Wednesday, 18 April 2018

मुक्तिबोध की कविता : ‘अँधेरे में’, भाष्यालोचन-5

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव            18-04-2018               रचनाकार में प्रकाशित

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एक विचारणीय प्रश्न:
पहल-108 में प्रकाशित पने लेख (‘शताब्दी पुरुष : ग. मा. मुक्तिबोध में’) में अच्युतानंद मिश्र ने मुक्तिबोध की फैंटेसी के संबंध में एक प्रश्न खड़ा किया है- आखिर मुक्तिबोध को फैंटेसी की जरूरत क्यों पड़ती है..अपने समय के दवाबों से तो मुक्तिबोध इस ओर नहीं मुड़ते? वह कहते हैं, इसपर कम ही विचार किया गया है, उनकी पैंटेसी को अमूमन उनकी काव्य-कला या टेकनिक से ही जोड़ कर देखा गया है. मुझे भी उनकी फैंटेसी, कला का एक रूप ही लगती है. लेकिन लेखक का प्रश्न भी ध्यान खींचता है.

नयी कविता से कुछ पहले चलें तो छायावाद के कवियों पर अपने समय का दबाव साफ दिखाई देता है. खासकर ब्रिटिश सत्ता का दबाव. तब देश में उस सत्ता से स्वतंत्र होने की छटपटाहट थी. प्रेमचंद के सोजे वतन में इस स्वतंत्रता की मुहिम की ध्वनि महसूस कर ब्रिटिश सत्ता ने उसपर प्रतिबंध लगा दिया था. समय के इस दबाव ने ही छायावादियों को प्रस्तुत को अप्रस्तुत के माध्यम से व्यक्त करने को बाध्य कियाः

                          यमुने! तेरी इन लहरों में किन अधरों की आकुल तान               (निराला)

लेकिन मुक्तिबोध पर समय का ऐसा कोई दबाव नहीं दिखता. तारसप्तक में उनकी प्रकाशित कविताएँ गाँधी के “अंग्रेजों! भारत छोड़ो” की मुहिम के आसपास ही लिखी गईं होंगी. पर इन कविताओं पर न इस मुहिम का कोई दबाव दिखता है न उसमें इसकी कोई गूँज ही है. हाँ, इन कविताओं में वह साम्यवाद की ओर झुके जरूर दिखाई देते हैं. और उनका भारतीय साम्यवाद, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल जैसी विदेशी संस्था के पर-चिंतन में डूबा दिखता है. इस संस्था का मानना था कि भारतीय स्वतंत्रता का साथ देना उचित नहीं है क्योंकि सोवियत रूस द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सत्ता का साथ दे रहा है. मुक्तिबोध पर इस पर-चिंतन का दबाव अवश्य दिखता है. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने जनता का पक्ष न लेकर साम्राज्यवादी शक्ति का पक्ष लिया. इसीलिए कभी कभी उनका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करना एक व्यंग्य-सा लगता है. मुक्तिबोध वस्तुतः अपनी ही आकांक्षाओं के दबाव में थे. हिंदी काव्य के क्षेत्र में वह स्वयं एक दबाव लेकर आए - छायावादी काव्यानुभव और काव्य-रीति को बदल देने का दबाव लेकर.

मुक्तिबोध की यह कविता स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नेहरू-शासन में लिखी गई थी. इस शासन में न तो मार्क्सवादी पार्टी पर कोई पहरा था न मार्क्सवादी विचारों पर ही, कि मुक्तिबोध अपने मार्क्सवादी विचारों पर कोई दबाव महसूस करते. अलबत्ता उनकी इतिहास और संस्कृति विषयक स्कूली पाठ्यपुस्तक पर म प्र सरकार द्वारा प्रतिबंध अवश्य लगा था. पर वह, कुछ प्रकाशकों और एक संगठन विशेष के अनुरोध पर लगाया गया था. कुछ कम्युनिष्ट भी उसपर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में थे. यह प्रतिबंध सत्ता की किसी नीति के तहत नहीं लगा था न यह पूँजीवादी या सामंतवादी प्रतिबंध था. वैसे भी यह पुस्तक मुक्तिबोध के स्वतंत्र चित्त का अध्ययन नहीं थी. यह हिटलर और गोलवरकर के विचारों की प्रतिक्रिया में लिखी गई धी. इसमें ऐतिहासिक तथ्य पर कम, प्रतिक्रिया पर ध्यान अधिक था. इस प्रतिबंध का दवाब उनपर अवश्य था पर इसे समय का दबाव नहीं कहा जा सकता.

तो फिर मुक्तिबोध के लिए, कविता में फैंटेसी के प्रयोग का क्या कारण हो सकता है. मिश्र कहते हैं कि मुक्तिबोध की फैंटेसी को हम उनके अवचेतन को चेतन के अनुभव में बदलने की प्रक्रिया के रूप में देख सकते हैं...समूची अँधेरे में कविता एक भविष्यतकाल को निरूपित करती है. यहाँ सोचने जैसी बात है कि जब चेतन व्यक्तित्व की छिपी स्मृतियाँ ही अवचेतन मन कहलाती है (बी के चंद्रशेखर, मन का सहज विज्ञान) तब अवचेतन को चेतन के अनुभव में बदलने की प्रक्रिया क्या चीज है. हाँ यह स्मृति के रूप में संचित अनुभव को अवचेतन से चेतन में बाहर निकालने जैसी बात अवश्य है. इस प्रक्रिया में उनकी यह फैंटेसी प्रकट यथार्थ से एक रचनात्मक दूरी की तरह है. तो क्या यह माना जाए कि मुक्तिबोध ने “अँधेर में” कविता में जिस पैंटेसी की रचना की है वह उनकी कभी की अनुभूत है, जो उनके अवचेतन में छिप अथवा संचित हो गई हो. तब यह भविष्य का यथार्थ रचने जैसी बात कैसे हुई. लेकिन मार्क्सवादी आलोचकों की दृष्टि में मुक्तिबोध की फैंटेसी भविष्य की बात करती है (मिश्र के नुसार निरूपित है). उदाहरणस्वरूप वे उस कविता के रचना-समय के बाद देश में लगी इमर्जेंसी की ओर संकेत करते हैं. लेकिन उस तानाशाही निर्णय पर लोकतंत्र की शक्ति की विजय की तरफ से वे अपनी आँखें मूँद लेते हैं जैसा देश की स्वतंत्रता के विषय में उन्होंने किया. मुक्तिबोध को तो इस बात की कल्पना भी नहीं थी कि लोकतंत्र की शक्ति तानाशाही शक्ति को मात दे सकती है. लगता है मार्क्सवादी आलोचक किसी भी बात को बंद कपाट से देखते हैं. उन्हें यह नहीं दिखता कि नब्बे के दशक में (यदि जन के मनोनुकूल अर्थात जनाकांक्षाओं को पूरी करने वाली सत्ता के संदर्भ में सोचें) सोवियत संघ की साम्यवादी सत्ता किस तरह ध्वस्त हो गई, और चीन की साम्यवादी अर्थव्यवस्था किस तरह पूँजीवादी व्यवस्था की ओर मुड़ गई, इसका भविष्यकथन मुक्तिबोध की इस कविता में है या नहीं. इस कविता की समयावधि को लें तो यह भी तो भविष्य का यथार्थ है. तो फिर किस प्रकार मुक्तिबोध की यह कविता, उनकी विश्वदृष्टि के परिप्रेक्ष्य में, भविष्य को निरूपित करती है. उनके मन में यह प्रश्न तो उठता है कि क्या बेबिलोन नष्ट हो जाएगा पर यह सवाल नहीं उठीता कि क्या यु एस एस आर की साम्यवादी सत्ता भी बिखर जाएगी.

मुझे लगता है, मुक्तिबोध के फैंटेसी के प्रयोग की वजह वर्तमान के यथार्थ से उनका बच निकलना हो सकता है. क्योंकि सन् 1962 में भारत पर साम्यवादी चीन का आक्रमण होता है, साम्राज्य की सीमा बढ़ाने के लिए ही तो. यह एक साम्राज्यवादी घटना थी. लेकिन इस घटना की कोई ध्वनि उनकी इस कविता में नहीं मिलती. जबकि यह कविता इसी घटित घटना के आस-पास लिखी गई थी. इसमें मुक्तिबोध चीनी-साम्यवाद की इस साम्राज्यवादी मनसा की ओर से अपनी आँखें मूँदे रहते हैं. इस कविता के प्रारंभिक ड्राफ्ट में वह देश में जिस पूँजीवादी, साम्राज्यवादी और सामंतवादी शासन के पैलने की आशंका करते हैं, वह एक राजनीतिक चातुर्य से अधिक नही लगता.

मुझे इस कविता में उनकी फैंटेसी का एक कला-रूप ही दिखता है. वह अपनी अतृप्त इच्छाओं को केवल इसी विधि से कविता में व्यक्त कर सकते थे. उनकी अतृप्त इच्छा थी पूँजीवादी और सामंतवादी विरूपता और उसकी भयावहता को जनता के सामने रखना जिसके लिए पाश्चात्य साम्यवादी चिंतकों द्वारा वातावरण बनाया गया था. इसमें एक राजनेता की-सी मनोवृत्ति काम करती दिखती है. किंतु नेहरू शासन में ऐसी किसी भयावह घटना घटने की गुंजाइश उन्हें नहीं दिखी तो उन्होंने इस कविता के ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में प्रकाशन के लिए जाने से पूर्व इसके पहले के शीर्षक से ‘आशंका के द्वीप’ अंश हटवा दिया. मुक्तिबोध ने अपनी फैंटेसी में एक जन-क्रांति की कल्पना करते हैं है पर इस जन-क्राति के स्वरूप की वह कोई चर्चा नहीं करते. इस जनक्रांति को एक भविष्य-कथन के रूप में देखा जाए तो इमर्जेंसी के विरोध में जयप्रकाश नारायण द्वारा छेड़ी गई संपूर्ण क्रांति की ओर हमारा ध्यान जाता है. पर यह गाँधी के तरीके की क्रांति थी, जनता की लोकतंत्री शक्ति के इजहार की क्रांति, बोल्सेविकों और माओवादियों की तरह की क्रांति नहीं जिसमें सत्ता के प्रतिष्ठापन के लिए खूनी खेल खेला गया था.

भाष्यः

एकाएक मुझे..................................................................................................स्वप्न सरीखा
सेना द्वारा पकड़े जाने के डर से भागता हुआ कवि एक बरगद के पेड़ के पास आकर खड़ा हो गया. यहाँ खड़ा वह सामने का दृश्य देखने रहा है. एकाएक उसे भान होता है जैसे किसी अजनबी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया हो. इस स्पर्श से वह चौंक उठता है. अचानक उसके शरीर में सिर से पैर तक एक थर-थराहट की भयानक अनुभूति रेंग जाती है (शायद उसे पकड़ जाने की प्रतीति हुई हो). किंतु अगले क्षण उसे अनुभव होता है, यह स्पर्श बरगद के पत्ते का है जो ऊपर से गिर कर उसके कंधे से आ लगा है. वह सोचता है क्या यह किसी प्रकार का ईशारा या संकेत है. क्या यह किसी अदृश्य की चिट्ठी है. इसमें क्या इंगित है, कौन सा ईशारा है (अदृश्य की इस चिट्ठी में, किसी पूँजीवादी या सामंतवादी शक्ति की प्रताड़ना से कवि की चेतना को सतर्क करने का ईशारा तो नहीं). फिर कवि का ध्यान उसके अपने परिवेश की ओर जाता है. वह सैन्य-जुलूस के एक सैनिक द्वारा देख लिए जाने से सजा पाने के डर से भागा हुआ है. स्मरण होते ही वह फिर दम छोड़ कर भागने लगता है और एक ही दम में कई मोड़ पार कर जाता है. वह भाग रहा है और बंदूकें धाँय-धाँय चल रही हैं. मकानों के ऊपर गेरुआ प्रकाश (गोलियों के साथ निकलता प्रकाश) छा रहा है (बताया जाता है कि सोवियत रूस में स्टालिन द्वारा जनता पर कुछ इसी तरह गोलियाँ चलवाई गईं थीं सत्ता पर कबजा बनाए रखने के लिए, इस कविता के लिखने के कुछ ही वर्ष पूर्व). कई मोड़ घूमने में दम छोड़ भागते हुए कवि को लगा कि वह पृथ्वी और आकाश को ही घूम लिया अर्थात उसने काफी दूरी तय कर ली. और फिर वह एक मुँदे हुए घर के पास पहुँचा और उसमें लगी हुई पत्थर की सीढ़ी के उस पार (छुप कर) अपना सिर पकड़ कर बैठ गया. दिमाग चक्कर खाने लगा और भँवरें आने लगीं. उन भँवरों में उसे स्वप्न सरीखा कुछ दिखा. स्वप्न में डूबा कवि उस स्वप्न के अंदर स्वप्न देखने लगा-

भूमि की सतहों............................................................................................भीतें हैं झिलमिल
कवि अपनी साधारण स्वप्न-कल्पना से, और गहरे स्वप्न में प्रवेश करता है अर्थात गहराई से कल्पना करने लगता है. कल्पना की गहराई में वह महसूस करता है कि भूमि की सतहों के बहुत नीचे अँधेरे से युक्त एक प्राकृत खोह है. वहाँ बहुत एकांत है. वह खोह बहुत विस्तृत है. उस खोह के साँवले तल में अँधियारे को भेद कर कुछ पत्थर चमक रहे हैं. ये पत्थर सामान्य पत्थर नहीं हैं. इनमें तेजस्क्रिय (तेजोद्दीप्त) मणि हैं, रेडियोएक्टिव रत्न बिखरे पड़े हैं. इन रत्नों पर एक प्रबल प्रपात झर रहा है. प्रपात से झरते प्राकृत जल में आवेग है. उसकी लहरें द्युतिमान अग्नि सरीखी मणियों पर से फिसल फिसल कर बह रही हैं और लहरों के तल में से किरणें फूट रही हैं. और उन रत्नों से, उसके रंगीन रूपों की आभा पूट रही है. इस खोह की बेडौल भीतें झिलमिल झिलमिल कर रही हैं. यह खोह क्या है और ये रत्न क्या हैं, यह अगले छंद में स्पष्ट होता है.

