28-01-2026
ब्लॉग-4
चौथा अध्याय
कृष्ण कहते हैं-अर्जुन!
यह कोई नया योग नहीं है. इसे पहले मैंने सूर्य से कहा था. पर अब यह लोक में
लुप्तप्राय है. वही पुरातन योग मैं तुझसे कहता हूँ. अर्जुन ने जिज्ञासा की- ‘यह
कैसे हो सकता है. आप अभी हाल के हैं और सूर्य बहुत पुरातन हैं. तब कृष्ण ने कहा-जब लोक में धर्म का
क्षय और अधर्म की बढ़ती होती है तब मैं अपने को पुनः रचता हूँ. मैं ही संसार का
कर्ता हूँ फिर भी तू मुझे अकर्ता ही जानो. सच तो यह है कि कर्म एक स्वाभाविक क्रिया
है. पर न उसमें,
न उससे प्राप्य फल
में कोई आसक्ति रहे
तभी वह कर्म योग
कहलाता है’. कर्म करें
न करें, इस संशय में रहने वाले व्यक्ति नष्ट
हो जाते हैं. तू अपने संशय को ज्ञानरूपी खड्ग से काटकर कर्गयोग का आश्रय लो और उठो, युद्ध करो.
# हिन्दी पद्यकार०-कर्मयोग को विस्तार से समझाने
के बाद कृष्ण ने अर्जुन से आगे कहा:
श्री भगवान बोले :
इस अक्षीण1 योग को मैंने कहा
विवस्वान2 से था
विवस्वान ने मनु से मनु ने इक्ष्वाकु से कहा उसे ।1।
परंपरा से प्राप्त
योग यों राजर्षियों
ने जाना
किंतु
परंतप! दीर्घकाल में वही लोक से लुप्त हुआ ।2।
वही पुरातन योग आज जो श्रेष्ठ
रहस्य है, मैंने
तुझे कहा इसलिए
कि तू
है भक्त सखा प्रिय
मेरा ।3।
अर्जुन ने पूछा:
जन्म तुम्हारा
अभी हाल का विवस्वान का पूर्व बहुत
कैसे समझूँ सृष्टि-आदि4
में योग कहा यह उनसे
।4।
#
हि.प० -भगवान ने इस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन को पुनर्जन्म का रहस्य बतायाः
श्री भगवान बोले:
अर्जुन! हैं हो चुके
बहुत से जन्म मेरे
व
तेरे
पार्थ! जानता उन सबको मैं, तू न जानता उनको ।5।
सभी
प्राणियों का ईश्वर अज5 अविनाशी
होते मैं
अपनी प्रकृति अधीन कर लेता जन्म योगमाया से ।6।
जब-जब होती हानि धर्म की और अधर्म बढ़ता है
तब तब ही भारत!
अपना मैं रूप रचा करता हूँ ।7।
साधु जनों की
रक्षा को
व नाश हेतु दुष्टों
के
धर्म-स्थापना
हेतु प्रकट मैं युग-युग होता रहता ।8।
मेरे जन्म कर्म दिव्य है
यों
जो तत्व से जाने
अर्जुन! देह त्यागने पर वह जन्म न
ले मुझे मिलता ।9।
राग-क्रोध-भयरहित
बहुत मेरे आश्रित पहले भी
ज्ञानरूप तप
से पवित्र मेरे स्वरूप
को
पाए ।10।
जो जैसे भजता
मुझको मैं भजूँ6 उसे
वैसे ही
सब प्रकार
से पार्थ! मनुज आ मिलते मेरे पथ में ।11।
लोग चाह
में कर्म-फलों की पूजें
देवजनों को
मिलती
उन्हें कर्म से उपजी सिद्धि तुरत
यहीं है ।12।
गुण व कर्म-भेद7
से मैंने चारो
वर्ण8 रचे हैं
उसके
कर्ता मुझ अविनाशी को तू जान अकर्ता ।13।
चाह न मुझे कर्म के फल में कर्म न मुझसे लिपटे
यों जो मुझे तत्व से
जाने बॉंधे कर्म न उसको ।14।
मुझे जान यों किए पूर्व में कर्म मुमुक्षुओं9
ने भी
अतः सदा
से किए पूर्वजों के कर्मों को
कर तू ।15।
# हि.प० -अब भगवान
अर्जुन को बताते हैं कि कर्म और अकर्म क्याहैं किन स्थितियों में कर्म करके भी मनुष्य
कर्म-बंधन से नहीं बॅधता.
