Tuesday, 13 January 2026

 


13-01-2026

ब्लॉग-02

गोरखपुर:

गीता के मूल प्रतिपाद्य को ध्यान में लिया जाए तो गीता दो अध्यायों में ही पूरी हो जाती है. बाक़ी के सोलह अध्यायों में, प्रथम अध्याय में उपदेशित जीवन जीने के दो मार्गों ‘ज्ञानयोग और कर्मयोग’ के सम्बन्ध में अर्जुन के मन में उठे प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं.

यहाँ अध्याय दो दिया जा रहा है.

                           श्रीमद्भभगवद्गीता                                                 

                        दूसरा अध्याय       

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा- महाराज! अर्जुन युद्ध में अपने ही सम्बन्धियों  को लड़ने आए देख कर दुखी हो गए. कृष्ण ने लक्ष्य किया कि उनके विषाद में अपनों के प्रति ममता है. उनके मन में कोई संशय और दुविधा भी है. तब कृष्ण ने कहा- ‘अर्जुन! मैं जो कहता हूँ सुनो. जीवन जीने के दो मार्ग हैं- एक ज्ञानयोग का और दूसरा, कर्मयोग का. ज्ञानयोग में देह को नाशवान माना गया है और आत्मा को अमर. देह में आत्मा के होने से ही देह सक्रिय रहती है. देह के मरने पर वह दूसरी देह में चली जाती है. आत्मा न किसी को मारती है न किसी के द्वारा मारी जाती है.

    कर्मयोग में देह को कुछ न कुछ कर्म करना ही पड़ता है. और देह नाशवान है. तू नाशवान का शोक न कऱ. तू इस युद्ध को लड़. तू स्वभाव से क्षत्रिय है, लड़ना तेरा स्वधर्म है. यह युद्ध तुझे अपने आप प्राप्त हुआ है. इस युद्ध को अपना स्वाभाविक कर्म समझ कर, तू यह युद्ध सबको समान देखने वाली बुद्धि (समबुद्धि) से लड़ क्योंकि तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं. इस योग में अकर्म में भी आसक्ति छोड़नी पड़ती है. बुद्धियोग कर्मयोग से श्रेष्ठ है. समबुद्धि से कर्म करने से तू कर्म के बंधन में नहीं बॅंधेगा.

# अनुवादक- अपनों के प्रति ममता उमड़ने से दुखी हो, हथियार त्याग कर और अर्जुन के रथ में पीछे जा बैठने की बात धृतराष्ट्र को बता कर--                                                           

संजय ने राजन से कहाः

        वैसी दया से भर ऑंसू से भरी  विकल ऑंखों के

         दुखी हो रहे अर्जुन  से उस, बोले  तब मधुसूदन ।1।

श्री कृष्ण ने बोले:

       अर्जुन! विषम  परिस्थिति में इस यह अज्ञान कहॉं से

       यह न आचरण  सत्पुरुषों  का न ही  स्वर्ग-यश दाता ।2।

        छोड़ नपुंसकता को पार्थ! इस, तुझे न यह शोभा दे   

       त्याग  हृदय-दौर्बल्य1  क्षुद्र, उठ युद्धनिमित्त  परंतप! ।3।

# अनु० अर्जुन ने अपने मन में आए संशय को कृष्ण के सामने रखाः    

अर्जुन बोले :