पाता हूँ निज को............................................................................................जूझना ही तय है
उस स्वप्न में कवि अपने को उस खोह के भीतर पाता है. और उन द्युतियों को विक्षुब्ध (कदाचित उसका उपयोग न कर पाने के कारण) नेत्रों से देख रहा है. और तेजस्क्रिय मणियों को हाथों में लेकर उन्हें विभोर (विमुग्ध) आँखों से देख रहा है. नेत्रों से देखने परखने से वह अकस्मात पाता है कि दीप्ति में वलयित ये पत्थर कोरे रत्न नहीं हैं, वरन ये हैं उसके अनुभव, वेदना, उसके विवेक से निकले निष्कर्ष जो यहाँ पड़े हुए हैं (अभी उसके विचारों के स्तर तक नहीं पहुँच सके हैं). ये उसके विचारों की रक्तिम अग्नि (विचारोत्तेजना) के मणि हैं. ये उसके प्राणों के जल-प्रपात में प्रतिपल घुल रहे हैं (अर्थात इसमें उसके प्राणों की स्निग्धता और स्नेह मिले हुए हैं). इनसे जो किरणें निकल रही हैं उसमें गीली हलचल है अर्थात उसमें प्राणों और हृदय की तरलता है. कवि अफसोस करता है कि उसने इन विचार-मणियों को अपनी अकर्मण्यता से गुहा वास दे दिया है (अर्थात सक्रिय विचार में लेने से विरत हो गया है). लोक-हित-क्षेत्र से और जनोपयोग से वह इन्हें बंचित कर दिया है. यही नहीं वह उन्हें खोह मे डाल कर (अपने से दूर कर) किसी के लिए उपयोगी होने से निषिद्ध कर दिया है. कवि यह स्वीकार करता है कि वे विचारादि खतरनाक थे. उनके व्यवहार में आने से यह नौबत आ पड़ती कि जनों के बच्चे भीख माँगने नगते (इससे कवि का आशय क्या इन विचारो के विकल्पहीन होने से है). फिर वह महसूस करता है कि इस तरह से विचार करने का यह समय नहीं है. इस समय केवल एक ही चीज तय है, समस्याओं से जूझना.

आलोचनाः
बरगद के वृक्ष का बिंब खड़ा कर कवि ने दो बातें साधनी चाही है. गाँवों में बरगद का विशाल छायादार वृक्ष दीन हीनों का शरण होता है. अतः इस बिंब से वह शोषित, प्रताड़ित, दीन-हीन जनों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता है और दूसरे एक सिरफिरे पागल कवि के माध्यम से आत्मालोचन करता है. उसका यह आत्मालोचन इस कविता-खंड में भी चलता है. भागते भागते पत्थर की एक सीढ़ी के पास छिप कर जब वह एक गहन सोच में डूब कर स्वप्न देखने लगता है- स्वप्न में स्वप्न- तो वह अपने को एक अँधेरी खोह में पाता है. जो कदाचित उसकी अंतर्गुहा की खोह है. वहाँ उस घुप्प अँधेरी खोह में चमकते रत्नों के रूप में उसे उसके अपने ही अनुभव, वेदना और विवेकपूर्ण निष्कर्ष पड़े दिखाई देते हैं. इनका उसकी अंतर्गुहा में पड़े रहना उसे अफसोस में डाल देता है. इसके लिए वह अपनी ही आलोचना करने लगता है या कहें अपने को कोसने लगता है कि इन विचार और अनुभव रूपी मूल्यवान रत्नों का लोक-हित के क्षेत्रों में उसने उपयोग नहीं किया. लेकिन कवि कुछ अतिरिक्त समझदारी में पगा लगता है- कहने लगता है अब यह सब सोचने से क्या फायदा. अब तो जूझना ही तय है. लेकिन कवि की उक्त निष्क्रियता हमें सोचने पर बाध्य करती है कि कवि का उक्त उनुभव उसकी एक किस्म की लापरवाही ही है. तो फिर इस लापरवाही के साथ समस्याओं से जूझने के लिए कितना आवेग हो सकता है.

यह कविता राजनीतिक है. इसमें कवि ने काव्य को उँड़ेलने की जगह एक विचार को गूँथने का प्रयास किया है. किंतु इस कविता में जिस विचार को गूँथा गया है उसमें कोई सौंदर्य नहीं झलकता. क्योंकि इसमें उदात्तता नहीं है. इससे हमारे पोरों में संवेदना नहीं उमड़ती. कवि केवल फैंटेसी की रचना में निमग्न है. इस फैंटेसी के माध्यम से ही उसे पता चलता है कि उसकी अंतर्गुहा में उसके अनुभव-विवेकादि दबे पड़े हैं. क्यों दबे पड़े हैं, क्यों उसके सत चित सक्रिय नहीं हो पाते उसका कोई चित्ताकर्षक और संवेदनात्मक चित्रण नहीं है. भाषा में प्रवाह नहीं दिखाई देता. अगर कहीं भाषा में प्रवाह बनता भी है तो अचानक कवि की अभिव्यक्ति-मुद्रा के बदलते ही उसके सहज प्रवाह में व्यवधान पड़ जाता है. कविता-पंक्ति “क्या वह चिट्ठी है किसी की?” और “भागता मैं दम छोड़” पंक्ति के बीच संवेदनात्मक प्रवाह छिन्न सा प्रतीत होता है. अंतिम पंक्तियों- “वे (अनुभव, वेदना. विवेक निष्कर्ष) खतरनाक थे/(बच्चे भीख माँगते) खैर” में कवि के विचार का सौंदर्य बिखर कर रह जाता है. कविता के अंतिम वाक्य-विन्यासों “यह न समय है, जूझना ही तय है” में कुछ अटपटा संबंध है जिसे कवि के पक्ष में हमें ठीक करके अर्थ लिकालना पड़ता है. अन्यथा इनके सहज प्रवाह में निहितार्थ बाधित होता है.

Wednesday, 11 April 2018

मुक्तिबोध की कविता : अंधेरे में–भाष्यालोचन–4

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव       रचनाकार में प्रकाशित         11-04-2018

कुछ फैंटेसी के बारे में-
मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में फैंटेसी शिल्प का प्रयोग किया है. यह “अँधेरे में” कविता तो पूरी फैंटेसी ही है. इसे हिंदी में फंतासी भी कहते हैं. फंतासी का अर्थ है कल्पना. इसमें कल्पना द्वारा चित्रांकन किया जाता है अथवा इमेजेज बनाए जाते हैं. फ्रायड के अनुसार असंतुष्ट व्यक्ति अपनी अतृप्त इच्छाओं को व्यक्त करने के लिए फैंटेसी का सहारा लेते हैं. 

हिंदी साहित्य में फैंटेसी का सर्वप्रथम प्रयोग डॉ सम्पूर्णानंद ने सन 1953 में किया “पृथ्वी से सप्तर्षिमंडल” नामक अपना विज्ञान-फंतासी लिख कर. यह एक लघु उपन्यास है. इसमें उन्होंने पृथ्वी से दिख रहे सप्तर्षिमंडल का चित्र प्रस्तुत किया है. उन्होंने उसमें कल्पना का पुट देकर उस चित्र को मनोहारी बना दिया है. लेकिन इस चित्रण में किसी भी स्तर पर वैज्ञानिक नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है. फैंटेसी वस्तुतः कोरी कल्पना नहीं है. इसमें कल्पना के सहारे अंतर्वस्तु का चित्रांकन किया तो जाता है, पर यहाँ कल्पना अनर्गल नहीं होने पाती. आधुनिक विज्ञान-फंतासी के जन्मदाता डेनियल डेफी ने अतरिक्ष यात्रा का कथानक लेकर अपना विज्ञान-फंतासी “कॉन्सोलिडेटर” लिखा है. इसमें अतरिक्ष यात्रा का कल्पना-प्रवण और प्राणवान चित्रण किया गया है. इसमें अंतरिक्ष के ज्ञान का आधार पूरी तरह वैज्ञानिक है पर यात्रा का आधार लेखक के मन की अपेक्षा के अनुसार है. कुछ विज्ञान-फंतासियों में कृतिकारों ने विज्ञान द्वारा ज्ञात तथ्यों के अलावे कुछ और भी होने की कल्पना की है जिसकी आगे चलकर वैज्ञानिक खोजों द्वारा पुष्टि भी हुई है. यह फैंटेसी की सामर्थ्य को दिखाता है.

देखा जाए तो भारतीय साहित्य भी फैंटेसी से अपरिचित नहीं है किंतु यहाँ यह कोरी कल्पना है. यहाँ यह किस्सा के रूप में है जिससे केवल मन की कुतूहल को ही शांति मिलती है.

कविता में फैंटेसी का प्रथम प्रयोग संभवतः मुक्तिबोध ने किया है. उन्होंने अपनी अतृप्त इच्छाओं को व्यक्त करने के लिए इसका सहारा लिया है. ऐसा करना उनकी मजबूरी-सी लगती है. “अँधेरे में” कविता में इसकी साफ झलक मिलती है. इस कविता के आरंभिक खंड में उन्होंने जो कई कल्पना-चित्र बनाए हैं वे उनके अस्थिर मन के द्वारा निर्मित लगते हैं. इनके द्वारा वह कुछ कहने का प्रयत्न कर रहे हैं. उनके अस्थिर व बेचैन मन के भीतर कुछ घुमड़ रहा है जिसे अभिव्यक्त करने की राहें उन्हें नहीं मिल रहीं. इन कल्पना-चित्रों में यथार्थ की झलकें मिलती नहीं दिखती. जबकि फैंटेसी-शिल्प में यथार्थ के चित्र ही कल्पना द्वारा लंबाए और प्रभावकारी बनाए जाते हैं. और यथार्थ की कोख में ही अतृप्त इच्छाभिव्यक्ति की लकीरें खींची जाती हैं. यहाँ तो सिर्फ इतना ही साफ दिखता है कि कवि के मन में जो प्रतीति उलझी हुई है उसे वह व्यक्त तो करना चाहता है पर अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा. कदाचित वह उसी अभिव्यक्ति की खोज में है जो उसके विचारों और अहसासों को स्पष्टता दे और संप्रेष्य बना सके.

कवितारंभ के कल्पना-चित्र कवि की अभिव्यक्ति की राहें बनाने की चेष्टा-से लगते हैं. जिस रक्तालोकस्नात पुरुष की, इस राह में, झलकी मिलती है वह कवि के मन की थाह देती है. वह थाह है कवि द्वारा जगत को (लाल रंग में रंगे) मार्क्सवादी नजर से देखने की. वह उसकी व्याख्या मार्क्सवादी दृष्टिकोण से ही करना चाहता है. किंतु उसका मन दोलायमान है. वह मार्क्सवादी व्यवस्था में भी लोकतंत्रात्मक अभिव्यक्ति के पाने की कामना करता है. यह आगे चल कर स्पष्ट होता है. “एक अरूप शून्य के प्रति” कविता की जड़ मार्क्सवादिता से वह बाहर निकलना चाहता है. उसमें उसकी दृष्टि केवल बाईबिल के इस वक्तव्य, कि ईश्वर ने इस जगत की सृष्टि छह दिन में की, तक ही सिकुड़ी है.

प्रथम दो खंडों को जब कवि स्वाभाविक विस्तार नहीं दे पाता है तब इसके तीसरे खंड में वह अकस्मात एक प्रोसेशन की फैंटेशी का प्रयोग करता है. दरअसल उसके मन में तत्कालीन भारतीय समाज का मार्क्सवादी विश्लेषण तैर रहा है उसके शोषक और शोषित में बँटे होने का. आजादी पाने के बाद उसे कुछ आशा थी कि उसमें कुछ परिवर्तन होगा, शोषकों पर नकेल कसी जाएगी. पर ऐसा होते उसे दिख नहीं रहा. उसके मन में शोषकों की भयावह शोषण-लीला का एक चित्र है जिसे वह अपने काव्य के माध्यम से लोगों को दिखाना चाहता है. उसकी इसी अतृप्त इच्छा की पूर्ति में सिविल लाईन्स के कमरे में पड़े पड़े उसके मन में किसी श्रमिक हड़ताल के दमन हेतु निकाले गए शोषकों के प्रोसेशन का चित्र उभर आता है. कवि अपने कमरे में पड़ा हुआ है, उसे सियारों का हो-हो और ट्रेनों के पहियों के घहराने की आवाज सुनाई दे रही है. पहियों के घहराने की आवाज से उसे संदेह होता है कि कहीं ट्रेन एक्सीडेंट न हो जाए. और इसी क्षण कविता का यह छंद बंद होता है और अगले ही क्षण कवि के मन में प्रोसेशन की बात कौंधती है. प्रोसेशन का कवि के मन में कौंध की तरह आना कविता में फैंटेसी का स्वाभाविक तौर पर आना नहीं माना जा सकता. तो क्या यह कहा जा जाए कि मुक्तिबोध की कविताओं में फैंटेसी स्वाभाविक विकास की तरह नहीं आती. इस प्रोसेशन का वर्णन कवि ने सामने घट रही घटना की तरह किया है किंतु प्रोसेशन में जो चित्र दिया गया है वह यथार्थ रूप में तत्काल घटित हो रही घटना का नहीं है. वह मार्क्सवादी दृष्टि से भारतीय समाज का विश्लेषित चित्र है, इस समाज को शोषक और शोषित में बाँट कर देखने का. इसमें शोषितों में दहशत पैदा करने के लिए शोषकों द्वारा निकाले गए भयंकर जुलूस का चित्र जो कवि के मन में है, वह उसके द्वारा कभी देखे जुलूस का है अथवा उसकी कल्पना द्वारा संयोजित है. ऐसा होने की उसके मन में आशंका है. यह सब प्रकृतिगत रात के अँधेरे में नहीं हो रहा, यह कवि के मन के अँधेरे में हो रहा है. ‘अँधेरे में’ शीर्षक कवि के मन के अँधेरे के लिए है. कवि के अपने अभिप्सित के कहने का यह अंदाज क्या काव्यमय है?

