं रुक गया तो अनर्थ हो जाएगा.
जब वह नहीं माने तो कुछ शिष्य उनके साथ हो लिए. किंतु तथागत ज्यों ज्यों घने बीहड़ में आगे बढ़ते गए, शिष्य धीरे धीरे कम होने लगे. तथागत जब अंगुलिमाल के निकट पहुँचे तब वह अकेले थे.
उधर उसकी माँ भी उससे मिलने के लिए चल पड़ी थी. उसे मारने लिए सम्राट के एक बड़ी सेना लेकर चल पड़ने की सूचना उसे सूचना देने के लिए..
इधर अंगुलिमाल चौकन्ना हो जंगल से होकर जाने वाले बाटों को देख रहा था. उसे एक बाट से उसकी माँ आती दिखी. अपनी माँ को अपनी ओर आते देख वह कुछ सोच में गड़ गया. विधाता ने क्या लिख रखा है मेरे लिए. एक हजारवीं उँगली के लिए अन्य कोई नहीं मिला तो मुझे अपनी माँ की भी हत्या करनी पड़ सकती है. एक पल के लिए लाल डोरों से पटे उसके नेत्रों में माँ की वह गोद स्मरण हो आई जिसमें उसने कभी किलकारी मारी थी. जिसके अधरों के स्पर्श से उसके कपोलों में स्नेह का संचार हो उठता था, एक गुरु को दिए वचन से बँधा मुझे माँ की भी हत्या करनी पड़ेगी. ऐसा उसके मन में होते ही उसके नेत्रों से अश्रु की कुछ बूँदें उसके कपोलों पर ढुलक आईं.
तभी अन्य मार्ग से आते एक बटोही उसे दिख गया जो कदाचित उसी की ओर आ रहा था. वह कोई बटोही नहीं, स्वयं तथगत थे.
अंगुलिमाल तथागत के आने के प्रति अनभिज्ञ था. उसने समझा कोई पथिक आ रहा है. वह प्रसन्न हुआ कि अब उसे एक हजारवीं उँगली पाने की प्रतीक्षा में अपनी माँ की हत्या नहीं करनी पड़ेगी.
वह उस पथिक की ओर झपटा. किंतु कुछ निकट आने पर उसने देखा, वह उसी की ओर आ रहा है. उसकी चलने की गति देखकर थोड़ा अचंभित हुआ. कोई भूले भटके ही इधर आता है, वह भी चौकन्ना और भयभीत हुआ-सा. पर इसके शरीर में तो तनिक भी भय के चिह्न नहीं दिखाई देते. यह चौकन्ना हुआ आगे नहीं बढ़ रहा है. उसकी चाल में एक मतवालापन है. फिर भी उसने पथिक को तेज स्वर में टोका-
“ऐ पथिक”.
यह कड़क स्वर सुन बुद्ध पीछे मुड़े तो देखा, सामने एक काला पहाड़-सा विकराल व्यक्ति खड़ा है. और अंगुलिमाल ने देखा, यह कोई पथिक नहीं, एक संन्यासी है. इसके मुख पर शांति के भाव छलक रहे हैं.. उसकी समूची देह में एक सरलता खेल रही है. यह किसी सामान्य पुरुष की अपेक्षा प्रभावान है. इसके साथ एक आभामंडल-सी है. यह देख कुछ क्षण के लिए वह अपनी क्रूरता को भूल गया. उसने सोचा- “यह संन्यासी किसी अन्य देश से आया प्रतीत होता है, तभी यह मेरे भय से अपरिचित है. इसे सावधान कर देना चाहिए. मैं तो अपनी क्रूरता के लिए तो अभिशप्त हूँ किंतु इस संन्यासी के निश्छल भाव को देखकर इस संन्यासी पर हथियार चलाना मुझे उचित प्रतीत नहीं होता“. यह सोच उसने संन्यासी को चेतावनी दी.
         “संन्यासी, क्या तू नहीं जानता कि यह अंगुलिमाल का क्षेत्र है? मैं अंगुलिमाल हूँ. मैं स्वभाव से क्रूर हूँ. जो भी इधर आता है मैं उसे मार डालता हूँ. लगता है तू इधर भटक कर आ गए हो.”
“अंगुलिमाल, मैं भटककर इधर नहीं आया हूँ. मैं स्वयं अपनी इच्छा से तुम्हारे पास आया हूँ. मैं तुम्हें जानता हूँ. हत्या को तुमने अपना धर्म बना लिया है. पर हत्या करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, यह भी मैं जानता हूं. मुझे यह भी ज्ञात है कि आज किसी की हत्या कर तू 1000 वीं उँगली अपनी उँगलियों की माला में जोड़ने वाले हो. तुम्हें 1000 उँगलियाँ अपने गुरु को दक्षिणा में देनी है. तुम मुझे नहीं जानते. मैं गौतम बुद्ध हूँ. अबतक तू निर्दोषों की हत्या करता रहा है शिकार की तरह. तुम मेरी हत्या कर उस 1000 वीं उँगली को प्राप्त करो. उँगलियाँ प्राप्त करने के लिए प्रारंभ में तूने लोगों से स्वेच्छा से उँगलियाँ देने की प्रार्थना की थी. मैं स्वेच्छा से तुम्हें अपनी उँगली देने आया हूँ. यही इच्छा लेकर तुम्हारी माँ भी तुम्हारे पास आनेवाली है. किंतु मैं नहीं चाहता कि तुम मातृहंता बनो. अभीतक तुम पूर्ण पापी नहीं बन सके हो. माता की हत्या कर तुम पूर्ण पापी बन जाओगे. जिसकी कहीं क्षमा नहीं हो सकेगी.“
अंगुलिमाल बुद्ध की ये बातें सुनकर चौंका. इस संन्यासी को तो सबकुछ पता है. उसके प्रभाव को एक ओर झिटक कर बोला-
“संन्यासी, मैं किसी बुद्ध को नहीं जानता. मैं केवल अपने गुरु को जानता हूँ. प्रारंभ में लोगों ने मुझे उँगलियाँ नहीं दी इस कारण मैं हत्या में प्रवृत नहीं हुआ हूँ. मुझे ये 1000 अँगलियाँ अपने गुरु को दक्षिणा में देनी हैं. इस समय मुझे एक ही धुन है, 1000 वीं उँगली को प्राप्त करने की. तेरी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं किंतु मैं अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हट सकता. किंतु तुम्हें मारना भी नहीं चाहता. अतः मैं पुनः कहता हूँ तू चला जा. मैं किसी और को मारकर 1000 वीं उँगली प्राप्त कर लूँगा.”
अंगुलिमाल तथागत को नहीं जानता था. उनके संबंध में हवा में तिरती सूचनाएँ भी उस तक नहीं पहुँच सकीं थीं हालाँकि सम्राट प्रसेनजित तक बुद्ध के सावत्थी में आने की सूचना हो चुकी थी. वास्तव में तक्षशिला में अंगुलिमाल जब अभी अहिंसक नाम से ही स्नातक का छात्र था बुद्ध अभी गौतम ही थे. वह अभी बुद्ध नहीं हुए थे. उन्हें 43 वर्ष की अवस्था में बुद्धत्व की प्राप्ति हुई. उस समय अंगुलिमाल वनस्थ हो गया था.
बुद्ध ने कहा-
“मैं यहाँ से जाने के लिए नहीं आया हूँ. मैं तुझसे पुनः कहता हूँ. तू मुझे मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर.“
“तू नहीं मानता, तो ठहर मैं अभी तुझे मारता हूँ. “
अंगुलिमाल खाँड़ लेकर संन्यासी को मारने दौड़ा. लेकिन यह देखकर वह अचंभा में पड़ गया कि जितना ही वह संन्यासी की ओर दौड़ रहा है संन्यासी से उसकी दूरी कम नहीं हो रही. तेज गति से भागने वालों को भी दौड़ कर पकड़ते उसे देर नहीं लगती थी. पर इस संन्यासी को वह नहीं पकड़ पा रहा है. उसे लगा, जितना वह संन्यासी की ओर भाग रहा है संन्यासी भी उसी गति से पीछे की ओर भाग रहा है. (बुद्ध ने अपनी अंतर्शक्ति के बल पर उसे एक विभ्रम में डाल दिया था.)
वह क्रोध से चिल्लाया-
“संन्यासी, तू कह रहा है कि तुझे मारकर मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँ,
और मैं तुझे मारने चला तो तू पीछे भागता जा रहा है. “
बुद्ध बोले, “मैं कहाँ भाग रहा हूँ. मैंने तो वर्षों पहले भागना छोड़ दिया. मैं  अब पूर्णतः स्थिर हूँ. भाग तो तुम रहे हो. तुम अपने अंदर ढूँढ़ के देखो. तुम्हारा मन चौबीसों घड़ी भाग रहा है. भाग कर मुझे पकड़ो और मारो. हाँ, मुझे मारने के पूर्व तुम मेरा एक कार्य कर दो.“
          “ कहो.”
          “उस वृक्ष की एक पत्ती तोड़ो.”
अंगुलिमाल ने पास के वृक्ष की डाल से एक पत्ती तोड़ी और बुद्ध को देने के लिए हाथ बढ़ाया. बुद्ध ने कहा,
“इसे मुझे मत दो. इसे तुम पुनः उस डाल से उसी स्थान पर जोड़ दो जहाँ से उसे तोड़े हो.”
   “यह कैसे हो सकता है. जो पत्ती टूट गई उसे पुनः जोड़ा नहीं जा सकता.“
बुद्ध ने कहा-
“डाल से तुम पत्ती तोड़ सकते हो किंतु उस पत्ती को उस डाल के उसी स्थान पर तुम जोड़ नहीं सकते. तो सोचो, जिस जीवन को तुम पुनः दे नहीं सकते उसे तुम छीन कैसे सकते हो.”
बुद्ध द्वारा ये वाक्य ऐसे समस्वर में कहे गए थे कि इसकी चोट सीधे उसके हृदय पर पड़ी. उसकी हृत्तंत्री झंकृत हो उठी. यह झंकृति अंगुलिमाल के पोर-पोर, रंध्र-रंध्र को बेध गई. उनके उस मर्मस्पर्शी स्वर को सुन वह अंतर्विमुग्ध अवाक रह गया. ऐसी अनुभूति उसे इसके पहले कभी नहीं हुई थी. बुद्ध की बातें सुनकर उसके शरीर के अणु-अणु में न जाने क्या होने लगा कि उसके कठोर शरीर में मृदुता आने लगी, उसका तना-अकड़ा शरीर ढीला पड़ने लगा. उसके मुखमंडल पर स्पष्ट दिख रहे तनावों की बंकिम लकीरें शिथिल होने लगीं. बुद्ध को मारने को उठा हाथ उठा ही रह गया. ढीली होती उँगलियों से खाँड़ भूमि पर गिर गया. उसका शीश झुकने लगा. वह निढाल हो गया और अंततः उसका शीश बुद्ध के चरणों में झुक गया. कुछ ही भणों में वहाँ बहुत कुछ घट गया. जो अंगुलिमाल कभी खूंखारता का पर्याय होता था वह अब सरलता की मूरत लग रहा था. उसके भीतर घट चुकी अतींद्रिय अंतर्घटना ने उसमें बुद्ध का शिष्य बनने की लालसा भर दी. उसके मुँह से सहसा फूट पड़ा-
“भगवन, अंगुलिमाल आपके चरणों में है. आप मुझे अपनी शरण में ले लें, मुझे अपना शिष्य बना लें.”
और करुणावान तथागत ने उसे अपना शिष्य बना लिया.
उस समय प्रकृति भी मनोहर हो उठी थी. अंगुलिमाल की क्रूरता से वन के जिन पत्थरों, वृक्षों, वृक्षों की पत्तियों, फुनगियों और झाड़ियों में मृत्यु का ग्रास बने लोगों की अनवरत चीखों, चीत्कारों ने घुलकर उन्हें कठोर बना दिए थे उनमें अब मर्मर ध्वनि की अनुगूँज भरने लगी. धीरे धीरे मंद मंद हवाओं के स्फुरण से वन की हरीतिमा मनोमय हो रही थी.
जब उसकी माँ वहाँ पहुँची, अंगुलिमाल तथागत का शिष्यत्व ग्रहण कर चुका था.
-----शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

