Thursday, 20 February 2014

गीता मेरी समझ में


                                                                                                                                                                                    
    ई-पत्रिका रचनाकार में   2 0.02.2014 को प्रकाशित                
 



   गीता रुपक में कही गर्इ है. इसकी विषयवस्तु कुल इतनी है:

   कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं.   युद्धारंभक शंख बज चुके हैं. अस्त्र-शस्त्र चलने ही वाले हैं. इसी क्षण अर्जुन धनुष-वाण उठाता है और कृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहता है. वह उन कौरवों को देखना चाहता है जो उससे लड़ने आए हैं. वह सबओर दृष्टि फिराता है. दोनों ही सेनाओं में उसे अपने ही संबंधी दिखते हैं. उन्हें  देखते ही उसके मन में ममत्व उमड़ आता है. उसके मन में होता है कि जिनके लिए वह राज्य, सुख, भोग चाहता है वे ही जीवन की आशा  छोड़कर यहा युद्धहेतु खड़े हैं. वह सोचता है कि अपने ही कुटुम्ब को मारकर उसे क्या मिलेगा. उनको मारने की कल्पना से ही वह कांप उठता है. उसका  मुंह सूखने लगता है, हाथ से गांडीव सरकने लगता है, मन विषाद से भर जाता है. वह अपना  धनुष-वाण त्यागकर उदासमन रथ में पीछे बैठ जाता है. अर्जुन का यह कृत्य कृष्ण को कायरतापूर्ण लगता है. वह उससे पूछते हैं-''अर्जुन! इस विषम घड़ी में तुझे यह मोह कहां से हो आया. अर्जुन अपने मन की स्थिति को कृष्ण के सामने रखता है. कृष्ण उसके मनोविज्ञान को समझते हैं. वह देखते हैं कि अर्जुन संशय में पड़ गया है. वह दुविधा में है कि युद्ध करे अथवा छोड़ दे. उनका तेजस्वी मित्र और शिष्य अपने होने (being) को समझ नहीं पा रहा है. वह उसके मन में उठी दुविधा को दूर करने की चेष्टा करते हैं. वह उसे पहले ज्ञानयोग (कर्मसंन्यास) फिर कर्मयोग समझाते हैं और उसे अपनी प्रकृति अथवा स्वधर्म को पहचानने के लिए प्रवृत करते हैं. अर्जुन अपने मन के संशय को दूर करने के लिए कृष्ण के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा देता है. उसका निर्णायक प्रश्न है- इनमें से किस एक को अपनाना उसके लिए उपयुक्त है, कर्मसंन्यास (ज्ञानोपलबिध के बाद कर्म को त्यागना) या कर्मयोग (फल में आसक्ति रखे बिना कर्म करना) को.

    कृष्ण उसे कर्मयोग की ओर प्रवृत करते हैं. वह कहते हैं कि देहनिर्वाह के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है. इसलिए फल में आसक्ति रखे बिना स्वधर्म में प्रवृत होकर कर्म करना ही तेरे लिए श्रेष्ठ है. यह युद्ध तूने ठाना नहीं है, तुझपर आ पड़ा है. गुण और कर्म के अनुसार तू क्षत्रिय है, युद्ध करना तेरा स्वधर्म है. उठो और युद्ध करो.

    अर्जुन को कृष्ण की बात समझ में आ जाती है और वह कृष्ण के कहने पर नहीं स्वधर्म से प्रेरित होकर लड़ने के लिए तैयार हो जाता है. 

    इस आ पड़े युद्ध  में, जिसकी ललकार सामने ताल ठोक रही है, युद्ध से विरत होकर अर्जुन का पुन: युद्ध के लिए तैयार हो जाना उसके स्वधर्म अथवा अपने सहज स्वाभाविक कर्म में प्रवृत हो जाने को दिखाता है. आज के कुछ लोगों के देखे अर्जुन का चित्त आतंकी लग सकता है. पर आतंकी चित्त तो घृणा-प्रेरित होता है और युद्ध को ही समस्या का समाधान समझता है. यह युद्ध आपद्धर्म है. 