कवि की यही परेशानी है. नेहरू युग तक भारत में पूँजीवाद अभी ठीक से आया भी नहीं था, न ही नेहरू पूँजीवाद के समर्थक थे. वह तो समाजवादी समाज की संरचना में लगे थे. और मुक्तिबोध पूँजीवादी समाज की खामियों के साथ उसमें उपस्थित शोषकों की भूमिका को रेखांकित करना चाहते थे. अतः यह प्रोसेशन का जो बिम्ब उल्होंने रचा है वह शोषितों को डराने के लिए शोषकों द्वारा निकाले गए संभावित जुलूस का है. यह शोषितों में दहशत पैदा करने की कोशिश का चित्रण है. इसमें फैंटेसी की यह कल्पना अनुस्यूत है कि पूँजीवाद किस प्रकार समाज पर अपना प्रभुत्व जमाने की चेष्टा करता है. मुझे तो इसमें विदेशी पूँजीवादी शक्ति का ही द्योतन दिखाई देता लगता है.

मुक्तिबोध की कविता : ‘अँधेरे में’, खंड 4

भाष्यः

अकस्मात.........................................................................................................गल रहा दिल
काव्य-नायक कवि गत खंड में अपनी प्रोसेशन की फैंटेसी में साँस ले रहा था. इस खंड में भी वह सिविल लाईन्स के कमरे में पड़ा पड़ा कल्पना में डूबा है. किंतु उसकी ज्ञानेंद्रियाँ सजग हैं. कवि को लगा था कि उस सैन्यबद्ध प्रोसेशन के किसी सैनिक की दृष्टि उसपर पड़ गई है. अतः इस डर से कि उनकी गतिविधि को नंगा (क्रूर रूप में) देख लेने के कारण वे उसे सजा देंगे, वह कमरे से भाग चला था (कल्पना में). इसी समय अकस्मात उसे दूर कहीं चार के गजर के खड़कने की (अर्थात चार बजने की) आवाज सुनाई देती है. घंटे की आवाज सुन उसका दिल धड़कने लगता है, जाने क्या हो. पकड़ जाने के भय से उसके मन पर मटमैले वल्मीकि जैसा आवरण पड़ा था अर्थात उदासी छा गई थी. उसके उस मनरूपी वल्मीकि में सहसा कुछ हलचल हुई. भय के मारे उसकी आँखों के सामने अनेक हायफन-डैसों जैसी काली काली लीकें अंदर बाहर लिकलने पैठने लगीं (जैसे चोट लगने से आँखों से चिनगी फूटने-मिटने लगती है). उसे चारो तरफ बिखराव महसूस होने लगा. वह स्वयं को अपने कमरे में लेटा हुआ है. उसे लगता है कि उस कमरे की छत के काले काले शहतीर उसके हृदय को दबोचे ले रहे हैं. यद्यपि कमरे के बाहर आँगन के नल में जल (सप्लाई वाले) के आने की खड़खड़ाहट है जैसे वह अपने आगमन की सूचना देने के लिए खँखार रहा हो और निर्भय होने को कह रहा हों. उस क्षण कवि अपने को एकाकी और कमजोर महसूस कर रहा है. उसे लगता है उसके शरीर में बल नहीं है, अँधेरे में उसका दिल गल रहा है अर्थात उसके हृदगत भाव में दृढ़ता नहीं है, अस्थिरता व्याप रही है.

एकाएक.................................................................................................................एक जन
रात के शान्त, नीरव वातावरण में प्रोसेशन की हलचल से कवि को एकाएक जग (जागतिक क्रिया कलाप) के होने का भान होता है. उसे लगता है सब ओर अखबारी दुनिया का फैलाव है (अर्थात अखबार जिसे खबर का विषय बनाते हैं), उसी का फँसाव, घिराव और तनाव व्याप्त है. ये ही सारी विकृतियाँ अखबारों का मसाला बलती हैं. उसे महसूस होता है कि नगर में पत्ते न खड़के (नगर की शांति भंग न हो) इसलिए सेना ने शहर की सारी सड़कों को घेर लिया है. इस दृश्य को देख कवि की बुद्धि की नाड़ी समय की धक् धक् को गिनने लगती है अर्थात घड़ी घड़ी क्या हो रहा है, आगे क्या होने वाला है इसके प्रति उसकी बुद्धि चेतस हो जाती है. वह सोचने लगता है, आखिर यह सब है क्या. यह सैनिकों द्वारा शहर की घेरेबंदी क्यों. कवि भौंचक है कि क्या किसी जन-क्रांति के दमन के निमित्त यह मार्शल-लॉ लागू हुआ है! यह जनक्रांति की बात कवि के मन में कहाँ से आई, सवाल उठता है. पर यह फैंटेसी, कुछ समीक्षकों के अनुसार वास्तव में एक घटी घटना का चित्रांकन है. कवि के समकालीनों का कहना है कि मध्यप्रदेश के एम्प्रेस कॉटन फैक्टरी में श्रमिकों की एक बड़ी हड़ताल हुई थी. हड़ताल में जो जुलूस निकला था उसे ‘नया खून’ पत्रिका की ओर से कवर (cover) करने के लिए स्वयं कवि उसमें सम्मिलित हुआ था. उसी हड़ताल को एक जन-क्रांति की तरह प्रस्तुत करने की भावना यहाँ की गई है.

नेट पर दिए मजदूर हड़ताल के इतिहास में एम्प्रेस मिल की हड़ताल को रोकने के लिए मार्शल-लॉ लगाने का जिक्र नहीं है. तिलक की गिरफ्तारी पर मुंबई (तब के बंबई) के कॉटन-मिल-श्रमिकों की हड़ताल को रोकने के लिए मार्शल-लॉ लगाया गया था. और वह वास्तव में एक जन-क्रांति थी. एम्प्रेस मिल की हड़ताल को जन-क्रांति कहना गले नहीं उतरता. क्योंकि जन-क्राति के मुद्दे व्यापक होते हैं, केवल वेतन-वृद्धि नहीं. फिर भी कविता में इस प्रकार की व्यंजना को स्थान देना कविता का कोई अवगुण नहीं कहलाएगा. किंतु यथार्थ को फैंटेसी में बदलने की कला पर यह चोट जरूर है. हाँ इस स्थिति को देख कर कवि को मार्शल-लॉ लगने की भ्रांति हो रही हो तो यह अलग बात है (हालाँकि मार्क्सवादी आलोचक वास्तविक रूप से मार्शल-लॉ लगने की बात करते हैं, कवि ने भी आगे मार्शल-सॉ लगने की बात की है).

शहर में मार्शल-लॉ के लागू होने जैसी स्थिति को देख कवि दम छोड़ गलियों में भाग खड़ा हुआ. उसकी साँसें फूलने लगीं. उसने महसूस किया, जमाने की जीभ निकल पड़ी है अर्थात इसे देख उसके साथ शहर के लोग भी हतप्रभ हैं. जुलूस में से किसी ने कवि को देख लिया था अतः उसे लग रहा है उसका कोई लगातार पीछा कर रहा है. और वह दम छोड़ कर भाग रहा है. भागते भागते कई मोड़ घूम जाने पर उसे एक चौराहा दिखता है. वहाँ रुक कर वह थोड़ी देर साँस लेना चाहता है क्योंकि उसके अनुमान में वहाँ फिलहाल कोई सैनिक पहरेदार नहीं होगा. फिर उसे अंधकार से बने स्तूप के समान एक विशाल बरगद का पेड़ दिखाई देता है जो बहुत भयंकर है. यह बरगद का पेड़ ऐसा है जहाँ सभी उपेक्षित, वंचित और गरीब शरण लेते हैं. यही स्थान उनका घर और बरगद के शीर्ष का फैलाव उनकी छत होता है. उसके ही तल के अँधेरे में जो एक खोह-सा दीखता है, उसमें गृह विहीन कई प्राणी इस समय सो रहे हैं. अँधेरे में डूबे डालों में जो मटमैले चीथड़े लटक रहे हैं, वे इन्हीं अत्यंत दीन हीनों के पूँजी-धन हैं. कवि दृढ़ता से कहता है कि उस बरगद के तल में एक सिरफिरा जन रहता है.

किंतु आज..........................................................................................................रह गए तुम
इस फैंटेशी में कवि द्वारा एक सिरफिरे जन की कल्पना की गई है. वह निरुद्देश्य नहीं है. सिरफिरे व्यक्ति बिना किसी डर भय के अपने अंतस्तल की बातें करते रहते हैं जिसमें अपनी और जगत दोनों की आलोचना के लिए स्थान होता है. कवि भी, जिन्हें जगत की वास्तविक प्रतीति होती है, सिरफिरे ही माने ताते हैं. वे केवल जीवन के पक्षधर होते हैं किसी मत विशेष के नहीं.

इस छंद में कवि महसूस करता है कि बरगद के तल में इस रात कुछ अजीब बात हो रही है. वह सिरफिरा व्यक्ति जो कत्तई पागल था आज प्रज्वलित घी के समान लग रहा है. वह आज जाग्रत-बुद्धि के समान है, जैसे उसकी बुद्धि जाग्रत हो गई हो. इस समय उसका सिरफिरापन जाता रहा लगता है. वह एक प्रबुद्ध कवि की तरह उँचे गले से कोई पद गा रहा है. पद के भाव से लगता है जैसे वह अपने को उद्बोधित कर रहा है. वह पद उसके आत्मोद्बोधन से भरा है. सड़कों पर निकल रहे सैनिक-जुलूस से उत्पन्न हुई उस असहज स्थिति में उस सिरफिरे का गान कवि को अद्भुत लगता है. वह उसपर टिप्पणी कर बैठता है- यह भी खूब है. क्या उसे पता नहीं कि नगर में वाकई सैनिक प्रशासन कायम है. क्या उसकी बुद्धि भी इस क्षण जग गई है और वह आत्मविश्लेषण में लग गया है. कवि महसूस करता है कि उस सिरफिरे पागल के गीत में करुणा से भरे हृदय की रस-ध्वनि है. वह उस स्वर से जगत को परिचित कराना चाहता है, इस हेतु वह इस कविता में उसका गद्यानुवाद देता है अर्थात गद्यरूप कविता में उसे बताता है.

वह बुद्धिप्रज्वल पागल अपने मन को संबोधित करते हुए कह रहा है, हे मन! तुम तो आदर्शवादी और सिद्धांतवादी थे. तूने अबतक क्या किया. कैसा जीवन तूने जिया कि वह पूरा व्यर्थ हो गया. अपना पेट भरना ही तुम्हारा ध्येय बन कर रह गया और इसतरह तुम आत्मा से हीन हो गए. तुम्हारी स्थिति ऐसी हो गई मानो लोगों की शादी में कनात-से तनने लगे और किसी व्यभिचारी के लिए बिस्तर बनने लगे अर्थात तुम ऐसे कार्यों में लग गए जो तुम्हारे आदर्शों और सिद्धांतों के विपरीत थे.

इस छंद में सिरफिरा कवि आत्मग्लानि में डूब रहा है. वह आत्मकथन करता हैः अपने आदर्शों को लेकर मैंने अनेक दुख सहे, ऐसे कि दुखों को तमगों की तरह पहन लिया, अपने ख्यालों में ही दिन रात रहने लगा, बुद्धि का भी साथ छूट गया, अकेलापन मेरा संगी साथी हो गया, जिंदगी निष्क्रिय-सी हो गई जैसे कोई तलघर हो जिसका कभी उपयोग न होता हो. पागल यह सोच कर पीड़ित है कि वह अबतक कुछ न कर सका, उसका जीवन जीना व्यर्थ हो गया. वह अपने होने से ही पूछता है, बताओ, किस किस के लिए तुम जीए, दौड़े. करुणा के कितने क्षणों से तुम रूबरू हुए और कितने से मुँह मोड़ लिए और पत्थर बन गए. तुमने लिया बहुत ज्यादा और दिया बहुत कम. अर्थात तुम्हारे आदर्शों और सिद्धांतों से देश को कुछ भी न मिला. एक तरह से देश मरा हुआ-सा ही लगने नगा और तुम्ही एक जीवित बच रहे. तुमने लोक-हित-पिता (मार्क्सवादी विचार तंतु?) को घर से निकाल दिया अर्थात उसके महत्व को ठीक से समझा नहीं. अतः अपनी विचारणा में उसे स्थान नहीं दिया. हे मेरे आत्म! तुमने जन-मन की करुणा-सी माँ को अर्थात जन के मन में उमड़ने वाली करुणा को जो माँ की ममता-सी होती है, कोई महत्व नहीं दिया, और स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया अर्थात पूँजीवादी उत्पादों को अपना लिया. शोषितों और गरीबों के प्रति जो तुम्हारे भावनागत कर्तव्य थे उसे तुमने छोड़ दिया. हृदय के मंतव्य मार डाले अर्थात हृदय से सोचना बंद कर दिया. गरीबों के प्रति जो सहानुभूतिमय भावना तुम्हारे मन में उमड़ती थी वह जैसे सूख गई. बुद्धि का तो तुमने कपाल ही फोड़ दिया अर्थात तुम्हारी बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया. अब तुम तर्क करने से कतराने लगे. तुम्हारी चेतना जैसे जम गई, जाम हो गई और उसी जड़ता में तुम फँस गए और अपने द्वारा उत्पन्न किए गए कींचड़ में धँस गए. परिणति ऐसी हो गई कि अपने ही स्वार्थों के तेल में अपने विवेक को बघार डाला, याने विवेक से काम लेना बंद कर दिया, और अपने आदर्श को ही खा गए अर्थात अनदेखा कर दिया. सोचो, अबतक तुमने क्या किया, क्या और कैसा जीवन जीया जिसमें केवल लिया, दिया बहुत कम. इससे देश मर गया पर तुम जीवित रह गए.