Friday, 24 July 2015

हिंदी कोशों में भिन्न भिन्न शब्द-क्रम - महावीर सरन जैन का प्रत्युत्तर

गुरुवार, 23 जुलाई 2015


प्रो. महावीर सरन जैन
"हिंदी कोशों में भिन्न भिन्न शब्द-क्रम" शीर्षक आलेख पढ़ा। जो सवाल लेखक ने उठाया है वह तार्किक है। इसका कारण यह है कि अनुस्वार, अनुनासिकता और विसर्ग अलग अलग हैं। इनके सम्बंध में न केवल सामान्य व्यक्ति अपितु हिन्दी के कतिपय विद्वानों एवं आलोचकों को भी अनेक भ्रांतियाँ हैं। आजकल अनुस्वार और अनुनासिकता के अन्तर को विश्वविद्यालय स्तर के बहुत से हिन्दी के प्रोफेसर भी नहीं समझते। समय मिलने पर मैं इस विषय पर लेख लिखने की कोशिश करूँगा। 
भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (उच्चतर शिक्षा विभाग) के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने 'देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण' शीर्षक पुस्तक का अनेक वर्षों की सतत साधना और तथाकथित भाषाविदों, विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थाओं के भाषा विशेषज्ञों, पत्रकारों, हिन्दी सेवी संस्थाओं तथा विभिन्न मंत्रालयों के सहयोग से सन् 2010 में संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण प्रकाशित किया है।
सन् 1966 में प्रकाशित 'मानक देवनागरी वर्णमाला' तथा 'परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला' तथा सन् 1967 में प्रकाशित 'हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' इन तीनों पुस्तिकाओं के समन्वित रूप को संशोधित और परिवर्धन के साथ केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने सन् 1983 में 'देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' शीर्षक से पुस्तिका प्रकाशित की थी। उस समय भी निदेशालय ने यह दावा किया था कि इसके निर्माण में भाषाविदों, पत्रकारों, हिन्दी सेवी संस्थाओं तथा विभिन्न मंत्रालयों का सहयोग लिया गया है और एक सर्वसम्मत निर्णय तक पहुँचने का प्रयास किया गया है। सन् 1983 में प्रकाशित पुस्तक का 27 वर्षों के बाद जो संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण प्रकाशित हुआ है उसमें बढ़चढ़कर दावा किया गया है कि यह संस्करण हिन्दी भाषा के आधुनिकीकरण, मानकीकरण और कंप्यूटीकरण के क्षेत्र में नई दिशा प्रशस्त करेगा। पुस्तक में जो नियम बनाए गए हैं, उनमें परस्पर विरोध है। यह बहुत चिन्त्य है