श्रीभगवान् आगे कहते हैं:
क्या
अकर्म कर्म क्या इसमें बुद्धिमान भी मोहित
अतः कहूँगा कर्म
जिसे तू जान छुटे बंधन
से ।16।
तुझे चाहिए कर्म-रूप
व
रूप अकर्म का जाने
जानो और विकर्म10क्या है तू, गहन
कर्म की गति है ।17।
जो देखता अकर्म
कर्म में कर्म अकर्म में
देखे
मनुजों
में वह बुद्धिमान वह योगी
कर्म
करे सब ।18।
जिसके होते कर्म कामना बिना और
संकल्प बिना,
कर्म जले जिसके ज्ञानाग्नि में ज्ञानी
कहें वो पंडित ।19।
छोड़ आसक्ति कर्म-फल में
जो नित्यतृप्त11निराश्रय12
लगा हुआ वह कर्मों में
भी किंचित कर्म न करता ।20।
जीत लिया
जिसने अंतः तन छोड़ा सभी परिग्रह
आशा बिन13
वह देह-कर्म कर भी न प्राप्त पापों को ।21।
तुष्ट जो
अपने आप प्राप्त में ईर्ष्या द्वन्द्वरहित जो
जो असिद्धि-सिद्धि में समरस बॅंधता नहीं कर्म कर ।22।
जिसकी गत14 आसक्ति चित्त ज्ञानस्थ मुक्त ममता से
यज्ञ हेतु जो कर्म करे उनके
सब कर्म
विनशते ।23।
जिस
यज्ञ में :
अर्पण ब्रह्म ब्रह्म हवि आहुति-क्रिया
अग्नि याज्ञिक भी
जो इस बह्म्रकर्म में स्थित
ब्रह्म प्राप्य फल उसको ।24।
दैव-यज्ञ का ही कुछ
योगी अनुष्ठान करते हैं
कई यज्ञ17 से ब्रह्म-अग्नि में यज्ञ18 हवन हैं करते ।25।
हवन
करें श्रवणादि इंद्रियॉं
संयमाग्नि में कुछ हैं
कुछ शब्दादि विषय को होमें19 इन्द्रियरूप
अगिन
में ।26।
कुछ सारे इंद्रिय-कर्मों
को और क्रिया प्राणों
की
हवन
करें अपने संयम के योग-अग्नि में ज्ञानज्वलित
।27।
कुछ करते तप- द्रव्य- यज्ञ19 कुछ योग-यज्ञ करते हैं
तीक्ष्णव्रती20
कुछ ज्ञान-यज्ञ21 स्वाध्याय-यज्ञ हैं करते ।28।
कितने प्राणायाम-परायण
प्राण21 अपान21 में होमें
फिर अपान प्राण में होमें रोक अपान-प्राणगति को ।29।
अन्य नियत आहारी करते हुत22 प्राणों
का प्राणों में
करते नष्ट पाप यज्ञ कर यज्ञ जानने वाले ।30।
बचे यज्ञ
से अमृत भोग वे पाते ब्रह्म
सनातन
यज्ञ-अकर्ता को कुरुसत्तम!23
लोक नहीं परलोक कहॉं ।31।
ऐसे बहुविध यज्ञ
वेद-वाणी में कहे हैं
विस्तृत
जान उन्हें वे कर्मजन्य24
हैं, जान मुक्त तू होगा
।32।
ज्ञानयज्ञ है श्रेष्ठ
परंतप! द्रव्य-यज्ञ से जानो
सभी भॉति के कर्म पार्थ! हैं लीन
ज्ञान में होते
।33।
जानो तत्व-ज्ञानियों से सब प्रश्न
प्रणाम सेवा कर
तुझे करेंगे
उपदेशित वे ज्ञान-तत्व के दर्शी
।34।
पांडव!
जिसे जान तुझको फिर मोह न
ऐसा होगा
जिससे सब प्राणी
को देखे अपने में, फिर मुझमें ।35।
यदि तू अधिक पापकर्ता हो सभी पापियों से भी
इसी
ज्ञान की नौका से तू अघ-निधि
पार करेगा ।36।
जैसे
जलती हुई अग्नि है करे
भस्म इंधन को
जला डालती सब कर्मों
को ज्ञान-अग्नि
वैसे ही ।37।
कुछ
भी नहीं पूतकर्ता26 है ज्ञान-सदृश
इस जग में
योगसिद्ध27
पाते हैं ज्ञान यह किते काल से स्व28में ।38।
श्रद्धावान जितेंद्रिय
तत्पर प्राप्त ज्ञान को होते
होकर प्राप्त ज्ञान को तत्क्षण परम शांति
पाते हैं ।39।
# हि.प०- कर्मयोग
को बिस्तार से समझाने के बाद भगवान कहते हैं-जो ‘करें या न करें’ के संशयमें पड़ा रहताहै उसे अपने
संशय को ज्ञान की तलवार से काट देना चाहिए।
श्रद्धारहित
विवेकहीन
संशयी भ्रष्ट हो जाते
संशयात्मा हेतु
नहीं यह लोक सुःख परलोक नहीं ।40।
छूटे कर्म
योग29 से
जिनके ज्ञानछिन्न हो संशय
कर्म नहीं बॉंधते धनंजय! आत्मवंत30
को ऐसे ।41।
अतः हृदयस्थित अपने
अज्ञानजनित संशय को
काट ज्ञानअसि
से योगस्थ हो उठो
युद्ध कर भारत!
।42।
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नाम का चौथा अध्याय समाप्त
1
क्षीण न होने वाले 2. सूर्य 3. पुराने समय में 4. सृष्टि के शुरू में 5. अजन्मा 6.
फल देता 7. गुण कर्म पर आधारित 8.
ब्राह्मण, वैश्य शूद्र 9. मोक्ष चाहने वालों 10. विपरीत कर्म 11. परमात्मा में तृप्त 12. ससार के आश्रय से
रहित 13. आशारहित 14. ख़त्म हो चुकी 15. कर्म करने वाले 16. अर्थ अंत में 17. अभेद
दर्शन रूपी यज्ञ 18. आत्मरूप यज्ञ 19. हवन करें 19. ताप व् द्रव्यरूपी यज्ञ 20.
अहिंसा आदि कठिन व्रत करने वाले 21. स्वाध्याय रूपी ज्ञानयज्ञ 21. प्राण वायु 21. अपां वायु 22. हवन 23. अर्जुन 24. कर्म से
जन्मे 25. पाप का सागर 26. पवित्रकर्ता 27. कर्मयोग से सिद्ध 28. अपनी आत्मा में
29. कर्मयोग विधि से जिसके कर्म छूट गए हैं
30. अंत:करण वाले को
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