Thursday, 29 January 2026

 25-01-2026

ब्लॉग-03


 

                                तीसरा अध्याय

अर्जुन ने सोचा, ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों हमें जीवन की सहज धारा में ले जाने वाले मार्ग है-किंतु केशव इन दोनों के संबंध में मिली जुली बातें कर रहे हैं. ये बातें भ्रम में डाल रही हैं- अतः उन्होंने केशव से प्रार्थना की कि वह इन दोनों में से किसी एक को निश्चित कर करने के लिए कहें, जो उनके (अर्जुन) लिए कल्याणकारी हो. कृष्ण उन्हें बताते हैं कि लोक में ज्ञानमार्ग पर चलने से संन्यास सिद्ध होता है जिसमें कर्म महत्वपूर्ण नहीं रह जाते. किंतु सामान्यतः कर्म किसी से छूटते नहीं. प्रकृति के सत्व, रज और तमगुण सबसे कुछ न कुछ कर्म कराते ही रहते हैं. जब कर्म छूटने ही नहीं हैं तो मनुष्य के लिए कर्मयोग ही श्रेष्ठ मार्ग है. आवश्यक यह है कि अपनी कर्मेंद्रियों को संयमित कर बुद्धि को सम और स्थिर करके अपने स्वधर्म के अनुसार कर्मों को किया जाए.

#रूपान्तरकार–संजय ने धृतराष्ट्र से कहा-हे राजन! भगवान् से ज्ञानयोग और कर्मयोग की बातें सुन अर्जुन ने उसे और विस्तार से समझना चाहा.

अर्जुन ने पूछा:

     ज्ञान  श्रेष्ठ कर्म से  है यदि  तू मानते जनार्दन! 

      फिर क्यों तू इस घोर कर्म में  मुझे लगाते केशव! ।1।

      अपने मिश्र-वचन  से करते बुद्धि मेरी मोहित-सी

      कहो  बात  एक  कर  निश्चित  होए  मेरी भलाई ।2।

# रूपा०-प्रभु ने अर्जुन को अनेक तरह से अपने एक निश्चित मत को समझाया:

श्री भगवान बोले:

       अनघ!1 लोक  में  निष्ठाएं  दो कहा पूर्व में मैंने

       ज्ञानयोग को सांख्य2 बरतते3 कर्मयोग को  योगी ।3।

       न तो  कर्म न करने  से निष्काम भाव नर पाता 

       न ही कर्म के त्यागमात्र से सिद्धि प्राप्त होती है ।4।

       कोई भी कुछ किए बिना न रह सकता है क्षण भर

       प्रकृतिजन्य4 गुण5 कर्म करा लेते परवश प्राणी से ।5।

       कर्मेंन्द्रिय को रोक करे जो विषय-चिंतना6  मन से

       मूढ़बुद्धि  वह  मनुज कहाता झूठ आचरण वाला ।6। 

        मन से कर वश में इन्द्रिय जो अनासक्त हो अर्जुन!

       कर्मेंद्रिय  से  कर्मयोग  जो  आचरता7 वह  उत्तम ।7।

       कर तू कर्म शास्त्र में निश्चित कर्म अकर्म से उत्तम

       कर्म न  करने  से  होगा  निर्वाह  न तेरे तन का ।8।

       यज्ञ-कर्म  से अलग अन्य  कर्मों  से लोक  बॅंधा है

       करो  यज्ञ  के लिए कर्म तू अनासक्त8 हो अर्जुन! ।9।

       यज्ञ सहित  रच प्रजा आदि में  कहा इसे ब्रह्मा ने 

       पाओ वृद्धि यज्ञ से  इस  यह  करे  कामना पूरी ।10।  

 