मेरा सिर....................................................................................................विक्षिप्त मस्तिष्क
उस सिरफिरे का गीत, स्वप्न में परिचालित मुक्तिबोध के मन को विचलित कर गया. उस गीत में उल्लिखित बातों को सोच कर उनका सिर गरम हो गया. उनके विचारों के स्वप्नों में आलोचन-प्रत्यालोचन का दौर चल पड़ा. मन में विचारों के चित्र उभरने लगे या कहें कविता में कही गई बातें उनके मन में चित्रवत आने लगीं. और वह चिंतनग्रस्त हो गए. वह निजता से मुक्त हो बेचैन हो गए अर्थात अपने बारे में सोचना छोड़ जगत-जीवन की चिंता में पड़ गए. वह असमंजस में पड़ गए कि जग-जीवन की पीड़ा के लिए वह क्या करें, किससे कहें, कहाँ जाएँ, दिल्ली या उज्जैन. संभवतः दिल्ली की याद उनके मन में इसलिए आती है क्योंकि राजसत्ता दिल्ली में थी जिसमें प्रवेश कर ही कुछ किया जा सकता था, और उज्जैन की इसलिए कि उज्जैन में ही उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का एक सम्मेलन कर आंतरिक शक्ति बटोरी थी. उस पागल सिरफिरे की कविता के अर्थानुगमन के बाद कवि यह समझता है कि उस पागल की अपनी स्थिति वैदिक ऋषि शुनःशेप के शापभ्रष्ट पिता अजीगर्त के समान ही है जिसने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए पुत्र को बलि के लिए वरुण के यज्ञ में प्रस्तुत कर दिया था. इस पागल ने भी जगत-जन के संघर्ष में देश को मरने दिया अपने स्वार्थ के लिए, और अपने को बचा लिया. उस पागल का अपना एक अलग ही व्यक्तित्व है, वह अपने आप में खोया हुआ है. मुक्तिबोध का कवि सोचता है कि वही पागल उसे रात में अकस्मात मिलता था (जिसकी पूर्व के कविता खंडों में चर्चा है) और दिन में पागल की तरह रहता था, सिरफिरा विक्षिप्त मस्तिष्क लेकर. तो क्या यह समझा जाए कि तालाब के तम-श्याम जल में उर्ध्व उठती हुई द्युति, मशालों के साथ प्रकटित रक्तालोकस्नात पुरुष और कमरे की साँकल को खटखटाता ‘कोई’ में इसी सिरफिरे की आत्मा थी? क्या उस सिरफिरे के आत्मोद्बोधन में मुक्तिबोध के स्वयं का आत्मोद्बोधन ध्वनित है जिसमें उसके मन की बेचैनी को अभिव्यक्ति देने की चेष्टा है.

हाय, हाय! ……………………………………………………………………………नींद गँवा दी
उस पागल का गान सुन मुक्तिबोध का मन हाय, हाय कर उठा. वह अचंभित हो उठे कि उस सिरफिरे ने यह क्या गा दिया. प्रत्यक्ष में यह क्या नयी बात कह दी उसने. कवि उसे सुन कर किसी छाया-मूर्ति के समान स्वयं अपने ही सामने खड़ा हो गया (अपने ही से बातें करने लगा). उसकी अपने से ही बहस होने लगी और उनपर परस्पर तमाचे लगने लगे. अर्थात कवि का व्यक्ति उसके अपने होने से ही उलझ गया. किंतु उसे तत्काल ही महसूस हुआ, छिः, अपने से ही लड़ना तो पागलपन है. परस्पर आलोचना प्रत्यालोचना वृथा है. गलियों में भयावह अंधकार फैला हुआ है. उसे (कवि को) लगा शायद उसी के कारण यह मार्शल-लॉ लगा है, उसी के मन-मस्तिष्क की निष्क्रियता ने इस दुर्घटना को आमंत्रित किया है. वह यहाँ तक सोच बैठता है कि उसी के कारण यह दुर्घट घटना घटित हुई है. इसी वर्णित प्रतीति को गुन कर कुछ समीक्षकों ने मुक्तिबोध को एक प्रखर आत्माभियोगी कवि के रूप में प्रस्तुत किया है. कवि कहता है चक्र से चक्र लगा हुआ है अर्थात घटनाएँ भी अनायास नहीं घटतीं. वह सोचता है, बाहरी दुनिया में कियाओं और घटनाओं का जितना तीव्र द्वंद्व है उतनी ही तीव्र गति से वह द्वंद्व भीतरी दुनिया में भी चल रहा है. फिक्र से फिक्र लगी हुई है याने एक फिक्र खत्म हुई नहीं कि दूसरी सामने आ खड़ी होती है. कवि बड़ी तीव्रता से अनुभव करता है कि उस पागल ने उसके दिन रात के चैन को तो भुला ही दिया है, उसकी रातों की नींद भी गवाँ दी है.

मैं इस बरगद....................................................................................................छटपटा रही है
कवि अपनी रची पैंटेसी में उस बरगद के पास खड़ा पाता है. वहाँ वह अपने चेहरे को किसी अथाह गंभीर साँवले जल से घुलता अर्थात विकृत होता महसूस कर रहा है. उसका मन दूर सामने झुके हुए, गुमसुम, टूटे हुए घरों में (टूटे हुए घर जिसमें सन्नाटा है) फैले अतल (जिसका कोई ओर छोर न हो) अंधकार को देख कर दुखित हो रहा है. इसके अतिरिक्त ओस से धुली हुई इस साँवली रात में उसे किसी गुरु गंभीर महान अस्तित्व की महक भी आ रही है (यहाँ कभी कर्मठ लोगों का वास रहा होगा) मानो किसी खंडहर के प्रसारों में गुलाब, चमेली आदि फूलों से भरे उद्यान रात के अंधकार में पल पल मँहक रहे हों. मगर वे उद्यान अब कहाँ हैं, अँधेरे में कुछ पता नहीं चलता. सब ओर मात्र सुगंध का ही प्रसार है. किंतु कवि अनुभव करता है कि इस सुगंध की बहती लहर में कोई छिपी वेदना, कोई छिपी गुप्त चिंता छटपटा रही है. कदाचित उक्त से कवि का यह कहना है कि कभी यहाँ दीन, दुखिया और पीड़ितों से सहानुभूति रखने वाले रहते होंगे. यह उन्हीं के सद्कर्मों और सदाशयता की सुगंध है जिसमें उन निराश्रितों, शोषितों की छटपटाती वेदना का आभास मिलता है.

समीक्षाः
यह कविता-खंड ‘अकस्मात’ पद से शुरू होता है. पिछले खंड से इसकी निरंतरता देखी जाए तो कवि सैन्य-जुलूस के किसी सदस्य के द्वारा देख लिए जाने के कारण पकड़े जाने के डर से गलियारे में भाग लिया. भागने की धुन में वह समय के प्रति चेतनशील नहीं रहा. जब रात के चार बजने के घंटे से उसका ध्यान भंग हुआ तो उसे लगा, वह चार का गजर कहीं अचानक खड़क गया है. इस खड़क से उसके भीतर कुछ हलचल-सी होने लगी है. मन चल-विचल हो उठा. उसे चारो ओर विखराव दिखाई देने लगा. किंतु कमरे के भाग चला कवि जब इस कविता खंड में कहता हैः “मैं अपने कमरे में यहाँ लेटा हुआ हूँ.” तो उसका यह काव्य-वाक्य हमें अचंभे में डाल देता है- अभी अभी वह गलियारे में भाग रहा था और अभी अपने को कमरे में लेटा हुआ बता रहा है. इसतरह की अभिव्यक्ति से कविता की निरंतरता और उनकी फैंटेसी बाधित होती है. पर इसको कलागत दोष मानने के बजाय यह कहा जा सकता है कि कवि अपनी एक स्वप्न-कल्पना की फैंटेसी बनाता है फिर अगली स्वप्न-कल्पना की फैंटेसी रचने हेतु थोड़ी देर के लिए जाग्रति में आ जाता है. हर फैंटेसी के रचने के समय वह एक ही परिवेश में रहता है. उसकी स्वप्न-कल्पना बदलती रहती है. यह कहना ही उपयुक्त लगता है कि वह जाग्रत स्वप्न की अवस्था में है.

कवि अगले छंद का आरंभ भी ‘एकाएक’ पद से करता है. नगर में सैन्य-जुलूस निकला है तो नगर में तनाव होगा ही, यह अखबारों का विषय बनेगा ही, इसकी कल्पना कर एकाएक उसे संसार का भान हो उठा, सेना ने सड़कें घेर ली है, यह गुन उसकी बुद्धि की रग धड़कने लगी है- कहीं किसी जन-क्रांति के दमन-निमित्त यह मार्शल-लॉ तो नहीं लगा है. क्योंकि ऐसी व्यवस्था तभी की जाती है. मार्क्सवादी आलोचक कहते हैं मुक्तिबोध की कविता भविष्य की ओर लक्ष्य करती है. पर भारत में किसी स्तर पर कभी मार्शल-लॉ लगा हो ऐसा पता नहीं चलता. हाँ, इंदिरा-शासन में हुए जनांदोलन (यह जन-क्रांति नहीं थी) को दबाने के लिए इंदिरा ने इमर्जेंसी लगाई थी जरूर पर वहाँ जीत लोकतंत्र की हुई थी. सत्ता के दुरूपयोग के खिलाफ लोकतंत्र का हथियार भी सफल हो सकता है मुक्तिबोध को इसकी कल्पना भी नहीं थी.

कविता में कवि द्वारा निर्मित बरगद का बिंब बहुत ही जीवंत और सार्वजनिक चित्त से सरोकार रखने वाला है. बरगद का पेड़ विशाल और छायादार होता है. इसकी छाया में बहुत सारे गरीब और गृहहीन जन शरण लेते हैं. वे अपना एकमात्र धन अपने मटमैले कपड़े उसी की शाखों पर डाल कर निश्चिंत खर्राटे लेते है और कुछ जीवन-चर्या भी निपटाते हैं. ऐसे लोगों के बीच कुछ भटकते विक्षिप्त-से दिखने वाले व्यक्ति भी मिलते हैं जो वास्तव में विक्षिप्त नहीं होते. कहीं कद्र न पाकर वे ऐसे सरल लोगों के बीच आ रमते हैं. कवि की फैंटेसी में यहाँ इस बरगद के नीचे एक सिरफिरा व्यक्ति रहता है जो कभी भी कुछ भी कहता रहता होगा. उसकी बातें, यहाँ शरण लिए जन कभी चाव से सुनते होंगे, कभी उसपर हँसते होंगे. कवि ने, अपने कल्पनानुभव की रात में (जिस रात में वह मार्शल-लॉ लगने की कल्पना करता है), लक्ष्य किया कि वह सिरफिरा इस समय किसी से कुछ कह नहीं रहा वल्कि कुछ गा रहा है. उसका गीत करुणा और व्यथा से भरा है. उस गीत के बहाने लगता है कवि स्वयं आत्मलोचन कर रहा है. वह अपने पर ही अभियोग लगाता है कि जगत-जन के लिए उसने कुछ नहीं किया, जो भी किया केवल अपने लिए किया. जिससे जगत में मृत्यु की छाया जैसा मार्शल-लॉ लग गया और उसने इस कोठरी में कैद होकर अपने को बचा लिया-शापग्रस्त अजीगर्त की तरह. उसे लगता है उसी की अकर्मण्यता के कारण यह मार्शल-लॉ लगा है. वह लोगों को ठीक से जगा नहीं सका, साम्यवाद के प्रति उद्बोधित नहीं कर सका.

Saturday, 31 March 2018

मुक्तिबोध की कविताः ‘अँधेरे में’ भाष्यालोचन-3

 शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव        रचनाकार में प्रकाशित         31-03-2018                


पहले, कविता के पूर्व खंडों का पुनरावलोकनः

आठ खंडों में वितरित मुक्तिबोध की यह लंबी कविता असंदिग्ध रूप से एक राजनीतिक कविता है. किंतु इसके प्रथम दो खंडों में इसका कोई आभास नहीं मिलता. इसका आभास मिलता है कविता के तीसरे खंड में जब उनके चिंतन-क्रम में एक प्रोसेशन की बात आती है. यह प्रोसेशन एक राजनीतिक प्रोसेशन है. इन कविता-खंडों में कवि ने कविता की जो अंतर्वस्तु प्रस्तुत की है वह टुकड़ों में है. इन टुकड़ों में संबद्धता नहीं है. इनमें एकसूत्रता का अभाव है. लगता है ये कवि के अस्थिर और उद्विग्न मन के प्रतिफलन हैं, वह जो कविता में कहना चाहता है, उसके मन में साफ नहीं है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण है जिसे वह अभिव्यक्त तो करना चाहता है पर उसे सटीक अभिब्यक्ति नहीं मिल पा रही.

वह इस कविता को अपनी प्रतीतियों के अंकन से शुरू करता है, स्यात इस आशा में कि वह अपने अंतर्बाह्य बोध को प्राप्त कर सके. नंदकिशोर नवल के साक्ष्य (निराला और मुक्तिबोधः चार लंबी कविताएं, पृष्ठ 125) से ज्ञात होता कि इस कविता को कवि ने कुछ दिनों तक एक टिन के बक्से में अंडर रिपेयर रख दी थी. संबवतः यह एम्प्रेस मिल की घटना घटने के पहले ही लिखनी शुरू की गई थी जिसमें शोषक-शोषित के अंतर्संबंधों को दर्शाने की चेष्टा की जाने वाली थी. इस कविता को वह रिपेयर करते हैं एम्प्रेस मिल की घटना (मजदूरों पर गोली चलाए जाने की) घटने के बाद. इस तीसरे खंड की अंतर्वस्तु को ध्यान से देखने से साफ झलकता है कि वह कविता यहीं रिपेयर की गई है. (कविता का रिपेयर, एक अनोखी बात).