   अर्जुन यहां केवल 'अर्जुन का नहीं अपितु मनुष्यमात्र का प्रतीक है. प्रत्येक मनुष्य को अपने अंतर्द्र्वन्द्वों और बहिर्द्वन्द्वों से उलझना पड़ता है. अत: यह स्वधर्म मनुष्यमात्र के संदर्भ में है. युद्ध के रुपक में यहां मनुष्यमात्र की प्रतीति ही संदर्भित है.

   इस बात को समझने के लिए इस क्षण मेरे मन में हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'पुनर्नवा का एक प्रसंग उभर कर आ रहा है. उपन्यास में देवरात की पुत्री मृणाल सुमेर काका से पूछती है-
   ''लड़कियां इस अनाचार के उन्मूलन में कुछ हाथ नहीं बंटा सकतीं काका? पिताजी बता रहे थे कि विंध्याटवी में कोर्इ सिद्धपुरुष हैं जो देवी के सिंहवाहिनी और महिष्मर्दिनी रूप की उपासना का प्रचार कर रहे हैं. परंतु पिताजी कहते हैं कि लड़कियां सिंहवाहिनी की ही उपासना कर सकती हैं, महिष्मर्दिनी की नहीं.. केवल कविता में यह बात फबती है. ऐसा क्यों होगा, काका? सुमेर काका ठठाकर हंसे, ''तू पूछना चाहती है कि भैंसा अगर चढ़ दौड़े तो तेरी-जैसी लड़की को क्या करना चाहिए. तेरे काका का जबाब है, जो कुछ आस-पास मिल जाए उससे उस भैंसे को दमादम पीट देना चाहिए''. 
 
    आमजन की भाषा में सोचें तो सुमेर काका यही कहते हैं कि मुसीबत आन पड़े तो उसका सामना करना ही करणीय कर्तव्य है. या कहें कि आ पड़े क्षण में लड़़ना भी पड़े तो वह मनुष्य का प्रकृत धर्म ही है. यहां मोह या संशय, विनाश को ही आमंत्रित करेगा. यहां तो जीवन का अस्तित्व ही खतरे में है. सिंहवाहिनी से प्रेरणा लेने तक तो अनर्थ हो जाएगा.

    इस युद्ध में कृष्ण अर्जुन से यही कह रहे हैं. हां वह यह अवश्य कहते हैं कि वह (अर्जुन) हर क्षण उसे (अस्तित्व को) स्मरण करता हुआ परिणाम को ध्यान में रखे बिना अनासक्त होकर लड़े. वह अस्तित्व की लीला का मात्रा एक निमित्त है. 

    युद्ध छिड़ने के क्षण में युद्ध से विमुखता युद्ध से भाग खड़ा होने जैसा है-   ठीक भैंसा से बचने के लिए प्राण बचाकर भागने जैसा.   

    युद्ध की कठिन घड़ी में अर्जुन का विषाद उसके अपने कुटुम्बियों के प्रति हुए उसके मोह से उत्पन्न हुआ. उसे लगा कि उसके लिए युद्ध से संन्यास लेना ही उचित होगा. जीवन जीने का यह भी एक मार्ग है. किंतु उसके मन में संन्यास स्यात् पूरी तरह स्पष्ट नहीं था. कृष्ण ने उसे बताया कि संन्यास कर्मों का त्याग अवश्य है पर वह ज्ञान को उपलब्ध हुए ज्ञानियों के लिए ही उपयुक्त है. यह संन्यास, योग भी है जो कर्मरत लोगों के लिए है. इसमें परिणाम की आकांक्षा किए बिना कर्म करना होता है. इसमें कर्म में तो आसक्त नहीं ही होना है, अकर्म में भी आसक्ति नहीं रखनी होती है. यही तेरे लिए करणीय कर्तव्य है. दुविध छोड़ो और युद्ध करो. यही मेरा निशिचत उत्तर है. यह देह तो एक भौतिक पिंड है. इसमें रहने वाला देही (आत्मा) न तो मारता है न ही मारा जाता है. यह एक देह से दूसरी देह में चला जाता है. तू भूलते हो कि तू मारोगे और तेरे भार्इ-बंधु मरेंगे. मैं तो पहले ही उन्हें मार चुका हूं. उनके लिए तेरा शोक करना व्यर्थ है.