      मधुसूदन! गुरु द्रोण भीष्म से कैसे तीक्ष्ण शरों से   

       युद्ध  करूँगा  युद्धभूमि  में पूज्य हैं  वे अरिसूदन! ।4।

       हत्या न कर परम पूज्य इन  गुरु-महानुभावों की

       भला समझता हूँ मैं लोक में अन्न भीख का खाना

       गुरु को  हत कर अर्थ–कामना2 भरे लोक में  ऐसे 

       भोग  भोगने   हमें  पड़ेंगे  सने  रुधिर  से  उनके ।5।

       नहीं जानता  क्या करना है  श्रेष्ठ   हमारे हित में

       या तो  उन्हें  जीत लें हम  या हमें  जीत लें वे ही

       जिन्हें  मारकर नहीं हमें  इच्छा जीवित रहने की

       वे  ही  सब  धृतराष्ट्र-पुत्र  हैं  खड़े  सामने डट के ।6।

        मैं  कायरतारूप दोष से चोटिल हुए प्रकृति3 का                                    

       मोहचित्त हूँ  धर्म  विषय  में अतः पूछता  तुझसे

        कहो वही जो निश्चित  ही  है मेरे लिए श्रेयस्कर

       मैं हूँ तेरा शिष्य, शरण  तेरी, मुझको  समझाओ ।7।

       मिले यदपि समृद्ध राज्य भी निष्कंटक पृथ्वी का

       या फिर मिले देवताओं का आधिपत्य भी मुझको

       तो भी  नहीं  दीखता  मेरा  शोक  दूर  हो जाए

       सुखा डालने वाला है यह विकल इंद्रियों को इन ।8।

       यों कह  हृषीकेश से फिर उस गुडाकेश ने राजन!        

      कहा करूँगा युद्ध नहीं गोविंद! हुए चुप कह कर ।9।

संजय राजन से बोले:

       हे भारत4! तब उभय सैन्य के मध्य दुखी होते उस

       अर्जुन से  प्रभु  हृषीकेश ने  कहा  वचन  हॅंसते-से ।10।

# अनु०- अर्जुन को मोहमुक्त करने के लिए भगवान ने हॅंसते हुए पहले ज्ञानयोग स्मझाया- ‘’यह देह नाशवान है आत्मा इसे गति देती है. आत्मा अमर है. यह न किसी को मारती है न किसी के द्वारा मारी जाती है.  तू युद्ध कर.

श्री भगवान बोले :