प्रथम कविता-खंड एक काव्य-प्रस्तावना से शुरू होता है. यह काव्य-प्रस्तावना बहुत उलझी हुई है. कवि ने इसे एक उपन्यास का शिल्प देने की चेष्टा की है. वह एक कमरे में है. कमरे के एकांत में उसे कुछ आभास होता है, या वह कुछ प्रकल्पना करता है अथवा एक स्वप्न (फैंटेसी) की मनोरचना करता है जिसमें बेतरतीब दृश्यों की प्रतिष्ठा है. लगता है कवि बहुत उद्विग्न है. उसे अपनी जिंदगी कमरों में बँटी दिखाई देती है. हम इन कमरों को कवि का व्यक्तित्व-खंड मान लेते हैं. उसे अपने इन व्यक्तित्व-खंडों में किसी के पैरों के चलने की आवाज सुनाई दे रही है, पर पैरो की आहट पैदा करने वाला व्यक्ति दिख नहीं रहा. यह एक रहस्य रचने का उपक्रम है अथवा कवि का भ्रम, अध्येता की संवेदना इसका निर्णय करे. कमरे में (इस तीसरे कविता-खंड में संकेत है कि यह कमरा सिविल लाईन्स में है) अस्थिर-मन कवि चारो तरफ देख-गुन रहा है. रात का आरंभिक प्रहर है. अब उसका ध्यान पैरों की ध्वनि से हट कर कमरे की दीवारों की तरफ जाता है. कमरा पुराना पड़ चुका है. उसकी दीवारों के पलस्तर झड़ रहे हैं. पलस्तर झड़ने से कमरे की एक दीवार पर एक आकृति उभर आती है- नुकीली नाक नक्स वाली. उसे देख कवि के मुख से अचानक निकल पड़ता है, “कौन, मनु?” यहाँ कवि के मन में मनु के स्मरण हो आने का कोई ब्याज नहीं दिखता. पर मुक्तिबोध ने इनका उल्लेख अनायास नहीं किया होगा. मनुष्य-सम आकृति को देख इसके मन में कोई नाम तो उभरना ही था. पर मनु नाम ही क्यों उभरा.

फिर कवि की दृष्टि कमरे की खिड़की से सामने के तालाब की ओर जाती है. तालाब के तम-श्याम जल में, उसके ऊपर छाए कोहरे में, उन्हें एक उर्ध्व आकृति बनती दिखती है जिसमें एक द्युति चमक रही है (जैसे एक अवगुंठन में कोई रहस्य प्रकट हो रहा हो, स्यात यह रहस्य में लिपटा उनका सेल्फ हो, जो अर्थवान होना चाह रहा हो, अभिव्यक्त होना चाह रहा हो). इसके उपरांत उन्हें वृक्षों की पुतलियों पर चमकती ज्योति दिखती है जो वृक्षों की पत्तियों पर दूर से आती हुई मशालों की पड़ती रोशनी की है. फिर उन्हें मशालों की लाल रोशनी में नहाई हुई एक और रहस्य-आकृति दिख जाती है. उसे वह अपनी अभिव्यक्ति कहते हैं. किंतु उनकी यह अभिव्यक्ति उन्हें प्राप्त न होकर उनसे दूर चली जाती है. उनकी अभिव्यक्ति के जाते ही वे मशालें अकस्मात बुझ जाती हैं और कवि बेजान हो जाता है. उसे लगता है जैसे किसी ने उसे सूली पर चढ़ा दिया हो. वह संज्ञाहीन होकर वहीं (कमरे में) गिर पड़ता है. कवि की ये सब प्रतीतियां और प्रकल्पनाएँ अद्भुत हैं ये पाठकों और समीक्षकों को उलझन में डाल देती हैं. इस रोशनी के बुझ जाने से संज्ञाहीन होकर गिर पड़ने की उसकी प्रतीति से क्या अर्थ निकाला जा सकता है.

यह कविता राजनीतिक है. तो इसे राजनीति की कसौटी पर कस कर इसके अंतर्वस्तु के खंड-दृश्यों में एकसूत्रता ढूँढ़ने की कोशिश की जाए. क्या यह माना जाए कि मशालों की रोशनी में मुक्तिबोध मार्क्सवाद की रोशनी देख रहे हैं. क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ मार्क्सवादियों की घुसपैठ काँगेस में बढ़ गई थी और वे नेहरू के संरक्षण में सत्ता पर अपना प्रभाव डालने का सपना देखने लगे थे. मुक्तिबोध उस धुसपैठ से दूर थे पर उनके मन में सत्ता पर मार्क्सवाद की प्रभावी छाया पड़ते रहने की आकांक्षा अवश्य थी. वह जो पैरों की आवाज सुन रहे थे, कदाचित वह मार्क्सवाद की पगध्वनि थी. तालाब में प्रकट हो रही चमकीली आकृति संभवतः मार्क्सवाद की अभिव्यक्ति का उपक्रम है. और मशालों की ज्योति मार्क्सवाद की ज्योति है जिसके लोक में फैलने की संभावना बन गई है. लेकिन अचानक मशालों की ज्योति बुझ जाती है अर्थात जन में जब मार्क्सवादी व्यवस्था लागू होने की संभावना क्षीण होती दिखाई देने लगती है तो कवि के लिए यह स्थिति प्राणघातक लगने लगती है. यह तगड़ा झटका महसूस कर, मुक्तिबोध संज्ञाहीनता को प्राप्त हो जाते हैं.

कविता के दूसरे खंड की आरंभिक पंक्तियों तक उनकी यह संज्ञाहीनता बनी रहती है. किंतु वह अपनी जिजीविषा के धनी होने से फिर संज्ञा (होश) में आ जाते हैं. उनके संज्ञा में आते ही, उनकी अभिव्यक्ति जो उनसे दूर चली गई थी (उनके अधिनायकी अथवा लोकतंत्री अभिव्यक्ति की द्विविधा में पड़ जाने के कारण). वह फिर उनसे मिलने के लिए (अर्थात उनकी आत्माभिव्यक्ति को एक स्वरूप देने के लिए) उनके कमरे की साँकल को खटखटाने लगती है (प्रतीकार्थ में यह साँकल उनके मन के द्वार की है). उक्त द्विविधा में पड़ा कवि कुछ समय तक, साँकल खोलें, न खोलें की अहजह में पड़ा रहता है. पर साहस बटोर कर जब वह कमरे की साँकल खोलता है तो उसकी अभिव्यक्ति रात के अंधेरे में गुम हो चुकी होती है. रात का पंछी कवि को हतोत्साहित भी कर डालता है- कवि, वह तुम्हारी गुरू थी और तुम उसके शिष्य. अभिव्यक्ति में किसी प्रकार का संकोच सबकुछ तितर-बितर कर देता है.

इस पूरे प्रसंग में कवि की मात्र स्वैर कल्पना (फैंटेसी) ही दिखती है. पूरे प्रसंग को देख कर केवल यही लगता है कवि जैसे किसी मानसिक बेचैनी में है. वह कोई तर्कसंगत बात सोच नहीं पा रहा. उसे किसी के पैरों की आवाज का सुनाई देना उसके अंतर्जीवन या बाह्य जीवन का कोई हलचल प्रकट नहीं करता. तालाब के तम-श्याम जल में उछलती आकृति एक कमजोर मन का प्रक्षेप ही लगती है. उनके मन में, रात में मशालों के जुलूसबद्ध उनकी कल्पना में आने का राज, क्या कवि के मन में आजादी की मशाल से मार्क्सवादी ज्योति के प्रकट होने की प्रतीति है. कवि की यह काव्य-प्रस्तावना बहुत उलझन में डाल देती है. केवल एक ही बात सुलझी हुई प्रतीत होती है, वह है लाल रोशनी में नहाई हुई आकृति का प्रकट होना और फिर उसका गुम हो जाना. इसका राज उनके द्वारा सुझाई गई उनकी अभिव्यक्ति के संदर्भ में ही खुलता है. नयी कविता के द्वितीय उत्थान-काल में मुक्तिबोध मार्क्सवाद की तरफ मुड़ गए थे और अपने हर सोच की व्यख्या मार्क्सवादी दृ।टिकोण से करने लगे थे. लाल रंग मार्क्सवाद का निशान है. ईश्वर के अस्तित्व की व्याख्या उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण से ही की है जिसमें अंधानुकरण अधिक है. लाल रोशनी में नहाई आकृति (उनकी अभिव्यक्ति) से उनका अर्थ उनकी मार्क्सवादी अभिव्यक्ति से है. जीवन के हर पहलू की, अपने मार्क्सवादी दृष्टिकोण से अभिव्यक्ति देने की कोशिश में हैं वह, ऐसा लगता है. अब यही देखें, सोवियत रूस मे उन्हीं के समय में जनता से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई ( सत्ता के अधिनायकत्व की घोषणा कर) पर उसपर वह कोई टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं कर सके क्योंकि उसी की छननी से छने मार्क्सवाद को उन्होंने अपनाया था. और मध्यप्रदेश में एक श्रमिक हड़ताल को जनक्राति बताकर वह अभिव्यक्ति की स्वपंत्रता के हनन से देश को अँधेरे में होने की घोषणा कर बैठते हैं.

यह काव्य-प्रस्तावना भारतीय काव्य-परंपरा में नहीं है. लेकिन यह अलग से अपनी कोई काव्य-परंपरा भी नहीं बना पाती. क्योंकि इसमें न तो कवि के चिंतन में तारतम्यता है न तो उनकी विचारणा को सर्वग्राह्य बनाने की काव्य-स्फुरणा.

भाष्यः
उक्त परिप्रेक्ष्य के साथ अब मैं कविता के पूर्व खंडों को उसके इस तीसरे खंड से जोड़ने का प्रयास करता हूँ. भाष्य निम्नवत हैः

समझ न पाया..................................................................................क्या वह मैं हूँ, मैं हूँ?
इस खंड में कवि समझ नहीं पा रहा है कि उसके मस्तिष्क में जो चल रहा है (पूर्व से अबतक) वह स्वप्न है या उसकी जाग्रति में ये सब बातें घुमड़ रही हैं. हालाँकि वह कमरे में जलते हुए दीये को देख रहा है, उसकी पीली लौ के प्रकाश में (लौ के बीतने के साथ) समय बीत रहा है. किंतु उसके गिर्द विभिन्न आकृतियों में फैला जगत उसे यथार्थ न लगकर किन्हीं छपी हुई जड़-चित्रकृतियों के समान लग रहा है. उसके सारे अवयव उसे अलग अलग और निर्जीव लग रहे हैं. कह सकते हैं, जगत उसकी संवेदना में असंबद्ध तंतुओं का समवाय-सा है, किसी चेतना से उसकी तारतम्यता नहीं है. पर सृष्टि की संरचना में आकाश तत्व के महत्व पर ध्यान दिया जाए तो प्रकृति की अद्भुतता हमें अभिभूत कर जाती है. जगत के अवयवों को प्रकृति इसी आकाश तत्व से जोड़ती है. जड़ दिखने वाले इस जगत में चेतना की न्यूनतम स्थिति होती है जो सामान्य अनुभव में नहीं आती. मुक्तिबोध का ध्यान इस तरफ नहीं जाता.

यह सिविल.....................................................................................................मैं हूँ
कवि सिविल लाईन्स के अपने कमरे में है. उसकी आँखें खुली हुई हैं पर वह अपने को स्वस्थ अनुभव नहीं कर रहा. उसे लगता है उसका चेहरा, उदास, इकहरा और पीटे गए बालक के मार खाए हुए चेहरे जैसा है. उसे लगता है वह स्लेट-पट्टी पर खींची गई जैसे कोई तस्बीर हो जिसकी आकृति भूत जैसी अंकित की गई हो. (क्या ऐसा कहा जा सकता है कि वह अपने अस्तित्व में जीवंतता का अनुभव नहीं कर रहा, पर क्यों. कहीं विपरीत विचारवालों की प्रतिकूल टिप्पणियों से वह आहत तो नहीं. अगर ऐसा है तो किसी संघर्षशील व्यक्ति के लिए यह अनपेक्षित है. इस क्षण कवि के मन को उसकी पुस्तक पर म प्र सरकार द्वारा प्रतिबंध की कचोट तो नहीं सता रही. पर यह कवि के जुझारूपन का संकेत तो नहीं देता). उस तस्वीर को ध्यान में रख कर वह सोचता है - क्या यह वह स्वयं है. कवि की आँखें खुली हुई हैं. कमरे में मद्धिम प्रकाश में जलता दीया भी उसे दिख रहा है. इससे साफ है कि वह जाग्रत अवस्था में है, पर फैंटेसी रचने का स्वप्न उसकी आँखों में है. किंतु फैंटेसी रचने के आवेश में वह अपने को एक पिटे बच्चे जैसा चेहरे वाला क्यों प्रकल्पित करता है, वह अपने को स्लेट-पट्टी पर खींची गई तस्बीर सा अनुभव क्यों करता है जिसकी आकृति भूत जैसी हो, समझ से परे है. कहीं ऐसा तो नहीं कि कवि में नयी कविता की दौड़ में अन्यों से अपने को अलग दिखने दिखाने की स्पर्धा में आने की ललक आ गई हो. उक्त पंक्तियों का इसके अलावे और क्या अर्थ लिया जा सकता है. फैंटेसी एक अर्थ रोमांच भी है. अगर उक्त प्रकल्पना से कवि कोई रोमांच रचना चाह रहा है, तो धयान रखने योग्य है कि भारतीय साहित्य का एक बड़ा हिस्सा फैंटेसी-रचनाओं से भरा है. पर ये फैंटेशियाँ पाठकों में भी जीवंत रोमांच रचती हैं. मुक्तिबोध की यह फैंटेसी पाठक या समीक्षक में कौन सा रोमांच रचती है, इसमें कितनी जीवंतता है, यह हमारे अनुभव से दूर है.

रात के दो हैं......................................................................................खिड़की से दीखते
रात के दो हैं, इस अमार्जित भाषा से एक अर्थ यह भी निकलता है कि इनमें (दूर दूर जंगल में सियारों के हो हो में) रात वाले दो हैं. पर पूरे अनुच्छेद को ध्यान में लेने पर इसका अर्थ होता है-रात के दो बजे हैं. सियार जंगल में हो-हो (हुँआ-हुँआ) का शोर मचा रहे हैं. पास आती हुई किसी रेलगाड़ी के पहियों की घहराती हुई आवाज गूँज रही है. इस आवाज में कुछ ऐसी गूँज है जिससे कवि को किसी अनपेक्षित और असंभावित घटना के घटने का संदेह हो रहा है, संदेह भी भयानक. यहाँ संदेह के साथ भयानक विशेषण कुछ खटकता है. और यह भी देखिए कि कवि उस दुर्घटना के घटने की अचेतन प्रतीक्षा में है- कहीं कोई रेल-एक्सीडेंट न होजाए. कवि के ललाट पर खिंचे चिंता के ये गणित के अंक (वास्तविक चिंता की लकीरें) आसमान की स्लेट-पट्टी (आसमान किसी स्लेट की पट्टी सा दीख रहा है) पर चमकते, कमरे की खिड़की से दीख रहे हैं (प्रकृति में हर जगह उसे यही चिंता टँकी हुई दीख रही है). कुछ अजीब सी स्थिति है, इन पंक्तियों में मार्क्सवादियों की दृष्टि में आत्मसंघर्ष से जूझते और संघर्षों से निकले इस कवि के अवचेतन में भयानक दुर्घटनाओं के घटने का संदेह तो है ही, वह उसकी प्रतीक्षा में भी है. भयानक दुर्घटनाओं के घटने की प्रतीक्षा में होना क्या कोई स्वस्थ दृष्टिकोण है.