       करो  यज्ञ से तुष्ट देव को  देव  करें संतुष्ट  तुझे   

       कर संतुष्ट परस्पर निज को परम श्रेय9 को पाओ ।11।

       देंगे देव  भोग प्रिय इच्छित तुझे  बिना  मॉंगे  ही

       उनका दिया न दे उनको जो भोगे स्वयं चोर ही है ।12। 

       खाकर  बचा  अन्न यज्ञ  से   संत  पाप  से छूटें

      पापी  अन्न पकाते निज पोषण को पाप ही  खाते ।13।

       प्राणी सब  उत्पन्न अन्न से अन्न  वृष्टि से होता

       होती वृष्टि  यज्ञ करने  से यज्ञ विहित10 कर्मों से ।14।

       जान कर्म उत्पन्न प्रकृति से प्रकृति परम11से उपजी

       अतः सर्वगत12ब्रह्म्र यज्ञ में सदा अधिष्ठित रहता ।15।  

       यों इस बने  सृष्टि-चक्र के अनु13 जो नहीं बरतता 

       पार्थ! व्यर्थ जीता वह पापी इंन्द्रियसुख का भोगी ।16।

       पर जो  रमणशील14 अपने में  तृप्त  रहे अपने में  

       व अपने में  तुष्ट रहे  कर्तव्य  न कोई  उसको ।17।

       कर्म न  करने या करने से उसको नहीं प्रयोजन 

       सर्वप्राणियों में भी इनका किंचित स्वार्थ न रहता ।18।

       अतः सतत कर्तव्य-कर्म कर अनासक्त होकर तू

       अनासक्त रह कर्म करे जो मनुज परमगति पाता ।19।

       जनक आदि ने कर्मयोग से परम सिद्धि पाई थी

       अतः देखते  लोकहितों को उचित कर्म ही कर तू ।20।

       श्रेष्ठ  मनुज  जो  करें आचरण अन्य करें वैसा ही                   

       कर देते हैं जो प्रमाण वे  लोग आचरित  करते ।21।

       पार्थ! लोक में  तीनों  मेरा कुछ कर्तव्य  नहीं  है

       प्राप्य कोई अप्राप्त नहीं पर कर्म पुनः भी करता ।22।

       क्योंकि पार्थ! यदि कर्म करूँ न सावधान हो मैं तो

       सब  प्रकार अनुसरण करेंगे  मनुज  मार्ग  का मेरे ।23।

       यदि मैं  करूँ न कर्म तो सारे मनुज भ्रष्ट हो जाएँ

       और मैं  होऊॅ  संकरकर्ता15 बनूँ  प्रजा  का नाशक ।24।

       भारत! जैसे कर्म- सक्त16 अज्ञानी  कर्म को  करते     

       अनासक्त  विद्वान करें  त्यों  लोक-भला जो चाहे ।25।

       कर्मासक्त  मूढ़ की मति में  भ्रम न जगाएँ ज्ञानी17

       करें कर्म सब  शास्त्रविहित  जो और कराएँ उनसे ।26।

      कर्म किए जाते हैं  सब ही प्रकृति-गुणों18 के द्वारा

       तो भी  अहंकार  से  मोहित समझे ‘’मैं कर्ता’’ हूँ ।27।

       महाबाहु! गुण-कर्म भिन्न हैं मुझसे  जो यह  जाने 

       गुण ही बरत रहें गुण में ये समझ आसक्त न होता ।28।

       प्रकृति-गुणों से मोहित हो नर खिंचे गुणों कर्मों में

       मंदबुद्धि उन नासमझों को विचलित करें न ज्ञानी ।29।

       तू अध्यात्म बुद्धि से19 मुझमें सभी कर्म अर्पण कर

       आशा-रहित, मोह  छोड़ संतापरहित  हो लड़  तू ।30।

       दोष-दृष्टि  से रहित जो मेरे  इस मत का श्रद्धा से

       करते  हैं  अनुसरण सदा  वे छुटें  कर्म-बंधन से ।31।

       मुझमें  लगा दोष  जो मेरे मत  अनुरूप न चलते             

       जान उन्हें वे सर्वज्ञान के भ्रम में पड़े विनष्ट हुए ।32।

       प्राणी करते  कर्म सभी  अपने स्वभाव के वश  हो

       ज्ञानी का भी कर्म प्रकृतिवश कर सकता क्या कोई ।33।

       इंद्रिय  व  इंद्रिय-विषयों  में  राग-द्वेष  छिपे   हैं

       वश  में हो इनके मनुष्य न विघ्न ये इनके पथ में ।34।

       पूर्ण आचरित अन्य धर्म से धर्म विगुण20वर अपना

       मृत्यु  श्रेयस्कर है स्वधर्म में धर्म अन्य  भयकारक ।35।    

# रूपा० - ये बातें सुनकर अर्जुन के मन में  हुआ कि स्वधर्म  तो स्वभाव से उपजता है फिर मनुष्य पाप किसकी प्रेरणा से करता है

अर्जुन ने पूछा:

      वार्ष्णेय!  किससे प्रेरित  फिर पाप  मनुज करता है

      नहीं  चाहते  हुए भी जैसे  बल  से  कोई  कराता ।36।

श्री भगवान ने कहा:

      जान रजोगुण से उपजे ये  काम  क्रोध  दोनों  ही

      भक्षक  महा   महापापी  ये इन्हें  शत्रु  ही  जानो ।37।

      ढॅंकी  रहे ज्यों अग्नि  धुएँ से  ढॅंके  धूलि से  दर्पण

      गर्भ  ढॅंका झिल्ली से  वैसे  ढॅंका ज्ञान  कामों21  से ।38।

      अग्निसदृश अतृप्त22 काम-सम नित्य वैरियों द्वारा

      ढॅंका हुआ कौंतेय! विवेक  कामना  भरे  ज्ञानी का ।39।

      बसता काम कामना द्वारा   बुद्धि  इंद्रियों मन में

      ढका  विवेक  मोह लेता  देहाभिमानि23 मनुजों को ।40।

      अतः तू पहले वश में  करके इंद्रिय निज भरतर्षभ24!       

      मार डाल काम पापी  को ज्ञान-विज्ञान के नाशक ।41।

      कहते श्रेष्ठ  देह से इंद्रिय  मन है श्रेष्ठ इंद्रियों से

      मन से श्रेष्ठ बुद्धि,बुद्धि से भी जो परे आत्मा है ।42।

      इसप्रकार जो परे  बुद्धि से महाबाहु! पहचान उसे 

      कर अपने को वश अपने तू मार काम-अरि25दुर्जय ।43।

            कर्मयोग नाम का तीसरा अध्याय समाप्त           

1.पापरहित अर्जुन 2. सांख्ययोगी 3. व्यवहार करते हैं  4. प्रकृति से उत्पन्न गुण  5. सत, रज, तम 6. काम वासना का विचार 7. आचरण करता 8. बिना आशाक्ति का 9. कल्याण 10. करने योग्य 11. परमात्मा 12. सर्वज्ञ 13. अनुसार 14. रमण करने वाला 15. वर्णसंकर बनाने वाला 16. कर्म में आसक्त 17. परमात्मा में स्थित 18. सत रज तम गुणों 19. परमात्मा में लगे चित्त से 20. कम गुण वाला 21. इच्छाओं से 22. तृप्त न होने वाला 23. देह के दंभी 24. अर्जुन 24. काम-भावना का शत्रु

 



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