    ओशो कहते हैं कि ज्ञानमार्ग यदि अर्जुन की समझ में आ गया होता तो गीता दूसरे अध्याय में ही समाप्त हो सकती थी.

    गीता में उल्लिखित संजय को मिली दूरदृष्टि और कृष्ण का विश्वरूप दर्शन आज के मनस के लिए एक कुतूहलपूर्ण विषय हैं. पर ये तथ्य हैं-

    कृष्ण ने अर्जुन को अपना जो विश्वरूप दिखाया वह उनके द्वारा उसको दी गर्इ ध्यान की एक अचानक विधि थी. रामकृष्ण ने भी विवेकानंद को स्पर्श कर उन्हें ऐसी ही अनुभूति दी थी , निर्विकल्प समाधि की अनुभूति, विश्वरूप जैसी. 

    संजय के पास दूर-दृष्टि के होने के संबंध में गीता पर ओशो के प्रथम प्रवचन से एक उद्धरण उल्लेखनीय है:

    ''एक व्यक्ति है अमेरिका में. अभी मौजूद है, नाम है टेड सीरियो. उसके संबंध में दो बातें कहना पसंद करूंगा तो संजय को समझना आसान हो जाएगा. क्योंकि संजय बहुत दूर है समय में हमसे. और न मालूम किस दुर्भाग्य के क्षण में हमने अपने समस्त पुराने ग्रंथों को कपोल-कल्पना समझना शुरू कर दिया है. इसलिए संजय को छोड़ें..यह टेड सीरियो.. कितने हजार मील की दूरी पर कुछ भी देखने में समर्थ है. न केवल देखने में बलिक उसकी आंख उस चित्र को पकड़ने में भी समर्थ है.-ओशो.
 

Wednesday, 15 January 2014

दिल्ली की राजनीति

सन् 1948 तक दिल्ली की राजनीति महात्मा गाँधी के नियंत्रण में थी. नीति और उद्देश्य था देश की आजादी प्राप्त करना. आजादी मिलते ही गाँधी ने काँग्रेस को सेवादल का रूप ले लेने की सलाह दी थी. पर काँग्रेस को यह स्वीकार नहीं हुआ.

सन् 1947 में सत्ता हस्तांतरण के समय प्रधानमंत्री का पद पं जवाहरलाल नेहरू ने सँभाला. वह गाँधी की ही पसंद थे. सरदार पटेल की तरफ से कुछ विरोध हुआ पर वह उपप्रधानमंत्री पद पर सहमत हो गए. गाँधी के जीवन काल में ही, संविधान लागू होने पर स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति किसे होना चाहिए, का प्रसंग आया था. तब अधिकांश नेताओं की दृष्टि डॉ राजेंद्र प्रसाद की ओर मुड़ी थी. पं जवाहरलाल नेहरू इस पद के लिए सी. राजगोपालाचारी के पक्ष में थे. फलतः डॉ प्रसाद इस संभावित पद के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. पर गाँधी की इच्छा के आगे उन्हें नतमस्तक होना पड़ा.

सन् 1950 में जब स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुसार भारत के प्रथम राष्ट्रपति के चुनाव का अवसर आया तब डॉ राजेंद्र प्रसाद इसके उम्मीदवार हुए. नेहरू की इच्छा के अनुसार राजगोपालाचारी ने भी पर्चा भरा. पर सांसदों का रुख देख उन्हें अपना पर्चा वापस लेना पड़ा. सन् 1955 में दूसरी बार भी नेहरू डॉ प्रसाद को राष्ट्रपति के पद पर नहीं देखना चाहते थे. पर राजर्षि टंडन आदि ने डॉ प्रसाद के पक्ष में मोर्चा संभाला और डॉ प्रसाद राष्ट्रपति चुन लिए गए.

डॉ प्रसाद, गाँधी के नेतृत्व में छेड़े गए स्वतंत्रता संग्राम में पं नेहरू के सहयात्री थे. डॉ प्रसाद को, देश के प्रति उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर गाँधी ने देशरत्न की उपाधि दी थी. राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता में वह नेहरू से किसी भी प्रकार से उन्नीस नहीं थे. फिर भी राष्ट्रपति के चुनाव में नेहरू द्वारा डॉ प्रसाद का ऐसा विरोध ! कुछ विचलित करता है उनका यह एट्टीच्युड.