अनुनासिकता नासिक्य व्यंजन नहीं है। यह स्वरों का ध्वनिगुण है। निरनुनासिक स्वरों के उच्चारण में फेफड़ों से आगत वायु केवल मुखविवर से निकलती है। अनुनासिक स्वरों में वायु का अंश नासिका विवर से भी निकलता है जिसके कारण स्वर अनुनासिक हो जाता है। अनुनासिकता का लिपि चिह्न चंद्रबिन्दु है। ( ँ )। व्यवहारिक कारणों से शिरोरेखा के उपर जुड़ने वाली मात्रा के साथ चन्द्रबिन्दु ( ँ ) के स्थान पर केवल बिन्दु (अनुस्वार चिह्न ं ) के प्रयोग का चलन बढ़ गया है। बहुत से लोग अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु में भेद नहीं करते। यह गलत है।
हिन्दी शिक्षण आरम्भ करते समय भाषा अध्यापक को शब्द में जहाँ भी अनुनासिकता हो वहाँ चन्द्रबिन्दु ( ँ ) का ही प्रयोग करना सिखाएँ। बाद में यह बताया जा सकता है कि इ, ई, ओ, औ की मात्रा जहाँ हो वहाँ चन्द्रबिन्दु ( ँ ) के स्थान पर केवल बिन्दु (अनुस्वार चिह्न ं ) का प्रयोग कर सकते हैं। अनुस्वार कोई एक व्यंजन ध्वनि नहीं है। यह विशेष स्थितियों में पंचमाक्षर ( ङ, ञ, ण, न, म ) को व्यक्त करने के लिए लेखन का तरीका है। संस्कृत शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग य, र, ल, व, श, स, ह के पूर्व नासिक्य व्यंजन को प्रदर्शित करने के लिए तथा संयुक्त व्यंजन के रूप में जहाँ पंचमाक्षर के बाद सवर्गीय शेष चार वर्णों में से कोई वर्ण हो तो विकल्प से पंचमाक्षर को प्रदर्शित करने के लिए लेखन का तरीका है। उदाहरण -
कवर्ग के पूर्व अंग, कंघा ं = ङ
चवर्ग के पूर्व अंचल, पंजा ं = ञ
टवर्ग के पूर्व अंडा, घंटा ं = ण
तवर्ग के पूर्व अंत, बंद ं = न
पवर्ग के पूर्व अंबा, कंबल ं = म

हिन्दी में परम्परागत दृष्टि से तवर्ग एवं पवर्ग के पूर्व नासिक्य व्यंजन ध्वनि [ न्, म्, ] को अनुस्वार [ं] की अपेक्षा नासिक्य व्यंजन से लिखने की प्रथा रही है। सिद्धांत उपर्युक्त स्थितियों में, दोनों प्रकार से लिखा जा सकता है। मगर कुछ शब्दों में नासिक्य व्यंजन के प्रयोग का चलन अधिक रहा है। उदाहरण के लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के दशकों तक मार्गदर्शक डॉ. नगेन्द्र अपने नाम को 'नगेंद्र' रूप में न लिखकर 'नगेन्द्र' ही लिखते रहे। विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग के नामपट्ट में भी 'हिंदी' रूप का नहीं अपितु 'हिन्दी' रूप का ही चलन रहा है।
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा प्रकाशित "देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण" शीर्षक पुस्तिका में अनेक विरोध हैं। हिन्दी जगत में हिन्दी एवं हिंदी दोनों रूप मान्य रहे हैं। निदेशालय के नियम बना दिया है कि केवल अनुस्वार का ही प्रयोग किया जाए। जो रूप सैकड़ों सालों से प्रचलित रहे हैं, उनको कोई व्यक्ति या संस्था अमानक नहीं ठहरा सकती। किसी भाषा का कोई वैयाकरण अपनी ओर से नियम नहीं बना सकता। उस भाषा का शिष्ट समाज जिस रूप में भाषा का प्रयोग करता है, उसको आधार बनाकर भाषा के व्याकरण के नियमों का निर्धारण करता है।
आज भी उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लिखा जाता है। आज भी हिन्दी साहित्य सम्मेलन लिखा जाता है। संघ की पत्रिका का शीर्षक है - पाञ्जन्य। निदेशालय इन रूपों को अमानक मानेगा। गलत ठहराएगा। मैं हिन्दीतर क्षेत्रों में जाता हूँ। वे कहते हैं - हम सैकड़ों सालों से हिन्दी, कङ्गन, कम्पन, पाञ्जन्य लिखते आए हैं। भारत सरकार का निदेशालय इनको गलत ठहराता है। प्रचलित एवं मान्य रूपों को गलत ठहराना कितना गलत है - यह विचारणीय है। निदेशालय को मानकीकरण के निर्धारित नियमों पर पुनर्विचार करना चाहिए। भाषा के प्रसार की नीति होनी चाहिए। उसके प्रयोक्ताओं के बीच भ्रम फैलाने के हर कदम का हर हिन्दी प्रेमी को विरोध करना चाहिए। भारत सरकार ने निदेशालय की स्थापना इस कारण की है वह हिन्दीतर क्षेत्रों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को गति प्रदान करे।
अगर उसके किसी कदम से हिन्दीतर क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोक्ताओं में भ्रम पैदा हो रहा है तो उसका कर्तव्य है कि वह उस कदम को वापिस ले ले। कोई व्यक्ति या कोई संस्था भाषा के प्रचलित रूपों को अमानक नहीं ठहरा सकता।
संस्था को हिन्दी के प्रसार के लिए काम करना चाहिए। हिन्दी के प्रसार की गति को अवरुद्ध करने का काम नहीं करना चाहिए।

Tuesday, 21 July 2015

हिंदी कोशों में भिन्न भिन्न शब्द-क्रम

मंगलवार, 21 जुलाई 2015                   'रचनाकार' में प्रकाशित



- शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

‘प्रभात बृहत् हिंदी शब्दकोश’ का कुछ अंश इंटरनेट पर उपलब्ध है. जब मैं उसे देख रहा था तो मेरा ध्यान संपादक की ‘भूमिका’ में उद्धृत कुछ पंक्तियों पर गया. ये पंक्तियाँ डॉ राकेश गुप्त की पुस्तक ‘हिंदी कोशों का भ्रष्ट शब्द-क्रम’ (प्रका. सन् 1994) से ली गई हैं. डॉ गुप्त ने इसमें लिखा है- “इस प्रकार हिंदी के कोशकारों ने एक ओर अनुस्वार का स्थान अ—औ से पहले रख दिया है, वहीं दूसरी ओर उसे ङ् ञ् ण् न् और म् से भी और पीछे ढकेल दिया है. उनका यह अराजकतापूर्ण कार्य न तो शास्त्रसम्मत है, न तर्कसम्मत है और न परंपरासिद्ध.“ यह पढ़कर मैं भी उत्सुक हुआ कि कुछ कोशों की पड़ताल करूँ. मैंने महसूस किया कि सन् 1994 तक के कोशों में जो त्रुटियाँ थीं सो तो थीं ही, उसके आगे के एक कोश में तो ये त्रुटियाँ भ्रम भी उत्पन्न कर रही हैं. आगे इसका ब्योरा दे रहा हूँ.