हाय हाय...........................................................................................तॉल्सतॉयनुमा
पहल 108 (पत्रिका) में अच्युतानंद मिश्र अपने लेख इक शम्अ है दलील-ए-सहर में अनुभव करते हैं कि मुक्तिबोध एक ही समय में कई दिशाओं में विचार कर रहे होते हैं. गौर करें, इस खंड के आरंभ में उनका ध्यान अपनी स्थिति पर है, वह समझ नहीं पा रहे हैं कि वह स्वप्न में हैं या जाग्रति में. फिर दूर जंगल में हो रही ध्वनियाँ उन्हें आकर्षित करती हैं. ट्रेन की ध्वनि सुन वह किसी एक्सीडेंट के होने की बात सोचने लगते हैं. फिर उनका ध्यान आकाश के सितारों की ओर चला जाता है. और अगले अनुच्छेद में किसी प्रोसेशन की बात करने लगते हैं.

इस अनुच्छेद में मुक्तिबोध को आकाश के सितारों के बीच घूमते, रुकते और पृथ्वी की ओर देखते तॉल्सतॉय दिख जाते हैं. पर सितारों के बीच तॉल्सतॉय को देख उन्हें खुशी होते नहीं दिखती, तत्समय उनके मुख से हाय, हाय शब्द निकलते हैं जो किसी अफसोसजनक स्थिति में ही प्रकट किए जाते हैं. समीक्षकों (अशोक वाजपेयी, नंदकिशोर नवल आदि) की दृष्टि में तॉल्सतॉय यथार्थोन्मुख साहित्य के क्षेत्र में मुक्तिबोध के आदर्श हैं और उनके गोत्र हैं. तो सितारों के बीच उन्हें देख, वह अफसोस की स्थिति में क्यों आ जाते हैं. कविता की अगली पंक्तियों में तॉल्सतॉय की अपनी ही परख पर उन्हें संदेह हो उठता है. अब उन्हें लगता है कि वह तॉल्सतॉयनुमा आदमी कोई और है. कवि सोचता है कि शायद वह उसके किसी भीतरी धागे का आखिरी छोर है अर्थात उसके भीतर छलकती कोई रचनात्मक संवेदना अभिव्यक्ति के कगार पर है. शायद वह उसके हाय-हायनुमा (जिसमें अफसोसनाक स्थितियाँ हों) और तॉल्सतॉयनुमा (तॉल्सतॉय के उपन्यासों के अनुकरण में) किसी अनलिखे उपन्यास का केंद्रीय संवेदन है जो उसके अवचेतन में दबी है.

प्रोसेशन...........................................................................................समीप आ रहा
सिविल लाईन्स के कमरे में बैठे चिंतनमग्न कवि का अस्थिर मन अब आकाश से हट कर धरती पर आ जाता है. और उसकी संवेदनाएँ अंतर्मुख से बहिर्मुख हो कर रात के अँधरे में निकल रहे एक प्रोसेशन (जुलूस) पर जा टिकती है. पूर्व की पंक्तियों में कवि ने अपने अंतर्मुख चेतना की केवल प्रतीति भर दर्शाई है पर इस बहिर्मुख घटना (प्रोसेशन) का एक बड़ा चित्र प्रस्तुत किया है. दरअसल घटनाएं बाहर ही घटती हैं, भीतर तो अनुभूति होती है जो घनी और विस्तृत होती है जिसे बाजवक्त अंतर्घटनाएँ भी कहते हैं. यहाँ कवि की अनुभूति में बहुत गहराई नहीं है किंतु उसका प्रोसेशन का बाह्य वर्णन विस्तृत है.

यह प्रोसेशन निस्तब्ध नगर की मध्यरात्रि के सुनसान अँधेरे में निकला है. पोसेशन में दूर बज रहे बैंड की क्रमशः नजदीक आ रही दबी (मंद मंद बजती हुई) तान-धुन सुनाई दे रही है. ये बैंड वाद्य-ताल के अनुसार मंद-तार, उच्च-निम्न स्वप्न सरीखे स्वर (स्वप्न में भी अनुभूत होने वाले स्वर) में बज रहे हैं. किंतु उनसे जो ध्वनि-तरंगें निकल रही हैं वे दीर्घ लहरियों में तो हैं पर उदास-उदास और गंभीर हैं अर्थात उनमें सहज उल्लास के भाव नहीं हैं. कवि इस प्रोसेशन को देखने के लिए कमरे से बाहर गली में निकलता है और रास्ते को देखता है. वह कोलतार से बना रास्ता उसे ऐसा लगता है जैसे कोई मरी और खिंची हुई काली जिह्वा हो. अर्थ यह की अँधेरे में पथ की भयावहता कुछ अधिक ही बढ़ गई है. पथ के किनारे पोल पर लटके बिजली के दीए मरे हुए दाँतों अर्थात किसी खोंपड़ी में जडे चमकदार दाँतों के नमूने लग रहे हैं किंतु सड़क के दूसरी ओर खिंचे बिजली के तारों की परछाँई से बने अँधियारे तल में, शीत से भरी सड़क पर प्रतिबिंबित बल्बों के प्रकाश की नीली तेज चमक (प्रतिबिंबित प्रकाश), बहुत पास पास (संभवतः पोलों के तिरछे होने के कारण) सड़क के इस ओर भी आ रही है. इसी चित्रबीथी में सैकड़ों ध्वनिमय संगीत से लदी फदी किंतु दबी (मंदित), गंभीर (उल्लासहीन) स्वर-स्वप्न-तरंगें (विभिन्न स्वरों के सपनों को पूरी करती गंभीर ध्वनि-तरंगें) उदास तान धुन के साथ समीप आती जा रही हैं

और अब.........................................................................................जादुई कारामात.
और अब बैंड बाजों के साथ चल रहीं गैस-लाइटों की पंक्तियाँ कवि के दृष्टि-पथ में बिंदु-सी छिटकी हुईं दिखाई देने लगी हैं. इन की पाँतों के बीचों-बीच अँधेरे में सँवलाए जुलूस-सा उसे कुछ दिखता है. और फिर उसे इन गैस-लाइटों के नीले प्रकाश में रँगे हुए कुछ अपार्थिव चेहरे (दूर होने और नीली रोशनी से रंगे होने कारण जड़वत लगते), बैंड-दल और उनके पीछे चलता काले घोड़ों का एक बलवान जत्था चलता दिखता है. मानो इस जुलूस में जैसे घना डरावना अवचेतन ही चल रहा है (शायद कवि के अवचेतन में प्रोसेशन की कोई प्रकल्पना रही होगी जो यहाँ चरितार्थ हो रही है). प्रोसेशन की भयंकरता को देख कर कवि को लगता है यह किसी मृत्यु-दल (अर्थात मृत्यु ढाने वाला दल) की शोभा-यात्रा है.

नीली गैस-लाइट का दोनों ओर पंक्तियों में जलना कवि को बड़ा अजीब लग रहा है. समूचा शहर नींद में डूबा हुआ है, नींद में खोए शहर के लोगों की गहन अवचेतना में बाहर की तरफ हलचल है, उसके मकानों के पाताली तल में (बेसमेंट में) चमकदार साँपों की उड़ती हुई लगातार लकीरों की वारदात है (अर्थात उँची उँची सीढ़ियाँ बनी हुई हैं). लोग सभी सोए हुए हैं. लेकिन कवि जाग रहा है. वह सबकुछ देख रहा है, जो चारों तरफ रोमांचकारी और जादुई कारामात हो रही है. यह जादुई कारामात ही है कि रोमांच से भर देने वाला जुलूस शहर में निकल रहा है और उसके प्रभाव से समूचा शहर अनांदोलित है.

विचित्र प्रोसेशन...............................................................................पसीने से सराबोर
यह प्रोसेशन विचित्र है. इसमें भाग लेने वाले दल गंभीर क्विक-मार्च के अनुशासन में चल रहे हैं. बैंड-दल के सदस्य चमकदार जरीदार ड्रेस पहने हुए हैं. इस बैंड-दल में चलने वाली आकृतियाँ ऐसी हैं जैसे हड्डियों को, आँतों को या आँतों के जाल से बने उदरों को ड्रेस पहना दिया गया हो (स्पष्ट है इस बैंड-दल में दबे कुचले निरीह लोगों को बलात शामिल कर लिया गया है). इससे उनके बाजाओं में भयंकर दमक है (बाजे ही बाजे दीख रहे हैं, बजाने वाले नहीं). बैंड-दल अपने वाद्यों से गंभीर गीतों की स्वप्न-तरंगें (गीतों की ऐसी तरंगें जो आमजन को स्वप्न में भी प्रभावित करती रहें) उभार रहे हैं, ये ध्वनि-तरंगें सड़क पर इस प्रकार गूँज रही हैं मानो धवनियों के आवर्त मँडरा रहे हों. इस बैंड-दल में शामिल चेहरे कवि के देखे हुए चेहरों से मिलते हैं. इनमें नगर के कई प्रतिष्ठित पत्रकार हैं. कवि आश्चर्य करता है कि इतने बड़े नाम इस बैंड-दल में कैसे शामिल हो गए. इस बैंड-दल के पीछे संगीनों की नोकों का चमकता जंगल है (अनगिनत संगीनें हैं). तथा दीर्घ पंक्तियों में सैनिकों के परेडों के तालबद्ध चल रहे पद-चाप सुनाई दे रहे हैं. उसके पीछे टैंकों का दल, मोर्टार, आर्टिलरी चल रही है. यह भयावना जुलूस धीर धीरे आगे बढ़ रहा है. लेकिन इसमें शामिल सैनिकों के चेहरे पथराए हुए, चिढ़ से भरे हुए, झुलसे हुए और गंभीर रूप से बिगड़े हुए हैं. इससे भान होता है कि ये सारे दल अनिच्छा से इस प्रोसेशन में शामिल हुए हैं. कवि को लगता है जुलूस में सम्मिलित मूर्तियों में से बहुत से ऐसे हैं जो पहले भी उसके देखे हुए हैं, कई परिचित भी हैं.

लेकिन पूरे जुलूस के जो सबसे पीछे है उसे देख कवि चौंक जाता है. यह तो कैवेलरी है, घुड़सवार सेना. इसमें काले काले घोड़ों पर मिलिट्री ड्रेस वाले सैनिक हैं. इन सैनिकों का आधा भाग सिंदूरी गेरुआ है और आधा भाग कोलतारी (काले रंग के) भैरव के रंग का, किंतु बहुत ही आबदार और चमक वाला. घोड़ों पर सवार सैनिकों के कंधे से कमर तक कारतूस से लैस तिरछा बेल्ट है. कमर में चमड़े के कवर में पिस्तौल कसा है. सैनिकों की आँखों में रोष है, उनकी दृष्टि एकाग्र और धार वाली है. इनमें कर्नल, ब्रिगेडियर,जनरल, मार्शल और कई सेनापति-सेनाध्यक्ष भी हैं. इनमें भी कई चेहरे जाने-बूझे लगते हैं. कवि ने समाचार-पत्रों में छपे उनके चित्र देखे थे और समाचार पत्रों में छपे कईयों के लेख भी पढ़े थे. लेख ही नहीं उनकी कविताएँ भी उसने पढ़ी थी. तभी कवि के मुँह से निकल पड़ता है- भई वाह, इस जुलूस में प्रकांड आलोचक और विचारक भी हैं, जगमगाते कविगण हैं, मंत्री, उद्योगपति यहाँ तक कि शहर का कुख्यात हत्यारा डोमाजी भी है जो बलवान बनता है. कवि अफसोस करता है, हाय-तोबा मचाता है कि यहाँ भूत और पिशाच की काया वाले (शोषक) सभी दिख रहे हैं. इनके भीतर जो राक्षसी स्वार्थ (शोषण का) है अब साफ उभर कर सामने आ गया है. उनके छिपे हुए उद्देश्य यहाँ निखर कर सामने आ गए हैं. अन्य मंचों पर इनका व्यक्तित्व दबा ढँका होता था. निश्चित ही यह जुलूस किसी मृत्यु-दल की शोभा-यात्रा है. ये निकले हैं इस प्रोसेशन में अपने शोषण की क्रिया-नीति को और पुख्ता करन के लिए.

इनके कर्तृत्वों और नीयत पर कवि के मन में विचार की फिरकी घूमने लगती है. इसी समय जुलूस में से कई आँखे कवि की ओर उठती हैं. कवि की ओर तनी ये आँखें ऐसी लगती हैं जैसे उसके हृदय में संगीनों की बर्बर नोकें घुस पड़ी हों. उनके द्वारा उसे देखते ही सड़क पर शोर मच गया- एकदम स्साले को गोली मार दो. कवि दुनिया की नजरों से हटकर छिपे तरीके से आधी रात के अँधेरे में निकल रहे जुलूस को देखने गैलरी में निकला था कि जुलूस में से किसी ने उसे देख लिया. उसने जान गया कि वह (कवि) क्रांतिवादी है और वह कवि को मार डालने पर उतारू हो गया. रास्ते पर पकड़ा- पकड़ी की धमाचौकड़ी शुरू हो गई. यह देख कवि पसीने से सराबोर गैलरी से भागा.