दरअसल नेहरू के व्यक्तित्व का वह पहलू जिसने उनसे यह कराया गाँधी के प्रभालोक में दब-सा गया था. स्वयं नेहरू ने भी देश के लिए अपने किए कार्यों और उदार पश्चिमगत राजनीतिक व्यवहार से एक ऐसा व्यक्तित्व बना लिया था जिसके आलोक में उनका वह पहलू ध्यान में आने पर भी नजरअंदाज किए जाने योग्य हो गया था. वह पहलू था उनका समर्थ और स्वतंत्र व्यक्तित्वों के प्रति असहज होना. अपनी सूझबूझ के आगे किसी और की सूझबूझ पर विचार करना उन्हें पसंद नहीं था. अंबेडकर का उनके मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना (सन् 1951) और उस समय के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण तथा कुछ अन्यों को उनके द्वारा मंत्रिमंडल में न लिया जाना इसी तथ्य की ओर संकेत है. सन् 1947 में सत्ता हस्तांतरण के ठीक बाद कबायलियों के वेश में पाकिस्तानी सेना के कश्मीर पर आक्रमण को रोकने के लिए कश्मीर नरेश हरि सिंह के अनुरोध पर भारत ने जेनरल करियप्पा के नेतृत्व में अपनी सेना भेजी. जेनरल ने आक्रमण को नाकाम कर देने के बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा कश्मीर की कुछ हथिया ली गई जमीन को वापस लेने की अनुमति माँगी तो नेहरू के दबाव में उन्हे अनुमति नहीं दी गई. नेहरू की अदूरदर्शिता के कारण जो समस्या उत्पन्न हुई वह आजतक भारत का सिरदर्द बनी हुई है.

सन् पचास के दशक तक केंद्रीय मंत्रिमंडल ही नहीं पूरी काँग्रेस नेहरू की छत्रछाया में आ गई थी. उनसे असहमति रखने वालों को यथारूप उनके मंत्रिमंडल से और काँग्रेस से हटना पड़ा जिनमें राजगोपालाचारी, जयप्रकाश नारायण, श्यामा प्र मखर्जी वगैरह उल्लेख्य हैं. अब दिल्ली की राजनीति नेहरू के नियंत्रण में थी. उन्होंने दुनिया के देशों के साथ सौहार्द्र बनाने के लिए पंचशील का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिससे देश की अपेक्षा उनकी अपनी छवि ही अधिक चमकी. तत्कालीन अखबार उनकी मंशा में सम्राट अशोक जैसा शांति दूत बनने की कामना देखते थे. हालाँकि इतिहास का यह विद्वान भूल गया था कि अशोकीय भारत की सीमाएँ पूर्णतः सुरक्षित थीं. सीमापार के देशों की प्रलुब्ध दृष्टियों पर सम्राट अशोक पैनी दृष्टि रखते थे. पर पंचशील की चकाचौंध में नेहरू इतना बह गए कि देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति चौकसी रखना या तो भूल गए या यह उन्हें बेमानी लगा. उनकी नींद तब टूटी जब चीन ने उनके पंचशील सिद्धांत की धज्जी उड़ाते हुए भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर आक्रमण कर दिया. चोट खाए नेहरू जब सन् 1962 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो वह अपने ही मंत्रिमंडल पर अपना नियंत्रण खो चुके थे. उसे नियंत्रण में लाने के लिए उन्हें कामराज प्लान का सहारा लेना पड़ा. वह एक संवेदनशील व्यक्ति अवश्य थे पर उनके पास गाँधी जैसा न समाहारी व्यक्तित्व ही था न उनकी जैसी दूरदर्शिता. फिर भी नेहरू ने काँग्रेस में अपने प्रति यत्किंचित विरोध के बावजूद अपना व्यक्तित्व ऐसा बना लिया था कि अन्यों की स्थिति लगभग अनुल्लेखनीय हो गई थी. इसीलिए तब एक प्रश्न निरंतर उठता रहा- ‘’नेहरू के बाद कौन’’. हालाँकि नेहरू मंत्रिमंडल में इस पद के वहन की योग्यता रखनेवाले कई अनुभवी मंत्री थे.