       तू  अशोच्य का  शोक करे व  बात करे  पंडित-सी

       प्राण रहें या जाए  किसी का पंडित शोक न करते ।11।

       ऐसा  तो  है  नहीं  पूर्व में  मैं था नहीं न भूप न तू

       और न  ऐसा  ही है   हम  अब आगे पुनः    होंगे ।12।

        ज्यों देही की देह में होती  बाल्य  युवा जरावस्था5    

       मिलती देह अन्य त्यों उसको धीरपुरुष न मोह करें ।13।

       इंद्रिय विषय6 योग देते हैं  सर्द-गर्म -सा सुख दुःख

       ये  अनित्य  आते जाते  हैं, भारत!  इन्हें  सहन कर ।14।

       पुरुषर्षभ7! जो सुखदुख में सम धीर न इनसे विचले

       वह  समर्थ होता  पाने में  अमृत-तत्व  की  स्थिति ।15।

       सत का नहीं अभाव, नहीं  है असत वस्तु की सत्ता  

       तत्वदर्शियों   ने   देखे   हैं   तत्व - रुप   दोनों   के ।16।  

       अविनाशी तू जान उसे यह  जगत व्याप्त है जिससे

       कोई  नहीं  समर्थ नाश कर दे इस  नाशरहित  का ।17।

       नित्य अनाशी अप्रमेय8 इस देही9 को ये प्राप्त शरीर   

       कहे  गये  हैं  नाशवान  तू  अतः युद्ध  कर  भारत! ।18।     

       जो   जाने  देही7  हतकर्ता10, माने  मरा  इसे  जो  

       दोनों  नहीं   जानते  यह    हते,  हता   जाए ।19। 

       यह न जन्मता मरे नहीं, न हो उत्पन्न फिर11 होवे   

       नित्य अजन्मा पुरा12  सनातन  मारे देह  न मरता ।20।   

       पुरुष जो जाने इसे अजन्मा नित्य  अनाशी अव्यय

       पार्थ!  किसी   को  मारे   कैसे      कैसे  मरवाए ।21।

       जैसे  त्याग  जीर्ण13 वस्त्रों को  अन्य नया नर धारे          

       वैसे  ही तज  जीर्ण  देह  धारता14 नया  तन   देही ।22।

       इसे न शस्त्र  काट सकते  न अनल जला  सकते  हैं

       वायु न इसे सुखा  सकता न गला सके  जल इसको ।23।

       इसे न काटा, गला, जला या  सोखा जा सकता है

       अचल  नित्य  सर्वव्यापी  यह  स्थिर और सनातन ।24।

       यह अचिंत्य15अव्यक्त विकारोंरहित कहा है इसको

       अतः जान ऐसा  देही को, शोक न उचित तुम्हारा ।25।

       यदि  तू  माने  नित्य जन्मता  नित्य  मरे देही  भी

       तो  भी  महाबाहु! चाहिए शोक  न करना तुझको ।26।

       जन्मे की  है  मृत्यु अटल व निश्चित जन्म  मरे  का

       अतः जो होकर ही रहना है शोक न कर  तू उसका ।27।

       प्राणी सब अप्रकट  आदि में  प्रकट मघ्य में भारत! 

       होंगें  फिर अदृश्य मरे पर शोक  पुन:  क्यों उनका ।28।

       इसे16 कोई विस्मय-सा देखे कहे  कोई अचरज  से

       कोई  इसे  सुने अचरज-सा   सुन भी कोई न जाने ।29।

       नित  अबध्य भारत! देही यह जान देह में  सबकी

       अतः चाहिए  किसी प्राणि के लिए न शोक करे तू ।30।

# अनु०-कृष्ण ने कहा- ज्ञानयोग का एक पक्ष स्वधर्म को निभाना भी है. तुम्हारा स्वभाव है लड़ना- तू क्षत्रिय है- तू निस्संकोच क्षत्रिय धर्म निभा.

       क्षत्रिय हो तू  देख स्वधर्म भी ठीक नहीं विचलना

       धर्म्य  युद्ध से बढ़  क्षत्रिय  का कर्म  नहीं  श्रेयस्कर ।31।      

       तुझे युद्ध यह  स्वतः प्राप्त  है स्वर्ग-कपाट  खुला है  

       भाग्यवान क्षत्रिय  ही पाते पार्थ! युद्ध  यह अनुपम ।32।  

        अब यदि तू यह युद्ध  धर्ममय नहीं करे, तो अपना

       खो करके  स्वधर्म, कीर्ति, तू  प्राप्त पाप  को  होगा ।33।

       तब अकीर्ति17 तेरी सुदीर्घ सब लोग कहेंगे बढ़ चढ़ 

       यह  अपकीर्ति मृत्यु से बढ़  है सम्मानित वीरों को ।34।

 

       महारथी  समझेंगे  डर  तू  भाग  गया  इस रण से

       जिनमें  तू बहुमान्य वही  सब समझेंगे लघु तुझको ।35।

       निंदा  कर   तेरे  सामर्थ्य   की   शत्रु   कहेंगे  बातें 

       कहनी जो चाहिए नहीं  है दुख क्या  इससे बढ़कर ।36।

       रण में मरा तो स्वर्ग  मिलेगा जीत मही-सुख भोगे

       अतः उठो  कौंतेय!  युद्ध के लिए  पूर्ण  निश्चय कर ।37।

       समझ समान लाभ-हानि व हार-जीत सुखदुख को

       उठ, हो जा  तैयार युद्ध  को   पाप न तुझे  लगेगा ।38।

# अनु०- ज्ञानयोग के बाद भगवान ने अर्जुन को कर्मयोग को समझाया। कहा-अर्जुन! कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में नहीं. युद्ध भी एक कर्म है. तू इस युद्धकर्म में समबुद्धि से लग जा. आसक्ति न कर्म में हो न अकर्म में.