मेरे सामने इस समय हिंदी के तीन शब्दकोश हैं--प्रामाणिक हिंदी कोश (सं. आचार्य रामचंद्र वर्मा, सन् 1996, संशोधित संस्करण), वर्धा हिंदी शब्दकोश (सं. डॉ राकेश सक्सेना, सन् 2013), प्रभात बृहत् हिंदी शब्दकोश (सं. डॉ श्याम बहादुर वर्मा, सन् 2010) और केंद्रीय हिंदी निदेशालय की एक पुस्तिका ‘देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण, सन् 2010’ जिसमें कोश-निर्माण के लिए उपयोगी शब्द क्रम के सुझाव दिए गए हैं. इन तीनों कोशों और निदेशालय की पुस्तिका में जो कोश-क्रम (कोश में सम्मिलित किए गए समस्त शब्दों का आद्यंत वर्ण-क्रम) दिए हैं, वे अकारादिक्रम (अ-----औ क-------ह) में ही हैं पर एक ही वर्ण से शुरू हुए शब्द-क्रम के वर्ण-क्रम में भिन्नता है. किसी में शब्द-क्रम अंकारादिक्रम मे हैं, तो किसी में अँकारादिक्रम में. शब्द का द्वीतीय वर्ण वर्णमाला के क्रम में न होकर कवर्ग के पंचम वर्ण से शुरू होता है जो अनुस्वार का रूप लेकर कोश-क्रम के प्रथम वर्ण की शिरोरेखा पर लग जाता है ( अं कं ).

1. प्रामाणिक हिंदी कोश में वर्ण से शुरू शब्दों का वर्ण-क्रम है-
अं (1.अं- ङ् ञ् ण् न् म् का बिंदीरूप, 2. अँ, 3. अं- अनुस्वार) अः अ
अ के बाद द्वतीय वर्णों का वर्ण-क्रम-
क...घ च...झ ट...ण त...न प...म य...ह
एक वर्ण का क्रम-
कं(ङ्) कँ कं(अनुसंवार) कः क का कि की कु कू कृ के कै को कौ क्
य र ल व श ष स ह.

इस कोश में शब्द-क्रम अं से प्रारंभ है. अं से प्रारंभ शब्द-क्रम में द्वितीय वर्ण क्रमशः ङ् ञ् ण् न् म् हैं जो के ऊपर बिंदीरूप में हैं. ये पंचम वर्ण अपने ही वर्ग के वर्णों से जुड़ते हैं, जैसे-अंक (अङ्क)...अंचल (अञ्चल)..अंडा (अण्डा)..अंत (अन्त..अंब (अम्ब). अं के नीचे का अनुनासिक रूप अँ, फिर अं है, जैसे, अंक...अँकुड़ा...अंचल...आँचल... तत्पश्चात क्रम में अनुस्वार (अं )है. यह सिर्फ य र ल व श स ह के ही पूर्व आता है, जैसे, (अंश...). अनुस्वार के बाद विसर्ग (छंद..छः) का स्थान है. और तब के साथ द्वितीय वर्ण स्वर और फिर वर्ण वाले शब्द शुरू होते हैं और पर समाप्त होते हैं. जैसे- अए अउर...अकड़...ह तक. क्ष त्र ज्ञ और श्र अपने वर्गों के अंतर्गत अपने निर्धारित स्थान पर रखे गए हैं.

सभी प्रचलित कोशों और अधुनातन कोशों में, जिसमें हरदेव बाहरी का ‘हिंदी-अंग्रेजी शब्दकोश’ और अरविंद कुमार का ‘समांतर कोश’ आते हैं, में भी इसी कोशक्रम को अपनाया गया है. अरविंद कुमार ने अपने कोश के ‘..कोश का उपयोग ऐसे करें’ शीर्षक में स्पष्ट भी किया है—“वर्णमाला में (वर्णक्रम) है अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः और कोशों में (शब्द-क्रम) है अं अः अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ—(पृष्ठ 14).”

2. वर्धा हिंदी शब्दकोश में वर्ण से शुरू शब्दों का वर्ण-क्रम है-
अँ अं (अं-ङ् का बिंदीरूप, अं- अनुस्वार) अः अ आ-------ए ऐ ऑ
ओ औ
अ के बाद द्वीतीय वर्णों का वर्ण-क्रम- उक्त कोश की तरह.
एक वर्ण का क्रम-रूप-
कँ कं(ङ्) कं(अनुस्वार) कः क का---------------के कै कॉ को कौ क्
य------------------ह

इस शब्दकोश का प्रारंभ उक्त कोश के विपरीत अँ से होता है, गोया अँ कोई वर्ण हो. अँ वाले शब्दों के चुक जाने के बाद शब्द-क्रम में अं है. का अनुस्वार उक्त कोश की तरह ङ् ञ् ण् न् म् का बिंदीरूप है. इसमें कुछ अंग्रेजी शब्दों (जैसे- डॉक्टर) के हिंदी में बहुप्रचलित हो जाने से ध्वनि को भी स्वर वर्णों में के बाद और के पहले स्थान दिया गया है. यदि वर्णमाला में ध्वनि वर्ण के रूप में स्वीकृत हो जाए तो (ह्रस्व ध्वनि) के लिए स्वर वर्णों में यह स्थान उचित जान पड़ता है. वैसे यह वैयाकरणों पर निर्भर है कि को वर्णमाला में क्या स्थान देते हैं, स्वर को अनुनासिक उच्चारण देने वाले चंद्रबिंदु जैसी ध्वनि की तरह अथवा एक स्वर वर्ण के रूप में.

डॉ राकेश सक्सेना ने इस कोश में contract और confrence जैसे अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में ले लिया गया मान लिया है और उनका हिंदी रूप कोश में इस प्रकार दिया दै- कॉन्ट्रैक्ट, कॉन्फ्रैंस. यह हिंदी की प्रकृति के अनुरूप नहीं है. ऐसा करना पंचम वर्ण के अपने ही वर्ग के वर्णों से जुड़ने के नियम के आधार को ही ध्वस्त कर देना है. अब हिंदी के विचारशील विद्वानों को यह तय करना होगा कि ऐसे अंग्रेजी शब्दों को हिंदी के कोश में रखना है तो किस प्रकार रखा जाए या रखा ही न जाए.

केंद्रीय हिंदी निदेशालय की पुस्तिका में शब्दकोश के लिए शब्द-क्रम सुझाया गया है (2.9.3)-
आं आँ आ ऑ आः....
कं कँ क का कॉ कः .........क्
इसमें प्रचलित कोशों से अलग अनुनासिक (अँ) शब्दों को अं वाले शब्दों (उक्त कोशों की तरह पहले ङ् फिर अनुस्वार के साथ) के बाद एक ही क्रम में रखने का सुझाव है जो ‘वर्धा हिंदी शब्दकोश’ के विपरीत है. को के बाद और अः के पूर्व रखा गया है जो तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता.