एकाएक..........................................................................................सजा मिलेगी
पकड़ो, गोली मारो की धमाचौकड़ी से एकाएक कवि का स्वप्न (प्रोसेशन को देखने में जड़ीभूत ध्यान) टूट गया और उसे दिख रहे सारे चित्र छिन्न भिन्न हो गए. प्रोसेशन देखने में तल्लीन कवि की दृष्टि जड़वत हो गई थी जैसे वह स्वप्न देख रहा हो. इस पकड़ा-पकड़ी की धमाचौकड़ी से उसका ध्यान भंग हो गया और वह अपने में आ गया. वह जाग गया अर्थात वह अपने और अपने परिवेश के प्रति चेतनशील हो गया. किंतु जागते में वह दृश्य (जो अभी अभी देखा गया था) उसे फिर से याद आने लगा. अँधेरे में देखे वे चेहरे जब भी फिर से याद आने लगे. उसके सोच में आया कि इस नगर की, जहाँ वह है, गहन मृतात्माएँ (जुलूस में जो आकृतियाँ कवि को दिखी थीं वे उसके अनुसार शहर की मृतात्माएँ थीं) हर रात को जुलूस में निकलती हैं परंतु दिन में विभिन्न दफ्तरों, कार्यालयों, और घरों में मिल बैठ कर कोई न कोई षड़यंत्र रचती हैं, कवि उन्हें देख कर अफसोस में पड़ जाता है कि वह उन्हें उनके नंगे रूप में देख लिया है. वह इसकी सजा उसे (कवि को) अवश्य देंगे.

जुलूस में शामिल लोगों के लिए कवि ने मृतात्माएँ पद का प्रयोग किया है. यथार्थ के धरातल पर सोचा जाए तो मृतात्माएँ न जुलूस निकालती हैं न मीटिंग किया करती हैं. ऐसा तो बेताल पचीसी जैसी फैंटेसी में ही होता है. समीक्षकों के अनुसार मुक्तिबोध ने यथार्थ को फैंटेसी में प्रस्तुत किया है. पर मृतात्माएँ तो यथार्थ नहीं हैं. यहाँ मृतात्माएँ से यही अर्थ लिया जा सकता है- वे आत्माएँ या सेल्प जो शोषित वर्ग के प्रति असंवेदनशील हैं. यह जुलूस इन्हीं असंवेदनशील शोषकों की ओर से निकाला गया है शोषितों में दहशत पैदा करने के लिए.

आलोचनाः
इस लंबी कविता का प्रस्थान-बिंदु है कवि का उद्विग्न और अस्थिर मन. उसके उद्विग्न मन में घुमड़ रहे विचार खंडों में हैं, परस्पर असंबद्ध. इन विचार-खंडों को जो एक सूक्ष्म तार जोड़ सकता है, वह है अभिव्क्ति का तार. पर वह सूक्ष्म तार कवि की पकड़ से छूट-छूट जाता है. अभिव्यक्ति में तारतम्यता नहीं बन पाती. कभी वह तालाब की उर्ध्व द्युति में खुलना चाहती है तो कभी मशालों की ललाई में हिलमिल कर अभिव्यक्त होना चाहती है. जब कवि को संज्ञा में आने का अहसास होता है तब फिर उसके मन में घुमड़ता कोई उलझा विचार अभिव्यक्ति पाने के लिए उसके मन की खिड़की खटखटाने लगता है. लेकिन कवि की द्विविधा उसे फिर खो देती है. उसकी अभिव्यक्ति उसके मन की नाड़ियों के अँधेरे में कहीं गुम हो जाती है.

ऐसे में कवि अपनी इयत्ता को टटोलने लगता है, कहीं वह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा अथवा वह जाग्रति में है. वह अपनी किसी भी अनुभूति अथवा विचारों की अभिव्यक्ति नहीं पा रहा. वह खुली हुई आँखों से फिर कुछ सोच में खो जाता है. आस पास की सारी चीजें उसे निर्जीव लगती हैं. वह अपने को एक पिटे हुए उदास बालक-सा महसूस करने लगता है. रात के दो बजे हैं. अँधेरे में सियारों की हो-हो मची है. ट्रेनों के पहियों के घहराने की आवाज सुनाई दे रही है. कवि को डर होता है कहीं एक्सीडेंट न हो जाए. कवि अघट घटनीय संभावना से भर जाता है. अस्थिर-मन कवि का ध्यान फिर आकाश की ओर जाता है. वहाँ उसे सितारों के बीच टॉल्सटॉय या टॉल्सटॉयनुमा आकृति दिखती है, जो उसके हृदय के किसी झीने किंतु संवेदनशील तार से जुड़ी है. इससे तो यही अनुमान होता है कि मुक्तिबोध में एक ऐसी अभिव्यक्ति की भी बेचैनी है जो यथार्थवादी साहित्य की होती है.

इस क्षण मुक्तिबोध की कविता एक प्रोसेशन के आयाम में प्रवेश करती है. यह प्रसंगागत प्रस्तुति के तारतम्य में नहीं है. प्रोसेशन का प्रसंग यहाँ जोड़ा गया लगता है. कुछ अजीब सी बात है कि यह जोड़ मुक्तिबोध की एक अवधारणा से मेल खाता है. अनिलकुमार से एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- “फर्स्ट राईटिंग में क्या होता है अनिलकुमार, कि जो हम कहना चाहते हैं न, यह पहले झटके से छूट जाता है. रिपेयर के लिए जब उठाते हैं तो रूप ही बदल जाता है. संश्लिष्टता के कारण लंबाई आ जाती है, गहराई भी.” (निराला और मुक्तिबोध, नंदकिशोर नवल, पृ 125). एम्प्रेस मिल की घटना के बाद शैलेंद्र कुमार ने जब मुक्तिबोध से पूछा, महागुरु, कविता लिखोगे, वह बोले, नहीं, थोड़ा पकने दो. कुछ समय बाद शैलेंद्र कुमार को पता चला कि यह कविता उनकी एक टिन की पेटी में अडर रिपेयर पड़ी है, एम्प्रेस मिल की घटना जब थोड़ी पकी तो उन्होंने प्रोसेशन का प्रसंग उस कविता में जोड़ दिया. लेकिन प्रोसेशन का जो चित्र यहाँ खींचा गया है वह शोषकों द्वारा निकाले गए जुलूस का है जो रात के अँधेरे में निकला है.

Monday, 5 February 2018

मुक्तिबोध की कवित : ‘अँधेरे में’, भष्यालोचन - 2

 शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव             05-02-2018          रचनाकार में प्रकाशित       

‘अँधेरे में’ कविता के प्रथम खंड में मशालों की ज्योति बुझ जाने से कवि का चेतनाहीन होकर गिर पड़ना आलोचक के सामने सवाल खड़े करता है, ऐसा क्यों? मशालों की ज्योति जबतक दिखती रही वह अच्छा भला रहा. पर ज्योति के बुझते ही वह अवसन्न पड़ गया. क्या कवि रुग्णावस्था में था, या उसके मस्तिष्क की कोई नाड़ी किसी व्यतिरेक में थी? मैंने जितनी ही आलोचनाएँ पढ़ीं, किसी में भी आलोचकों को इस बिंदु पर विचार करते नहीं पाया. मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा भी इस बिंदु पर अपना विचार नहीं देते पर सामान्य तौर पर कवि की चेतना के किसी विशिष्ट स्थिति में होने का संकेत अवश्य देते हैं. वह संकेत कवि के विभाजित व्यक्तित्व और उसकी रुग्णावस्था की ओर है.

यदि कविता में एक काव्य-नायक की योजना की गई है, तो कवि को काव्य-नायक की चेतनागत स्थिति का कुछ संकेत देना चाहिए था. कवि कविता में मात्र इतना ही कहता है कि उसे लगातार किसी के चलने की आवाज सुनाई देती है. इस तरह की आवाज का सुनाई देना भी एक मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है. मशाल की ज्योति को देख कर वह सामान्य ही रहता है. पर ज्योति के एकाएक बुझ जाने पर उसका यह सोचना कि ज्योति को बुझाकर व अँधेरा पैदा कर किसी ने उसे जैसे मौत की सजा दे दी हो, उलझन में डाल देता है, उसका संज्ञाहीन होकर गिर पड़ना खटकता है. यदि कवि का अर्थ आँखों के सामने अँधेरा छा जाने से होता (जैसा कि इस स्थिति में होता है) तो वह कुछ क्षण की ही स्थिति होती. ऐसे में वह लड़खड़ा सकता था, संज्ञाहीन होकर गिर नहीं पड़ता. इस समय काव्य-नायक कुछ काल तक संज्ञाहीन रहता है. चित्रण भी कुछ इस तरह का है जैसे काव्य-नायक बहुत कमजोर रहा हो, मानसिक आवेग को झेल पाने में समर्थ न हो. ऐसा काव्य-नायक किसी संघर्ष में कितनी दूर तक चल पाएगा?

कविता की वर्ण्य-स्थिति यह है कि कवि अपने जीवन के उसी कमरे में चेतनाहीन होकर गिरा पड़ा है, जिसमें उसे लग रहा था कि कोई अनायास चक्कर लगा रहा है, या कहें उसकी चेतना उसके जिस व्यक्तित्व-खंड में थी, वह खंड थोड़ी देर के लिए संज्ञाशून्य हो गया. कहीं वह ज्योति-तुल्य पूँजी (जो जीवन का आधार तत्व है) के मार्क्सवादी विलोम में तो फँस कर नहीं रह गया, जिसने कवि को तनावों से भर दिया और कवि उस तनावों को झेल नहीं सका!

कविता का भाष्यः
सूनापन..................................................................................................................दुःसह
कविता के इस दूसरे खंड में कवि चेतना में आने लगा है. वह अनुभव करता है कि कुछ क्षणोंपरांत सूनापन सिहरा याने उसमें उसका जीवन सुगबुगाया, उसने करवटें लीं. उसे अहसास हुआ कि अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभर उठे, अर्थात झिंगुरादि जीवों की ध्वनियाँ सुनाई देने लगीं (संज्ञाहीनता समाप्त होने लगी). उसे लगा जैसे शून्य अर्थात जहाँ कुछ नहीं है उस सूनेपन के मुख पर स्वरलहरियों की सिकुड़नें पड़ने लगीं. उसके (कवि के) मुख से पीड़ा हरने वाली कुछ ऐसी ध्वनियाँ निकलने लगीं जो उसके हृदय में संवेदना जगाने लगी मानो उसके ही हृदय पर अपना सिर धँसा रही हों और उनके शब्दों की लहरें छटपटा रही हों (पीड़ा के आलोड़न में स्फुट ध्वनियाँ निकल रही हों) जो दुःसह होने पर भी उसे मीठी-सी लग रही थीं..

अरे हाँ.....................................................................................................बिजली के झटके
इस दुःसह, पर मीठे अहसास वाली पीड़ा के क्षण में उसे कुछ बजता सुनाई देता है. जब वह ध्यान टिकाता है तो वह दंग रह जाता है, अरे! यह तो उसके द्वार पर लगी साँकल है जो रह रह कर बज उठती है. साँकल के बजने की रीति से वह सोचता है कि वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो उसी की बात बताने के लिए उसे बुला रहा है. कवि को, द्वार पर साँकल इसतरह रह रह कर बजती लगती है, जैसे किसी जटिल प्रसंग में कोई, किसी सच्ची बात को उनसे सीधे सीधे कहने को तड़प जाए और हृदय को सहलाकर सहसा होठों पर होठ (यहाँ ओठ की जगह होठ का प्रयोग है जो चलताऊ संगीत में चलता है) रख दे, और फिर वही बात सुनकर उसका (कवि का) जी धँस जाए अर्थात धक कर के रह जाए. कवि जिज्ञासु हो उठता है, इतने अँधेरे में, आधी रात को उससे कौन मिलने आया? कवि को लगता है कि कोहरे में घिरा हुआ, विना मन का, उससे मिलने को आतुर जो दरवाजे पर बाहर खड़ा है उसे वह पहचानता है. उसके मुख पर ज्योति चमक रही होगी. उसके चेहरे पर प्रेम का भाव होगा और वह देखने में भोला भाला होगा. कवि के अनुसार यह वही रहस्य-पुरुष है जो उसे तिलस्मी खोह में दिखा था. अवसर हो या बेअवसर वह उसकी (कवि की) सुविधाओं का बिना तनिक भी ख्याल किए प्रकट होता रहता है. जहाँ चाहे, जिस समय भी चाहे उपस्थित हो जाता है. वह किसी भी रूप में, किसी भी प्रतीक में उपस्थित होकर, जो कुछ बताना होता है, ईशारे से बताता, समझाता रहता है और हृदय को बिजली के झटके देता रहता है. बिजली के झटके से यह अर्थ लिया जा सकता है कि वह रहस्य-पुरुष कवि को कुछ ऐसे भी संकेत देता है जिसके लिए कवि उस समय तैयार नहीं होता, और उस संकेत को गुन कर वह तिलमिला उठता है.

अरे, उसके....................................................................................................डरता हूँ उससे
कवि बताता है कि उस रहस्य-पुरुष के चेहरे पर सुबहें खिलती हैं अर्थात उसमें संभावनाओं के पुट होते हैं और उसके गालों पर पठार की चट्टानी चमक होती है जिसे बवंडरी हवाओं ने तराशा हो. उसकी आँखों में किरणों से मंडित शांति की लहरें हिलोरें ले रही होती हैं. उसे देख कर कवि के हृदय में अनायास प्रेम उमड़ता है. कवि दरवाजा खोलकर उसे बाँहों में भर लेना चाहता है, अपने हृदय के संपुट में रख लेना चाहता है. कवि चाहता है उससे लिपट कर उससे घुल-मिल जाए. किंतु अपने परिवेश की ओर जब उसका ध्यान जाता है तब वह क्षुब्ध हो उठता है. वह अपने को एक भयानक खड्ड के अँधेरे में पड़ा हुआ पाता है. वह आहत है, क्षत-विक्षत है (संज्ञाशून्य होकर खड्ड में गिरने पड़ने से). एक क्षण के लिए कवि के मन में आता है कि कहीं यह उसकी कमजोरियों के प्रति लगाव का प्रतिफल तो नहीं! कवि बताता है कि इसी कारण वह अपने प्रिय को टालता रहता है, उससे कतराता रहता है और डरता भी है उससे.