       कही  बुद्धि यह  ज्ञानयोग में  कर्मयोग में सुन अब

       वह समबुद्धि पार्थ! जुड़ जिससे  कर्म-बंध  त्यागेगा ।39।

       कर्म किए आरम्भ का इसमें नाश न, विघ्न  न आगे    

        इसका अल्पाचरण  बचा ले तुझको  महती भय से ।40।

        कुरुनंदन! इस मार्ग में होती वुद्धि एक निश्चयकर18       

       होते जो अधीर नर, उनकी  बुद्धि अनंत  बहुशाखी ।41।

       कहते  हैं  ये  बात  दिखाऊ  पार्थ!  मूढ़  अविवेकी  

       सिवा   कुछ  वेदोक्त  काम-कर्मों के  व भोगों के  ।42।  

       मानें  श्रेष्ठ  स्वर्ग  को  जो  वे  खुले  कहा  करते  हैं

       ऐसी बहुत  क्रियाएँ हैं जो दे  भोगैश्वर्य  जनम-फ़ल ।43।

       इस  वाणी  से  खिंचे  लीन  जो  भोगैश्वर्य  में पूरा

       उनके  अंतस्तल  में   होती  बुद्धि   निश्चयवाली ।44।     

       त्रिगुण19विषय से भरे वेद हो त्रिगुणातीत तू अर्जुन!

       द्वंद्वरहित निर्योग-क्षेम20 बन आत्मवान नितस्थित21 ।45।

       भरे  जलाशय  के  समक्ष  जो  रखे अर्थ  गड्ढा-जल

       वेदों से  उतना ही अर्थ  है  ब्रह्मज्ञानि22  का  होता ।46।

       तेरा बस  अधिकार कर्म करने में  कभी न फल में

       मत  हो  हेतु  कर्मफल का  न हो अकर्म  को आतुर ।47।

       तू असिद्धि सिद्धि23में सम हो हो योगस्थ धनंजय!

       कर्म  करो आसक्ति त्याग  है कर्मयोग  समता ही ।48।

        कर्म सकाम है निम्न धनंजय! समता-मति से जानो

       ले तू शरण समत्वबुद्धि की, दीन जो बने फलार्थी ।49।

       साम्यबुद्धि से युक्त मनुज जो पुण्य पाप को त्यागे

       इससे  लगो समत्वयोग में योग है  कर्म-कुशलता ।50

       क्योंकि त्याग  कर्मफल को  संबुद्ध पुरुष जो होते             

        मुक्त  जन्म-बंधन से  हो कर  निर्विकार पद पाते ।51।           

 

        पार करेगी बुद्धि  तेरी जब मोहरूप  दलदल को 

       तू  विरक्त  होगा उन  बातों  से जो सुना, सुनोगे ।52। 

       सुन नाना  मत घबराई जब बुद्धि  तेरी हो स्थिर    

       अचल परम में ठहरे तब तू प्राप्त योग24 को होगा ।53।

# अनु०-कर्मयोग की बातों में भगवान ने स्थितप्रज्ञों की बात की है. अर्जुन ने यह सुन उनसे उन स्थितप्रज्ञों के लक्षणों को जानना चाहा-

अर्जुन ने कहा:

      स्थितप्रज्ञ समाधि-स्थित के केशव! क्या लक्षण हैं

      स्थिरबुद्धि   बोलते   कैसे   चलें      बैठें   कैसे ।54।

# अनु०-भगवान ने उन्हें स्थितिप्रज्ञों के लक्षण बतलाएः

श्री भगवान ने कहा:

      पार्थ! जो  छोड़े  मन में आई  सभी  वासनाओं को  

      तुष्ट रहे  जो  निज  में  निज  से  स्थिरप्रज्ञ  वही है ।55।

      दुख में मन में खेद न जिसके लोभ नहीं हो सुख में

      क्रोध प्रीति भय छोड़ चुके मुनि स्थिर-बुद्धि कहाते ।56।

      सब बातों में संगरहित जो, इन उन शुभअशुभों को

      पाकर जो  न प्रसन्न  न द्वेषी उसकी  बुद्धि सुस्थिर ।57। 

      जैसे  सभी ओर से  कछुआ स्वांगों को  सिमटा ले

      विषयों से  इंद्रिय  खीचे जो बुद्धि  उसी की स्थिर ।58।

      छूटे  विषय   निराहारी  के चाह  न छूटे  रस की

      पर इनका छूटे  यह रस भी  परमब्रह्म  अनुभव से ।59। 

      क्योंकि नष्ट आसक्ति न हो  कौंतेय! यत्नरत नर की

      हरतीं उसकी प्रबल इन्द्रियाँ बलपूर्वक उसका मन ।60।

      सभी  इंद्रियों को वश कर  हो  योगी मेरे परायण

      होती स्ववश इंद्रियॉं जिसकी बुद्धि उसी की स्थिर ।61। 

      विषयों  की  चिंता करते जो  वे आसक्त  हो उनमें

      काम उपजता है आसक्ति से क्रोध काम-बाधा25 से ।62।

      जगता मोह क्रोध से करता मोह भ्रमित स्मृति को

      बुद्धिनाश स्मृति में भ्रम  से  पतन बुद्धि  के क्षय से ।63।

      अंतः  जिसका  वश में हो  जो  राग-द्वेषरहित  हो

      विषय-लिप्त स्ववशी इंद्रिय से,मन-प्रसन्नता पाता ।64।

      हो जाता है  मन प्रसन्न जब नाश  दुखों का होता

      स्थिर होती  बुद्धि शीघ्र उस विमलचित्त वाले की ।65।

      असंयमित चित्त में निश्चयबुद्धि  नहीं भावना नहीं

      शांति नहीं भावनाहीन को  शांति बिना सुख कैसे ।66।

      विषयलिप्त  इंद्रियों  में  से  मन जिसके  संग होता  

      हरती वह प्रज्ञा मनुष्य की ज्यों प्रवायु26जल-नौका ।67।

      अतः इंद्रियॉं  हटी हुईं  इंद्रिय-विषयों27 से जिनकी

      महाबाहु!  कहते  उनकी   है   बुद्धि  पूर्णतः स्थिर ।68।

       होती रात प्राणि  की जो  संयमी  जागता  उसमें               

       जिसमें  प्राणि  जागते  जानें  रात उसे ज्ञानी जन ।69।      

   जलापूर्ज28 निधि को अविचल रख ज्यों नदि-नीर समाता  

   भोग समाए त्यों29 जिस नर में, पाता शम, न भोगेच्छुक ।70।      

     छोड़  कामना  मनुज रहे  लालसारहित  जो जग में 

     जिसमें  अहं न  ममता हो  वह प्राप्त शांति को होता ।71।

     पार्थ! यही  ब्राह्मी31 स्थिति है पा न कोई मोहित हो  

     मरते   समय  यही  स्थिति  हो  उसे ब्रह्म मिलता है ।72।

            सांख्ययोग नाम का दूसरा अध्याय समाप्त

शब्दार्थ:  1हृदय की दुर्वलता 2. धन की इच्छा  3. स्वभाव 4. राजा धृतराष्ट्र  5. वृद्धावस्था  6. इन्द्रियों के विषय 7. पुरुषों में श्रेष्ठ 8. प्रमाणित न किया जा सके 9. देह में रहे वाला 10. ह्त्या करने वाला 11. फिर जन्म न ले 12. पुराना 13. पुराने 14. ग्रहण करता 15. चिंता से परे 16. देही (आत्मा) को 17. अपयश 18. कार्य अकार्य का निर्णय करने वाल बुद्धि  19. सत, रज, तम गुण 20. योग क्षेम से रहित 21. परमात्मा में स्थित 22. ब्रह्मज्ञानियों 23. कर्म सिद्ध हो या असिद्ध  24. साम्यबुद्धि रूपी योग  25. वासना में विघ्न पड़ने से  26. जोर की हवा 27. इन्द्रियों के विषय 28. जल से भरा 29. स्थितप्रज्ञ को विचल किए बिना 30. शांति 31. ब्रह्म पाने की

हिन्दी पद्य में रूपांतरण :

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

Email- sheshnaath250@gmail.com

Blog link- sheshnath-anushesh.blogspot.com


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