3. प्रभात बृहत् हिंदी शब्दकोश- इस कोश में भी उक्त कोशों के कोश-क्रमों की तरह ही कोशक्रम रखा गया है. किंतु शब्द-क्रम हिंदी वर्णमाला के अनुसार है. इसमें शब्द वर्ण से शुरू होते हैं. शब्दों का वर्ण-क्रम यों है-
अ अं अः अँ 
अ के बाद द्वितीय वर्णों का क्रम है-
इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ, अनुस्वार(अं), विसर्ग(अः), क...ङ च...ञ
ट...ण त...न प...म य र ल व श ष स ह अँ(चंद्रबिंदु वाले शब्द)
एक वर्ण का क्रम-
क का कि की कु कू के कै को कौ क्
कं(ङ्) का स्थान कवर्ग में ङ् के आने पर ही है, ञ्,ण् के भी.....
क या किसी अन्य प्रथम वर्ण के बाद द्वीतीय वर्ण का क्रम-
पहले स्वर वर्ण (अ...औ) जैसे- कई, फिर अनुस्वार (अंश), फिर विसर्ग (छः), क से ह तक के वर्ण, फिर चंद्रबिंदु (कँ)

हिंदी में विसर्गयुक्त शब्द संस्कृत से आए हैं. ये प्राय शब्द के बीच में आते हैं, द्वीतीय वर्ण-क्रम के बाद --अतः प्रायः. लेकिन शब्दकोश में इन्हें रखने का नियम एक ही है.
यह कोश पहले से संबंधित विविध सूचनाएँ देता है. के साथ द्वितीय वर्ण (अ—औ) से बने शब्द आते है (अउर, अए..). फिर अनुस्वार वाले शब्द (अंश..), फिर विसर्ग वाले शब्द, यदि हों, फिर के साथ से प्रारंभ कर तक वाले शब्द और अंत में अँ से बने शब्द आते हैं.
अंग्रेजी शब्दों की ध्वनि को इस कोश में स्थान नहीं दिया गया है. डॉ वर्मा ने डॉक्टर को डाक्टर लिखना पसंद किया है. अब विद्वान ही इस संबंध में उपयुक्त निर्णय ले सकते हैं.

उक्त कोशों और निदेशालय की पुस्तिका में दिए गए शब्द-क्रम की समीक्षा से स्पष्ट हो जाता है कि सबके शब्द-क्रम अलग अलग हैं. हिंदी कोशों के लिए यह कत्तई सराहनीय स्थिति नहीं है. आज हम हिंदी को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित कराना चाहते हैं पर हम अपने ही में इतने विखरे हैं कि यह आशा धूमिल ही लगती है.

आश्चर्य की बात है कि सन् 1994 में डॉ राकेश गुप्त ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी कोशों का भ्रष्ट शब्द-क्रम’ में कोशों की इन व कुछ और त्रुटियों की ओर (देखें, भूमिका, प्रभात बृहत् हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ सोलह)* कोशकारों का ध्यान आकृष्ट किया था पर किसी ने उसपर ध्यान नहीं दिया. डॉ हरदेव बाहरी का हिंदी कोश, हिंदी-अंग्रेजी कोश और अरविंद कुमार का समांतर कोश इक्कीसवीं सदी में आए हैं पर इन लोगों ने बींसवी सदी की पुरानी परिपाटी को ही अपनाना उचित समझा. हालाँकि डॉ बाहरी मानते हैं कि कोशक्रम वर्णमालाक्रमानुसारी होना चाहिए. केंद्रीय हिंदी निदेशालय भी यही सुझाव देता है- “शब्दकोश निर्माण में भी सही अकारादि क्रम का पालन आवश्यक है” निर्देश बिंदु (2.9). पर इसमें अनुस्वार और विसर्ग को वर्णमाला के वर्णों के क्रम में रखा ही नहीं गया है जबकि इनकी पुस्तिका के निर्देश बिंदु 3.6.1.2 में अलुस्वार को व्यंजन माना गया है.

हिंदी के प्रथम शब्दकोश हिंदी शब्दसागर (सं श्यामसुंदरदास प्र सन् 1928), जिसमें रामचंद्र वर्मा आद्यंत सहयोगी रहे, के निर्माण में शब्द-क्रम के लिए जो अंकारादिक्रम अपनाया गया है, और जो आजतक अपनाया जा रहा है, वह उस समय के लिए उपयुक्त था. क्योंकि हिंदी की आरंभिक कोश-रचना के समय कोशकारों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी, हिंदी शब्दों के रूप को स्थिर करना. हिंदी के सामने तब विश्वभाषाओं के कोशों की चुनौती नहीं थी. तब हिंदी जाननेवालों के सामने हिंही वर्णमाला के परिचय की अनिश्चितता नहीं थी (इसे आगे के शीर्षक ‘हिंदी वर्णमाला की अराजकता’ में मैंने दिखाया है). तब हिंदी की वर्णमाला सुनिश्चित थी. प्राथमिक स्तर पर ही विद्यार्धी इसमें इतने निपुण हो जाते थे कि अनुस्वार से शुरू होने वाले शब्दों में पंचम वर्णों वाले शब्दों को भी आसानी से खोज लेते थे. किंतु आज वह स्थिति नहीं है. आज विशव की संपन्न भाषाओं के कोश हमारे सामने हैं जो पूरी तरह व्यवस्थित व अपनी अपनी वर्णमाला के क्रमानुसार हैं. हिंदी कोशकार आधुनिक कोश-चेतना से संवेदित होते हुए भी इसके प्रति बेफिक्र लगते हैं.

लेकिन खुशी की बात है कि उक्त उदाहृत कोशों में डॉ श्याम बहादुर वर्मा द्वारा संपादित ‘प्रभात बृहत् हिंदी शब्दकोश‘ (प्र सन् 2009) आधुनिक कोश-चेतना की कसौटी पर खरा उतरता है. इसमें कोश से संबंधित त्रुटियाँ दूर कर दी गई हैं. संभव है कोई त्रुटि रह गई हो. मुझे आशा है वह इस कोश के कोशकारों की सजग दृष्टियाँ उसे खोज ही लेंगी. आगे के खोशकारों के लिए यह उदाहरणस्वरूप है. उन्हें अतिरिक्त परिश्रम नहीं करना पड़ेगा.

हिंदी वर्णमाला की अराजक स्थिति

हिंदी कोशकारों ने भले ही अपने कोशों में शब्द-क्रमों को अंकारादि या अँकारादिक्रम को अपनाया हो, वर्णमाला का क्रम एक ही है. वह है-

स्वर वर्ण-     अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ 11
अयोगवाह     अं अः                        2
व्यंजन वर्ण    कवर्ग से पवर्ग तक ड़ ढ़ समेत   27
अंतस्थ और उष्म वर्ण     (य----------ह)        8
संयुक्त व्यंजन वर्ण       (क्ष त्र ज्ञ श्र)1        4 =52
1. क्+ष् से क्ष्, त्+र् से त्र, ज्+ञ् से ज्ञ्, श्+र् से श्र् पहले संयुक्त वर्ण ही बनता है. अ से जुड़ने पर हल चिह्न हटता है.