यह प्रश्न कोई सम्मानजनक प्रश्न नहीं था.  

कहीं इस प्रश्न के पीछे लोगों में कोई विशेष मंशा तो नहीं काम कर रही थी.  

नेहरू की राजनीति अब दिल्ली की राजनीति के रूप में स्थापित हो गई थी. इस नीति की एक बड़ी विशेषता थी संगठन को कमजोर कर देना. ध्यान देने योग्य है कि अपने तीसरे मंत्रिमंडल को नियंत्रण में रखने के लिए नेहरू ने तमिल नाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज (कामराज प्लान) का सहारा लिया और उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया. और सन् 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद जब अगले प्रधानमंत्री के चुनाव का समय आया तो इसके लिए काँग्रेस अध्यक्ष कामराज ने नेहरू की अनुभवहीन पुत्री इदिरा का प्रस्ताव किया. इंदिरा के इंकार करने पर लालबहादुर शास्त्री पर सहमति बनी. इन लालबहादुर ने जो देश के लिए काम किया उसपर उस समय के अखबारों ने टिप्पणी की थी- जो काम नेहरू अपने अठारह साल के शासन में नहीं कर सके लालबहादुर ने उसे अठारह महीने में कर दिखाया. और सच में लालबहादुर जब धोती पहने पाकिस्तान के लाहौर तक पहुँच गए तब इस देश के लोगों ने लगभग उती तरह का उत्साह और जोश महसूस किया जैसा सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में महसूस किया था.

ताशकंद में लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद सन् 1966 में आखिरकार इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाया ही गया. शुरू शुरू में डॉ राममनोहर लोहिया ने उन्हें संसद में एक देखने वाली गुड़िया कहा. पर इस तथाकथित गुड़िया के नेतृत्व में जब पाकिस्तानी बाँगलादेश पर सफल सैनिक अभियान हुआ तो इस गुड़िया में छिपे एक दक्ष और दृढ़प्रतिज्ञ राजनीतिज्ञ को देख सारा देश हतप्रभ रह गया. और देशवासियों को अपनी अपार शक्ति का एहसास भी हुआ. लेकिन वह दिल्ली की उसी राजनीति को लेकर आगे बढ़ीं जिसे नेहरू ने स्थापित की थी. जब सांसद के रूप में उनके चुनाव को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अबैध घोषित कर किया तो उन्होंने इस्तीफा न देकर न्यायालय के उस फैसले को निरस्त कराने के लिए संसद से पिछली तिथि से कानून पास करा लिया. और पहली बार एक तरह से संसद का अवमूल्यन हुआ.

उस समय एक सशक्त विपक्ष के न होने से दिल्ली की राजनीति में किसी परिवर्तन की गुंजाईश नहीं थी. पर विपक्ष में इंदिरा सरकार के विरुद्ध तिरस्कार के स्तर तक का विरोध था. नेहरू की राजनीति का एक तत्व यह भी था कि सत्ता कहीं हाथ से फिसल न जाए. इसमें देश सेवा का भाव था या सत्ता लिप्सा का, इसका निर्णय तो इतिहास करेगा. पर इंदिरा गाँधी ने देश में इमरजेंसी केवल इसीलिए लगाई कि सत्ता उनके हाथ से न फिसले. और उनका यही कदम उल्टा पड़ गया और सत्ता उनके ङाथ से फिसल गई. सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की टूटती डोर को थामने वाला बूढ़ा शेर ( जयप्रकाश नारायण ) अभी जीवित था. इमरजेंसी के खिलाफ उसने एक दहाड़ मारी और टुकड़ों में साँस ले रहा विपक्ष उसके पीछे हो लिया. पटना के गाँधी मैदान में उस दहाड़ के पीछे उमड़े जन सैलाब ने ऐसा करिश्मा दिखाया कि दिल्ली की सत्ता, टुकड़े टुकड़े दलों को मिलाकर बने जनता दल के हाथ में आ गई.