वह बिठा........................................................................................................पीड़ाएँ समेटे
कवि का कहना है, उसका वह प्रिय (रहस्य-पुरुष) उसे खतरनाक उँची चोटी के खुरदरे तट के कगार पर बिठा देता है (किन्हीं जटिल प्रसंगों की अभिव्यक्ति के लिए कवि को स्वतंत्र छोड देना, किसी उँची चोटी के खुरदरे तट पर बिठा देने जैसा है) और उसे शोचनीय स्थिति में (कवि को उसके मानसिक द्वंद्व मे छोड़ कर) कहता है.- पार करो पर्वत-संधियों के गह्वर, रस्सी के पुल पर चल कर और पहुँचो उस शिखर के कगार पर, स्वयं ही. (जटिल प्रसंगों में उपस्थित विपरीत परिस्थितियाँ पर्वतों जैसी हैं, उनके बीच का अंतर गह्वर (घाटी) जैसी हैं और उनके पार करने का साधन विचारों की रस्सियों जैसी हैं) पर कवि शिखरों की यात्रा करने से इंकार कर देता है (जीवन-प्रसंगों की जटिलता से दूर भागता है) क्योंकि उसे ऊँचाइयों (विचारों की उत्तुंगता) से डर लगता है. एक क्षण के लिए उसके मन में हठ होता है कि साँकल बजती है तो बजती रहने दो. अँधेरे में ध्वनियों के जो बुलबुले उठते हैं, उठने दो. मेरे उसमें रुचि न लेने से वह जैसे आया था वैसे ही चला जाएगा. और वह (कवि) अँधेरे खड्ड में अपनी पीड़ाएँ समेटे पड़ा रहेगा.

क्या करूँ.........................................................................................................जो भले ही
कवि की दृढ़ता निहायत ही कमजोर है. उसकी क्षणस्थायी दृढ़ता चूर हो जाती है और वह असमंजस में पड़ जाता है कि वह क्या करे क्या न करे. उस रहस्य-पुरुष द्वारा जगत की की हुई समीक्षा (पूँजीवाद और साम्यवाद के चौखटे में रख कर अथवा लोकतंत्र के मूल्य पर रख कर)) इस अंधकार के शून्य में तैर रही है. पर वह उसे सह नहीं सकता अर्थात स्वीकार नहीं कर सकता. चारो तरफ फैले अंधकार में उसका विवेक से भरा महान विक्षोभ (कवि से न मिलने का?) वह सहन नहीं कर सकता. अँधेरे में उसको ज्योति की आकृति-सा अर्थात प्रकाशमान, उसका दिया हुआ नक्शा (जगत का नक्शा ?) वह सहन नहीं कर सकता. फिर भी कवि उसे (रहस्य-पुरुष को) छोड़ने को तैयार नहीं चाहे उसे (कवि को) जो सहना पड़े.

कमजोर घुटनों.............................................................................................स्पर्श की गहरी
कवि उस साँकल बजाने वाले को कभी न छोड़ सकने का इरादा कर अपने कमजोर घुटनों को बल पाने के लिए बार-बार मसलता है और कुछ बल होने पर लड़खड़ाता हुआ दरवाजा खोलने उठता है. वह मशाल की बत्ती बुझ जाने पर संज्ञाहीन होकर गिर पड़ने से, दहशत से, रक्तहीन हुए अपने चेहरे पर पसरे गहरे पर विचित्र शून्य को (सुन्नपन को) अपने हाथों से पोंछता है (चेहरे को सहला कर उसपर कुछ संवेदना लाना चाहता है). फिर अँधेरे के ओर-छोर को टटोल-टटोल कर वह आगे बढ़ता है. वह धरती के फैलाव को अँधेरे में और हाथों से दुनिया को, मस्तिष्क से आकाश को महसूस करता है. उसके दिल में अँधेरे का अंदाज तड़पता है अर्थात अँधेरा कितना गहरा और भयावह है उसे अनुभव कर उसका हृदय बैठने लगता है. उसकी आँखें इन तथ्यों को सूँघती-सी लगती हैं याने ये सब देख नहीं पातीं किंतु उनका अहसास उसकी पपनियों में साफ दिखाई देता है. कवि आगे बढ़ने के लिए निरापद नहीं है पर एक शक्ति, स्पर्श की गहरी शक्ति है उसके पास, जो उसे सहारा दे रही है.

आत्मा में...................................................................................................झाँकता हूँ बाहर
इसी क्षण कवि की आत्मा में भीषण सत्-चित्-वेदना जल उठी (उभर आई अथवा उद्बुद्ध हुई) और दहकने लगी अर्थात लपटें फेंकने लगीं या प्रभाव डालने लगी. मस्तिष्क में विचार उठे और कवि के विचरण के सहचर हो गए अर्थात वह विचार करता हुआ आगे बढ़ने लगा. वह धीरे धीरे सँभल सँभल कर द्वार को टटोलता हुआ आगे बढ़ता है और जंग खाई सिटकिनी को जबरन, जोर से हिला हिला कर, दरवाजा खोलता है और बाहर झाँकता है कि वह साँकल बजाने वाले से मिल ले.
कवि अपनी स्पर्श-शक्ति के सहारे साँकल बजाने वाले से मिलने को जब आगे बढ़ता है, उसी क्षण उसकी आत्मा में भीषण सत्-चित्-वेदना जल उठती है. 

भारतीय धारणा में आत्मा परमातमा का अंश है, और मनुष्य का चरम लक्ष्य सत्-चित्-आनंद को पाना है. अर्थात- चेतना की सम्पूर्णता में सत्य को पाकर आनंद से भर उठना है. पर उक्त मुक्तबोधी सूत्र में मुक्तिबोध का आत्मा से और भीषण सत्-चित्-वेदना के जल उठने से क्या आशय है? साम्यवाद किसी आत्मा-परमात्मा को नहीं मानता तो मुक्तिबोध की यह आत्मा कैसी आत्मा है? मेरी समझ से यह आत्मा पश्चिमी संस्कृति का सेल्फ (self, सवयं की इयत्ता) है. और भीषण सत्-चित्-वेदना का अर्थ हो सकता है- भीषण चेतना (?) की संपूर्णता में भीषण सत्य (?) को पाकर भीषण वेदना से भर जाना. तो क्या साम्यवाद को साध कर मुक्तिबोध का उद्देश्य था समाज को दुखों से भर देना, कि समाज भीषण सत्य को पा ले और भीषण चेतना (हिटलरी?) से भर जाए.

मुझे लगता है, नया करने की चाह में मुक्तिबोध इतने उत्साह से उत्कंठित हो उठते थे कि किसी तथ्य को समझने के लिए उसकी गहराई में डुबकी लगाना भूल जाते थे. शब्दों के प्रयोग में भी वह बहुत सावधान नहीं दिखते. सत्-चित्-वेदना के आगे भीषण विशेषण अनुपयुक्त लगता है. इसका निर्णय मैं विद्वान आलोचकों पर छोड़ता हूँ.

सूनी है राह........................................................................................................नहीं बाहर
किंतु द्वार के बाहर कवि को कोई नहीं मिलता. वह देखता है, बाहर राहें सूनी पड़ी हैं, सर्द अँधेरा है अद्भुत फैलाव पसरा है सामने. आकाश के उदास तारे अपनी ढीली (टिमटिमाती मंद रोशनी वाली) आँखों से विश्व को देख रहे हैं. कवि, उस साँकल बजाने वाले के न मिलने के दर्द से भर गया. ऐसे में उसके (साँकल बजाने वाले के) बारे में कवि के प्रत्येक क्षण सोचने, अफसोस करने और फिक्र करने से उसका दर्द और बढ़ गया. ऐसे में उसे लगने लगा कि मानो वह साँकल बजाने वाला कुछ दूर वहाँ है, वहाँ दूर के अँधियारे में है. वह जाएगा कैसे, वह पीपल (एक पवित्र वृक्ष जिसके तले लोग अक्सर विश्राम करते हैं, कुछ वहाँ इस समय भी हो सकते हैं) वहाँ पहरा दे रहा है. इस अँधियारे में दूर दूर से कुत्तों की अलग अलग आवाजें आ रही हैं और ये आवाजें सियारों की आवाजों से टकरा रही हैं. इनकी आवाजों से दूरियाँ काँप रही हैं, फासले गूँज रहे हैं अर्थात दूर दूर तक इनके ही स्वर गूँज रहे हैं, साँकल बजाने वाले का कहीं कोई स्पंदन तक नहीं. कवि को विश्वास हो गया कि द्वार पर बाहर कोई नहीं है.

इतने में.................................................................................................................गुरु है
द्वार पर खड़ा कवि यों सोच ही रहा था, कि इतने में उसे उस सूने अँधेरे में कोई चीख सुनाई दी, शायद वह रात के पक्षी (उल्लू) की आवाज थी- “क्या इंतजार करते हो, वह तो चला गया. वह अब तेरे द्वार पर नहीं आएगा, नहीं आएगा तो नहीं ही आएगा. कवि! अब वह गाँव में या शहर में निकल गया है. अब तू उसे खोज, उसका शोध कर. वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति है और तू उसका एक भागा हुआ (पलायक) शिष्य है. वह तेरी गुरु है, गुरु.”

आलोचना :
इस कविता के खंड-1 का भाष्य लिखते समय मैंने जिक्र किया था कि इसे लिखते समय मुक्तिबोध के मन में एक सदमे का बोझ था- एम्प्रेस मिल की हड़ताल में गोली चलने से कर्मचारियों के घायल होने और कवि की इतिहास-पुस्तक पर प्रतिबंध के सदमे का. किंतु यह तथ्य कविता के इन दो खंडों का विषय नहीं है. इन दो खंडों में कवि अपने सामने बार बार प्रकट होने वाले किसी रहस्य-पुरुष की चर्चा और चित्रण करता है, जिसे वह अपनी अभिव्यक्ति बताता है. उस अभिव्यक्ति को वह अभी पा नहीं सका है. इससे तो यही संकेत मिलता है कि कदाचित कवि के मन में हर क्षण कुछ ऐसी बातें व विचार उमड़ रहे होते हैं जिसे वह प्रकट करना चाहता है पर उसके लिए उसे उपयुक्त शब्द नहीं मिल रहे. अभिव्यक्ति उपयुक्त शब्दों द्वारा ही होती है.

मुक्तिबोध के विचारों के अध्ययन से हमें लगता है, वह साम्यवाद से तो जुड़े ही हैं किंतु स्वतंत्र सृजन के लिए व्यक्ति के स्वातंत्र्य के भी पक्षधर हैं. लेकिन ये दोनों विचार उनके मन में जैसे ओवरलैप करते रहते हैं. किसी एक पर टिक रहना उनके लिए मुश्किल है. डॉ महेंद्र भटनागर (प्रगतिशील कवि) ने एक जगह लिखा है कि उन्होंने अपनी एक कविता रामविलास शर्मा को दिखाई. शर्मा ने उस कविता की प्रशंसा की. मुक्तिबोध के साथ एक मुलाकात में भटनागर ने उनसे इस वाकया का जिक्र किया तो वह उनसे बोले तक नहीं. दरअसल शर्मा ने मुक्तिबोध को गैरमार्क्सवादी कहकर उनकी आलोचना की ही थी, उनपर कई अरुचिकर टिप्पणी भी कर दी थी. उस चर्चा के क्षण उनपर मार्क्सवाद ओवरलैप कर रहा था, व्यक्ति-स्वातंत्र्य पर. उचित तो था कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य का पक्षधर होने के नाते मुक्तिबोध सहज ही रहे होते.

इस कविता में कवि ने एक रहस्य-पुरुष की सृष्टि की है. यह रहस्य-पुरुष प्रथम खंड में कोहरे में लिपटा रक्तालोक-स्नात पुरुष के रूप में प्रकट होता है (ठीक ठीक अभिव्यक्ति मिलने के पूर्व कुछ इसी तरह की आभामय स्थिति होती है). किंतु मशालों के बुझने पर वह रहस्य-पुरुष लुप्त हो जाता है. इस द्वितीय खंड में वह कवि के कमरे की साँकल बजाता है. कवि ‘कौन?’ कह कर पहले अचंभित होता है, फिर कहता है कि साँकल बजाने वाला उसकी अभिव्यक्ति है. पहले वह उससे (रहस्य-पुरुष,अभिव्यक्ति) मिलने से कतराता है पर अगले ही क्षण मिलने को दौड़ पड़ता है. तबतक वह रहस्य-पुरुष जा चुका होता है.

ध्यान देने योग्य है-कवि अभिव्यक्ति के लिए व्यग्र नहीं है, अभिव्यक्ति कवि के निए व्यग्र है. यह बात कुछ उल्टी दिखती है. कविता के लिए अनुभूति और उसकी तीव्रता चाहिए. (वैसे नये कवियों ने कविता की अद्भुत परिकल्पनाएँ कर ली हैं जो उनके अनुकूल पडे). अभिव्यक्ति अंतस्तल में नहीं सतह पर उभरती है. अनुभूति गहरी व तीव्र हो तो वह छलकने लगती है, थोड़े से प्रयास से वह रूप ग्रहण करने लेती है. पर यहाँ सबकुछ सायास हो रहा है. ऐसा लगता है कि कवि कोई बात कहना चाहता है या कहें अभिव्यक्त करना चाहता है और अपने कहे को स्पष्टता देना चाहता है (अर्थात अभिव्यक्ति अपनी झलक साफ करना चाहती है) कि अभिव्यक्ति उनके द्वार पर दस्तक देकर कहीं खो जाती है (वह अपनी बात स्पष्ट करने से चूक जाते हैं). और मुक्तिबोध की दृष्टि अँधेरे के अंतराल में दूर दूर तक ढूँढ़ती है. पर वह कहीं नहीं दिखती. रात का पंछी भी कह देता है, रहस्य-पुरुष के रूप में आई वह अभिव्यक्ति तुझे अब नहीं मिलेगी, नहीं ही मिलेगी. इसका लक्ष्यार्थ यही हो सकता है कि अभिव्यक्ति ढूँढ़े नहीं मिलती. इसके लिए पहले समझ और अनुभूति को गहरी करनी पड़ती है. इसे ठहराव नहीं, फ्लो चाहिए.

आखिर यह अभिव्यक्ति है किस चीज की? किसी अनुभूति की, दुख की या विचार की? मुक्तिबोध इसे स्पष्ट नहीं करते. मेरी समझ से इसका उत्तर इन कविता खंडों में नहीं है. इसका उत्तर उनके जीवन विस्तार में है. वैचारिक रूप से उनका व्यक्तित्व बँटा हुआ है. उनके व्यक्तित्व का एक खंड मार्क्सवाद की गिरफ्त है तो दूसरा खंड लोकतंत्रवादी दिखना चाहता है.