यही वर्णमाला बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के प्राथमिक स्तर की पुस्तकों में रहती थी. लेकिन जबसे हिंदी के मानकीकरण के प्रयास होने लगे हैं समस्या और उलझती चली गई है. आज की प्रचलित हिंदी व्याकरण की प्राथमिक पुस्तकों/व्याकरण में वर्णमाला से संबंधित भिन्न-भिन्न मत देखने को मिलते हैं. देखें-

वैयाकरण वासुदेवनंदन प्रसाद ने अपने व्याकरण में वर्णमाला में 48 वर्ण माना है, क्ष त्र ज्ञ श्र को वर्ण नहीं माना है, वचनदेव कुमार ने 49, (अं अः श्र को छोड़ कर), हरदेव बाहरी ने 53 (ऴ को भी वर्णमाला में गिना है) और N C E R T के मानक व्या. में 55 (गृहीत आ ज फ, नीचे बिंदी, को वर्णमाला में रखा गया है) वर्ण माने हैं. प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए बाजार में उपलब्ध प्रतियोगिता-पुस्तकों में भी यही स्थिति देखने को मिलती है.

केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने अपनी पुस्तिका के प्रारंभ में ही हिंदी वर्णमाला की सूची दी है जिसमें 50 वर्ण हैं. इसमें से अं अः को हटा दिया गया है. यह और भ्रम उत्पन्न करने वाला है. ताज्जुब यह कि पुस्तिका के निर्देश बिंदु 2.9 में अनुस्वार को व्यंजन माना गया है फिर भी इसे वर्णमाला में स्थान नहीं दिया गया है. डॉ वासुदेवनंदन प्रसाद ने अनुस्वार और विसर्ग दोनों को व्यंजन माना है. व्यंजन बिना स्वर का सहारा लिए उच्चरित नहीं हो सकते. अनुस्वार और विसर्ग भी स्वर के सहारे ही उच्चरित होते हैं. इन्हें व्यंजन की तरह ही स्वर के सहारे ही लिखा जाता है.
वैयाकरणों को वर्णमाला को लेकर इस भ्रम दूर करना ही होगा.

Tuesday, 26 May 2015

....और बुलबुल बच्चे को उड़ा ले गई



              