किंतु सत्ता में आया यह विपक्ष एकदम नकारा निकला. दिल्ली की राजनीति तो नहीं बदली वल्कि इसमें ‘अहम के टकराव' का एक और तत्व जुड़ गया. यह ‘अहम’ वैसा ही था जैसा अंग्रेजों के विरुद्ध टुकड़े में लड़ रहे सामंतों में था. इधर जयप्रकाशनारायण की मृत्यु हुई उधर जनता दल विखर गया. फिर दिल्ली की राजनीति अपने पूर्वरूप में चलती रही. सदी के अंत में भाजपा आई और छै साल से कुछ अधिक शासन में भी रही पर दिल्ली की राजनीति में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ.

आज भी दिल्ली की राजनीति में कोई परिवर्तन हुआ हो ऐसा नहीं दिखता. अब तो यह राजनीति पूरी तरह से सत्ता की राजनीति बनकर रह गई है. इसमें सत्ताशीन और विपक्ष दोनों समान रूप से शामिल हैं. उसमें अब नए नए अवांक्षित तत्व भी जुड़ते जा रहे हैं जो नेहरूकालीन राजनीति में भी थे पर सूक्ष्मरूप में, दबे ढँके थे. लेकिन इसने अब भदेस का रूप ले लिया है. इस भदेसी राजनीति ने कई संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन भी कर दिया है जिसमें प्रधानमंत्री जैसी संस्था भी है. यह राजनीति न्यायालय जैसी संस्था के भी अवमूल्यन के प्रयास में लगी दिखती है. इस अवमूल्यन के दौर में राष्ट्रपति जैसी संस्था भी नहीं बच सकी है. क्या प्रजातंत्र के मूल्यों मे ये संस्थाएँ शामिल नहीं हैं.

पता नहीं इस राजनीति की अंतिम हद क्या है. आज तो इस राजनीति ने एक अकुशल और अनुभवहीन व्यक्ति, जो किसी भी समय कुछ भी बोलने के लिए मशहूर है, को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार किया जा रहा है. इस राजनीति के ये अद्भुत प्रयोग कहाँ जाकर थमेंगे यह तो भविष्य ही बताएगा.

 



      
  


Sunday, 29 December 2013

मौसम बदलेगा



ई- पत्रिका अनुभूति में प्रकाशित नचिकेता की कविता क्या मौसम बदलेगा पर एक प्रतिक्रिया

मौसम तो बदलेगा ही
उसे अनुकूलता की प्रतीक्षा 
नहीं होती.  

पक्षी चहकेगें ही
उन्हें चहकने के लिए
किसी की अपेक्षा 
नहीं होती.

मउराए अंकुरों में भी
हरीतिमा आएगी
बस प्रकृति की निकटता भर
पाने की देर है
पर मित्र ! हम तो
अपेक्षाओं के पुलिंदे हैं
इनमें एक जबतक हरी हो 
दूसरी मउरा जाती है.

मौसम तो बदलता है
हमारी अनुभूति में

प्रकृति के आँगन में
सूरज का उगना और डूबना
प्रकृति के तुक हैं
पर इनके प्रतिसंवेदन
और सिहरन
हमारी अनुभूति में ही सरक 
व द्रवीभूत होकर
हमारे होते हैं

सूरज की अरुणाई में खोए हम
दरअसल हम्हीं
सूरज को उगाते और डुबाते हैं

मौसम तो बदलेगा ही

जरा सोचें 
क्या नए मौसम को
अपने में समोने के लिए
हमारे भीतर की ग्रहणशीलता
उर्वर है.