    यह नवासी नब्बे की बात है. मैं डी ए वी इंटर कॉलेज में लेक्चरर था. मेरे साथी  अध्यापक जो शहर से बाहर के थे अक्सर गोरखपुर प्रॉपर में भी अपने लिए एक मकान बनवाने की बातें किया करते थे. उनकी बातें सुन-सुनकर मेरे भी मन में होता कि काश गोरखपुर शहर में मेरा भी एक मकान होता.
    अस्सी के दशक में मेरी श्रीमतीजी ने जब यह बात मेरे सामने रखी थी तब मैंने उन्हें चुप करा दिया था. उन्होंने मेरी भावनाओं को समझा और सराहा भी था. उस समय अपने गाँव के प्रति मेरा मोह प्रबल था. मैं अपने माता पिता की जिंदगी में इस तरह का कोई कदम उठाना भी नहीं चाहता था. गोरखपुर में मकान बनवाने की मेरी कोई उत्कट इच्छा भी नहीं थी. फिर मैं जिस क्वार्टर में सपरिवार रहता था उसके मालिक की तरफ से भी ऐसा कोई दबाव नहीं था कि इस तरफ मेरा ध्यान बरबस खिंचता.
    लेकिन नब्बे के दशक में बात बदल गई थी. अब मकान मालिक चाह रहे थे कि  वह मकान मैं छोड़ दूँ. मेरे मन में भी अपने लिए एक मकान की इच्छा हो रही थी. क्वार्टर छोड़ने के बाद आवास के लिए विकल्प भी मेरे सामने केवल दो ही थे. या तो मैं नया मकान ढूँढ़ूँ या अपने लिए एक मकान बनवाउँ. मैंने दूसरे विकल्प को चुना. और अपने कॉलेज से पाँच किमी दूर जमीन का एक टुकड़ा ले लिया. वहाँ एक कमरा, लैट्रिन, बाथरूम बनवाकर और गृह पूजा करवाकर इस नए मकान में शिफ्ट कर गया. बाउंडरी कराया और फूल पत्तियाँ लगा दीं. फूल पत्तियों के साथ शोपीस के कुछ पौधे भी लगा दिए. इनमें एक पौधा मोरपंखी का था.
    मोरपंखी बड़ी होकर अब आदमकद हो गई थी- मोर के पंखों जैसी खिली उसकी हर फाँकें बहुत भाती थी मुझे. गेट पर ही उसे लगाया भी था. जब भी मैं घर से बाहर निकलता उस मोरपंखी के फाँकों पर हाथ जरूर फेरता. इसी बहाने पौधे के स्वास्थ्य का जायजा भी ले लिया करता.
    एक दिन मैं मोरपंखी के हर फाँकों को एक-एककर निहार रहा था. तभी मेरी नजर उसके भीतर एक अधबने खोंते पर पड़ी. यह एक चिड़िया का खोंता था. खोंते के नीचे की परत बड़े ही सुंदर ढंग से रखी गई थी. एक-एक तिनके को मोरपंखी के फाँकों से इसतरह बाँधा गया था कि तेज हवा चले तो भी खोंते में पड़े चिड़िया के अंडों को कोई क्षति नहीं पहुँचे. खोंते को निहारकर ज्योंही हटा, देखा कि एक बुलबुल उड़ती हुई आई और मोरपंखी के झुरमुट में घुस गई. उसकी चोंच में एक बड़ा सा तिनका था. यह खोंता एक बुलबुल चिड़िया का था.
    यों दिन पर दिन खोंता बड़ा होता रहा. बुलबुल तिनके लाती, खोंते पर रखती, उसे बुनती, फिर दूसरे तिनके के लिए उड़ जाती. कुछेक दिन तो हमारा ध्यान उधर लगा रहा. हम उसकी लगन और अपने नीड़ बनाने की तन्मयता को देखते और सोचते- चाहे मनुष्य हो या कोई प्राणी सबमें माँ की स्थिति ऐसी ही होती है. माँ को सृजन करना होता है. मनुष्य तो इसके लिए कृत्रिम साधनों को भी ढूँढ़ लेता है किंतु पक्षियों को प्रकृति की दी हुई सुबिधाओं पर ही निर्भर करना पड़ता है. उसे सृजन के लिए अनुकूल तो बनना ही पड़ता है, अपने गिर्द के वातावरण को भी अनुकूल बनाना होता है. हर तरह की सुरक्षा के लिए भी उसे सावधानी बरतनी पड़ती है.
    दिन बीतता रहा, खोंता बनता रहा. पर न जाने कब हमारा ध्यान उधर से हट गया. बुलबुल ने कब अपने खोंते को पूरा बना लिया और कब उसमें उसने अंडे दे दिए, तनिक भी पता नहीं चला.
    रोज मैं अपने कमरे से निकलता और मोरपंखी को छूकर बगल में स्थित गेट से बाहर निकल जाता. किंतु जरा भी भनक नहीं लगी कि कब बुलबुल के बच्चे अंडों को फोड़कर बाहर निकल आए. एक दिन कुछ चीं-चीं की आवाज सुनाई दी तो भीतर झाँककर देखा. खोंते में तीन नाजुक-नाजुक बच्चे थे. वे एक दूसरे पर लुढ़क हे थे. मेरी आहट पाते ही उन तीनों ने अपनी चोंचें उर्ध्वोन्मुख खोल लीं और परस्पर चढ़ा ऊपरी करने लगे. उनको लगा उनकी माँ उनके लिए चारा (खाना) लेकर आ गई है. मैंने देखा है माँ चिड़िया चारा लेकर अपने बच्चों के पास आती है तो उसके बच्चे चीं-चीं करते
हुए ऐसे ही चोंच फैला देते हैं और माँ उनके चोंचों में एक-एक कर चारा डाल देती है.
    अब रोज मैं उन्हें देखने लगा. उनके शरीर पर अभी थोड़े से ही बाल आए थे. उनके पंख अभी पूरे खुलते नहीं थे. गर्दन पर बाल बिलकुल नहीं थे. उनकी गर्दनें हलकी ललाई व फीकी सफेदी लिए थीं. चोंचों को देखकर लगता था जैसे उनसे अभी रक्त छलक आएगा. एक दिन देखा उस खोंते में केवल एक ही बच्चा रह गचा है. माँ बुलबुल दो को उसमें से उड़ा ले गई थी.
    हम निश्चिंत थे कि कुछेक दिन में ही माँ बुलबुल इसे भी उड़ा ही ले जाएगी. लेकिन नियति ने कुछ और ही रच रखा था उस बच्चे के लिए. नियति का वह खेल हमारे लिए एकदम अप्रत्याशित था. उसका वह अप्रत्याशित खेल उस दिन मेरे मन में एक स्थाई करुण छवि टाँक गया. वह करुणाप्लावित क्षण आज मेरे मन को इतना द्रवित कर गया कि मेरे हाथ में अनायास लेखनी आ गई और मैं यह कहानी लिखने को बाध्य हो गया. बड़ी ही रोमांचक और करुणा मिश्रित घटना थी वह.
    रोज की तरह उस दिन भी मैं अपने कमरे से निकला जिस दिन वह घटना घटी. सुबह का समय था. सात या आठ बज रहा होगा. आकाश साफ था. आँगन में किसी तरह की कोई गतिविधि नहीं थी, न चीं-चीं न चह-चह न ही किसी अन्य तरह का शोरगुल, जिससे कुछ अनहोनी होने की आशंका हो. अतः उस घटना के घट रहे होने का कोई आभास नहीं मिला. घटना घट रही थी पर हम उससे अनभिज्ञ थे. मैं सामान्यरूप से कमरे से निकला. और ज्योंही फकटक की ओर मुड़ा अचानक मेरा ध्यान मोरपंखी की जड़ की तरफ चला गया. वहाँ घट रहा वह दृश्य देख मेरा कलेजा धक से होकर रह गया. मैंने देखा मोरपंखी की जड़ के कुछ ऊपर हाथ डेढ़ हाथ का साँप का एक बच्चा बुलबुल के बच्बे को निगल रहा है. संपोले का जबड़ा बहुत फैला हुआ था. बुलबुल के फैले शरीर को देखकर लगता नहीं था कि सँपोला उसे निगल पाएगा. लेकिन देखा कि वह बहुत दम लेकर उसे उदरस्थ करने की चेष्टा कर रहा है. बुलबुल का बच्चा बिलकुल निश्चेष्ट था. सँपोला बुलबुल के बच्चे को लगभग गर्दन तक निगल चुका था. बच्चे की चोंच खुली हुई थी. मैं दौड़कर उस सँपोले पर एक लकड़ी का टुकड़ा फेंका. लकड़ी की चोट लगते ही सँपोला बुलबुल के बच्चे को छोड़ पास में रखी ईंटों के ढेर में गुम हो गया. सँपोले के मुख से छूटते ही बुलबुल का बच्चा छिटक कर जमीन पर आ गया. मैं दौड़कर उसे अपने हाथ में थाम लिया. मेरे अचानक दौड़ने की धमक सुन मेरे पूरे परिवार ने मुझे घेर लिया. सभी चौंक कर पूछने लगे- क्या हुआ, क्या हुआ? मैंने उन्हें बुबुल के घायल बच्चे को दिखाया और सारी बातें बताईं. बच्चे के पंख निकल आए थे. बस उनमें उड़ने की शक्ति भर आने की देर थी
    हमने देखा कि बच्चे की गर्दन के थोड़ा नीचे कट गया है और खून छलक आया है. बच्चा सहमा सहमा सा है. केवल दिशाओं में देख रहा है. पंख उसके भींग गए हैं और बलात चिपके हुए हैं. कैसा अनुभव कर रहा होगा सँपोले के जबड़े में जकड़ा वह, उसकी स्थिति देखकर इसका केवल अनुमान भर मैं कर सकता था. संपोले के जबड़े की कश में आते समय वह फडफड़ाया होगा अवश्य. कश में आकर छूटने के लिए छटपटाया भी होगा. मृत्यु के ग्रास में होते हुए भी उसकी साँस अभी घुटी नहीं थी. इससे प्रतीत तो यही होता है कि उसने जीवट के साथ मृत्यु का सामना किया. उसमें एक मनुष्य-मन का आरोपण करें तो वह जितनी घड़ी तक सँपोले के जबड़े में था, वह जकड़ की पीड़ा झेलते हुए भी उतना समय आपद्संकट का सामना करने के लिए साहस बटोरने में लगाया होगा. पंचतंत्र के सहृदय लेखक जैसा मैं होता- चूँकि वह प्रकृति के अधिक निकट था, पंछियों की वेदना की समानुभूति में हो जाना उसके लिए सरल था- तो मैं इस घायल पंछी की जूझ को वैसे ही असरदार शब्द दे देता जैसा वह सहृदय देता. पर मैं ऐसे जमाने में हूँ जिसमें मनुष्य बुद्धि-भार से दबा है. मैं बहुत चाह रहा हूँ कि इस पंछी की पीड़ानुभूति को उसी की अनुभव-सरणि में रखूँ पर वाल्मीकि के करुणोद्रेक का तलस्पर्श ही उस दिन मेरे हिस्से में आया. और आज उसपर बुद्धि की छाया मँड़रा रही है. बुद्धि का अस्र-शस्र तर्क है. और तर्क करुणा को भोथरा ही करता है.   
    उसकी उस पीड़ानुभूति को उकेरने की मैं चेष्टा तो कर रहा हूँ पर बुद्धि आड़े आ जा रही है. वह क्षण प्रत्यक्ष था उस दिन मेरे सामने. मेरा हृदय बहुत करुण हो गया था. पर आज मेरे हृदय का द्रवण इस क्षण वह गति नहीं पा पा रहा है. मैं उस बच्चे पंछी के अंतर में उठ क्षण की उठी वेदना को गद्य में करुणापूरित व्यंजना देने की चेष्टा कर रहा हूं. पर बुद्धि से वह गति लाई नहीं जा सकती. आज के समस्त काव्य-संसार का भी यही हाल है. वहाँ भावों के द्रवण की कोई चेष्टा ही नहीं दिखती. इन्हें पढ़कर हृद-रंध्रों में करुणा रिसती ही नहीं. गद्य में करुणोद्रेक लाना तो और कटिन है. यह घटना अगर वामभट्ट के सामने घटी होती तो एक और कादंबरी लिख गई होती. कदाचित इस दृश्य का वर्णन उनकी लेखनी से यों निःसृत हुआ होता- सँपोले के सबल जबड़े में बुलबुल के बच्चे का आकंठ कसा होना देखकर ऐसा लगा मानों काल का रूप लिए वह सँपोला वेगवान अंधड़ की तरह आकर खोंते से हवा में पहली उड़ान भरने को उद्यत उस बच्चे को अपने खूंखार जबड़े में जकड़ लिया होगा. लेकिन यहाँ भी हृदय के द्रवण की गुंजाईश नहीं दिखाई देती. मेरी कोशिश है कि संवेदना की कुछ ही बूँदें सही यहाँ छलकें अवश्य.
    खैर कुछ ही क्षणों में घायल बच्चे के बावत मेरे बच्चों की तरफ से तरह तरह के परामर्श आने लगे. पापा ऐसा करिए, पापा वैसा करिए. मेरी पुत्री तो इतनी उतावली हो गई कि दौड़कर मेरा बायोकेमिक दवावों का डिब्बा ही उठा लाई. असल में बायोकेमिक दवावों से घर में मुझे उपचार करते देख उसे इल्म हो गया था कि कटे पर तुरत फेरम फॉस का चूरा बुरक देना चाहिए. यह थोड़ा गहरा कटा था. अतः उसने उसमें पूरा चूरा भर दिया. और दहशत के लिए काली फॉस की एक टिकिया बच्चे के मँह में डाल दिया. कुछ ही मिनटों में बुलबुल का वह बच्चा टनमना गया और चलने फिरने लगा.
    लेकिन हमने उसे स्वतंत्र नहीं छोड़ा. उसे एक बेंत की टोकरी से ढँक दिया. ताकि उसे उन उपद्रवों (बिल्ली तथा अन्य पक्षी) से बचाया जा सके जो उसे हानि पहुंचा सकते थे.
    हुलबुल के बच्चे को सँपोले से हमने बचाया. उसे दवा दी और टोकरी से ढँककर उसे सुरक्षा दी. किंतु इतने समय तक माँ बुलबुल हमें दिखाई नहीं दी. थोड़ी देर बाद मैं टोकरी के पास गया तो देखा वह शिशु पखेरू टोकरी के भीतर बेचैनी से जिधर तिधर घूम रहा है. मुझे लगा वह भूखा है. मैंने आँगन में लगे पोय के कुछ पके फऱ तोड़े और उसे देने लगा. चिमटी से पकड़कर पहला फर उसके सामने किया तो उसने अपने चोंच फैला दिए. उस शिशु पखेरू के चोंच एकदन टहनी-से फूटे ललाई लिए कोमल पल्लव की तरह थे. उसके गले से चोंच तक की शिराओं को देख, लगता था जैसे अभी लाल रक्त टपक पड़ेगा. मैंने एक फर उसके मुँह में डाल दिया. फर देते ही वह उसे निगल गया और एक-एक कर उसने कई फर निगल लिए. अब वह स्वस्थ था. उसकी चाल बदल गई थी. मेरा हाथ अभी भी उसके सर के ऊपर था, चिमटे में पोय का फर पकड़े. चिमटे में पकड़े फर को उसने देखा. पर तुरत पास नहीं आया. वह कुछ दूर आगे गया, फिर लौटा और चोंच फैला दिया. मैंने वह फर चिमटी से उसके चोंच में डाल दिया. ऐसा उसने कई बार किया. और हर बार मैं पोय का फर उसकी चोंच में डालता गया. ऐसा कर मैं वैसा ही आनंद ले रहा था जैसा मेरी श्रीमतीजी आज अपने चार वर्षीय पोते जोसू को चावल या रोटी का कौर- ये सुग्गा खाएगा, ये मैनी के लिए है, आदि कहकर खिलाती हैं और आनंदित होती हैं. इसतरह जब मैं उस शिशु पखेरू को खिला रहा था तो मैंने देखा, उसकी माँ दो तीन बार आकर झाँक गई.
    दो से तीन दिन ऐसा चला. कभी मैं तो कभी मेरे बच्चे उसे पोय का फर या पके चावल के दाने खिला देते थे. इन दो तीन दिनों में मैंने देखा कि माँ बुलबुल दिन में दो तीन दफा आकर आँगन में मँडराती, फिर लौट जाती. एकाध बार आँगन की बाहरी दीवार पर उसे बैठे और उसके बार बार सिर हिलाने के दौरान उसका बच्चे की तरफ भी एक झपक देख लेना उसके दिल में उमड़ती ममता का अहसास जगा जाता. पखेरू हो या अन्य जीव, सभी में ममता के तंतु समान ही होते होंगे. पर पखेरुओं की ममता वैसी नहीं छलकती जैसी मनुष्यों मे छलकती है. माँ बुलबुल मँड़राती अवश्य पर उस टोकरी के पास नहीं आती जिसमें शिशु पखेरू ढँका था. वहाँ हममें से कोई जो होता. पर हमारे गिर्द वह एक चक्कर लगा जाती अवश्य.
        लेकिन उस दिन माँ बुलबुल एकदम हमारे पास तक आ गई, जैसे हमसे डर ही नहीं रही हो. असल में उस दिन जब मैंने शिशु पखेरू को दाने देने के लिए टोकरी उठाई तो वह फुदक कर आगे बढ़ आया. मैं चिमटी में दाना लिए उसकी ओर बढ़ा तो वह और आगे फुदक गया. इसतरह जब जब मैं दाना लेकर आगे बढ़ता वह और आगे फुदक जाता. और फुदकते फुदकते वह आंगन के दूसरे छोर तक पहुँच गया. वहां मैंने लत्तरवाला एक पौधा लगाया था. जो एक छोटे कमरे पर पड़े टिन के छप्पर पर पूरा फैल गया था. फुदकते फुदकते वह बच्चा न जाने कब और कैसे उछलकर ऊपर छप्पर के झाड़ में पहुँच गया, मुझे जरा भी भान न हुआ. माँ बुलबुल भी लगातार हरकत में थी, इधर उधर मचल रही थी. मैं उस बच्चे को झाड़ से नीचे उतारने में लगा रहा. वह नीचे उतरा भी पर जमीन पर हाथ नहीं आया. तबतक देखा माँ बुलबुल एक और सहयोगी को लेकर आ गई. संभवतः वह नर बुलबुल था. यह देख मैं थम गया और उनकी हरकतें देखने लगा. मैंने देखा उन दोनों में से एक ने बच्चे को चोंच मारी और वह बच्चा उड़कर दो-चार हाथ आगे चला गया. फिर दूसरे ने चोंच मारी तो वह बच्चा उड़कर पाँच फुट ऊँची बाउंडरीवाल पर चला गया. माँ बुलबुल ने फिर तीसरी बार उसे चोंच मारी और वह बच्चे को उड़ा ले गई. मनुष्य के बच्चे को उड़ान भरना सिखाने के लिए विभिन्न तकनीकों का सहारा लेना पड़ता है पर नभचारियों को उड़ना सीखने के लिए पल भर का अभ्यास ही काफी है. ये प्रकृति के सहचर जो होते हैं.  
23-05-2015, शनिवार