                  



              

Sunday, 22 December 2013

राजनीति की दिल्ली दिल्ली की राजनीति-2

दिल्ली की राजनीति

कभी दिल्ली राजनीति की थी, आज राजनीति दिल्ली की है. राजनीति का दिल्ली का होना प्रारंभ होता है सन 1947 ई से पं जवाहर लाल नेहरू के स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री बनने के साथ. सत्ता हस्तांतरण के समय भारत के प्रधानमंत्री के लिए सरदार बल्लभभाई पटेल और राजगोपालाचारी चुने गए थे पर गाँधी जी के कहने से इन लोगों ने जवाहर लाल के पक्ष में अपने नाम वापस ले लिए. वह इस पद को पाने के लिए बहुत आतुर भी थे. उनकी यह आतुरता इस घटना से प्रकट होती है. भारत-पाकिस्तान के बँटवारे के प्रश्न पर गाँधी ने अल्टिमेटम दे दिया था कि यह बँटवारा उनकी लाश पर होगा. पर सत्ता हस्तांतरण में देरी होते देख जवाहर लाल ने उनके इरादे की अनदेखी की. बाद में पटेल भी उनसे सहमत हो गए. नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत गणतंत्र का (26 जनवरी 1950 को) प्रथम राष्ट्रपति बनाने के पक्ष में भी नहीं थे. सन 1955 में तो उन्होंने 'प्रसाद' की उम्मीदवारी का बाकायदा बिरोध किया. पर राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन जैसे दमदार लोगों के जबरदस्त बिरोध के आगे उनकी एक नहीं चली. असल में जवाहर लाल नहीं चाहते थे कि सरकार में उनके कैलिबर का कोई व्यक्ति हो. भीमराव अंबेडकर जैसे कुछ को अपने मंत्रीमंडल में ले भी लिया था उन्होंने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. जयप्रकाशनारायण की स्वतंत्र विचारधारा भी उन्हें पसंद नहीं थी. जवाहरलाल के अंकुश से असंतुष्ट होकर सी. रीजगोपालाचारी ने भी कांग्रेस से अलग होकर अपनी ''स्वतंत्र पार्टी'' बना ली. देखने लायक है कि ये लोग कांग्रेस के प्रभावी सदस्य थे. अंबेडकर तो संविधान निर्माता ही थे. उस समय के अखबारों में अक्सर चर्चा होती रहती थी कि नेहरू सम्राट अशोक बनना चाहते है. पंचशील का सिद्धांत देकर और अमरीका और रूस को करीब लाकर वह यही संकेत देना चाहते थे. इसमें कोई संदेह नहीं कि नए भारत की आधारशिला नेहरू ने ही रखी पर इससे जितनी उनकी अपनी छवि चमकी उतनी देश की सूरत नहीं बदली. सन 1962 के चीनी हमले ने उनके नेतृत्व में मजबूत हुए भारत की पोल खोल दी. चीन की सीमा पर केवल लाठी-भाला लिए सैनिक तैनात थे. चीनी हमले का सामना करने में अपने को असमर्थ पा उन्हें अमेरिका से सहायता की याचना करनी पड़ी. इसके पहले पी.एल-480 के लिए वह देश को परमुखापेक्षी बना ही चुके ही थे. दुनिया में और देश में उनका नाम तो खूब चमका पर उनकी चमक देश की जनता में बल और स्वाभिमान का संचार नहीं कर सकी. उलटे देश के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया कि ''नेहरू के बाद प्रधानमंत्री कौन''. अह! दिल्ली की राजनीति ने भारत को एक निरीह चेहरा दे दिया.

किंतु लगता है दिल्ली ने इसे महसूस किया. उसकी राजनीति ने थोड़ी करवट ली. उसने उहापोह में ही सही भारत के प्रधानमंत्री के लिए एक ऐसे व्यक्ति को चुना जिसने एक छोटी सी रेल-दुर्घटना पर रेलमंत्री के पद से तत्काल इस्तीफा दे दिया था. इस नेहरूभक्त की कद छोटी थी. नेहरू के ग्लैमरस व्यक्तित्व से कोसों दूर यह धोती कुर्ता टोपी पहननेवाला एक सीधा और सरल व्यक्ति था. पर उसमें कुछ कर गुजरने का अपार हौसला और छाती में बेशुमार बल था. यह मन से लौह-इरादेवाला था. किसी भी तरह की सहायता के लिए दुनिया के सामने हाथ पसारना उसे स्वीकार नहीं था. यह थे देश के स्वाभिमान से लदे फदे लालबहादुर शास्त्री. सन 1964 ई. के पाकिस्तान के हमले का इन्होंने डटकर मुकाबला किया. धोती पहने ही वह लाहौर पहुँच गए. देश के स्वाभिमान को जगाने के लिए उन्होंने ''जय जवान जय किसान'' का नारा दिया. उन्होंने देश की जनता से प्रतिज्ञा कराई कि घर के आसपास कोने-काने में जो भी जमीन हो उसमें हम गेहूँ उगाएँगें और उसे ही मिल बाँटकर खाएँगे. किंतु इसके लिए अपना हाथ नहीं पसारेंगे. उनके इस कदम से पूरे देश में बड़े जोरों से यह चर्चा चल पड़ी कि जो काम जवाहर लाल नेहरू ने अपने शालन के अठारह साल में नहीं कर सके उसे लाल बहादुर शास्त्री ने अठारह महीने में कर दिखाया.

इस नाटी कद की असाधारण प्रतिभा ने देश की जनता में जिस बल और स्वाभिमान का संचार किया वह आजतक कायम है. पर राजनीति के नशे में डूबी दिल्ली ने, लगता है उसे एकदम भुला दिया है.
                                                                           क्रमशः      

Monday, 16 December 2013

राजनीति की दिल्ली, दिल्ली की राजनीति-1

राजनीति की दिल्ली

दिल्ली महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ नाम से जानी गई जब पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इसी नाम से अपनी राजधानी बनाई. ग्यारहवीं सदी में राजा अनंगपाल ने संभवतः इसे दिल्ली नाम दिया. तेरहवीं सदी से सोलहवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक यह सल्तनत काल की राजधानी रही. बाबर ने मुगल शासन की स्थापना इसी दिल्ली में की और इसे अपनी राजधानी बनाया. दिल्ली के दुर्भाग्य से अकबर ने कुछ समय के लिए अपनी राजधानी आगरा को बनाया. पर शाहजहाँ ने इसे पुनः दिल्ली में प्रत्यावर्तित कर दिया. और तब से आजतक यह दिल्ली हमारी राजधानी है. इस दिल्ली को मैं राजनीति की दिल्ली इस लिए कह रहा हूँ क्योंकि मगध के बाद देश की सारी राजनीति हमेशा यहीं से डील होती रही है. 

स्वतंत्रता की प्राप्ति के पूर्व तक दिल्ली राजनीति का ही हो के रही. यह राजनीति थी सत्ता को हथियाने, राजाओं की प्रभाव-सीमा को बढ़ाने और उनके अपने निजी हित को साधने की राजनीति. तब राजनीति प्रजा के हित के नाम पर नहीं की जाती थी. इसका चरित्र अधिनायकी था. पांडवों को इंद्रप्रस्थ (आज की दिल्ली) सत्ता के घरेलू झगड़े के समाधान में मिली थी राज्याधिकार के रूप में. अनंगपाल से लेकर बहादुरशाह जफर तक की राजनीति का आधार यही था. इस राजनीति में यह मान लिया गया था कि राजा का कर्तव्य ही है प्रजा की रक्षा और उसका हित करना. इसमें सत्ता उत्तराधिकार में मिलती थी. कभी कभी उत्तराधिकार के लिए जोड़ तोड़ में सशस्त्र विद्रोह किए जाते थे. अंग्रेजों ने राजनीति की दिल्ली को करवट लेने पर मजबूर कर दिया. अब इसका चरित्र सामंती हो गया. इसमें एक नए तत्व का प्रवेश हुआ- आजादी का. इसके लिए अंग्रेजों के विरुद्ध सामंतों ने विद्रोह की अगुआई की. पर यह केवल सामंतों का विद्रोह नहीं रहा. इस विद्रोह में सामंतों को एक नया आयुध हाथ में लेने को बाध्य होना पड़ा. वह आयुध था जनता का सक्रिय सहयोग. अबतक शासक ही राजनीति किया करते थे. लेकिन अब राजनीति का चरित्र सामंती नहीं रह गया. अब दिल्ली ने स्वयं ही राजनीति करना शुरू कर दिया. भारत के गणतंत्र घोषित होते ही दिल्ली की राजनीति खुलकर सामने आने लगी.
                                                                        आगे भी.....